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सर्वकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 283

प्रकृतिखण्ड २७३
दर्शन पाना आपके लिये भी अत्यन्त कठिन है,
उन्हीं पुरातनी महालक्ष्मी श्रीराधादेवीका दर्शन
राजा सुयज्ञने कैसे किया ? वे मनुष्योंके दृष्टिपथमें
कैसे आयीं ? तीनों लोकोंके स्रष्टा ब्रह्माने राजा
सुयज्ञको श्रीराधाका कवच किस प्रकार दिया ?
उनके ध्यान, पूजन-विधि तथा स्तोत्रका उपदेश
कैसे दिया ? यह सब बतानेकी कृपा कीजिये।
श्रीमहादेवजी बोले- देवि ! चौदह मनुओँमें
जो सबसे प्रथम हैं, उन्हें स्वायम्भुव मनु कहते हैं।
वे ब्रह्माजीके पुत्र और तपस्वी कहे गये हैं।
उन्होंने शतरूपासे विवाह किया था। मनु और
शतरूपाके पुत्र उत्तानपाद हुए। उत्तानपादके पुत्र
केवल ध्रुव हैं। गिरिराजनन्दिनि ! ध्रुवकी कीर्ति
तीनों लोकोंमें विख्यात है। ध्रुवके पुत्र उत्कल
हुए, जो भगवान् नारायणके अनन्य भक्त थे।
उन्होंने पुष्करतीर्थमें एक हजार राजसूय-यज्ञोंका
अनुष्ठान किया था, उस यज्ञमें सारे पात्र रत्नोंके
बने हुए थे। राजाने बड़ी प्रसन्नताके साथ वे
सब पात्र ब्राह्मणोंको दान कर दिये थे।
यज्ञान्तमहोत्सवमें राजाने बहुमूल्य वस्त्रोंकी सहस्रों
राशियाँ जो तेजःपुञ्जसे उद्भासित होती थीं,
ब्राह्मणोंको बाँट दीं। प्रिये ! उस सुन्दर यज्ञको
देखकर ब्रह्माजीने देवसभामें राजा उत्कलका नाम
सुयज्ञ रख दिया। राजा सुयज्ञ अन्न, रत्न तथा सब
प्रकारकी सम्पत्तियोंके दाता थे। वे प्रतिदिन
प्रसन्नतापूर्वक उचित दक्षिणाके साथ ब्राह्मणोंको
दस-बारह लाख गौएँ दानमें देते थे। उन गौओंके
सींग रत्नोंसे मढ़े होते थे तथा दुग्धपात्र आदि
सामग्री भी रत्नमयी ही होती थी। वे प्रतिदिन छः
करोड़ ब्राह्मणोंको भोजन कराया करते थे। उन्हें
प्रतिदिन चूसने, चबाने, चाटने और पीनेयोग्य
भोजनसामग्री देकर तृप्त करते थे। नित्यप्रति एक
लाख रसोइयोंको भोजन दिया करते थे। पूआ,
रोटी-चावल आदि अन्न, दाल आदि व्यञ्जन
दहीके साथ परोसे जाते थे। उस भोजनसामग्रीमें
मांसका सर्वथा अभाव होता था। ब्राह्मणलोग
भोजनके समय मनुवंशी राजा सुयज्ञकी ही नहीं,
उनके पितरोंकी भी स्तुति करते थे। सुन्दरि !
यज्ञके दिनोंमें तथा उसकी समाप्तिके दिन कुल
मिलाकर छत्तीस लाख करोड़ ब्राह्मणोंने अत्यन्त
तृप्तिपूर्वक सु-अन्न भोजन किया था। उन्होंने
दक्षिणामें इतने रत्न ग्रहण किये थे कि उन सबको
अपने घरतक ढो ले जाना उनके लिये असम्भव
हो गया था। कुछ तो उन्होंने शूद्रोंको बाँट दिया
और कुछ रास्तेमें छोड़ दिया। ब्राह्मण-भोजनके
अन्तमें राजाने ब्राह्मणेतरोंको भी भोजन दिया
तथापि वहाँ अन्नकी सहस्रों राशियाँ शेष रह गयीं।
इस प्रकार यज्ञ करके महाबाहु राजा सुयज्ञ
अपनी राजसभामें रमणीय रत्न-सिंहासनपर बैठे
हुए थे। वह सिंहासन रत्नेन्द्रसारसे निर्मित अनेक
छत्रोंसे सुशोभित था। उसे अच्छी तरह सजाया
गया था। उसपर चन्दन आदि सुगन्धित वस्तुओंका
लेप हुआ था। चन्दनपल्लवोंसे उसकी रमणीयता
और बढ़ गयी थी। वहाँ वसु, वासव, चन्द्रमा, इन्द्र,
आदित्यगण, मुनिवर नारद तथा बड़े-बड़े देवता
विराजमान थे। इसी समय वहाँ एक ब्राह्मण आया,