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सर्वकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 504

४९४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
दिन जो विधान आवश्यक है, उसे सुनो।
विप्रवर ! नब्बे हजार अक्षत कमलकी आहुति दे
और यत्नपूर्वक नौ हजार ब्राह्मणोंको उत्तम,
स्वादिष्ट एवं मीठे अन्न भोजन करावे। नौ हजार
सात सौ बीस फल तथा नाना प्रकारके मनोहर
द्रव्यका नैवेद्य अर्पण करे। इसके बाद संस्कारयुक्त
अग्निकी स्थापना करके विद्वान् पुरुष होम करे।
घृतयुक्त तिलकी नब्बे हजार आहुतियाँ देकर
ब्राह्मणोंको भक्तिभावसे वस्त्र, भोजन, यज्ञोपवीत
और फलसहित अन्न और तिलके लड्डू दे। उन
लड्डुओंको गन्ध-पुष्पसे अर्चित करके देना
चाहिये। साथ ही शीतल जलसे भरे हुए नब्बे
कलशोंका भी दान करना चाहिये। इस प्रकार
व्रत करके ब्राह्मणको दक्षिणा देनी चाहिये।
दक्षिणाका परिमाण वही है, जो वेदोंमें बताया
गया है। एक हजार बैल हों और उनके सींगोंमें
सोना मढ़ा गया हो। ब्रह्मन् ! इस प्रकार 'त्रैमासिक'
व्रत बताया गया। इस व्रतका अनुष्ठान कर लिया
जाय तो यह विशिष्ट संतति देनेवाला और
पतिसौभाग्यकी वृद्धि करनेवाला होता है। इस
व्रतके प्रभावसे सौ जन्मोंतक नारीका अखण्ड
सौभाग्य बना रहता है और निश्चय ही वह सौ
जन्मोंतक सत्पुत्रकी जननी होती है। उसका कभी
पति और पुत्रसे वियोग नहीं होता। पुत्र दासकी
भाँति उसकी आज्ञाका पालक होता है तथा पति
भी उसकी बातको माननेवाला होता है। वह सती
नारी प्रतिक्षण श्रीराधा-कृष्णकी भक्तिसे सम्पन्न
होती है। व्रतके प्रभावसे उसको ज्ञान तथा श्रीहरिकी
स्मृति प्राप्त होती है। इस सामवेदोक्त व्रतका
पूर्वकालमें हम दोनोंने भी पालन किया था। ब्रह्मन् !
दूसरी स्त्रियोंद्वारा उस व्रतका अनुष्ठान होता देख
पार्वतीदेवीने प्रसन्नतापूर्वक दोनों हाथ जोड़ भक्तिभावसे
सिर झुकाकर भगवान् शंकरसे कहा।
पार्वती बोलीं- जगन्नाथ ! आज्ञा कीजिये।
मैं उत्तम व्रतका पालन करूँगी। हम दोनोंके
इष्टदेव श्रीहरिके व्रतोंमें यह श्रेष्ठ व्रत है। नाथ !
श्रीहरिकी आराधना समस्त मङ्गलोंकी कारणरूपा
है। यज्ञ, दान, वेदाध्ययन, तीर्थसेवन और पृथ्वीकी
परिक्रमा-ये सब श्रीहरिकी आराधनाकी सोलहवीं
कलाके भी बराबर नहीं हैं। जिसके बाहर और
भीतर प्रतिक्षण श्रीहरिकी स्मृति बनी रहती है,
उस जीवन्मुक्त पुरुषके दर्शनसे ही मुक्ति प्राप्त हो
जाती है। उसके चरणकमलोंकी धूल पड़नेसे
वसुधा उसी क्षण शुद्ध हो जाती है तथा उसके
दर्शनमात्रसे तीनों लोक पवित्र हो जाते हैं। ब्रह्मा,
विष्णु, धर्म, शेषनाग, आप महेश्वर और गणेश-
ये सब लोग जिनके चरणकमलोंका चिन्तन
करते-करते उन्हींके समान महातेजस्वी हो गये
हैं। जो जिसका सदा ध्यान करता है, वह निश्चय
ही उसे प्राप्त कर लेता है। इतना ही नहीं-ध्याता
पुरुष गुण, तेज, बुद्धि और ज्ञानकी दृष्टिसे अपने
ध्येयके समान ही हो जाता है। श्रीकृष्णके
चिन्तन, तप, ध्यान और सेवासे मैंने आप-जैसा
स्वामी और पुत्र भी प्राप्त किया है। मुझे अनायास
ही सब कुछ मिल गया। मेरा मनोरथ पूर्ण हो
गया। मुझे आप-जैसे स्वामी मिले। कार्तिकेय
और गणेश-जैसे पुत्र प्राप्त हुए तथा श्रीकृष्णके
अंशस्वरूप हिमवान्-जैसे पिता मिले। प्रभो! मेरे
लिये कौन-सी वस्तु दुर्लभ है?
पार्वतीकी यह बात सुनकर भगवान् शंकर
बहुत प्रसन्न हुए। उनका शरीर पुलकित हो उठा
और वे हँसकर मधुर वाणीमें बोले।
श्रीमहादेवजीने कहा- ईश्वरि ! तुम
महालक्ष्मीस्वरूपा हो। तुम्हारे लिये क्या असाध्य
है? तुम सर्वसम्पत्स्वरूपा और अनन्तशक्तिरूपिणी
हो। देवि! तुम जिसके घरमें हो, वह सम्पूर्ण
ऐश्वर्यका भाजन है। शुभप्रदे! मैं, ब्रह्मा और विष्णु
तुममें भक्ति रखकर तुम्हारे कृपाप्रसादसे ही
संसारकी सृष्टि, पालन और संहारमें समर्थ हुए
हैं। हिमालय कौन है? मेरी क्या बिसात है