ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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तत्पर रहते हैं; प्रायः सभी मनमाना आचरण
करने लगते हैं। जबतक तीर्थ वर्तमान हैं, जबतक
सत्पुरुष स्थित हैं और जबतक ग्रामदेवता, शास्त्र
तथा पूजा-पद्धति मौजूद है; तभीतक कुछ-कुछ
तप, सत्य तथा स्वर्गदायक धर्मका अंश विद्यमान
रहता है।
तात ! दोषके भण्डाररूप इस कलियुगका
एक महान् गुण भी है, इसमें मानसिक धर्म
पुण्यकारक होता है, परंतु मानसिक पाप नहीं
लगता *। पिताजी ! कलियुगके अन्तमें अधर्म
पूर्णरूपसे व्याप्त हो जायगा। उस समय चारों वर्ण
मिलकर एक वर्ण हो जायेंगे। न वेदमन्त्रोच्चारणसे
पवित्र विवाह होगा और न सत्य तथा क्षमाका ही
अस्तित्व रह जायगा। ग्राम्यधर्मकी प्रधानतासे
विवाह सदा स्त्रीकी स्वीकृतिपर ही निर्भर
करेगा। ब्राह्मण सदा यज्ञोपवीत और तिलक नहीं
धारण करेंगे। वे संध्या-वन्दन और शास्त्रोंसे हीन
हो जायेंगे। उनका वंश सुननेमात्रको रह जायगा।
सब लोग अनियमित रूपसे सबके साथ बैठकर
भोजन करेंगे। चारों वर्णोंके लोग अभक्ष्यभक्षी
और परस्त्रीगामी हो जायेंगे। स्त्रियोंमें कोई
पतिव्रता नहीं रह जायगी। घर-घरमें कुलटा ही
दीख पड़ेंगी; वे अपने पतिको नौकरकी तरह
डराती-धमकाती रहेंगी। पुत्र पिताकी और शिष्य
गुरुकी भर्त्सना करेगा। प्रजाएँ राजाको और राजा
प्रजाओंको पीडित करता रहेगा। दुष्ट, चोर और
लुटेरे सत्पुरुषोंको खूब कष्ट देंगे। पृथ्वी अन्नसे
हीन और गायें दूधरहित हो जायँगी। दूधके कम
हो जानेपर घी और माखनका सर्वथा अभाव हो
जायगा। सभी मनुष्य सत्यहीन हो जायँगे और
वे सदा झूठ बोलेंगे। ब्राह्मण पवित्रता, संध्या-
वन्दन और शास्त्रज्ञानसे हीन होकर बैलोंको
जोतेंगे, रसोइयाका काम करेंगे और सदा शूद्रामें
लवलीन रहेंगे। शूद्र ब्राह्मण-पत्नियोंसे प्रेम करेंगे।
रसोइया तथा लम्पट शूद्र जिस ब्राह्मणका अन्न
खायेंगे, उसकी सुन्दरी पत्नीको हथिया लेंगे।
नौकर राजाका वध करके स्वयं राजा बन बैठेंगे।
सभी लोग स्वच्छन्दाचारी, शिश्नोदरपरायण, पेटू,
रोगग्रस्त, मैले-कुचैले, खण्डित मन्त्रोंसे युक्त और
मिथ्या मन्त्रोंके प्रचारक होंगे। जातिहीन, अवस्थाहीन
और निन्दक गुरु होंगे। धर्मकी निन्दा करनेवाले
यवन और म्लेच्छ राजा होंगे; वे हर्षपूर्वक
सत्पुरुषोंकी उत्तम कीर्तिको भी समूल नष्ट कर
देंगे। लोग पितरों, देवताओं, द्विजातियों, अतिथियों,
गुरुजनों और माता-पिताकी पूजा नहीं करेंगे; वे
सदा स्त्रीकी ही आवभगतमें लगे रहेंगे।
पिताजी ! स्त्रियोंके भाई-बन्धुओं तथा
स्त्रियोंका ही सदा गौरव होगा। उत्तम कुलमें
उत्पन्न लोग चोर और ब्राह्मण तथा देवताके
द्रव्यका हरण करनेवाले होंगे। कलियुगमें लोग
कौतुकवश लोभयुक्त धर्मसे मानको धारण
करेंगे। सारा जगत् देव-मन्दिरोंसे शून्य तथा
भयाकुल हो जायगा। कलिके दोषसे सदा
दुर्नीतिके कारण अराजकता फैली रहेगी।
मनुष्य भूखे, मैले-कुचैले, दरिद्र और रोगग्रस्त
हो जायँगे। जो पहले अशर्फियोंके घटके
स्वामी थे, वे राजालोग कौड़ियोंके घड़ोंके
मालिक हो जायँगे। गृहस्थोंके घरोंकी शोभा
नष्ट हो जायगी; वे सभी जल रखनेके पात्र,
अन्न और वस्त्रसे शून्य, दुर्गन्धसे व्याप्त,
दीपकसे रहित तथा अन्धकारयुक्त हो जायँगे।
सभी मनुष्य पापपरायण तथा हिंसक जन्तुओंसे
- कलेर्दोषनिधेस्तात गुण एको महानपि। मानसं च भवेत् पुण्यं सुकृतं न हि दुष्कृतम् ॥
(१०।२९)
कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा ॥
(श्रीरामचरितमानस ७। १०३। ८)