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सर्वकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 291

प्रकृतिखण्ड २८१

उत्पत्तिके स्थानभूत वे महाविष्णु भी सदा श्रीकृष्णकी इच्छासे प्रकृतिके गर्भसे अण्डरूपमें प्रकट होते हैं। सबके आधारभूत वे महाविष्णु भी कालके स्वामी सर्वेश्वर परमात्मा श्रीकृष्णका सदा चिन्तन किया करते हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंमें स्थित ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि तथा महान् विराट् और क्षुद्र विराट् इन सबकी बीजरूपा जो मूलप्रकृति ईश्वरी है, वह प्रलयकालमें कालेश्वर श्रीकृष्णमें लीन होती है तथा सदा उन्हींका ध्यान किया करती है। यह सब परम दुर्लभ महाज्ञान तुम्हें बताया गया है। गुरुदेव शिवने यह ज्ञान मुझे दिया था। इसे तो तुमने सुन लिया। अब और क्या सुनना चाहते हो?

(अध्याय ५३)


गोलोक एवं श्रीकृष्णकी उत्कृष्टता, कालमान एवं विभिन्न प्रलयोंका निरूपण, चौदह मनुओंका परिचय, ब्रह्मासे लेकर प्रकृतितकके श्रीकृष्णमें लय होनेका वर्णन, शिवका मृत्युञ्जयत्व, मूलप्रकृतिसे महाविष्णुका प्रादुर्भाव, सुयज्ञको विप्रचरणोदकका महत्त्व तथा राधाका मन्त्र बताकर सुतपाका जाना, पुष्करमें राजाकी दुष्कर तपस्या तथा राधामन्त्रके जपसे सुयज्ञका श्रीराधाकी कृपासे गोलोकमें जाना और श्रीकृष्णका दर्शन एवं कृपाप्रसाद प्राप्त करना

**राजाने पूछा—**मुनीश्वर! सभी कालसे भयभीत रहते हैं तो उनका आधार कहाँ है? कालकी माया कितनी है? क्षुद्र विराट्की आयु कितने कालकी है? ब्रह्मा, प्रकृति, मनु, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य तथा अन्य प्राकृत जनोंकी परमायु क्या है? वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! उनकी वेदोक्त आयुका भलीभाँति विचार करके मेरे समक्ष वर्णन कीजिये। महाभाग! समस्त विश्वोंके ऊर्ध्वभागमें कौन-सा लोक है? यह बताइये और मेरे संदेहका निवारण कीजिये।

**मुनि बोले—**राजन्! सम्पूर्ण विश्वोंके ऊर्ध्वभागमें गोलोक विद्यमान है, जो आकाशके समान विस्तृत है। वह श्रीकृष्णकी इच्छासे प्रकट हो सदा नित्य-अण्डके रूपमें प्रकाशित होता है। भूपाल! आदिसर्गमें सृष्टिके लिये उन्मुख हो अपनी कलास्वरूपा प्रकृतिके साथ संयुक्त श्रीकृष्ण जब क्रीडापरायण होकर लीलासे ही थकानका अनुभव करते हैं, उस समय उनके मुखमण्डलसे निर्गत पसीनेकी बूँदोंसे जो जलराशि प्रकट होती है, उसीके द्वारा गोलोकधाम जलसे परिपूर्ण रहता है। प्रकृतिके गर्भसे संयुक्त एवं अण्डाकारमें उत्पन्न जो विश्वके आधारभूत महाविष्णु (या महाविराट्) हैं, उनका आधार वहाँ उपर्युक्त विस्तृत गोलोकधाम ही है। अत्यन्त विस्तृत जलाधार (अथवा जलशय्या)-पर शयन करनेवाले जो महाविराट् हैं, वे श्रीराधावल्लभ श्रीकृष्णका सोलहवाँ अंश कहे गये हैं। उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति दूर्वादलके समान श्याम है। उनके मुखपर मन्द मुसकान खेलती रहती है। उनके चार भुजाएँ हैं। वे वनमाला धारण करते हैं। श्रीमान् महाविष्णु पीताम्बरसे सुशोभित हैं। सर्वोपरि आकाशमें श्रीविष्णुका नित्य वैकुण्ठधाम है, जो आत्माकाशके समान नित्य तथा चन्द्रमण्डलके तुल्य विस्तृत है। ईश्वरकी इच्छासे उसका आविर्भाव हुआ है।