सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

८२- इन्द्रके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णका स्तवन

५२६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मध्या नाड़ीके पास ले आये। उस वायुको घुमाकर विधाताने मध्या नाड़ीके साथ संयुक्त कर दिया। ऐसा करके वे निष्पन्द (निश्चल) हो गये और पूर्वकालमें श्रीहरिने जिसका उपदेश दिया था, उस परम उत्तम दशाक्षर-मन्त्रका जप करने लगे। मुने! श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंका ध्यान करते हुए एक मुहूर्ततक जप करनेके पश्चात् ब्रह्माने अपने हृदयकमलमें उनके सर्वतेजोमय स्वरूपको देखा। उस तेजके भीतर अत्यन्त मनोरम रूप था, दो भुजाएँ, हाथमें मुरली और पीताम्बरभूषित श्रीअङ्ग। कानोंके मूलभागमें पहने गये मकराकृति कुण्डल अपनी उज्ज्वल आभा बिखेर रहे थे। प्रसन्न मुखारविन्दपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। भगवान् भक्तपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ते थे। ब्रह्माजीने ब्रह्मरन्ध्रमें जिस रूपको देखा और हृदयकमलमें जिसकी झाँकी की, वही रूप बाहर भी दृष्टिगोचर हुआ। वह परम आश्चर्य देखकर उन्होंने उन परमेश्वरकी स्तुति की। मुने! पूर्वकालमें एकार्णवके जलमें शयन करनेवाले श्रीहरिने ब्रह्माजीको जिस स्तोत्रका उपदेश दिया था, उसीके द्वारा विधाताने भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर उन परमेश्वरका विधिवत् स्तवन किया।

ब्रह्माजी बोले— जो सर्वस्वरूप, सर्वेश्वर, समस्त कारणोंके भी कारण तथा सबके लिये अनिर्वचनीय हैं; उन कल्याणस्वरूप श्रीकृष्णको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनका श्रीविग्रह नवीन मेघमालाके समान श्याम एवं सुन्दर है, जो सम्पूर्ण जीवोंमें स्थित रहकर भी उनसे लिप्त नहीं होते, जो साक्षीस्वरूप हैं, स्वात्माराम, पूर्णकाम, विश्वव्यापी, विश्वसे परे, सर्वस्वरूप, सबके बीजरूप और सनातन हैं; जो सर्वाधार, सबमें विचरनेवाले, सर्वशक्तिसम्पन्न, सर्वाराध्य, सर्वगुरु तथा सर्वमङ्गलकारण हैं। सम्पूर्ण मन्त्र जिनके स्वरूप हैं, जो समस्त सम्पदाओंकी प्राप्ति करानेवाले और श्रेष्ठ हैं; जिनमें शक्तिका संयोग और वियोग भी है; उन स्वेच्छामय प्रभुकी मैं स्तुति करता हूँ। जो शक्तिके स्वामी, शक्तिके बीज, शक्तिरूपधारी तथा घोर संसारसागरमें शक्तिमयी नौकासे युक्त हैं; उन भक्तवत्सल कृपालु कर्णधारको मैं नमस्कार करता हूँ। जो आत्मस्वरूप, एकान्तमय, लिप्त, निर्लिप्त, सगुण और निर्गुण ब्रह्म हैं; उन स्वेच्छामय परमात्माकी मैं स्तुति करता हूँ। जो सम्पूर्ण इन्द्रियोंके अधिदेवता, आवासस्थान और सर्वेन्द्रिय-स्वरूप हैं; उन विराट् परमेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो वेद, वेदोंके जनक तथा सर्ववेदाङ्गस्वरूप हैं; उन सर्वमन्त्रमय परमेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सारसे सारतर द्रव्य, अपूर्व, अनिर्वचनीय, स्वतन्त्र और अस्वतन्त्र हैं; उन यशोदानन्दनका मैं भजन करता हूँ। जो सम्पूर्ण शरीरोंमें शान्तरूपसे विद्यमान हैं, किसीके दृष्टिपथमें नहीं आते, तर्कके अविषय हैं, ध्यानसे वशमें होनेवाले नहीं हैं तथा नित्य विद्यमान हैं; उन योगीन्द्रोंके भी गुरु गोविन्दका मैं भजन करता हूँ। जो रासमण्डलके मध्यभागमें विराजमान होते हैं, रासोल्लासके लिये सदा उत्सुक रहते हैं तथा गोपाङ्गनाएँ सदा जिनकी सेवा करती हैं; उन राधावल्लभको मैं नमस्कार करता हूँ। जो साधु पुरुषोंकी दृष्टिमें सदैव सत् और असाधु पुरुषोंके मतमें सदा ही असत् हैं, भगवान् शिव जिनकी सेवा करते हैं; उन योगसाध्य योगीश्वर श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ। जो मन्त्रबीज, मन्त्रराज, मन्त्रदाता, फलदाता, फलरूप, मन्त्रसिद्धिस্বরূপ तथा परात्पर हैं; उन श्रीकृष्णको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सुख-दुःख, सुखद-दुःखद, पुण्य, पुण्यदायक, शुभद और शुभ बीज हैं; उन परमेश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ।

इस प्रकार स्तुति करके ब्रह्माजीने गौओं और बालकोंको लौटा दिया तथा पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़कर रोते हुए प्रणाम किया। मुने! तदनन्तर जगत्स्रष्टाने आँखें खोलकर श्रीहरिके दर्शन किये। जो ब्रह्माजीके द्वारा किये गये इस

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५२७

स्तोत्रका प्रतिदिन भक्तिभावसे पाठ करता है, वह इहलोकमें सुख भोगकर अन्तमें श्रीहरिके धाममें जाता है। वहाँ उसे अनुपम दास्यसुख तथा उन परमेश्वरके निकट स्थान प्राप्त होता है। श्रीकृष्णका सांनिध्य पाकर वह पार्षदशिरोमणि बन जाता है।

भगवान् नारायण कहते हैं—तदनन्तर जगत्-विधाता ब्रह्मा जब ब्रह्मलोकमें चले गये, तब भगवान् श्रीकृष्ण ग्वालबालोंके साथ अपने घरको गये। उस दिन गौओं, बछड़ों और ग्वालबालोंने एक वर्षके बाद अपने घरपर पदार्पण किया था; किंतु श्रीकृष्णकी मायासे उन सबने उस एक वर्षके अन्तरको एक दिनका ही अन्तर समझा। गोप और गोपियाँ उस समय कुछ भी अनुमान न लगा सकीं। (पहलेके मायारचित बालकोंमें और आजके वास्तविक बालकोंमें उन्हें कोई अन्तर नहीं जान पड़ा।) योगीके लिये तो क्या नया और क्या पुराना, सारा जगत् कृत्रिम ही है। इस प्रकार श्रीकृष्णका यह सारा शुभ चरित्र कहा गया—जो सुखद, मोक्षप्रद, पुण्यमय तथा सर्वकालमें सुख देनेवाला है।

(अध्याय २०)


नन्दद्वारा इन्द्रयागकी तैयारी, श्रीकृष्णद्वारा इसके विषयमें जिज्ञासा, नन्दजीका उत्तर और श्रीकृष्णद्वारा प्रतिवाद, श्रीकृष्णकी आज्ञाके अनुसार इन्द्रका यजन न करके गोपोंद्वारा ब्राह्मणों और गिरिराजका पूजन, उत्सवकी समाप्तिपर इन्द्रका कोप, नन्दद्वारा इन्द्रकी स्तुति, श्रीकृष्णका नन्दको इन्द्रकी स्तुतिसे रोककर सब व्रजवासियोंको गौओंसहित गोवर्धनकी गुफामें स्थापित करके पर्वतको छातेके डंडेकी भाँति उठा लेना; इन्द्र, देवताओं तथा मेघोंका स्तम्भन कर देना, पराजित इन्द्रद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति, श्रीकृष्णका उन्हें विदा करके पर्वतको स्थापित कर देना तथा नन्दद्वारा श्रीकृष्णका स्तवन

भगवान् नारायण कहते हैं—मुने! एक दिन आनन्दयुक्त नन्दने व्रजमें इन्द्रयज्ञकी तैयारी करके सब ओर ढिंढोरा पिटवाया। उस समय सबको यह संदेश दिया गया कि जो-जो इस नगरमें गोप, गोपी, बालक, बालिका, ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र निवास करते हैं; वे सब लोग भक्तिपूर्वक दही, दूध, घी, तक्र, माखन, गुड़ और मधु आदि सामग्री लेकर इन्द्रकी पूजा करें। इस प्रकार घोषणा कराकर उन्होंने स्वयं ही प्रसन्नतापूर्वक सुविस्तृत रमणीय स्थानमें यष्टिका-आरोपण किया (ध्वजाके लिये बाँस गड़वाया)। उसमें रेशमी वस्त्र और मनोहर मालाएँ लगवायीं। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुङ्कुमके द्रवसे उस यष्टिको चर्चित किया गया। नन्दजीने स्नान और नित्यकर्म करके भक्तिभावसे दो धुले हुए वस्त्र धारण किये तथा पैर धोकर वे सोनेके पीढ़ेपर बैठे। उस समय नाना प्रकारके पात्रोंके साथ ब्राह्मण, पुरोहित, गोप, गोपी, बालिका तथा बालक उपस्थित हुए। इसी बीचमें वहाँ नगरनिवासी भी बहुत सामान एकत्र करके अनेक प्रकारकी भेंट-पूजा लिये आ पहुँचे। तदनन्तर ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान, वेद-वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् एवं शान्त-स्वभाव—गर्ग, जैमिनि, कृष्णद्वैपायन आदि बहुत-से मुनिगण शिष्योंसहित वहाँ पधारे। और भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, बन्दी, भिक्षुक आदि आये। गोपराज नन्दने उठकर सभीका यथायोग्य प्रणामादिद्वारा स्वागत-सत्कार किया। तत्पश्चात् यष्टिके समीप ही निपुण रसोइया ब्राह्मण

५२८
संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
पाक करने लगे। रत्नदीपोंकी तथा धूपकी
जगमगाहट और सुगन्धि चारों ओर फैल गयी।
पुष्पमालाओंसे स्थान सुसज्जित हो गये। भाँति-
भाँतिकी मिठाई, पक्वान्न, मीठे फल, हजारों-
लाखों घड़े दूध, दही, घृत, मधु, मक्खन आदि
इकट्ठे हो गये। सुरीले बाजे बजने लगे। नाना
प्रकारके सोने-चाँदीके पात्र, श्रेष्ठ वस्त्र, आभूषण,
स्वर्णपीठ आदि लाये गये। सभी चीजें अगणित
थीं। नृत्यगीत होने लगे।
दीप्तिसे ऐसा दमक रहा था, मानो शरद्-ऋतुका
प्रफुल्ल कमल सूर्यदेवकी किरणोंसे उद्दीप्त हो रहा
हो। जगदीश्वर श्रीकृष्ण उनके बीचमें रत्नमय
सिंहासनपर बैठे, मानो शरत्कालके चन्द्रमा
तारामण्डलके बीचमें भासमान हो रहे हों। वह
महोत्सव देखकर नीतिशास्त्रविशारद श्रीहरिने पितासे
तत्काल ऐसी नीतिपूर्ण बात कही, जो अन्य सब
लोगोंके लिये दुर्लभ थी।
श्रीकृष्ण बोले-उत्तम व्रतका पालन करनेवाले
गोपसम्राट् ! आप यहाँ क्या कर रहे हैं ? आपके
आराध्य देवता कौन हैं ? इस पूजाका क्या स्वरूप
है और इस प्रकार पूजन करनेपर कौन-सा फल
इसी बीच बलशाली बलराम तथा ग्वाल-
बालोंके साथ साक्षात् श्रीहरि शीघ्रतापूर्वक वहाँ
आये। उन्हें देखकर सब लोग हर्षसे खिल उठे
और उठकर खड़े हो गये। श्रीकृष्ण क्रीडास्थानसे
लौटकर आ रहे थे। उनका शान्त सुन्दर विग्रह
बड़ा मनोहर था। विनोदकी साधनभूत मुरली,
वेणु और शृङ्ग नामक वाद्योंकी ध्वनि उनके साथ
सुनायी देती थी। रत्नोंके सार-तत्त्वसे निर्मित
आभूषणों तथा कौस्तुभमणिसे वे विभूषित थे।
उनका श्याम मनोहर शरीर अगुरु एवं चन्दनपङ्कसे
चर्चित था। वे रत्नमय दर्पणमें शरद्-ऋतुके
मध्याह्नकालमें प्रफुल्ल कमलके समान अपने मनोहर
मुखको देख रहे थे। भालदेशमें कस्तूरीकी बेंदीके
साथ पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति मनोहर चन्दन
लगा था। इससे उनका ललाट चन्द्रदेवसे अलंकृत
आकाशकी भाँति शोभा पा रहा था। श्याम कण्ठ
और वक्षःस्थल मालतीकी मालासे उज्ज्वल कान्ति
धारण कर रहा था, मानो अत्यन्त निर्मल शरत्कालिक
आकाश बगुलोंकी पंक्तिसे अलंकृत हुआ हो।
मनोहर पीताम्बरसे उनके श्याम विग्रहकी अनुपम
शोभा हो रही थी, मानो नवीन मेघ विद्युत्की
कान्तिसे निरन्तर उद्भासित हो रहा हो। मस्तकपर
एक ओर झुका हुआ टेढ़ा मोरमुकुट कुन्दके फूलों
और गुञ्जाओंकी मालासे आबद्ध था, मानो आकाश
नक्षत्रों तथा इन्द्र-धनुषसे सुशोभित हो रहा हो।
उनका मुस्कराता हुआ मुख रत्नमय कुण्डलोंकी
प्राप्त होता है ? इस फलसे कौन-सा साधन सुलभ
होता है और उस साधनसे भी कौन-सा मनोरथ
सिद्ध होता है? यदि पूजामें भी विघ्न पड़ जाय
और देवता रुष्ट हो जायें तो क्या होता है? अथवा
यदि देवता संतुष्ट हों तो वे इहलोक और
परलोकमें कौन-सा फल देते हैं ?
विप्ररूपधारी श्रीहरि नैवेद्यको साक्षात् ग्रहण
करते हैं; अतः ब्राह्मणके संतुष्ट होनेपर सब देवता
संतुष्ट हो जाते हैं। जो ब्राह्मणके पूजनमें लगा

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५२९
हुआ है, उसके लिये देवपूजाकी क्या आवश्यकता
है ? जिसने ब्राह्मणोंकी पूजा की है, उसने सम्पूर्ण
देवताओंकी पूजा सम्पन्न कर ली। देवताको नैवेद्य
देकर जो ब्राह्मणको नहीं देता है, उसका वह
नैवेद्य भस्मीभूत होता है और पूजन निष्फल हो
जाता है। देवताका नैवेद्य यदि ब्राह्मणको दिया
जाय तो उस दानसे वह निश्चय ही अक्षय हो जाता
है और उस अवस्थामें देवता संतुष्ट होकर
दाताको अभीष्ट वरदान दे अपने धामको जाते हैं।
जो मूढ़ देवताको नैवेद्य अर्पित करके ब्राह्मणके
दिये बिना स्वयं खा लेता है, वह दत्तापहारी
(देकर छीन लेनेवाला) है और देवताकी वस्तु
खाकर नरकमें पड़ता है। जो भगवान् विष्णुको
अर्पित न किया गया हो, वह अन्न विष्ठा और
जल मूत्रके समान है। यह क्रम सभीके लिये है;
परंतु ब्राह्मणोंके लिये विशेषरूपसे इसपर ध्यान
देना उचित है। यदि नैवेद्य अथवा भोज्य वस्तु
देवताको न देकर ब्राह्मणको दे दी गयी तो देवता
ब्राह्मणके मुखमें ही उसे खाकर संतुष्ट हो स्वर्गलोकको
लौट जाते हैं; अतः पिताजी ! आप सारी शक्ति
लगाकर ब्राह्मणोंका पूजन कीजिये; क्योंकि वे
इहलोक और परलोकमें भी उत्तम फलके दाता हैं।
जो श्रीहरिकी आराधना करनेवाले ब्राह्मण हैं, वे
उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं। हरिभक्त ब्राह्मणोंका
प्रभाव श्रुतिमें दुर्लभ है। उनके चरणकमलोंकी
धूलिसे पृथ्वी तत्काल पवित्र हो जाती है। उनका
जो चरणचिह्न है, उसीको तीर्थ कहा गया है।
उनके स्पर्शमात्रसे तीर्थोंका पाप नष्ट हो जाता है।
उनके आलिङ्गन, श्रेष्ठ वार्तालाप, दर्शन और
स्पर्शसे भी मनुष्य समस्त पापोंसे छुटकारा पा
जाता है। सम्पूर्ण तीर्थोंमें भ्रमण और स्नान करनेसे
जो पुण्य प्राप्त होता है, वह हरिभक्त ब्राह्मणके
दर्शनमात्रसे सुलभ हो जाता है। मनुष्यको चाहिये
कि वह पुण्यके लिये समस्त जीवोंको अन्न दे;
परंतु विशिष्ट जीवोंको अन्न-दान करनेसे विशिष्ट
फलकी प्राप्ति होती है। भगवान् विष्णु ब्राह्मणोंके
भक्त हैं। उन्हें उत्तम वस्तुका दान करनेसे दाताको
जो फल मिलता है, वह निश्चय ही भक्त ब्राह्मणको
भोजन करानेमात्रसे मिल जाता है। भक्तके संतुष्ट
होनेपर श्रीहरि संतुष्ट होते हैं और श्रीहरिके संतुष्ट
होनेपर सब देवता सिद्ध हो जाते हैं। ठीक उसी
तरह जैसे वृक्षकी जड़ सींचनेसे उसकी शाखाएँ
भी पुष्ट होती हैं। यदि ये सब संचित द्रव्य आप
किसी एक देवताको देते हैं तो अन्य सब देवता
रुष्ट हो जायँगे। उस दशामें एक देवता क्या
करेगा ? मेरी सम्मति तो यह है कि यहाँ जितनी
वस्तुएँ प्रस्तुत हैं, उनका आधा भाग आप
श्रीगोवर्धनदेवको दे दीजिये। वे गौओंकी सदा
वृद्धि करते हैं; इसलिये उनका नाम 'गोवर्धन'
हुआ है। पिताजी ! इस भूतलपर गोवर्धनके समान
पुण्यवान् दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि वे नित्यप्रति
गौओंको नयी-नयी घास देते हैं। तीर्थस्थानोंमें
जाकर स्नान-दानसे जो पुण्य प्राप्त होता है;
ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे जिस पुण्यकी प्राप्ति
होती है, सम्पूर्ण व्रत-उपवास, सब तपस्या,
महादान तथा श्रीहरिकी आराधना करनेपर जो
पुण्य सुलभ होता है, सम्पूर्ण पृथ्वीकी परिक्रमा,
सम्पूर्ण वेदवाक्योंके स्वाध्याय तथा समस्त यज्ञोंकी
दीक्षा ग्रहण करनेपर मनुष्य जिस पुण्यको पाता
है; वही पुण्य बुद्धिमान् मानव गौओंको घास
देकर पा लेता है*।
जो घास चरती हुई गायको स्वेच्छापूर्वक

  • तीर्थस्नानेषु यत्पुण्यं यत्पुण्यं विप्रभोजने । सर्वव्रतोपवासेषु सर्वेष्वेव तपःसु च॥
    यत्पुण्यं च महादाने यत्पुण्यं हरिसेवने । भुवः पर्यटने यत्तु वेदवाक्येषु यद्भवेत् ॥
    यत्पुण्यं सर्वयज्ञेषु दीक्षायां च लभेन्नरः । तत्पुण्यं लभते प्राज्ञो गोभ्यो दत्त्वा तृणानि च ॥
    (२१।८७-८९)
५३०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

चरनेसे रोकता है, उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है तथा वह प्रायश्चित्त करनेपर ही शुद्ध होता है। पिताजी! सब देवता गौओंके अङ्गोंमें, सम्पूर्ण तीर्थ गौओंके पैरोंमें तथा स्वयं लक्ष्मी उनके गुह्य स्थानों (मल-मूत्रके स्थानों)-में सदा वास करती हैं। जो मनुष्य गायके पद-चिह्नसे युक्त मिट्टीद्वारा तिलक करता है, उसे तत्काल तीर्थस्नानका फल मिलता है और पग-पगपर उसकी विजय होती है। गौएँ जहाँ भी रहती हैं, उस स्थानको तीर्थ कहा गया है। वहाँ प्राणोंका त्याग करके मनुष्य तत्काल मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। जो नराधम ब्राह्मणों तथा गौओंके शरीरपर प्रहार करता है; निःसंदेह उसे ब्रह्महत्याके समान पाप लगता है। जो नारायणके अंशभूत ब्राह्मणों तथा गौओंका वध करते हैं, वे मनुष्य जबतक चन्द्रमा और सूर्यकी सत्ता है, तबतकके लिये कालसूत्र नामक नरकमें जाते हैं*।

नारद! ऐसा कहकर श्रीकृष्ण चुप हो गये। तब आनन्दयुक्त नन्दने मुस्कराते हुए उनसे कहा।

नन्द बोले—बेटा! यह महात्मा महेन्द्रकी पूजा है, जो पूर्वपरम्परासे चली आ रही है। यह सुवृष्टिका साधन है और इससे सब प्रकारके मनोहर शस्योंकी उत्पत्ति ही साध्य है। शस्य ही प्राणियोंके प्राण हैं। शस्यसे ही जीवधारी जीवन-निर्वाह करते हैं। इसलिये व्रजवासी लोग पूर्व पीढ़ियोंके क्रमसे महेन्द्रकी पूजा करते चले आ रहे हैं। यह महान् उत्सव वर्षके अन्तमें होता है। विघ्न-बाधाओंकी निवृत्ति और कल्याणकी प्राप्ति ही इसका उद्देश्य है।

नन्दजीकी यह बात सुनकर बलरामसहित श्रीकृष्ण जोर-जोरसे हँसने लगे और पुनः प्रसन्नतापूर्वक पितासे बोले।

श्रीकृष्णने कहा—तात! आज मैंने आपके मुखसे बड़ी विचित्र और अद्भुत बात सुनी है। इसका कहीं भी निरूपण नहीं किया गया है कि इन्द्रसे वृष्टि होती है। आज आपके मुखसे अपूर्व नीतिवचन सुननेको मिला है। सूर्यसे जल उत्पन्न होता है और जलसे शस्य एवं वृक्ष उत्पन्न होते और बढ़ते हैं। उनसे अन्न और फल पैदा होते हैं तथा उन अन्नों और फलोंसे जीवधारी जीवननिर्वाह करते हैं। सूर्य अपनी किरणोंद्वारा जो धरतीका जल सोख लेते हैं, वर्षाकालमें उसी जलका उनसे प्रादुर्भाव होता है। सूर्य और मेघ आदि सबका विधाताद्वारा निरूपण होता है। पञ्चाङ्गोंके अनुसार जिस वर्षमें जो मेघ गज और समुद्र माने गये हैं, जो शस्याधिपति राजा और मन्त्री निश्चित किये गये हैं; उन सबका विधाताद्वारा ही निरूपण हुआ है। प्रत्येक वर्षमें जल, शस्य तथा तृणोंकी आढक-संख्या निश्चित की जाती है, उस निश्चयके अनुसार वर्ष-वर्षमें, युग-युगमें और कल्प-कल्पमें वे सारी बातें घटित होती हैं। ईश्वरकी इच्छासे ही जल आदिका आविर्भाव होता है। उसमें कोई बाधा नहीं पड़ती। तात! भूत, वर्तमान और भविष्य तथा महान्, क्षुद्र और मध्यम—जिस कर्मका विधाताने निरूपण किया है, उसका कौन निवारण कर सकता है? ईश्वरकी आज्ञासे ही ब्रह्माजीने सम्पूर्ण चराचर जगत्का निर्माण किया है। पहले भोजनकी


* भुक्तवन्तीं तृणं यश्च गां वारयति कामतः। ब्रह्महत्या भवेत् तस्य प्रायश्चित्ताद् विशुध्यति॥
सर्वे देवा गवामङ्गे तीर्थानि तत्पदेषु च। तद्गुह्येषु स्वयं लक्ष्मीस्तिष्ठत्येव सदा पितः॥
गोष्पदाक्तमृदा यो हि तिलकं कुरुते नरः। तीर्थस्नातो भवेत् सद्यो जयस्तस्य पदे पदे॥
गावस्तिष्ठन्ति यत्रैव तत्तीर्थं परिकीर्तितम्। प्राणांस्त्यक्त्वा नरस्तत्र सद्यो मुक्तो भवेद् ध्रुवम्॥
ब्राह्मणानां गवामङ्गं यो हन्ति मानवाधमः। ब्रह्महत्यासमं पापं भवेत् तस्य न संशयः॥
नारायणांशान् विप्रांश्च गाश्च ये घ्नन्ति मानवाः। कालसूत्रं च ते यान्ति यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥
(२१। ९०-९५)

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५३१

व्यवस्था होती है, उसके बाद जीव प्रकट होता है। बारंबार ऐसा होनेसे ही इस नियत व्यवस्थाको स्वभाव कहते हैं। स्वभावसे कर्म होता है और कर्मके अनुसार जीवधारियोंको सुख-दुःखका भोग प्राप्त होता है। यातना, जन्म-मरण, रोग-शोक, भय, उत्पत्ति, विपत्ति, विद्या, कविता, यश, अपयश, पुण्य, स्वर्गवास, पाप, नरकनिवास, भोग, मोक्ष और श्रीहरिका दास्य—ये सब मनुष्योंको कर्मके अनुसार उपलब्ध होते हैं। ईश्वर सबके जनक हैं। शील और कर्मोंका अभ्यास विधाताके लिये भी फलदाता होता है। सब कुछ ईश्वरकी इच्छासे ही सम्भव होता है। विराट् पुरुषसे प्रकृति, पञ्चतत्त्व, जगत्, कूर्म, शेष, धरणी तथा ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सम्पूर्ण चराचर पदार्थोंका निर्माण हुआ है। जिनकी आज्ञासे वायु कूर्मको, कूर्म शेषको, शेष अपने मस्तकपर वसुधाको और वसुधा सम्पूर्ण चराचर जगत्‌को धारण करती है; जिनके आदेशसे जगत्‌के प्राणस्वरूप समीर सदा तीनों लोकोंमें बहते रहते हैं, उत्तम प्रभाके धाम सूर्य समस्त भूगोलका भ्रमण करते हुए तपा करते हैं, अग्नि जलाती है, मृत्यु समस्त जन्तुओंमें संचरित होती है और वृक्ष समयानुसार फूल एवं फल धारण करते हैं; जिनकी आज्ञासे समुद्र अपने स्थानपर विद्यमान रहते और तत्काल ही नीचे-नीचे निमग्न हो जाते हैं; उन परमेश्वरका ही आप भक्तिभावसे भजन कीजिये। इन्द्र क्या कर सकता है? जिनके भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे आजतक कितने ही ब्रह्माण्ड पैदा हुए और कालके गालमें चले गये तथा कितने ही विधाता उत्पन्न होकर नष्ट हो गये। वे परमेश्वर ही मृत्युकी भी मृत्यु, कालके भी काल तथा विधाताके भी विधाता हैं। तात! आप उन्हींकी शरण लीजिये। वे ही आपकी रक्षा करेंगे। अहो! जिनके एक दिन-रातमें अट्ठाईस इन्द्रोंका पतन होता है, ऐसे एक सौ आठ ब्रह्माओंका उन निर्गुण परमात्मा श्रीहरिके एक निमेषमें ही पतन हो जाता है; ऐसे परमात्माके रहते हुए इन्द्रकी पूजा विडम्बनामात्र है।

नारद! यों कहकर श्रीकृष्ण चुप हो गये। उस समय सभामें बैठे हुए महर्षियोंने भगवान्‌की भूरि-भूरि प्रशंसा की। नन्दके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। वे हर्षसे उत्फुल्ल हो सभामें बैठे-बैठे नेत्रोंसे अश्रु बहाने लगे। मनुष्य यदि अपने पुत्रोंसे पराजित हों तो वे आनन्दित ही होते हैं। श्रीकृष्णकी आज्ञा मान नन्दजीने स्वस्तिवाचन किया और क्रमशः सब ब्राह्मणों एवं मुनियोंका वरण किया। उन्होंने आदरपूर्वक गिरिराज गोवर्धनकी, समागत मुनीश्वरोंकी, विद्वान् ब्राह्मणोंकी तथा गौओं और अग्निकी सानन्द पूजा की। पूजाकी समाप्ति होनेपर उस यज्ञ-महोत्सवमें नाना प्रकारके वाद्योंका तुमुल नाद होने लगा। जय-जयकारके शब्द, शङ्खध्वनि तथा हरिनामकीर्तन होने लगे। मुनिवर गर्गने वेदोंके मङ्गलकाण्डका पाठ किया। बन्दीजनोंमें श्रेष्ठ डिंडी जो कंसका प्रिय सचिव था, सामने खड़े हो उच्चस्वरसे मङ्गलाष्टकका पाठ करने लगा। श्रीकृष्ण गिरिराजके निकट जा दूसरी मूर्ति धारण करके बोले—‘मैं साक्षात् गोवर्धन