ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ५२९
हुआ है, उसके लिये देवपूजाकी क्या आवश्यकता
है ? जिसने ब्राह्मणोंकी पूजा की है, उसने सम्पूर्ण
देवताओंकी पूजा सम्पन्न कर ली। देवताको नैवेद्य
देकर जो ब्राह्मणको नहीं देता है, उसका वह
नैवेद्य भस्मीभूत होता है और पूजन निष्फल हो
जाता है। देवताका नैवेद्य यदि ब्राह्मणको दिया
जाय तो उस दानसे वह निश्चय ही अक्षय हो जाता
है और उस अवस्थामें देवता संतुष्ट होकर
दाताको अभीष्ट वरदान दे अपने धामको जाते हैं।
जो मूढ़ देवताको नैवेद्य अर्पित करके ब्राह्मणके
दिये बिना स्वयं खा लेता है, वह दत्तापहारी
(देकर छीन लेनेवाला) है और देवताकी वस्तु
खाकर नरकमें पड़ता है। जो भगवान् विष्णुको
अर्पित न किया गया हो, वह अन्न विष्ठा और
जल मूत्रके समान है। यह क्रम सभीके लिये है;
परंतु ब्राह्मणोंके लिये विशेषरूपसे इसपर ध्यान
देना उचित है। यदि नैवेद्य अथवा भोज्य वस्तु
देवताको न देकर ब्राह्मणको दे दी गयी तो देवता
ब्राह्मणके मुखमें ही उसे खाकर संतुष्ट हो स्वर्गलोकको
लौट जाते हैं; अतः पिताजी ! आप सारी शक्ति
लगाकर ब्राह्मणोंका पूजन कीजिये; क्योंकि वे
इहलोक और परलोकमें भी उत्तम फलके दाता हैं।
जो श्रीहरिकी आराधना करनेवाले ब्राह्मण हैं, वे
उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं। हरिभक्त ब्राह्मणोंका
प्रभाव श्रुतिमें दुर्लभ है। उनके चरणकमलोंकी
धूलिसे पृथ्वी तत्काल पवित्र हो जाती है। उनका
जो चरणचिह्न है, उसीको तीर्थ कहा गया है।
उनके स्पर्शमात्रसे तीर्थोंका पाप नष्ट हो जाता है।
उनके आलिङ्गन, श्रेष्ठ वार्तालाप, दर्शन और
स्पर्शसे भी मनुष्य समस्त पापोंसे छुटकारा पा
जाता है। सम्पूर्ण तीर्थोंमें भ्रमण और स्नान करनेसे
जो पुण्य प्राप्त होता है, वह हरिभक्त ब्राह्मणके
दर्शनमात्रसे सुलभ हो जाता है। मनुष्यको चाहिये
कि वह पुण्यके लिये समस्त जीवोंको अन्न दे;
परंतु विशिष्ट जीवोंको अन्न-दान करनेसे विशिष्ट
फलकी प्राप्ति होती है। भगवान् विष्णु ब्राह्मणोंके
भक्त हैं। उन्हें उत्तम वस्तुका दान करनेसे दाताको
जो फल मिलता है, वह निश्चय ही भक्त ब्राह्मणको
भोजन करानेमात्रसे मिल जाता है। भक्तके संतुष्ट
होनेपर श्रीहरि संतुष्ट होते हैं और श्रीहरिके संतुष्ट
होनेपर सब देवता सिद्ध हो जाते हैं। ठीक उसी
तरह जैसे वृक्षकी जड़ सींचनेसे उसकी शाखाएँ
भी पुष्ट होती हैं। यदि ये सब संचित द्रव्य आप
किसी एक देवताको देते हैं तो अन्य सब देवता
रुष्ट हो जायँगे। उस दशामें एक देवता क्या
करेगा ? मेरी सम्मति तो यह है कि यहाँ जितनी
वस्तुएँ प्रस्तुत हैं, उनका आधा भाग आप
श्रीगोवर्धनदेवको दे दीजिये। वे गौओंकी सदा
वृद्धि करते हैं; इसलिये उनका नाम 'गोवर्धन'
हुआ है। पिताजी ! इस भूतलपर गोवर्धनके समान
पुण्यवान् दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि वे नित्यप्रति
गौओंको नयी-नयी घास देते हैं। तीर्थस्थानोंमें
जाकर स्नान-दानसे जो पुण्य प्राप्त होता है;
ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे जिस पुण्यकी प्राप्ति
होती है, सम्पूर्ण व्रत-उपवास, सब तपस्या,
महादान तथा श्रीहरिकी आराधना करनेपर जो
पुण्य सुलभ होता है, सम्पूर्ण पृथ्वीकी परिक्रमा,
सम्पूर्ण वेदवाक्योंके स्वाध्याय तथा समस्त यज्ञोंकी
दीक्षा ग्रहण करनेपर मनुष्य जिस पुण्यको पाता
है; वही पुण्य बुद्धिमान् मानव गौओंको घास
देकर पा लेता है*।
जो घास चरती हुई गायको स्वेच्छापूर्वक
- तीर्थस्नानेषु यत्पुण्यं यत्पुण्यं विप्रभोजने । सर्वव्रतोपवासेषु सर्वेष्वेव तपःसु च॥
यत्पुण्यं च महादाने यत्पुण्यं हरिसेवने । भुवः पर्यटने यत्तु वेदवाक्येषु यद्भवेत् ॥
यत्पुण्यं सर्वयज्ञेषु दीक्षायां च लभेन्नरः । तत्पुण्यं लभते प्राज्ञो गोभ्यो दत्त्वा तृणानि च ॥
(२१।८७-८९)