About this granth
The Matsya Mahapurana (मत्स्य महापुराण) is one of the eighteen major Puranas, named after Vishnu's fish incarnation. In the traditional frame, the divine Fish narrates it to King Vaivasvata Manu and the seven sages during the great deluge; authorship is ascribed to Maharshi Veda Vyasa.
This is the illustrated Gita Press, Gorakhpur edition with a Hindi translation alongside the Sanskrit, running to about 1,098 pages; the imprint records the fourteenth reprint of Samvat 2076. Its chapters cover creation and the manvantaras, the lineage of Kashyapa, the life of King Prithu and the milking of the earth, the solar and lunar dynasties with the story of Ila, the lineages of the Pitris and the 108 names of the Goddess, and the well-known episode of Yayati, Devayani and Puru.
The Matsya Purana is especially valued for its detailed rules on shraddha (ordinary, ekoddishta and sapindikarana rites, proper times and tirthas), and also treats vows, gifts, pilgrimage and image-making, which makes it a frequent source for students of dharmashastra, history and Indian art.
२२५- दण्डनीतिका वर्णन
८७८ * मत्स्यपुराण *
| फलानाम्प्यपक्वानां पाकः क्षिप्रं प्रजायते।<br>प्रकोपश्चैव पक्वानां माल्यानां म्लानता तथा॥ २८<br>मृदुता कठिनानां स्यान्मृदूनां च विपर्ययः।<br>सूक्ष्माणां रूपदलनं तथा चैवातिरङ्गता॥ २९<br>श्याममण्डलता चैव वस्त्राणां वै तथैव च।<br>लौहानां च मणीनां च मलपङ्कोपदिग्धता॥ ३०<br>अनुलेपनगन्धानां माल्यानां च नृपोत्तम।<br>विगन्धता च विज्ञेया वर्णानां म्लानता तथा।<br>पीतावभासता ज्ञेया तथा राजन् जलस्य तु॥ ३१<br>दन्ता ओष्ठौ त्वचः श्यामास्तनुसत्त्वास्तथैव च।<br>एवमादीनि चिह्नानि विज्ञेयानि नृपोत्तम॥ ३२<br>तस्माद् राजा सदा तिष्ठेन् मणिमन्त्रौषधागदैः।<br>उक्तैः संरक्षितो राजा प्रमादपरिवर्जकः॥ ३३<br>प्रजातारोमूलमिहावनीश-<br> स्तद्रक्षणाद् राष्ट्रमुपैति वृद्धिम्।<br>तस्मात् प्रयत्नेन नृपस्य रक्षा<br> सर्वेण कार्या रविवंशचन्द्र॥ ३४ | लाल रंग हो जाता है। विषके संसर्गसे न पके हुए फल शीघ्र ही पक जाते हैं और पका हुआ फल विकृत हो जाता है। पुष्प-मालाएँ मलिन हो जाती हैं। कठोर वस्तु कोमल तथा कोमल वस्तु कठोर हो जाती है। सूक्ष्म वस्तुओंका रूप नष्ट हो जाता है और रंग बदल जाता है। वस्त्रोंमें विशेषकर काले धब्बे पड़ जाते हैं। लोहे और मणियोंपर मैल जम जाती है। नृपश्रेष्ठ! शरीरमें लेपन किये जानेवाले द्रव्यों एवं उपयोगमें आनेवाली पुष्प-मालाओंमें दुर्गन्धि तथा रंगकी मलिनता समझनी चाहिये। राजन्! उसी प्रकार जलमें भी पीलेपनका आभास आने लगता है। नृपोत्तम! विषके सेवनसे दाँत, होंठ और चमड़े श्यामल वर्णके हो जाते हैं और शरीरमें क्षीणताका अनुभव होने लगता है—इस प्रकार ये लक्षण जानने चाहिये। इसलिये राजाको सर्वदा मणि, मन्त्र और उपर्युक्त ओषधियोंसे सुरक्षित तथा सावधान रहना चाहिये। सूर्यवंशके चन्द्र! इस पृथ्वीपर प्रजारूपी वृक्षकी जड़ राजा है, अतः उसीकी रक्षासे राष्ट्रकी वृद्धि होती है। इसलिये सभीको प्रयत्नपूर्वक राजाकी रक्षा करनी चाहिये॥ २७–३४॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे राजधर्मे राजरक्षा नामैकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रकरणमें राजरक्षा नामक दो सौ उन्नीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१९॥
दो सौ बीसवाँ अध्याय
राजधर्म एवं सामान्य नीतिका वर्णन
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| राजन् पुत्रस्य रक्षा च कर्तव्या पृथिवीक्षिता।<br>आचार्यश्चात्र कर्तव्यो नित्ययुक्तश्च रक्षिभिः॥ १ | राजन्! राजाको अपने पुत्रकी रक्षा करनी चाहिये। उसकी शिक्षाके लिये पहरेदारोंकी देख-रेखमें एक ऐसे आचार्यकी नियुक्ति करनी चाहिये, |
| धर्मकामार्थशास्त्राणि धनुर्वेदं च शिक्षयेत्।<br>रथे च कुञ्जरे चैनं व्यायामं कारयेत् सदा॥ २ | जो उसे धर्म, काम एवं अर्थशास्त्र, धनुर्वेद तथा रथ एवं हाथीकी सवारीकी शिक्षा दे और सदा व्यायाम कराये। साथ ही उसे शिल्पकलाएँ भी सिखलाये। उसपर ऐसा प्रभाव पड़े कि वह गुरुजनोंके सम्मुख असत्य एवं अप्रिय बात न बोले। उसके शरीरकी रक्षाके व्याजसे रक्षक नियुक्त कर दे। इसे क्रोधी, लोभी और तिरस्कृत व्यक्तियोंकी संगतिमें नहीं जाने देना चाहिये। उसे इस प्रकार जितेन्द्रिय बनाना चाहिये कि जिससे वह युवावस्था आनेपर |
| शिल्पानि शिक्षयेच्चैनं नास्र्मिमिथ्याप्रियं वदेत्।<br>शरीररक्षाव्याजेन रक्षिणोऽस्य नियोजयेत्॥ ३ | |
| न चास्य सङ्गो दातव्यः क्रुद्धलुब्धावमानितैः।<br>तथा च विनयेदेनं यथा यौवनगोचरे॥ ४ |
२२६- सामान्य राजनीतिका निरूपण
| * अध्याय २२० * | ८७९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इन्द्रियैर्नापकृष्येत सतां मार्गात् सुदुर्गमात्।<br>गुणाधानमशक्यं तु यस्य कर्तुं स्वभावतः॥ ५<br>बन्धनं तस्य कर्तव्यं गुप्तदेशे सुखान्वितम्।<br>अविनीतं कुमारं हि कुलमाशु विशीर्यते॥ ६<br>अधिकारेषु सर्वेषु विनीतं विनियोजयेत्।<br>आदौ स्वल्पे ततः पश्चात् क्रमेणाथ महत्स्वपि॥ ७<br>मृगयापानमक्षांश्च वर्जयेत् पृथिवीपतिः।<br>एतांस्तु सेवमानास्तु विनष्टाः पृथिवीक्षितः॥ ८<br>बहवो नृपशार्दूल तेषां संख्या न विद्यते।<br>वृथाटनं दिवास्वप्नं विशेषेण विवर्जयेत्॥ ९<br>वाक्पारुष्यं न कर्तव्यं दण्डपारुष्यमेव च।<br>परोक्षनिन्दा च तथा वर्जनीया महीक्षिता॥ १० | इन्द्रियोंद्वारा अत्यन्त दुर्गम सत्पुरुषोंके मार्गसे अपकृष्ट न किया जा सके। जिस राजकुमारमें स्वभाववश गुणाधान करना अशक्य हो उसे गुप्तस्थानमें सुखपूर्वक अवरुद्ध कर देना चाहिये, क्योंकि उद्दण्ड राजकुमारसे युक्त कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। राजाको सभी अधिकारोंपर सुशिक्षित व्यक्तिको नियुक्त करना चाहिये। प्रथमतः उसे छोटे पदपर नियुक्त करे, तत्पश्चात् क्रमशः अधिक शिक्षितकर ऊँचे पदोंपर भी पहुँचा दे। राजसिंह! राजाको शिकार, मद्यपान तथा द्यूतक्रीड़ाका परित्याग कर देना चाहिये; क्योंकि पूर्वकालमें इनके सेवनसे बहुत-से राजा नष्ट हो चुके हैं, जिनकी गणना नहीं कही जा सकती। राजाके लिये व्यर्थ घूमना तथा विशेषकर दिनमें शयन करना वर्जित है। राजाको कटुवचन बोलना और कठोर दण्ड देना—ये दोनों कर्म नहीं करना चाहिये। राजाको परोक्षमें किसीकी निन्दा करना उचित नहीं है॥ १–१०॥ |
| अर्थस्य दूषणं राजा द्विप्रकारं विवर्जयेत्।<br>अर्थानां दूषणं चैकं तथार्थेषु च दूषणम्॥ ११<br>प्राकाराणां समुच्छेदो दुर्गादीनामसत्क्रिया।<br>अर्थानां दूषणं प्रोक्तं विप्रकीर्णत्वमेव च॥ १२<br>अदेशकाले यद्दानमपात्रे दानमेव च।<br>अर्थेषु दूषणं प्रोक्तमसत्कर्मप्रवर्तनम्॥ १३<br>कामः क्रोधो मदो मानो लोभो हर्षस्तथैव च।<br>एते वर्ज्याः प्रयत्नेन सादरं पृथिवीक्षिता॥ १४<br>एतेषां विजयं कृत्वा कार्यों भृत्यजयस्ततः।<br>कृत्वा भृत्यजयं राजा पौरान् जानपदान् जयेत्॥ १५<br>कृत्वा च विजयं तेषां शत्रून् बाह्यांस्ततो जयेत्।<br>बाह्याश्च विविधा ज्ञेयास्तुल्याभ्यन्तरकृत्रिमाः॥ १६<br>गुरुवस्ते यथापूर्वं तेषु यत्नपरो भवेत्।<br>पितृपैतामहं मित्रममित्रं च तथा रिपोः॥ १७<br>कृत्रिमं च महाभाग मित्रं त्रिविधमुच्यते।<br>तथापि च गुरुः पूर्वं भवेत् तत्रापि चादृतः॥ १८<br>स्वाम्यमात्यौ जनपदो दुर्गं दण्डस्तथैव च।<br>कोशो मित्रं च धर्मज्ञ सप्ताङ्गं राज्यमुच्यते॥ १९<br>सप्ताङ्गस्यापि राज्यस्य मूलं स्वामी प्रकीर्तितः।<br>तन्मूलत्वात् तथाङ्गानां स तु रक्ष्यः प्रयत्नतः॥ २० | राजाको दो प्रकारके अर्थदोषोंसे बचना चाहिये—एक अर्थका दोष और दूसरा अर्थ-सम्बन्धी दोष। अपने दुर्गके परकोटोंका तथा मूलदुर्ग आदिकी उपेक्षा और अस्तव्यस्तता—ये अर्थके दोष कहे गये हैं। उसी प्रकार कुदेश और कुसमयमें दिया गया दान, कुपात्रको दिया गया दान और असत्कर्मका प्रचार—ये अर्थ-सम्बन्धी दोष कहे गये हैं। राजाको आदरसहित काम, क्रोध, मद, मान, लोभ तथा हर्षका प्रयत्नपूर्वक त्याग करना चाहिये। राजाको इनपर विजय प्राप्त करनेके पश्चात् अनुचरोंको जीतना चाहिये। इस प्रकार अनुचरोंको जीतनेके बाद पुरवासियों और देशवासियोंको अपने अधिकारमें करे। उनको जीतनेके पश्चात् बाहरी शत्रुओंको परास्त करे। तुल्य, आभ्यन्तर और कृत्रिम-भेदसे बाह्य शत्रुओंको अनेकों प्रकारका समझना चाहिये। उनमेंसे क्रमशः एक-एकको बढ़कर समझना चाहिये और उनको जीतनेमें यत्नशील रहे। महाभाग! मित्र तीन प्रकारके होते हैं—प्रथम वे हैं जो पिता-पितामह आदिके कालसे मित्रताका व्यवहार करते चले आ रहे हैं। दूसरे वे हैं, जो शत्रुके शत्रु हैं तथा तीसरे वे हैं, जो किन्हीं कारणोंसे पीछे मित्र बनते हैं। इन तीनों मित्रोंमें प्रथम मित्र उत्तम होता है, उसका आदर करना चाहिये। धर्मज्ञ! स्वामी, मन्त्री, राष्ट्र, दुर्ग, सेना, कोश तथा मित्र—ये राज्यके सात अङ्ग कहे गये हैं। इस सप्ताङ्गयुक्त राज्यका भी मूल स्वयं राजा कहा गया है। राज्यका तथा राज्याङ्गोंका मूल होनेके कारण वह प्रयत्नपूर्वक रक्षणीय है॥ ११–२०॥ |
८८० | * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| षडङ्गरक्षा कर्तव्या तथा तेन प्रयत्नतः।<br>अङ्गेभ्यो यस्त्वैकस्य द्रोहमाचरतेऽल्पधीः॥ २१<br>वधस्तस्य तु कर्तव्यः शीघ्रमेव महीक्षिता।<br>न राज्ञा मृदुना भाव्यं मृदुर्हि परिभूयते॥ २२<br>न भाव्यं दारुणेनातितीक्ष्णादुद्विजते जनः।<br>काले मृदुर्यो भवति काले भवति दारुणः॥ २३<br>राजा लोकद्वयापेक्षी तस्य लोकद्वयं भवेत्।<br>भृत्यैः सह महीपालः परिहासं विवर्जयेत्॥ २४<br>भृत्याः परिभवन्तीह नृपं हर्षवशं गतम्।<br>व्यसनानि च सर्वाणि भूपतिः परिवर्जयेत्॥ २५<br>लोकसंग्रहणार्थाय कृतकव्यसनी भवेत्।<br>शौण्डीरस्य नरेन्द्रस्य नित्यमुद्रिक्तचेतसः॥ २६<br>जना विरागमायान्ति सदा दुःसेव्यभावतः।<br>स्मितपूर्वाभिभाषी स्यात् सर्वस्यैव महीपतिः॥ २७<br>वध्येष्वपि महाभाग भ्रुकुटिं न समाचरेत्।<br>भाव्यं धर्मभृतां श्रेष्ठ स्थूललक्ष्येण भूभुजा॥ २८<br>स्थूललक्ष्यस्य वशगा सर्वा भवति मेदिनी।<br>अदीर्घसूत्रश्च भवेत् सर्वकर्मसु पार्थिवः॥ २९<br>दीर्घसूत्रस्य नृपतेः कर्महानिर्ध्रुवं भवेत्।<br>रागे दर्पे च माने च द्रोहे पापे च कर्मणि॥ ३०<br>अप्रिये चैव कर्तव्ये दीर्घसूत्रः प्रशस्यते। | फिर राजाके द्वारा राज्यके शेष छः अङ्गोंकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा की जानी चाहिये। जो मूर्ख इन छः अङ्गोंमेंसे किसी एकके साथ द्रोह करता है उसे राजाको शीघ्र ही मार डालना चाहिये। राजाको कोमल वृत्तिवाला नहीं होना चाहिये; क्योंकि कोमल वृत्तिवाला राजा पराजयका भागी होता है। साथ ही अधिक कठोर भी नहीं होना चाहिये; क्योंकि अधिक कठोर शासकसे लोग उद्विग्न हो जाते हैं। जो लोकद्वयापेक्षी राजा समयपर मृदु तथा समयपर कठोर हो जाता है, वह दोनों लोकोंपर विजयी हो जाता है। राजाको अपने अनुचरोंके साथ परिहास नहीं करना चाहिये; क्योंकि उस समय आनन्दमें निमग्न हुए राजाका अनुचरगण अपमान कर बैठते हैं। राजाको सभी प्रकारके व्यसनोंसे दूर रहना चाहिये, किंतु लोकसंग्रहके लिये उसे कुछ ऊपरसे अच्छी बातोंका व्यसन करना उचित है। गर्वीले एवं नित्य ही उद्धत स्वभाववाले राजासे लोग कठिनतासे अनुकूल होनेके कारण विरक्त हो जाते हैं, अतः राजाको सभीसे मुसकानपूर्वक बातें करनी चाहिये। महाभाग! यहाँतक कि प्राणदण्डके अपराधीको भी वह भ्रुकुटि न दिखलाये। धार्मिकश्रेष्ठ! राजाको महान् लक्ष्ययुक्त होना चाहिये; क्योंकि सारी पृथ्वी स्थूललक्ष्य रखनेवाले राजाके अधीन हो जाती है। राजाको सभी कार्योंके निर्वाहमें विलम्ब नहीं करना चाहिये; क्योंकि विलम्ब करनेवाले राजाके कार्य निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं। केवल अनुराग, दर्प, आत्मसम्मान, द्रोह, पापकर्म तथा अप्रिय कार्योंमें दीर्घसूत्री प्रशंसित माना गया है॥ २१—३० १/२॥ |
| राज्ञा संवृतमन्त्रेण सदा भाव्यं नृपोत्तम॥ ३१<br>तस्यासंवृतमन्त्रस्य राज्ञः सर्वापदो ध्रुवम्।<br>कृतान्येव तु कार्याणि ज्ञायन्ते यस्य भूपतेः॥ ३२<br>नारब्धानि महाभाग तस्य स्याद् वसुधा वशे।<br>मन्त्रमूलं सदा राज्यं तस्मान्मन्त्रः सुरक्षितः॥ ३३<br>कर्तव्यः पृथिवीपालैर्मन्त्रभेदभयात् सदा।<br>मन्त्रवित्साधितो मन्त्रः सम्पत्तीनां सुखावहः॥ ३४<br>मन्त्रच्छलेन बहवो विनष्टाः पृथिवीक्षितः।<br>आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषितेन च॥ ३५<br>नेत्रवक्त्रविकारैश्च गृह्यतेऽन्तर्गतं मनः।<br>न यस्य कुशलैस्तस्य वशे सर्वा वसुंधरा॥ ३६<br>भवतीह महीभर्तुः सदा पार्थिवनन्दन। | नृपोत्तम! राजाको सदा अपनी मन्त्रणा गुप्त रखनी चाहिये; क्योंकि प्रकट मन्त्रणावाले राजाको निश्चय ही सभी आपत्तियाँ प्राप्त होती हैं। महाभाग! जिस राजाके कार्योंको आरम्भके समय नहीं, अपितु पूरा होनेपर ही लोग जान पाते हैं उसके वशमें वसुंधरा हो जाती है। मन्त्र ही सर्वदा राज्यका मूल है, अतः मन्त्रभेदके भयसे राजाओंको उसे सदा सुरक्षित रखना चाहिये। मन्त्रज्ञ मन्त्रीद्वारा दिया गया मन्त्र सभी सम्पत्तियों तथा सुखोंको देनेवाला होता है। मन्त्रके छलसे बहुत-से राजा विनष्ट हो चुके हैं। आकृति, संकेत, गति, चेष्टा, वचन, नेत्र तथा मुखके विकारोंसे अन्तःस्थित मनोभावोंका पता लगता है। राजपुत्र! जिस राजाके मनका इन उपर्युक्त उपायोंद्वारा कुशल लोग भी पता न लगा सकें, वसुंधरा उसके वशमें सदा बनी रहती है॥ ३१—३६ १/२॥ |
२२७- दण्डनीतिका निरूपण
* अध्याय २२० * ८८१
| नैकस्तु मन्त्रयेन्मन्त्रं राजा न बहुभिः सह॥ ३७ | राजाको कभी केवल एक व्यक्तिके या एक ही साथ अनेक लोगोंके साथ मन्त्रणा नहीं करनी चाहिये। |
| नारोहेद् विषमां नावमपरीक्षितनाविकाम्।<br>ये चास्य भूमिजयिनो भवेयुः परिपन्थिनः॥ ३८ | राजा जिसकी परीक्षा न की गयी हो ऐसी विषम नौकापर सवार न हो। राजाके जो भूमिविजेता शत्रु हों, |
| तानानयेद् वशे सर्वान् सामादिभिरुपक्रमैः।<br>यथा न स्यात् कृशीभावः प्रजानामनवेक्षया॥ ३९ | उन सबको सामादि उपायोंद्वारा वशमें लाना चाहिये। अपने राष्ट्रकी रक्षामें तत्पर राजाका यह कर्तव्य है कि वह उपेक्षाके कारण प्रजाओंको दुर्बल न होने दे। |
| तथा राज्ञा प्रकर्तव्यं स्वराष्ट्रं परिरक्षता।<br>मोहाद् राजा स्वराष्ट्रं यः कर्षयत्यनवेक्षया॥ ४० | जो अज्ञानवश असावधानीसे अपने राष्ट्रको दुर्बल कर देता है, |
| सोऽचिराद् भ्रश्यते राज्याज्जीविताच्च सबान्धवः।<br>भृतो वत्सो जातबलः कर्मयोग्यो यथा भवेत्॥ ४१ | वह शीघ्र ही भाई-बन्धुओंसहित राज्य एवं जीवनसे च्युत हो जाता है। महाभाग! जिस प्रकार पालतू बछड़ा बलवान् होनेपर कार्य करनेमें समर्थ होता है |
| तथा राष्ट्रं महाभाग भृतं कर्मसहं भवेत्।<br>यो राष्ट्रमनुगृह्णाति राज्यं स परिरक्षति॥ ४२ | उसी तरह पालन-पोषणकर समृद्ध किया हुआ राष्ट्र भी भविष्यमें कार्यक्षम हो जाता है। जो अपने राष्ट्रके ऊपर अनुग्रहकी दृष्टि रखता है, वस्तुतः वही राज्यकी रक्षा कर सकता है। |
| संजातमुपजीवेत् तु विन्दते स महत्फलम्।<br>राष्ट्राद्धिरण्यं धान्यं च महीं राजा सुरक्षिताम्॥ ४३ | जो उत्पन्न हुई प्रजाओंकी रक्षा करता है, वह महान् फलका भागी होता है। राजा राष्ट्रसे सुवर्ण, अन्न और सुरक्षित पृथ्वी प्राप्त करता है। |
| महता तु प्रयत्नेन स्वराष्ट्रस्य च रक्षिता।<br>नित्यं स्वेभ्यः परेभ्यश्च यथा माता यथा पिता॥ ४४ | माता और पिताके समान अपने राष्ट्रकी रक्षामें तत्पर रहनेवाला नृपति विशेष प्रयत्नसे नित्यप्रति स्वकीय एवं परकीय दोनों ओरसे होनेवाली बाधाओंसे अपने राष्ट्रकी रक्षा करे। |
| गोपितानि सदा कुर्यात् संयतानीन्द्रियाणि च।<br>अजस्रमुपयोक्तव्यं फलं तेभ्यस्तथैव च॥ ४५ | अपनी इन्द्रियोंको संयत तथा गुप्त रखे और सर्वदा उनका प्रयोग गोपनीय रूपसे करे, तभी उनसे उत्तम फल प्राप्त होता है। |
| सर्वं कर्मेदमायत्तं विधाने दैवमानुषे।<br>तयोर्दैवमचिन्त्यं च पौरुषे विद्यते क्रिया॥ ४६ | जीवनके सभी कार्य दैव और पौरुष—इन दोनोंके अधिकारमें रहते हैं। उन दोनोंमें दैव तो अचिन्त्य है, किंतु पौरुषमें क्रिया विद्यमान रहती है। |
| एवं महीं पालयतोऽस्य भर्तु-<br>र्लोकानुरागः परमो भवेत्।<br>लोकानुरागप्रभवा च लक्ष्मी-<br>र्लक्ष्मीवतश्चापि परा च कीर्तिः॥ ४७ | इस प्रकार पृथ्वीका पालन करनेवाले राजाके प्रति प्रजाका परम अनुराग हो जाता है। प्रजाके अनुरागसे राजाको लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है तथा लक्ष्मीवान् राजाको ही परम यशकी प्राप्ति होती है॥ ३७-४७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजधर्मानुकीर्तने विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें राजधर्मकीर्तन नामक दो सौ बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२०॥
| ८८२ | * मत्स्यपुराण * |
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दो सौ इक्कीसवाँ अध्याय
दैव और पुरुषार्थका वर्णन
| मनुरुवाच | **मनुने पूछा—**देव! भाग्य और पुरुषार्थ—इन दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है? यह मुझे बतलाइये। इस विषयमें मुझे संदेह है, अतः आप उसका सम्पूर्णरूपसे निवारण कीजिये॥ १॥ |
|---|---|
| दैवे पुरुषकारे च किं ज्यायस्तद् ब्रवीहि मे।<br>अत्र मे संशयो देव छेत्तुमर्हस्यशेषतः॥ १ | |
| मत्स्य उवाच | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**राजन्! अन्य जन्ममें अपने द्वारा किया गया पुरुषार्थ (कर्म) ही दैव कहा जाता है, इसी कारण इन दोनोंमें मनीषियोंने पौरुषको ही श्रेष्ठ माना है; क्योंकि माङ्गलिक आचरण करनेवाले एवं नित्य-प्रति अभ्युदयशील पुरुषोंका प्रतिकूल दुर्दैव भी पुरुषार्थद्वारा नष्ट हो जाता है। मानवश्रेष्ठ! जिन्होंने पूर्वजन्ममें सात्त्विक कर्म किया है, उन्हींमें किन्हीं-किन्हींको पुरुषार्थके बिना भी अच्छे फलकी प्राप्ति देखी जाती है। लोकमें रजोगुणी पुरुषको कर्म करनेसे फलकी प्राप्ति होती है और तमोगुणी पुरुषको कठिन कर्म करनेसे फलकी प्राप्ति जाननी चाहिये॥ २—५॥ |
| स्वमेव कर्म दैवाख्यं विद्धि देहान्तरार्जितम्।<br>तस्मात् पौरुषमेवेह श्रेष्ठमाहुर्मनीषिणः॥ २ | |
| प्रतिकूलं तथा दैवं पौरुषेण विहन्यते।<br>मङ्गलाचारयुक्तानां नित्यमुत्थानशालिनाम्॥ ३ | |
| येषां पूर्वकृतं कर्म सात्त्विकं मनुजोत्तम।<br>पौरुषेण विना तेषां केषांचिद् दृश्यते फलम्॥ ४ | |
| कर्मणा प्राप्यते लोके राजसस्य तथा फलम्।<br>कृच्छ्रेण कर्मणा विद्धि तामसस्य तथा फलम्॥ ५ | |
| पौरुषेणाप्यते राजन् प्रार्थितव्यं फलं नरैः।<br>दैवमेव विजानन्ति नराः पौरुषवर्जिताः॥ ६ | राजन्! मनुष्योंको पुरुषार्थद्वारा अभिलषित पदार्थकी प्राप्ति होती है, किंतु जो लोग पुरुषार्थसे हीन हैं, वे दैवको ही सब कुछ मानते हैं। अतः तीनों कालोंमें पुरुषार्थयुक्त दैव ही सफल होता है। राजन्! भाग्ययुक्त मनुष्यका पुरुषार्थ समयपर फल देता है। पुरुषोत्तम! दैव, पुरुषार्थ और काल—ये तीनों संयुक्त होकर मनुष्यको फल देनेवाले होते हैं। कृषि और वृष्टिका संयोग होनेसे फलकी सिद्धियाँ देखी जाती हैं, किंतु वे भी समय आनेपर ही दिखायी पड़ती हैं, बिना समयके किसी प्रकार भी नहीं। इसलिये मनुष्यको सर्वदा धर्मयुक्त पुरुषार्थ करना चाहिये। उसके इस लोकमें आपत्तियोंमें पड़ जानेपर भी परलोकमें उसे निश्चय ही फल प्राप्त होगा। आलसी और भाग्यपर निर्भर रहनेवाले पुरुषोंको अर्थोंकी प्राप्ति नहीं होती। इसलिये सभी प्रयत्नोंसे पुरुषार्थ करनेमें तत्पर रहना चाहिये। राजेन्द्र! लक्ष्मी भाग्यपर भरोसा रखनेवाले एवं आलसी पुरुषोंको छोड़कर पुरुषार्थ करनेवाले पुरुषोंको यत्नपूर्वक ढूँढ़कर वरण करती है, इसलिये सर्वदा पुरुषार्थशील होना चाहिये॥ ६—१२॥ |
| तस्मात् त्रिकालं संयुक्तं दैवं तु सफलं भवेत्।<br>पौरुषं दैवसम्पत्त्या काले फलति पार्थिव॥ ७ | |
| दैवं पुरुषकारश्च कालश्च पुरुषोत्तम।<br>त्रयमेतन्मनुष्यस्य पिण्डितं स्यात् फलावहम्॥ ८ | |
| कृषेर्वृष्टिसमायोगाद् दृश्यन्ते फलसिद्धयः।<br>तास्तु काले प्रदृश्यन्ते नैवाकाले कथञ्चन॥ ९ | |
| तस्मात् सदैव कर्तव्यं सधर्मं पौरुषं नरैः।<br>विपत्तावपि यस्येह परलोके ध्रुवं फलम्॥ १० | |
| नालसाः प्राप्नुवन्त्यर्थान्न च दैवपरायणाः।<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पौरुषे यत्नमाचरेत्॥ ११ | |
| त्यक्त्वाऽऽलसान् दैवपरान् मनुष्या-<br>नुत्थानयुक्तान् पुरुषान् हि लक्ष्मीः।<br>अन्विष्य यत्नाद्वृणुयान्नृपेन्द्र<br>तस्मात् सदोत्थानवता हि भाव्यम्॥ १२ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे दैवपुरुषकारवर्णनं नामैकविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें दैव-पुरुषका वर्णन नामक दो सौ इक्कीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२१॥
* अध्याय २२२ *
८८३
दो सौ बाईसवाँ अध्याय
साम-नीतिका वर्णन
| मनुरुवाच | मनुने पूछा— महान् द्युतिशील भगवन्! अब आप साम आदि उपायोंका वर्णन कीजिये। देवश्रेष्ठ! साथ ही उनका लक्षण और प्रयोग भी बतलाइये॥ १॥ |
|---|---|
| उपायांस्त्वं समाचक्ष्व सामपूर्वान् महाद्युते।<br>लक्षणं च तथा तेषां प्रयोगं च सुरोत्तम॥ १ | |
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— मनुजेश्वर! (राजनीतिमें) साम (स्तुति-प्रशंसा), भेद, दान, दण्ड, उपेक्षा, माया तथा इन्द्रजाल—ये सात प्रयोग बतलाये गये हैं। राजन्! उन्हें मैं बतला रहा हूँ, सुनिये! साम तथ्य और अतथ्यभेदसे दो प्रकारका कहा गया है। उनमें भी अतथ्य (झूठी प्रशंसा) साधु पुरुषोंकी अप्रसन्नताका ही कारण बन जाती है। नरोत्तम! इसलिये सज्जन व्यक्तिको प्रयत्नपूर्वक तथ्य साम (सच्ची प्रशंसा)-से वशमें करना चाहिये। जो उन्नत कुलमें उत्पन्न, सरलप्रकृति, धर्मपरायण और जितेन्द्रिय हैं, वे (तथ्य) सामसे ही साध्य होते हैं, अतः उनके प्रति अतथ्य सामका प्रयोग नहीं करना चाहिये। उनके प्रति तथ्य सामका प्रयोग, उनके कुल और शील-स्वभावका वर्णन, किये गये उपकारोंकी चर्चा तथा अपनी कृतज्ञताका कथन करना चाहिये। इसी युक्ति तथा इस प्रकारके सामसे धर्ममें तत्पर रहनेवालोंको अपने वशमें करना चाहिये। यद्यपि राक्षस भी साम-नीतिके द्वारा वशमें किये जाते हैं—ऐसी पराश्रुति है, तथापि असत्पुरुषोंके प्रति इसका प्रयोग उपकारी नहीं होता। दुर्जन पुरुष सामकी बातें करनेवालेको अतिशय डरा हुआ समझते हैं, इसलिये उनके प्रति इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। राजन्! जो पुरुष शुद्ध वंशमें उत्पन्न, सरलप्रकृतिवाले, विनम्र, धर्मिष्ठ, सत्यवादी, विनयी एवं सम्मानी हैं, वे ही निरन्तर सामद्वारा साध्य बतलाये गये हैं॥२—१०॥ |
| साम भेदस्तथा दानं दण्डश्च मनुजेश्वर।<br>उपेक्षा च तथा माया इन्द्रजालं च पार्थिव॥ २<br>प्रयोगाः कथिताः सप्त तन्मे निगदतः शृणु।<br>द्विविधं कथितं साम तथ्यं चातथ्यमेव च॥ ३<br>तत्राप्यतथ्यं साधूनामाक्रोशिवायैव जायते।<br>तत्र साधुः प्रयत्नेन सामसाध्यो नरोत्तम॥ ४<br>महाकुलीना ऋजवो धर्मनित्या जितेन्द्रियाः।<br>सामसाध्या न चातथ्यं तेषु साम प्रयोजयेत्॥ ५<br>तथ्यं साम च कर्तव्यं कुलशीलादिवर्णनम्।<br>तथा तदुपचाराणां कृतानां चैव वर्णनम्॥ ६<br>अनयैव तथा युक्त्या कृतज्ञाख्यापनं स्वकम्।<br>एवं साम्ना च कर्तव्या वशगा धर्मतत्पराः॥ ७<br>साम्ना यद्यपि रक्षांसि गृह्णन्तीति परा श्रुतिः।<br>तथाप्येतदसाधूनां प्रयुक्तं नोपकारकम्॥ ८<br>अतिशङ्कितमित्येवं पुरुषं सामवादिनम्।<br>असाधवो विजानन्ति तस्मात् तेषु वर्जयेत्॥ ९<br>ये शुद्धवंशा ऋजवः प्रणीता<br>धर्मे स्थिताः सत्यपरा विनीताः।<br>ते सामसाध्याः पुरुषाः प्रदिष्टा<br>मानोन्नता ये सततं च राजन्॥ १० |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजधर्मे सामबोधो नाम द्वाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रकरणमें सामबोध नामक दो सौ बाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२२॥
८८४ * मत्स्यपुराण *
दो सौ तेईसवाँ अध्याय
नीति चतुष्टयीके अन्तर्गत भेद-नीतिका वर्णन
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| परस्परं तु ये दुष्टाः क्रुद्धा भीतावमानिताः।<br>तेषां भेदं प्रयुञ्जीत भेदसाध्या हि ते मताः॥ १<br>ये तु येनैव दोषेण परस्मान्नापि बिभ्यति।<br>ते तु तद्दोषपातेन भेदनीया भृशं ततः॥ २<br>आत्मीयां दर्शयेदाशां परस्माद् दर्शयेद् भयम्।<br>एवं हि भेदयेद् भिन्नान् यथावद् वशमानयेत्॥ ३<br>संहता हि विना भेदं शक्रेणापि सुदुःसहा।<br>भेदमेव प्रशंसन्ति तस्मान्नयविशारदाः॥ ४<br>स्वमुखेनाश्रयेद् भेदं भेदं परमुखेन च।<br>परीक्ष्य साधु मन्येत भेदं परमुखाच्छ्रुतम्॥ ५<br>सद्यः स्वकार्यमुद्दिश्य कुशलैर्ये हि भेदिताः।<br>भेदितास्ते विनिर्दिष्टा नैव राज्ञाऽर्थवादिभिः॥ ६<br>अन्तःकोपो बहिःकोपो यत्र स्यातां महीक्षिताम्।<br>अन्तःकोपो महांस्तत्र नाशकः पृथिवीक्षिताम्॥ ७ | राजन्! जो परस्पर वैर रखनेवाले, क्रोधी, भयभीत तथा अपमानित हैं, उनके प्रति भेद-नीतिका प्रयोग करना चाहिये; क्योंकि वे भेदद्वारा साध्य माने गये हैं। जो लोग जिस दोषके कारण दूसरेसे भयभीत नहीं होते उन्हें उसी दोषके द्वारा भेदन करना चाहिये। उनके प्रति अपनी ओरसे आशा प्रकट करे और दूसरेसे भयकी आशङ्का दिखलाये। इस प्रकार उन्हें फोड़ ले तथा फूट जानेपर उन्हें अपने वशमें कर ले। संगठित लोग भेद-नीतिके बिना इन्द्रद्वारा भी दुःसाध्य होते हैं। इसीलिये नीतिज्ञलोग भेद-नीतिकी ही प्रशंसा करते हैं। इस नीतिको अपने मुखसे तथा दूसरेके मुखसे भेद्य व्यक्तिसे कहे या कहलाये, परंतु अपने विषयमें दूसरेके मुखसे सुनी हुई भेद-नीतिको परीक्षा करके ठीक मानना चाहिये। अपने कार्यके उद्देश्यसे सुनिपुण नीतिज्ञोंद्वारा जो तुरंत भेदित किये जाते हैं, वे ही सच्चे अर्थमें भेदित कहे जाते हैं, अर्थवादियों एवं राजाद्वारा किये गये नहीं। जहाँ राजाओंके सम्मुख आन्तरिक (दुर्गके अन्तर्गतका) कोप और बाहरी कोप—दोनों उपस्थित हों, वहाँ आन्तरिक कोप ही महान् है; क्योंकि वह राजाओंके लिये विनाशकारी होता है॥ १—७॥ |
| सामन्तकोपो बाह्यस्तु कोपः प्रोक्तो महीभृतः।<br>महिषीयुवराजाभ्यां तथा सेनापतेर्नृप॥ ८<br>अमात्यमन्त्रिणां चैव राजपुत्रे तथैव च।<br>अन्तःकोपो विनिर्दिष्टो दारुणः पृथिवीक्षिताम्॥ ९<br>बाह्यकोपे समुत्पन्ने सुमहत्यपि पार्थिवः।<br>शुद्धान्तस्तु महाभाग शीघ्रमेव जयी भवेत्॥ १०<br>अपि शक्रसमो राजा अन्तःकोपेन नश्यति।<br>सोऽन्तःकोपः प्रयत्नेन तस्माद् रक्ष्यो महीभृता॥ ११<br>परतः कोपमुत्पाद्य भेदेन विजिगीषुणा।<br>ज्ञातीनां भेदनं कार्यं परेषां विजिगीषुणा॥ १२ | छोटे राजाओंका क्रोध राजाके लिये बाह्य क्रोध कहा गया है तथा रानी, युवराज, सेनापति, अमात्य, मन्त्री और राजकुमारके द्वारा किया गया क्रोध आन्तरिक कोप कहा गया है। इन सबोंका कोप राजाओंके लिये भयानक बतलाया गया है। महाभाग! अत्यन्त भीषण बाह्य कोपके उत्पन्न होनेपर भी यदि राजाका अन्तःपुर (दुर्गस्थ महारानी, युवराज, मन्त्री आदि प्रकृति) शुद्ध एवं अनुकूल है तो वह शीघ्र ही विजय-लाभ करता है। यदि राजा इन्द्रके समान हो तो भी वह अन्तः (दुर्गस्थ रानी, युवराज, मन्त्री आदिके)-कोपसे नष्ट हो जाता है। इसलिये राजाको प्रयत्नपूर्वक उस आन्तरिक कोपकी रक्षा करनी चाहिये। शत्रुओंको जीतनेकी इच्छावाले राजाको चाहिये कि दूसरेसे भेद-नीतिद्वारा क्रोध पैदा कराकर |
| * अध्याय २२४ * | ८८५ |
|---|
| रक्ष्यश्चैव प्रयत्नेन ज्ञातिभेदस्तथात्मनः।<br>ज्ञातयः परितप्यन्ते सततं परितापिताः ॥ १३<br>तथापि तेषां कर्तव्यं सुगम्भीरेण चेतसा।<br>ग्रहणं दानमानाभ्यां भेदस्तेभ्यो भयंकरः ॥ १४<br>न ज्ञातिमनुगृह्णन्ति न ज्ञातिं विश्वसन्ति च।<br>ज्ञातिभिर्भेदनीयास्तु रिपवस्तेन पार्थिवैः ॥ १५<br>भिन्ना हि शक्या रिपवः प्रभूताः<br> स्वल्पेन सैन्येन निहन्तुमाजौ।<br>सुसंहतानां हि तदस्तु भेदः<br> कार्यो रिपूणां नयशास्त्रविद्भिः ॥ १६ | उसकी जातिमें भेद उत्पन्न कर दे और प्रयत्नपूर्वक अपने जाति-भेदकी रक्षा करे। यद्यपि संतप्त भाई-बन्धु राजाकी उन्नति देखकर जलते रहते हैं, तथापि राजाको दान और सम्मानद्वारा उनको मिलाये रखना चाहिये; क्योंकि जातिगत भेद बड़ा भयंकर होता है। जातिवालोंपर प्रायः लोग अनुग्रहका भाव नहीं रखते और न उनका विश्वास ही करते हैं, इसलिये राजाओंको चाहिये कि जातिमें फूट डालकर शत्रुको उनसे अलग कर दें। इस भेद-नीतिद्वारा भिन्न किये गये शत्रुओंके विशाल समूहको भी संग्रामभूमिमें थोड़ी-सी सुसंगठित सेनासे ही नष्ट किया जा सकता है, अतएव नीतिकुशल लोगोंको सुसंगठित शत्रुओंके प्रति भी भेदनीतिका ही प्रयोग करना चाहिये ॥ ८—१६ ॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे राजधर्मे भेदप्रशंसा नाम त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रकरणमें भेद-प्रशंसा नामक दो सौ तेईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २२३ ॥
दो सौ चौबीसवाँ अध्याय
दान-नीतिकी प्रशंसा
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| सर्वेषामप्युपायानां दानं श्रेष्ठतमं मतम्।<br>सुदत्तेनेह भवति दानेनोभयलोकजित् ॥ १ | दान सभी उपायोंमें सर्वश्रेष्ठ है। प्रचुर दान देनेसे मनुष्य दोनों लोकोंको जीत लेता है। |
| न सोऽस्ति राजन् दानेन वशगो यो न जायते।<br>दानेन वशगा देवा भवन्तीह सदा नृणाम् ॥ २ | राजन्! ऐसा कोई नहीं है जो दानद्वारा वशमें न किया जा सके। दानसे देवतालोग भी सदाके लिये मनुष्योंके वशमें हो जाते हैं। |
| दानमेवोपजीवन्ति प्रजाः सर्वा नृपोत्तम।<br>प्रियो हि दानवाँल्लोके सर्वस्यैवोपजायते ॥ ३ | नृपोत्तम ! सारी प्रजाएँ दानके बलसे ही पालित होती हैं। दानी मनुष्य संसारमें सभीका प्रिय हो जाता है। |
| दानवानचिरेणैव तथा राजा परान् जयेत्।<br>दानवानेव शक्नोति संहतान् भेदितुं परान् ॥ ४ | दानशील राजा शीघ्र ही शत्रुओंको जीत लेता है। दानशील ही संगठित शत्रुओंका भेदन करनेमें समर्थ हो सकता है। |
| यद्यप्यलुब्धगम्भीराः पुरुषाः सागरोपमाः।<br>न गृह्णन्ति तथाप्येते जायन्ते पक्षपातिनः ॥ ५ | यद्यपि निर्लोभ तथा समुद्रके समान गम्भीर स्वभाववाले मनुष्य स्वयं दानको अङ्गीकार नहीं करते, तथापि वे (भी दानी व्यक्तिके) पक्षपाती हो जाते हैं। |
| अन्यत्रापि कृतं दानं करोत्यन्यान् यथा वशे।<br>उपायेभ्यः प्रशंसन्ति दानं श्रेष्ठतमं जनाः ॥ ६ | अन्यत्र किया गया दान भी अन्य लोगोंको अपने वशमें कर लेता है, इसलिये लोग सभी उपायोंमें श्रेष्ठतम दानकी प्रशंसा करते हैं। |
८८६ * मत्स्यपुराण *
| दानं श्रेयस्करं पुंसां दानं श्रेष्ठतमं परम्।<br>दानवानेव लोकेषु पुत्रत्वे ध्रियते सदा॥ ७<br>न केवलं दानपरा जयन्ति<br>भूर्लोकमेकं पुरुषप्रवीराः।<br>जयन्ति ते राजसुरेन्द्रलोकं<br>सुदुर्जयं यो विबुधाधिवासः॥ ८ | दान पुरुषोंका कल्याण करनेवाला तथा परम श्रेष्ठ है। लोकमें दानशील व्यक्तिकी सर्वदा पुत्रकी भाँति प्रतिष्ठा होती है। दानपरायण पुरुषश्रेष्ठ केवल एक भूलोकको ही अपने वशमें नहीं करते, प्रत्युत वे अत्यन्त दुर्जय देवराज इन्द्रके लोकको भी, जो देवताओंका निवासस्थान है, जीत लेते हैं॥ १—८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजधर्मदानप्रशंसा नाम चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रकरणमें दान-प्रशंसा नामक दो सौ चौबीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२४॥
दो सौ पचीसवाँ अध्याय
दण्डनीतिका वर्णन
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| न शक्या ये वशे कर्तुमुपायत्रितयेन तु।<br>दण्डेन तान् वशीकुर्याद् दण्डो हि वशकृन्नृणाम्॥ १<br>सम्यक् प्रणयनं तस्य तथा कार्यं महीक्षिता।<br>धर्मशास्त्रानुसारेण सुसहायेन धीमता॥ २<br>तस्य सम्यक् प्रणयनं यथा कार्यं महीक्षिता।<br>वानप्रस्थांश्च धर्मज्ञान् निर्ममान् निष्परिग्रहान्॥ ३<br>स्वदेशे परदेशे वा धर्मशास्त्रविशारदान्।<br>समीक्ष्य प्रणयेद् दण्डं सर्वं दण्डे प्रतिष्ठितम्॥ ४<br>आश्रमी यदि वा वर्णी पूज्यो वाथ गुरुर्महान्।<br>नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्मेण तिष्ठति॥ ५<br>अदण्ड्यान् दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन्।<br>इह राज्यात् परिभ्रष्टो नरकं च प्रपद्यते॥ ६<br>तस्माद् राज्ञा विनीतेन धर्मशास्त्रानुसारतः।<br>दण्डप्रणयनं कार्यं लोकानुग्रहकाम्यया॥ ७<br>यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति पापहा।<br>प्रजास्तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत् साधु पश्यति॥ ८<br>बालवृद्धातुरयतिद्विजस्त्रीविधवा यतः।<br>मात्स्यन्यायेन भक्ष्येरन् यदि दण्डं न पातयेत्॥ ९<br>देवदैत्योरगगणाः सर्वे भूतपतत्रिणः।<br>उत्क्रामयेयुर्मर्यादां यदि दण्डं न पातयेत्॥ १० | राजन्! जो (पूर्वोक्त सामादि) तीनों उपायोंके द्वारा वशमें नहीं किये जा सकते, उन्हें दण्डनीतिके द्वारा वशमें करे; क्योंकि दण्ड मनुष्योंको निश्चयरूपसे वशमें करनेवाला है। बुद्धिमान् राजाको सम्यक्-रूपसे उस दण्डनीतिका प्रयोग धर्मशास्त्रके अनुसार पुरोहित आदिकी सहायतासे करना चाहिये। उस दण्डनीतिका सम्यक् प्रयोग जिस प्रकार करना चाहिये, उसे सुनिये। राजाको अपने देशमें अथवा पराये देशमें वानप्रस्थाश्रमी, धर्मशील, ममतारहित, परिग्रहहीन और धर्मशास्त्रप्रवीण विद्वान् पुरुषोंकी परिषद्द्वारा भलीभाँति विचार कर दण्डनीतिका प्रयोग करना चाहिये; क्योंकि सब कुछ दण्डपर ही प्रतिष्ठित है। सभी आश्रमधर्मके व्यक्ति, ब्रह्मचारी, पूज्य, गुरु, महापुरुष तथा अपने धर्ममें स्थित रहनेवाला कोई व्यक्ति ऐसा नहीं है, जो राजाके द्वारा दण्डनीय न हो; किंतु अदण्डनीय पुरुषोंको दण्ड देने तथा दण्डनीय पुरुषोंको दण्ड न देनेसे राजा इस लोकमें राज्यसे च्युत हो जाता है और मरनेपर नरकमें पड़ता है। इसलिये विनयशील राजाको लोकानुग्रहकी कामनासे धर्मशास्त्रके अनुसार ही दण्डनीतिका प्रयोग करना चाहिये। जिस राज्यमें श्यामवर्ण, लाल नेत्रवाला और पापनाशक दण्ड विचरण करता है तथा राजा ठीक-ठीक निर्णय करनेवाला होता है वहाँ प्रजाएँ कष्ट नहीं झेलतीं। यदि राज्यमें दण्डनीतिकी व्यवस्था न रखी जाय तो बालक, वृद्ध, आतुर, संन्यासी, ब्राह्मण, स्त्री और विधवा—ये सभी मात्स्यन्यायके अनुसार आपसमें एक-दूसरेको खा जायँ। यदि राजा दण्डकी व्यवस्था न करे तो सभी देवता, दैत्य, सर्पगण, प्राणी तथा पक्षी मर्यादाका उल्लङ्घन कर जायँगे॥ १—१०॥ |
| * अध्याय २२६ * | ८८७ |
|---|
| एष ब्रह्माभिशापेषु सर्वप्रहरणेषु च।<br>सर्वविक्रमकोपेषु व्यवसाये च तिष्ठति॥ ११<br>पूज्यन्ते दण्डिनो देवैर्न पूज्यन्ते त्वदण्डिनः।<br>न ब्रह्माणं विधातारं न पूषार्यमणावपि॥ १२<br>यजन्ते मानवाः केचित् प्रशान्ताः सर्वकर्मसु।<br>रुद्रमग्निं च शक्रं च सूर्याचन्द्रमसौ तथा॥ १३<br>विष्णुं देवगणांश्चान्यान् दण्डिनः पूजयन्ति च।<br>दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति॥ १४<br>दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः।<br>राजदण्डभयादेव पापाः पापं न कुर्वते॥ १५<br>यमदण्डभयादेके परस्परभयादपि।<br>एवं सांसिद्धिके लोके सर्वं दण्डे प्रतिष्ठितम्॥ १६<br>अन्धे तमसि मज्जेयुर्यदि दण्डं न पातयेत्।<br>यस्माद् दण्डो दमयति दुर्मदान् दण्डयत्यपि।<br>दमनाद् दण्डनाच्चैव तस्माद् दण्डं विदुर्बुधाः॥ १७<br>दण्डस्य भीतैस्त्रिदशैः समेतै-<br>भागो धृतः शूलधरस्य यज्ञे।<br>दत्तं कुमारे ध्वजिनीपतित्वं<br>वरं शिशूनां च भयाद् बलस्थम्॥ १८ | यह दण्ड ब्राह्मणके शाप, सभीके अस्त्र-शस्त्र, सभी प्रकारके पराक्रमपूर्वक क्रोधसे किये गये क्रिया-कलाप और व्यवसायमें स्थित रहता है। दण्ड देनेवाले व्यक्ति देवताओंद्द्वारा पूज्य हैं, किंतु दण्ड न देनेवालोंकी पूजा कहीं भी नहीं होती। ब्रह्मा, पूषा और अर्यमा सभी कार्योंमें शान्त रहते हैं, इसलिये कोई भी मनुष्य उनकी पूजा नहीं करता। साथ ही दण्ड देनेवाले रुद्र, अग्नि, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, विष्णु एवं अन्य देवगणोंकी सभी लोग पूजा करते हैं। दण्ड सभी प्रजाओंपर शासन करता है तथा दण्ड ही सबकी रक्षा करता है। दण्ड सभीके सो जानेपर भी जागता रहता है, अतएव बुद्धिमान् लोग दण्डको धर्म मानते हैं। कुछ पापी राजदण्डके भयसे, कुछ यमराजके दण्डके भयसे और कतिपय पारस्परिक भयसे भी पापकर्म नहीं करते। इस प्रकार इस प्राकृतिक जगत्में सभी कुछ दण्डपर ही प्रतिष्ठित है। यदि दण्ड न दिया जाय तो प्रजा घोर अंधकारमें डूब जाय। चूँकि दण्ड दमन करता है और दुर्मदोंको दण्ड भी देता है, इसलिये दमन करने तथा दण्ड देनेके कारण बुद्धिमान् लोग उसे दण्ड मानते हैं। दण्डके भयसे डरे हुए समस्त देवताओंने यज्ञमें शिवजीका भाग निश्चित किया है और भयके कारण ही स्वामी कार्तिकेयको शैशवावस्थामें ही सारी देवसेनाका सेनापतित्व और वरदान प्रदान किया गया है॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे राजधर्मे दण्डप्रशंसा नाम पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रकरणमें दण्डप्रशंसा नामक दो सौ पचीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२५॥
दो सौ छब्बीसवाँ अध्याय
सामान्य राजनीतिका निरूपण
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| दण्डप्रणयनार्थाय राजा सृष्टः स्वयम्भुवा।<br>देवभागानुपादाय सर्वभूतादिगुप्तये॥ १<br>तेजसा यदमुं कश्चिन्नैव शक्नोति वीक्षितुम्।<br>ततो भवति लोकेषु राजा भास्करवत्प्रभुः॥ २ | राजन्! ब्रह्माने समस्त प्राणियोंकी रक्षाके निमित्त दण्डका प्रयोग करनेके लिये देवताओंके अंशोंको लेकर राजाकी सृष्टि की है। चूँकि तेजसे देदीप्यमान होनेके कारण कोई भी उसकी ओर देख नहीं सकता, इसलिये राजा लोकमें सूर्यके समान |
८८८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यदास्य दर्शने लोकः प्रसादमुपगच्छति।<br>नयनानन्दकारित्वात् तदा भवति चन्द्रमाः॥ ३<br><br>यथा यमः प्रियद्वेष्ये प्राप्ते काले प्रयच्छति।<br>तथा राज्ञा विधातव्याः प्रजास्तद्विद्धि यमव्रतम्॥ ४<br><br>वरुणेन यथा पाशैर्बद्ध एव प्रदृश्यते।<br>तथा पापान् निगृह्णीयाद् व्रतमेतद्धि वारुणम्॥ ५<br><br>परिपूर्णं यथा चन्द्रं दृष्ट्वा हृष्यति मानवः।<br>तथा प्रकृतयो यस्मिन् स चन्द्रप्रतिमो नृपः॥ ६ | प्रभावशाली होता है। जिस समय इसे देखनेसे लोग हर्षको प्राप्त होते हैं, उस समय वह नेत्रोंके लिये आनन्दकारी होनेके कारण चन्द्रमाके समान हो जाता है। जिस प्रकार यमराज समय आनेपर शत्रु-मित्र—सबको दण्ड देते हैं, उसी तरह राजाको प्रजाके साथ व्यवहार करना चाहिये, यह यम-व्रत है। जिस तरह वरुणद्वारा पाशसे बँधे हुए लोग दिखायी पड़ते हैं; उसी प्रकार पापाचरण करनेवालोंको पाशबद्ध करना चाहिये, यह वरुण-व्रत है। जैसे मनुष्य पूर्ण चन्द्रको देखकर प्रसन्न होता है, उसी प्रकार जिसे देखकर प्रजा प्रसन्न होती है वह राजा चन्द्रमाके समान है॥ १—६॥ |
| प्रतापयुक्तस्तेजस्वी नित्यं स्यात् पापकर्मसु।<br>दुष्टसामन्तहिंस्रेषु राजाग्नेयव्रते स्थितः॥ ७<br><br>यथा सर्वाणि भूतानि धरा धारयते स्वयम्।<br>तथा सर्वाणि भूतानि बिभ्रतः पार्थिवं व्रतम्॥ ८<br><br>इन्द्रस्यार्कस्य वातस्य यमस्य वरुणस्य च।<br>चन्द्रस्याग्नेः पृथिव्याश्च तेजोव्रतं नृपश्रयेत्॥ ९<br><br>वार्षिकांश्चतुरो मासान् यथेन्द्रोऽप्यभिवर्षति।<br>तथाभिवर्षेत् स्वं राज्यं काममिन्द्रव्रतं स्मृतम्॥ १०<br><br>अष्टौ मासान् यथाऽऽदित्यस्तोयं हरति रश्मिभिः।<br>तथा हरेत् करं राष्ट्रान्नित्यमर्कव्रतं हि तत्॥ ११<br><br>प्रविश्य सर्वभूतानि यथा चरति मारुतः।<br>तथा चारैः प्रवेष्टव्यं व्रतमेतद्धि मारुतम्॥ १२ | अग्नि-व्रतमें स्थित राजाको पापियों, दुष्ट सामन्तों तथा हिंसकोंके प्रति नित्य प्रतापशाली एवं तेजस्वी होना चाहिये। जिस प्रकार स्वयं पृथ्वी समस्त जीवोंको धारण करती है, उसी प्रकार राजा भी सम्पूर्ण प्राणियोंका पालन-पोषण करता है। यह पार्थिव-व्रत है। राजाको इन्द्र, सूर्य, वायु, यम, वरुण, चन्द्रमा, अग्नि तथा पृथ्वीके तेजोव्रतका आचरण करना चाहिये। जिस प्रकार इन्द्र वर्षके चार महीनोंमें वृष्टि करते हैं, उसी प्रकार राजाको भी अपने राष्ट्रमें स्वेच्छापूर्वक दानवृष्टि करनी चाहिये, यह इन्द्र-व्रत है। जिस प्रकार सूर्य आठ महीनेतक अपनी किरणोंसे जलका अपहरण करते हैं, उसी प्रकार राजाको भी नित्य राज्यसे कर ग्रहण करना चाहिये। यह सूर्य-व्रत है। जिस प्रकार मारुत सभी प्राणियोंमें प्रवेश करके विचरण करता है, उसी प्रकार राजाको भी गुप्तचरोंद्वारा सभी प्राणियोंमें प्रविष्ट होनेका विधान है। यह मारुत-व्रत है॥ ७—१२॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजधर्मे राज्ञो लोकपालसाम्यनिर्देशो नाम षड्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रकरणमें प्रजापालन नामक दो सौ छब्बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२६॥
| * अध्याय २२७ * | ८८९ |
|---|
दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय
दण्डनीतिका निरूपण
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| निक्षेपस्य समं मूल्यं दण्ड्यो निक्षेपभुक् तथा।<br>वस्त्रादिकसमस्तस्य तदा धर्मो न हीयते॥ १<br>यो निक्षेपं नार्पयति यश्चानिक्षिप्य याचते।<br>तावुभौ चोरवच्छास्यौ दाप्यौ वा द्विगुणं धनम्॥ २<br>उपधाभिश्च यः कश्चित् परद्रव्यं हरेन्नरः।<br>ससहायः स हन्तव्यः प्रकामं विविधैर्वधैः॥ ३<br>यो याचितं समादाय न तद् दद्याद् यथाक्रमम्।<br>स निगृह्य बलाद् दाप्यो दण्ड्यो वा पूर्वसाहसम्॥ ४<br>अज्ञानाद् यदि वा कुर्यात् परद्रव्यस्य विक्रयम्।<br>निर्दोषो ज्ञानपूर्वं तु चोरवद् वधमर्हति॥ ५<br>मूल्यमादाय यो विद्यां शिल्पं वा न प्रयच्छति।<br>दण्ड्यः स मूल्यं सकलं धर्मज्ञेन महीक्षिता॥ ६<br>द्विजभोज्ये तु सम्प्राप्ते प्रतिवेशममभोजयन्।<br>हिरण्यमाषकं दण्ड्यः पापे नास्ति व्यतिक्रमः॥ ७<br>आमन्त्रितो द्विजो यस्तु वर्तमानश्च स्व गृहे।<br>निष्कारणं न गच्छेद यः स दाप्योऽष्टशतं दमम्।<br>प्रतिश्रुत्याप्रदातारं सुवर्णं दण्डयेन्नृपः॥ ८<br>भृत्यश्चाज्ञां न कुर्याद् यो दर्पात् कर्म यथोदितम्।<br>स दण्ड्यः कृष्णालान्यष्टौ न देयं चास्य वेतनम्॥ ९<br>संगृहीतं न दद्याद् यः काले वेतनमेव च।<br>अकाले तु त्यजेद् भृत्यं दण्ड्यः स्याच्छतमेव च॥ १० | राजन्! (रत्न-धन-) वस्त्रादि धरोहरको हड़प जानेवाले व्यक्तिको उसके मूल्यके अनुरूप दण्ड देनेपर राजाका धर्म नष्ट नहीं होता। जो व्यक्ति रखी हुई धरोहरको वापस नहीं करता और जो बिना धरोहर रखे ही माँगता है, वे दोनों ही चोरके समान दण्डनीय हैं। उनसे मूल्यसे दुगुना धन दिलाना चाहिये। जो कोई उपधा<sup>१</sup>-डाँका डालकर या छल-कपटसे दूसरेके धनको चुरा लेता है, उसे अनेकों वधोपायोंद्वारा सहायकोंसहित प्राण-दण्ड देना चाहिये। जो व्यक्ति दूसरेसे माँगकर ली गयी वस्तुको समयपर वापस नहीं करता तो उसे बलपूर्वक पकड़कर वह वस्तु दिला देने अथवा पूर्वसाहस<sup>२</sup>का दण्ड देनेका विधान है। जो कोई अनजानमें किसी दूसरेकी वस्तुको बेंच देता है, वह तो निर्दोष है, किंतु जो जानते हुए दूसरेकी वस्तुको बेचता है वह चोरके समान दण्डनीय है। जो मूल्य लेकर विद्या या शिल्पज्ञानको नहीं देता, उसे धर्मज्ञ राजाको रकमवापसीका दण्ड देना चाहिये। जो ब्रह्मभोजका अवसर प्राप्त होनेपर अपने पड़ोसियोंको भोजन नहीं कराता उसे एक माशा सुवर्णका दण्ड देना चाहिये। अपराधियोंको दण्ड देनेमें व्यतिक्रमका विधान नहीं है। जो निमन्त्रित ब्राह्मण अपने घरपर रहते हुए भी बिना किसी कारणके भोजन करने नहीं जाता उसे एक सौ आठ माशा सुवर्णका दण्ड देना चाहिये। जो किसी वस्तुको देनेकी प्रतिज्ञा कर उसे नहीं देता; उसे राजा एक सुवर्ण-मुद्राका दण्ड दे। जो नौकर अभिमानवश आज्ञापालन तथा कहा हुआ कर्म नहीं करता, उसे राजा आठ कृष्णलक<sup>३</sup> दण्ड दे और उसका वेतन भी रोक दे। जो स्वामी अपने नौकरको उसके संचित धन तथा वेतनको समयपर नहीं देता और कुसमयमें उसे छोड़ देता है, उसे सौ मुद्राका दण्ड देना चाहिये॥ १-१०॥ |
१. कामन्दक आदिने उपधाको छल, साहस (डाँका) आदि भेदसे चार प्रकारका बतलाया है।
२. दण्डनीति एवं मन्वादि धर्मशास्त्रोंके अनुसार वध (फाँसी), वनवास, अग्निचिह्नपूर्वक देशनिष्कासन अथवा सहस्रपणका दण्ड पूर्व या उत्तमसाहस दण्ड कहलाता है।
३. १ ३/८ दाने जौकी स्वर्णमुद्रा (कौटलीय अर्थशास्त्र, लीलावती आदि)।
८९० * मत्स्यपुराण *
| यो ग्रामदेशसस्यानां कृत्वा सत्येन संविदम्।<br>विसंवदेन्नरो लोभात् तं राष्ट्राद् विप्रवासयेत्॥ ११ | जो मनुष्य सत्यतापूर्वक किये गये देश, ग्राम और अन्नके बँटवारेको लोभके कारण पुनः असत्य बतलाता है, उसे देशसे निकाल देना चाहिये। |
| क्रीत्वा विक्रीय वा किंचिद् यस्येहानुशयी भवेत्।<br>सोऽन्तर्दशाहात् तत्साम्यं दद्याच्चैवाददीत वा॥ १२ | किसी वस्तुको खरीदने या बेंचनेके बाद यदि कुछ मूल्य शेष रह जाता है तो उसे दस दिनके भीतर दे देना या ले लेना चाहिये। |
| परेण तु दशाहस्य न दद्यान्नैव दापयेत्।<br>आददद्विददच्चैव राज्ञा दण्ड्यः शतानि षट्॥ १३ | यदि दस दिन बीत जानेके बाद कोई शेष मूल्यको न देता है न दिलाता है तो राजा उन न देने और दिलानेवाले दोनोंको छः सौ मुद्राओंका दण्ड दे। |
| यस्तु दोषवतीं कन्यामनाख्याय प्रयच्छति।<br>तस्य कुर्यान्नृपो दण्डं स्वयं षण्णवतिं पणान्॥ १४ | जो व्यक्ति अपनी दोषसे युक्त कन्याको बिना दोष सूचित किये किसीको दान कर देता है तो स्वयं राजा उसे छियानबे पणोंका दण्ड दे। |
| अकन्यैवेति यः कन्यां ब्रूयाद् दोषेण मानवः।<br>स शतं प्राप्नुयाद् दण्डं तस्या दोषमदर्शयन्॥ १५ | जो मनुष्य बिना दोषके ही किसी दूसरेकी कन्याको दोषयुक्त बतलाता है और उस कन्याके दोषको दिखानेमें असमर्थ हो जाता है तो राजा उसे सौ मुद्राका दण्ड दे। |
| यस्त्वन्यां दर्शयित्वान्यां वोढुः कन्यां प्रयच्छति।<br>उत्तमं तस्य कुर्वीत राजा दण्डं तु साहसम्॥ १६ | जो व्यक्ति अन्य कन्याको दिखलाकर वरको दूसरी कन्याका दान करता है तो राजाको उसे उत्तम साहसिक दण्ड देना चाहिये। |
| वरो दोषाननाख्याय यः कन्यां वरयेदिह।<br>दत्ताप्यदत्ता सा तस्य राज्ञा दण्ड्यः शतद्वयम्॥ १७ | जो वर अपने दोषको न बतलाकर किसी कन्याका पाणिग्रहण करता है तो वह कन्या देनेके बाद भी न दी हुईके समान है। राजाको उसपर दो सौ मुद्राओंका दण्ड लगाना चाहिये। |
| प्रदाय कन्यां योऽन्यस्मै पुनस्तां सम्प्रयच्छति।<br>दण्डः कार्यो नरेन्द्रेण तस्याप्युत्तमसाहसः॥ १८ | जो एक ही कन्याको किसीको दान कर देनेके बाद फिर किसी दूसरेको दान करता है, उसे भी राजाको उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये। |
| सत्यंकारेण वा वाचा युक्तं पण्यमसंशयम्।<br>लुब्धो ह्यन्यत्र विक्रेता षट्शतं दण्डमर्हति॥ १९ | जो अपने मुखसे 'निश्चय ही मैं इतने मूल्यपर अमुक वस्तु आपको दे दूँगा' ऐसी प्रतिज्ञा कर फिर लोभके कारण उसे दूसरेके हाथ बेंच देता है, वह छः सौ मुद्राओंके दण्डका भागी होता है। |
| दुहितुः शुल्कविक्रेता सत्यंकारात् तु संत्यजेत्।<br>द्विगुणं दण्डयेदेनमिति धर्मो व्यवस्थितः॥ २० | जो व्यक्ति कन्याका मूल्य लेकर विक्रय नहीं करता या प्रतिज्ञासे हटता है तो उसे लिये हुए मूल्यसे दुगुने द्रव्यका दण्ड देना चाहिये, यह धर्मकी व्यवस्था है। |
| मूल्यैकदेशं दत्त्वा तु यदि क्रेता धनं त्यजेत्।<br>स दण्ड्यो मध्यमं दण्डं तस्य पण्यस्य मोक्षणम्॥ २१ | मूल्यका कुछ भाग देनेके पश्चात् यदि लेनेवाला व्यक्ति उसे लेना नहीं चाहता तो उसे मध्यम साहसका दण्ड देना चाहिये और उसे दिये हुए द्रव्यको लौटा देना चाहिये। |
| दुह्याद् धेनुं च यः पालो गृहीत्वा भुक्तवेतनम्।<br>स तु दण्ड्यः शतं राज्ञा सुवर्णं चाप्यरक्षिता॥ २२ | जो गोपाल वेतन लेकर गायको दुहता है और उसकी ठीकसे रक्षा नहीं करता उसे राजाको सौ सुवर्ण मुद्राओंका दण्ड देना चाहिये। |
| दण्डं दत्त्वा तु विरमेत् स्वामितः कृतलक्षणः।<br>बद्धः कार्ष्णायसैः पाशैस्तस्य कर्मकरो भवेत्॥ २३ | राजा दण्ड देनेके बाद विराम ले ले। तदनन्तर राजाद्वारा चिह्नित अपराधीको काले लोहेकी जंजीरसे आबद्ध कर दिया जाय और पुनः किसी अपने ही कार्यपर नियुक्त कर लिया जाय॥११-२३॥ |
* अध्याय २२७ * ८९१
| धनुःशतपरीणाहो ग्रामस्य तु समंततः।<br>द्विगुणं त्रिगुणं वापि नगरस्य तु कल्पयेत्॥ २४<br><br>वृत्तिं तत्र प्रकुर्वीत यामुष्ट्रो नावलोकयेत्।<br>छिद्रं वा वारयेत् सर्वं श्वशूकरमुखानुगम्॥ २५<br><br>यत्रापरिवृतं धान्यं विहिंस्युः पशवो यदि।<br>न तत्र कारयेद् दण्डं नृपतिः पशुरक्षिणे॥ २६<br><br>अनिर्दशाहं गां सूतां वृषं देवपशुं तथा।<br>छिद्रं वा वारयेत् सर्वं न दण्ड्यो मनुरब्रवीत्॥ २७<br><br>अथोऽन्यथा विनष्टस्य दशांशं दण्डमर्हति।<br>पाल्यस्य पालकस्वामी विनाशे क्षत्रियस्य तु॥ २८<br><br>भक्षयित्वोपविष्टस्तु द्विगुणं दण्डमर्हति।<br>विशं दण्ड्याद् दशगुणं विनाशे क्षत्रियस्य तु॥ २९<br><br>गृहं तडागमारामं क्षेत्रं वापि समाहरन्।<br>शतानि पञ्च दण्डः स्यादज्ञानाद् द्विशतो दमः॥ ३०<br><br>सीमाबन्धनकाले तु सीमान्तं यो हि कारयेत्।<br>तेषां संज्ञां ददानस्तु जिह्वाच्छेदनमाप्नुयात्॥ ३१<br><br>अथैनामपि यो दद्यात् संविदं वाधिगच्छति।<br>उत्तमं साहसं दण्ड्य इति स्वायम्भुवोऽब्रवीत्॥ ३२ | ग्रामके बाहर चारों ओरसे सौ धनुषके विस्तारकी और नगरके लिये उससे दुगुने या तिगुने विस्तारकी ऐसी प्राचीर बनाये जिसके भीतरकी वस्तुको ऊँट भी न देख सके। उसमें कुत्ते तथा सूअरके मुख घुसने योग्य सभी छिद्रोंको बंद करा देना चाहिये। यदि पशु बिना घेरेके खेतके अन्नको हानि पहुँचाते हैं तो राजाको पशुके चरवाहेको दण्ड नहीं देना चाहिये। दस दिनके भीतरकी ब्यायी गायद्वारा तथा देवताके उद्देश्यसे छोड़े गये वृषद्वारा घेरा रहनेपर भी यदि खेतके अन्नकी हानि होती है तो उसके लिये पशुपालक दण्डनीय नहीं है—ऐसा मनुने कहा है। इन उपर्युक्त कारणोंके अतिरिक्त अन्य प्रकारसे नष्ट हुए द्रव्यके दशांशका दण्ड लगाना चाहिये। कोई पशु फसलको खाकर यदि वहीं बैठा हुआ मिलता है तो उसके स्वामीके ऊपर उक्त दण्डसे दुगुना दण्ड लगाना चाहिये। यदि खेतका स्वामी क्षत्रिय है और वैश्यका पशु हानि पहुँचाता है तो उसे हानिका दस गुना दण्ड देना चाहिये। यदि किसीके घर, तालाब, बगीचे या खेतको कोई दूसरा छीन लेता है तो उसे पाँच सौ मुद्राका तथा बिना जाने यदि इनको हानि पहुँचाता है तो दो सौ मुद्राका दण्ड देना चाहिये। किसी खेत आदिकी सीमा बाँधनेके समय यदि कोई सीमाका उल्लङ्घन करता है या सम्मति देता है तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिये। जो सीमाका उल्लङ्घन करनेवाले व्यक्तिकी बातोंका शपथपूर्वक समर्थन करता है, उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये—ऐसा स्वायम्भुव मनुने कहा है॥ २४-३२॥ |
| वर्णानामानुपूर्व्येण त्रयाणामविशेषतः।<br>अकार्यकारिणः सर्वान् प्रायश्चित्तानि कारयेत्॥ ३३ | ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—इन तीनों वर्णोंके लोग समाजमें अपनी स्थितिके बिना किसी विशेषताके क्रमसे यदि निषिद्ध कार्य करते हैं तो उन सबसे प्रायश्चित्त करवाना चाहिये। |
| अमत्या च प्रमाप्य स्त्रीं शूद्रहत्याव्रतं चरेत्।<br>दानेन च धनेनैकं सर्पादीनामशक्नुवन्॥ ३४<br><br>एकैकं स चरेत् कृच्छ्रं द्विजः पापापनुत्तये।<br>फलदानां च वृक्षाणां छेदने जप्यमृक्शतम्॥ ३५<br><br>गुल्मवल्लीलतानां च पुष्पितानां च वीरुधाम्।<br>अस्थिमतां च सत्त्वानां सहस्रस्य प्रमापणे।<br>पूर्णे वानस्यवस्थातुं शूद्रहत्याव्रतं चरेत्॥ ३६ | यदि कोई अनजानमें स्त्रीका वध कर देता है तो उसे शूद्र-हत्या-व्रतका पालन करना चाहिये। सर्पादिकी हत्या कर धन-दान करनेमें असमर्थ द्विजको पाप-शान्तिके लिये एक-एक कृच्छ्रव्रतका आचरण करना चाहिये। फल देनेवाले वृक्षों, फूली हुई लताओं, गुल्मों, वल्लियों तथा फूले हुए वृक्षोंको काटनेपर सौ ऋचाओंका जप करना चाहिये। एक सहस्र अथवा एक गाड़ीमें भर जानेके योग्य हड्डीवाले जीवोंकी हत्या करनेवालेको शूद्रहत्याका प्रायश्चित्त करना चाहिये। |
८९२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| किंचिद् देयं च विप्राय दद्यादस्थिमतां वधे।<br>अनस्थां चैव हिंसायां प्राणायामैर्विशुद्ध्यति॥ ३७<br><br>अन्नादिजानां सत्त्वानां रसजानां च सर्वशः।<br>फलपुष्पोद्गतानां च घृतप्राशो विशोधनम्॥ ३८<br><br>कृष्टानामोषधीनां च जातानां च स्वयं वने।<br>वृथाच्छेदेन गच्छेत दिनमेकं पयोव्रती॥ ३९<br><br>एतैर्व्रतैरपोह्यं स्यादेनो हिंसासमुद्भवम्।<br>स्तेयदोषापहर्तॄणां श्रूयतां व्रतमुत्तमम्॥ ४० | हड्डीवाले जानवरोंकी हत्या करनेपर ब्राह्मणको कुछ दान देना चाहिये और जो बिना हड्डीके हैं उनकी हिंसा करनेपर प्राणायामसे शुद्धि हो जाती है। अन्नादिसे एवं रससे उत्पन्न होनेवाले तथा फलों और पुष्पोंमें पैदा होनेवाले जन्तुओंकी हिंसा करनेपर घृत-पान ही प्रायश्चित्त है। जुताईसे उत्पन्न हुई तथा वनमें स्वतः उगी हुई ओषधियोंको बिना आवश्यकताके काटनेपर एक दिनका दुग्धव्रत करना चाहिये। हिंसासे उत्पन्न हुआ पातक इन व्रतोंसे दूर किया जा सकता है। अब चोर-कर्मसे उत्पन्न हुए पापको दूर करनेके लिये उत्तम व्रत सुनिये॥ ३३—४०॥ |
| धान्यान्नधनचौर्याणि कृत्वा कामाद् द्विजोत्तमः।<br>सजातीयगृहादेव कृच्छ्रार्धेन विशुद्ध्यति॥ ४१<br><br>मनुष्याणां तु हरणे स्त्रीणां क्षेत्रगृहस्य तु।<br>कूपवापीजलानां तु शुद्धिश्चान्द्रायणं स्मृतम्॥ ४२<br><br>द्रव्याणामल्पसाराणां स्तेयं कृत्वान्यवेश्मतः।<br>चरेत् सान्तपनं कृच्छ्रं तन्निर्यात्यविशुद्धये॥ ४३<br><br>भक्ष्यभोज्यापहरणे यानशय्यासनस्य तु।<br>पुष्पमूलफलानां तु पञ्चगव्यं विशोधनम्॥ ४४<br><br>तृणकाष्ठद्रुमाणां तु शुष्कान्नस्य गुडस्य च।<br>चैलचर्मामिषाणां तु त्रिरात्रं स्यादभोजनम्॥ ४५<br><br>मणिमुक्ताप्रवालानां ताम्रस्य रजतस्य च।<br>अयस्कांस्योपलानां च द्वादशाहं कणान्नभुक्॥ ४६<br><br>कार्पासकीटजोर्णानां द्विशफैकशफस्य च।<br>पक्षिगन्धौषधीनां च रज्ज्वाश्चैव त्र्यहं पयः॥ ४७<br><br>एतैर्व्रतैर्व्यपोहेत पापं स्तेयकृतं द्विजः।<br>अगम्यागमनीयं तु व्रतैरेभिरपानुदेत्॥ ४८<br><br>गुरुतल्पव्रतं कुर्याद् रेतः सिक्त्वा स्वयोनिषु।<br>सख्युः पुत्रस्य च स्त्रीषु कुमारीष्वन्त्यजासु च॥ ४९<br><br>पैतृष्वस्त्रीयभगिनीं स्वस्त्रीयां मातुरेव च।<br>भ्रातुर्दुहितरं चैव गत्वा चान्द्रायणं चरेत्॥ ५० | यदि ब्राह्मण अपनी जातिवालोंके घरसे इच्छापूर्वक धान्य, अन्न और धनकी चोरी करता है तो वह अर्धकृच्छ्रव्रतसे शुद्ध होता है। मनुष्य, स्त्री, खेत, घर, कूप और बावलीके जलका हरण करनेपर शुद्धिके लिये चान्द्रायणव्रतका विधान है। दूसरेके घरसे थोड़ी मूल्यवाली वस्तुओंकी चोरी करनेपर उससे शुद्ध होनेके लिये कृच्छ्रसांतपन-व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। भक्ष्य, भोज्य, वाहन, शय्या, आसन, पुष्प, मूल और फलकी चोरी करनेपर उसका प्रायश्चित्त पञ्चगव्य-पान है। तृण, काष्ठ, वृक्ष, सूखा अन्न, गुड, वस्त्र, चमड़ा तथा मांसकी चोरी करनेपर तीन राततक उपवास करना चाहिये। मणि, मोती, प्रवाल, ताँबा, चाँदी, लोहा, काँसा तथा पत्थरकी चोरी करनेपर बारह दिनोंतक अन्नके कणोंका भोजन करना चाहिये। सूती, रेशमी, ऊनी वस्त्र, दो तथा एक खुरवाले पशु, पक्षी, सुगन्धित द्रव्य, ओषधि तथा रस्सीकी चोरी करनेपर तीन दिनतक केवल जल पीकर रहना चाहिये। ब्राह्मणको इन व्रतोंद्वारा चोरीसे उत्पन्न हुए पापका निवारण करना चाहिये। अगम्या स्त्रीके साथ समागम करनेसे उत्पन्न हुए पापको इन व्रतोंद्वारा नष्ट करना चाहिये। अपनी जातिकी परायी स्त्रीके साथ समागम करके गुरुतल्प-व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये अर्थात् गुरुकी स्त्रीके साथ समागम करनेपर जो प्रायश्चित्त कहा गया है, उसका अनुष्ठान करना चाहिये। मित्र तथा पुत्रकी स्त्री, कुमारी कन्या, नीच जातिकी स्त्री (चाण्डाली), फुफेरी तथा मौसेरी बहन और भाईकी कन्याके साथ समागम करनेपर चान्द्रायण-व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये॥ ४१—५०॥ |
| * अध्याय २२७ * | ८९३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एताः स्त्रियस्तु भार्यार्थे नोपगच्छेत्तु बुद्धिमान्।<br>ज्ञातीनां च स्त्रियो यास्तु पतितानुगताश्च याः॥ ५१<br><br>अमानुषीषु पुरुषो उदक्यायामयोनिषु।<br>रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्छ्रं सांतपनं चरेत्॥ ५२<br><br>मैथुनं च समालोक्य पुंसि योषिति वा द्विजः।<br>गोयानेऽप्सु दिवा चैव सवासाः स्नानमाचरेत्॥ ५३<br><br>चाण्डालान्त्यस्त्रियो गत्वा भुक्त्वा च प्रतिगृह्य च।<br>पतत्यज्ञानतो विप्रो ज्ञानात् साम्यं तु गच्छति॥ ५४<br><br>विप्रदुष्टां स्त्रियं भर्त्ता निरुन्ध्यादेकवेश्मनि।<br>यत् पुंसः परदारेषु तच्चैनां चारयेद् व्रतम्॥ ५५<br><br>सा चेत् पुनः प्रदुष्येत्तु सदृशेनोपमन्त्रिता।<br>कृच्छ्रं चान्द्रायणं चैव तत् तस्याः पावनं स्मृतम्॥ ५६<br><br>यः करोत्येकरात्रेण वृषलीसेवनं द्विजः।<br>तद्भक्ष्यभुग् जपेन्नित्यं त्रिभिर्वर्षैर्व्यपोहति॥ ५७<br><br>एषा पापकृतामुक्ता चतुर्णामपि निष्कृतिः।<br>पतितैः सम्प्रयुक्तानामिमां शृणुत निष्कृतिम्॥ ५८ | बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि जो स्त्रियाँ अपनी जातिकी हों तथा जो पतितोंकी अनुगामिनी हों, उनके साथ भार्याके समान समागम न करे। मनुष्यसे भिन्न योनि, ऋतुमती स्त्री तथा योनिद्वारसे अन्यत्र अथवा जलमें वीर्यपात करके पुरुषको कृच्छ्र-सान्तपन नामक व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। बैलगाड़ीपर, जलमें तथा दिनमें स्त्री-पुरुषके मैथुनको देखकर ब्राह्मणको वस्त्रसहित स्नान करना चाहिये। ब्राह्मण यदि अज्ञानसे चाण्डाल और अन्त्यज स्त्रियोंके साथ सम्भोग, उनके यहाँ भोजन और उनका दिया हुआ दान ग्रहण करता है तो वह पतित हो जाता है और जान-बूझकर करता है तो वह उन्हींके समान हो जाता है। ब्राह्मणद्वारा दूषित स्त्रीको उसका पति एक घरमें बंद कर दे। इसी प्रकार दूसरेकी स्त्रियोंसे समागम करनेवाले पुरुषको भी यही व्रत करना चाहिये। यदि वह स्त्री पुनः किसी परकीय पुरुषसे दूषित होती है तो उसे शुद्ध करनेके लिये कृच्छ्रचान्द्रायण-व्रतका अनुष्ठान बताया गया है। जो द्विज एक रात भी शूद्र स्त्रीके साथ समागम करता है तथा उसका दिया हुआ अन्न भोजन करता है, वह तीन वर्षांतक निरन्तर गायत्रीजप करनेसे शुद्ध होता है। चारों वर्णोंके पापियोंके लिये यह प्रायश्चित्त कहा गया है। अब पतितोंके संसर्गमें होनेवाले पापके लिये यह प्रायश्चित्त सुनिये॥ ५१—५८॥ |
| संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन्।<br>याजनाध्यापनाद् यौनादन्यानाशानासनात्॥ ५९<br><br>यो येन पतितेनैषां संसर्गं याति मानवः।<br>स तस्यैव व्रतं कुर्यात् तत्संसर्गविशुद्धये॥ ६०<br><br>पतितस्योदकं कार्यं सपिण्डैर्बान्धवैः सह।<br>निन्दितेऽहनि सायाह्ने ज्ञातिभिर्गुरुसंनिधौ॥ ६१<br><br>दासी घटमपां पूर्णं पर्यस्येत् प्रेतवत् सदा।<br>अहोरात्रमुपासीरन् नाशौचं बान्धवैः सह॥ ६२<br><br>निवर्त्तयेरंस्तस्मात्तु सम्भाषणसहासनम्।<br>दायादस्य प्रमाणं च यात्रामेव च लौकिकीम्॥ ६३<br><br>ज्येष्ठाभावान्निवर्तेत ज्येष्ठ्यावाप्तं च यत्पुनः।<br>ज्येष्ठांशं प्राप्नुयाच्चास्य यवीयान् गुणतोऽधिकः॥ ६४ | पतितके साथ यज्ञानुष्ठान, अध्यापन, यौन-सम्बन्ध, भोजन, एक वाहनपर गमन तथा आसनपर उपवेशन करनेसे भला मनुष्य (भी) एक वर्षमें पतित हो जाता है। जो मनुष्य इन कर्मोंमें जिस पतितका संसर्ग प्राप्त करता है, उसे उस संसर्गदोषकी शुद्धिके लिये उसी पतितके व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। उसके सपिण्ड भाई-बन्धुओंको जातिवालोंके साथ किसी निन्दित दिनको सायंकालके समय गुरुके समीप उस पतितके लिये उदक-क्रिया करनी चाहिये। दासी उक्त व्यक्तिके लिये प्रेतकी तरह जलपूर्ण घट रखे, परिवारवालोंके साथ एक दिन-रातका उपवास करे और अशौचके समान व्यवहार करे। परिवारवालोंके लिये उसके साथ वार्तालाप करना और एक आसनपर बैठना निषिद्ध है। इस पाप-कर्मकी जातिको भी उन्हें नहीं प्रकट करना चाहिये—यह लोककी मर्यादा है। जिस प्रकार ज्येष्ठ भाईके न रहनेपर उसके हिस्सेकी प्राप्ति छोटे भाईको होती है, उसी प्रकार अधिक गुणवान् होनेपर भी छोटे भाईको उसका फल भोगना पड़ता है। |
८९४ * मत्स्यपुराण *
| श्लोक | अर्थ |
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| स्थापितां चापि मर्यादां ये भिन्द्युः पापकर्मिणः।<br>सर्वे पृथग्दण्डनीया राज्ञा प्रथमसाहसम्॥ ६५<br>शतं ब्राह्मणमाक्रुश्य क्षत्रियो दण्डमर्हति।<br>वैश्यस्तु द्विशतं राजञ्छूद्रस्तु वधमर्हति॥ ६६<br>पञ्चाशद्ब्राह्मणो दण्ड्यः क्षत्रियस्याभिशंसने।<br>वैश्यस्याप्यर्धपञ्चाशच्छूद्रे द्वादशको दमः॥ ६७<br>क्षत्रियस्याप्नुयाद्वैश्यः साहसं पुनरेव च।<br>शूद्रः क्षत्रियमाक्रुश्य जिह्वाच्छेदनमाप्नुयात्॥ ६८ | जो पापाचारी प्राणी निश्चित की गयी मर्यादाको तोड़ देते हैं, उन्हें राजा पृथक्-पृथक् जाति-क्रमके अनुसार उत्तम साहसका दण्ड दे। राजन्! यदि क्षत्रिय होकर ब्राह्मणको कटु वचन कहता है तो उसे सौ मुद्राका दण्ड देना चाहिये। यदि वैश्य है तो उसे दो सौ मुद्राका और यदि शूद्र है तो उसे प्राण-दण्ड देना चाहिये। यदि ब्राह्मण क्षत्रियको कटु बातें कहे तो उसे पचास पण, वैश्यको कहे तो पचीस पण तथा शूद्रको कहे तो बारह पणका दण्ड देना चाहिये। यदि वैश्य क्षत्रियको कटु वचन कहता है तो उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये और शूद्र क्षत्रियको कटूक्ति सुनाता है तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिये॥ ५९—६८॥ |
| पञ्चाशत्क्षत्रियो दण्ड्यस्तथा वैश्याभिशंसने।<br>शूद्रे चैवार्धपञ्चाशत्तथा धर्मो न हीयते॥ ६९<br>वैश्यस्याक्रोशने दण्ड्यः शूद्रश्चोत्तमसाहसम्।<br>शूद्राक्रोशे तथा वैश्यः शतार्धं दण्डमर्हति॥ ७०<br>सवर्णाक्रोशने दण्ड्यस्तथा द्वादशकं स्मृतम्।<br>वादेष्ववचनीयेषु तदेव द्विगुणं भवेत्॥ ७१<br>एकजातिर्द्विजातिं तु वाचा दारुणया क्षिपन्।<br>जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यः प्रथमो हि सः॥ ७२<br>नामजातिगृहं तेषामभिद्रोहेण कुर्वतः।<br>निक्षेप्योऽयोमयः शङ्कुर्ज्वलन्नास्ये दशाङ्गुलः॥ ७३<br>धर्मोपदेशं शूद्रस्तु द्विजानामभिकुर्वतः।<br>तप्तमासेचयेत्तैलं वक्त्रे श्रोत्रे च पार्थिवः॥ ७४<br>श्रुतिं देशं च जातिं च कर्म शारीरमेव च।<br>वितथं च ब्रुवन् दण्ड्यो राज्ञा द्विगुणसाहसम्॥ ७५<br>यस्तु पातकसंयुक्तः क्षिपेद् वर्णान्तरं नरः।<br>उत्तमं साहसं दण्डः पात्यस्तस्मिन् यथाक्रमम्॥ ७६<br>राज्ञो निवेशनियमं वितथं यान्ति वै मिथः।<br>सर्वे द्विगुणदण्ड्यास्ते विप्रलम्भान्नृपस्य तु॥ ७७<br>प्रीत्या मयास्याभिहितं प्रमादेनाथवा वदेत्।<br>भूयो न चैवं वक्ष्यामि स तु दण्डार्धभागभवेत्॥ ७८ | क्षत्रिय यदि वैश्यको बुरा-भला कहता है तो उसे पचास और शूद्रको कहता है तो पचीस दमका दण्ड देना चाहिये। ऐसा करनेसे उसका धर्म क्षीण नहीं होता। शूद्र यदि वैश्यको कटु वचन कहे तो उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये और वैश्य होकर शूद्रको बुरा-भला कह रहा है तो वह पचास दमके दण्डका भागी होता है। यदि कोई अपने वर्णवालेको कटूक्ति सुनाता है तो उसे बारह दमका दण्ड देना चाहिये तथा अकथनीय बातें कहनेपर वह दण्ड दुगुना हो जाता है। यदि द्विजातिसे भिन्न जातिवाला किसी द्विजातिको कठोर वाणीसे बुरा-भला कहता है तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिये और उसे परम नीच समझना चाहिये। अधिक द्रोहवश नाम, जाति तथा घरकी निन्दा करनेवालेके मुखमें लोहेकी बारह अंगुल लम्बी जलती हुई शलाका डाल देनी चाहिये। राजाको द्विजातिको धर्मोपदेश करनेवाले शूद्रके मुख और कानमें खौलता हुआ तेल डाल देना चाहिये। वेद, देश, जाति और शारीरिक कर्मको निष्फल बतलानेवाला राजाद्वारा दुगुने साहसके दण्डका भागी होता है। जो मनुष्य स्वयं पापाचारी होकर दूसरे वर्णकी निन्दा करता है, उसे राजा जातिके अनुरूप उत्तम साहसका दण्ड दे। जो राजाके बनाये हुए नियमकी अवहेलना करते हैं अथवा राजाकी निन्दा करते हैं, उन सबको दुगुने साहसका दण्ड देना चाहिये। जो व्यक्ति 'मैंने प्रेमवश अथवा प्रमादसे ऐसा कहा है, अब पुनः ऐसा नहीं कहूँगा' ऐसा कहकर अपराध स्वीकार कर लेता है, वह आधे दण्डका पात्र है॥ ६९—७८॥ |
| * अध्याय २२७ * | ८९५ |
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| श्लोक | अर्थ |
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| काणं वाप्यथवा खञ्जमन्धं चापि तथाविधम्।<br>तथ्येनापि ब्रुवन् दाप्यो दण्डं कार्षापणं धनम्॥ ७९ | कोई काना हो, लँगड़ा हो अथवा अन्धा हो, उसे सत्यतापूर्वक उसी प्रकारका कहनेपर भी उसे एक कार्षापणका* दण्ड देना चाहिये। |
| मातरं पितरं ज्येष्ठं भ्रातरं श्वशुरं गुरुम्।<br>आक्रोशयञ्शतं दण्ड्यः पन्थानं चार्दयन् गुरोः॥ ८० | माता, पिता, ज्येष्ठ भाई, श्वशुर तथा गुरु—इनकी निन्दा करनेवाले तथा गुरुजनोंके मार्गको नष्ट करनेवालेको सौ कार्षापणका दण्ड देना चाहिये। |
| गुरुवर्ज्यं तु मानार्हं यो हि मार्गं न यच्छति।<br>स दाप्यः कृष्णलं राजंस्तस्य पापस्य शान्तये॥ ८१ | जो माननीय श्रेष्ठ लोगोंको मार्ग नहीं देता, उसे उस पापकी शान्तिके लिये राजा एक कृष्णलका दण्ड दे। |
| एकजातिर्द्विजातिं तु येनाङ्गेनापराध्नुयात्।<br>तदेव च्छेदयेत्तस्य क्षिप्रमेवाविचारयन्॥ ८२ | द्विजातिसे भिन्न जातिवाला व्यक्ति किसी द्विजातिका जिस अङ्गसे अपकार करता है, उसके उसी अङ्गको शीघ्र ही बिना कुछ विचार किये कटवा देना चाहिये। |
| अवनिष्ठीवतो दर्पाद् द्वावोष्ठौ छेदयेन्नृपः।<br>अवमूत्रयतो मेढ्रमपशब्दयतो गुदम्॥ ८३ | राजा सामने गर्वपूर्वक थूकनेवाले, पेशाब करनेवाले तथा अपानवायु छोड़नेवाले व्यक्तिका क्रमशः दोनों होंठ, लिङ्ग और गुदाद्वार कटवा दे। |
| सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टजः।<br>कट्यां कृताङ्को निर्वास्यः स्फिचं वाप्यस्य कर्तयेत्॥ ८४ | यदि कोई नीच जातिवाला व्यक्ति उत्कृष्ट व्यक्तिके साथ आसनपर बैठना चाहता है तो राजा उसकी कमरमें एक चिह्न बनाकर अपने राज्यसे निर्वासित कर दे या उसके गुदाभागको कटवा दे। |
| केशेषु गृह्णतो हस्तं छेदयेदविचारयन्।<br>पादयोर्नासिकायां च ग्रीवायां वृषणेषु च॥ ८५ | इसी प्रकार यदि कोई निम्न जातिवाला किसी उच्च जातीय व्यक्तिके केशोंको पकड़ता है तो उसके हाथको बिना विचार किये ही कटवा देना चाहिये। इसी प्रकारका दण्ड दोनों पैरों, नासिका, गला तथा अण्डकोशके पकड़नेपर भी देना चाहिये। |
| त्वग्भेदकः शतं दण्ड्यो लोहितस्य च दर्शकः।<br>मांसभेत्ता च षण्णिष्कान्निर्वास्यस्त्वस्थिभेदकः॥ ८६ | यदि कोई किसीके चमड़ेको काट देता है और उससे रक्त निकलने लगता है तो उसे शतमूद्राका दण्ड देना चाहिये। मांस काट लेनेवालेको छः निष्कोंका दण्ड तथा हड्डी तोड़नेवालेको देशनिकालाका दण्ड देना चाहिये। |
| अङ्गभङ्गकरस्याङ्गं तदेवापहरेन्नृपः।<br>दण्डपारुष्यकृद् दण्ड्यः समुत्थानव्ययं तथा॥ ८७ | यदि कोई व्यक्ति किसीके अङ्गको तोड़-फोड़ देता है तो राजाको चाहिये कि उसके उसी अङ्गको कटवा दे तथा उसे उतने द्रव्यका भी दण्ड दे, जितना उस आहत व्यक्तिके उठने-बैठनेके व्ययके लिये अपेक्षित हो। |
| अर्धपादकरः कार्यो गोगजाश्वोष्ट्रघातकः।<br>पशुक्षुद्रमृगाणां च हिंसायां द्विगुणो दमः॥ ८८ | गाय, हाथी, अश्व और ऊँटकी हत्या करनेवालेका आधा हाथ और आधा पैर काट लेना चाहिये। राजाको पशु तथा छोटे जानवरोंकी हत्या करनेपर अपराधीको उनके मूल्यके दुगुने पणका दण्ड देना चाहिये। |
| पञ्चाशच्च भवेद् दण्ड्यस्तथैव मृगपक्षिषु।<br>कृमिकीटेषु दण्ड्यः स्याद् रजतस्य च माषकम्॥ ८९ | मृग तथा पक्षियोंकी हत्या करनेपर पचास पणका दण्ड करनेका विधान है। कृमि तथा कीटोंके मारनेपर एक मासा चाँदीका दण्ड लगाना उचित है |
| तस्यानुरूपं मूल्यं च प्रदद्यात् स्वामिने तथा।<br>स्वस्वामिकानां सकलं शेषाणां दण्डमेव तु॥ ९० | तथा उसके अनुकूल मूल्य भी उसके स्वामीको दिलाना चाहिये॥ ७९–८९ १/२ ॥<br><br>अब स्वतन्त्र पदार्थोंको नष्ट करनेपर लगनेवाले |
* १६ माशेकी स्वर्णमुद्रा या १६ पणकी रजतमुद्रा। (दे० मनु० ८। १३६, ३३६ आदि)
८९६
* मत्स्यपुराण *
| वृक्षं तु सफलं छित्त्वा सुवर्णं दण्डमर्हति।<br>द्विगुणं दण्डयेच्चैनं पथि सीम्नि जलाशये॥ ९१<br><br>छेदनादफलस्यापि मध्यमं साहसं स्मृतम्।<br>गुल्मवल्लीलतानां च सुवर्णस्य च माषकम्॥ ९२<br><br>वृथाच्छेदी तृणस्यापि दण्ड्यः कार्षापणं भवेत्।<br>त्रिभागं कृष्णला दण्ड्याः प्राणिनस्ताडने तथा॥ ९३<br><br>देशकालानुरूपेण मूल्यं राजा द्रुमादिषु।<br>तत्स्वामिनस्तथा दण्ड्या दण्डमुक्तस्तु पार्थिव ॥ ९४<br><br>यत्रातिवर्तते युग्यं वैगुण्यात् प्राजकस्य तु।<br>तत्र स्वामी भवेद् दण्ड्यो नाप्तश्चेत् प्राजको भवेत्॥ ९५<br><br>प्राजकश्च भवेदाप्तः प्राजको दण्डमर्हति।<br>नास्ति दण्डश्च तस्यापि तथा वै हेतुकल्पकः॥ ९६<br><br>द्रव्याणि यो हरेद् यस्य ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा।<br>स तस्योत्पादयेत् तुष्टिं राज्ञो दद्यात् ततो दमम्॥ ९७<br><br>यस्तु रज्जुं घटं कूपाद्धरेद् भिन्द्याच्च तां प्रपाम्।<br>स दण्डं प्राप्नुयान्माषं तच्च सम्प्रतिपादयेत्॥ ९८<br><br>धान्यं दशभ्यः कुम्भेभ्यो हरतोऽभ्यधिकं वधः।<br>शेषेऽप्येकादशगुणं तस्य दण्डं प्रकल्पयेत्॥ ९९<br><br>तथा भक्ष्यान्नपानानां न तथाप्यधिके वधः।<br>सुवर्णरजतादीनामुत्तमानां न वाससाम्॥ १००<br><br>पुरुषाणां कुलीनानां नारीणां च विशेषतः।<br>महापशूनां हरणे शस्त्राणामौषधस्य च॥ १०१<br><br>मुख्यानां चैव रत्नानां हरणे वधमर्हति। | दण्डको बतला रहा हूँ। फलयुक्त वृक्षको काटनेपर अपराधीको सुवर्णका दण्ड देना उचित है। यदि वह वृक्ष किसी सीमा, मार्ग अथवा जलाशयके समीप है तो उसे दुगुना दण्ड देना चाहिये। फलरहित वृक्षको भी काटनेपर मध्यमसाहसका दण्ड देनेका विधान है। गुल्मों, लताओं तथा वल्लियोंको काटनेपर एक मासा सुवर्णका दण्ड देना चाहिये। बिना किसी आवश्यकताके तृणको भी नष्ट करनेवाला व्यक्ति एक कार्षापणके दण्डका भागी होता है। किसी प्राणीको कष्ट पहुँचानेवालेको कृष्णलके तिहाई भागका दण्ड देना चाहिये। राजन्! वृक्षादिके काटे जानेपर राजा देश तथा कालके अनुसार उचित मूल्यका दण्ड दे और उस दण्डको वृक्षादिके स्वामीको दिला दे। यदि चालककी असावधानीसे रथ मार्गसे विचलित हो जाता है तो ऐसे अवसरपर यदि वह चालक निपुण नहीं है तो उसके स्वामीको दण्ड देना चाहिये और यदि चालक निपुण है तो उसीके ऊपर दण्ड लगाना चाहिये, किंतु यदि वह घटना किसी विशेष परिस्थितिवश घटित हुई हो तो चालकको भी दण्ड नहीं देना चाहिये। जो किसीके द्रव्यको जानकर या अनजानमें अपहरण कर लेता है, उसे राजाके सम्मुख दण्ड स्वीकार कर उसके स्वामीको संतुष्ट करना चाहिये। अन्यथा उसपर एक पण दण्ड लगानेका विधान है। जो व्यक्ति किसी कुएँपरसे रस्सी अथवा घड़ा चुरा लेता है या उस कुएँको तोड़ता-फोड़ता है, उसके ऊपर एक मासा सुवर्णका दण्ड लगाना उचित है और उसीसे कुएँकी क्षति-पूर्ति करानी चाहिये। दस घड़ेसे अधिक अन्न चुरानेवालेको प्राण-दण्ड देना चाहिये। यदि दस घड़ेसे कम अन्न चुराता है तो उसने जितना अन्न चुराया है, उससे ग्यारहगुना अधिक मूल्यका दण्ड उसपर लगाना चाहिये। उसी प्रकार दस घड़ेसे अधिक खाद्य-सामग्री, अन्न एवं पानादिकी चोरी करनेपर उसी प्रकारके दण्डका विधान है। उसे प्राणदण्ड नहीं देना चाहिये। सुवर्ण, चाँदी आदि धातुओं, उत्तम वस्त्रों, कुलीन पुरुषों, विशेषतया कुलीन स्त्रियों, बड़े-बड़े पशुओं, हथियारों, औषधियों तथा मुख्य-मुख्य रत्नोंकी चोरी करनेपर चोर प्राण-दण्डका पात्र होता है॥ ९०—१०१ १/२॥ |
| दध्नः क्षीरस्य तक्रस्य पानीयस्य रसस्य च॥ १०२<br><br>वेणुवैदलभाण्डानां लवणानां तथैव च।<br>मृन्मयानां च सर्वेषां मृदो भस्मन एव च॥ १०३ | दही, दूध, तक्र (छाँछ-मट्ठा), जल, रस, बाँस एवं वैदल आदिके पात्र, लवण, सभी प्रकारके मिट्टीके पात्र, मिट्टी और भस्मकी चोरी करनेवालेके लिये राजा |
२२८- अद्भुत शान्तिका वर्णन
- अध्याय २२७ * | ८९७
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| कालमासाद्य कार्यं च राजा दण्डं प्रकल्पयेत्।<br>गोषु ब्राह्मणसंस्थासु महिषीषु तथैव च॥ १०४<br>अश्वापहारकश्चैव सद्यः कार्योऽर्धपादकः।<br>सूत्रकार्पासकिण्वानां गोमयस्य गुडस्य च॥ १०५<br>मत्स्यानां पक्षिणां चैव तैलस्य च घृतस्य च।<br>मांसस्य मधुनश्चैव यच्चान्यद्द्रव्यसम्भवम्॥ १०६<br>अन्येषां लवणादीनां मद्यानामोदनस्य च।<br>पक्वान्नानां च सर्वेषां तन्मूल्याद् द्विगुणो दमः॥ १०७<br>पुष्पेषु हरिते धान्ये गुल्मवल्लीलतासु च।<br>अन्नेषु परिपूर्णेषु दण्डः स्यात् पञ्चमाषकम्।<br>परिपूर्णेषु धान्येषु शाकमूलफलेषु च॥ १०८<br>निरन्वये शतं दण्ड्यः सान्वये द्विशतं दमः।<br>येन येन यथाङ्गेन स्तेनोऽन्येषु विचेष्टते॥ १०९<br>तत्तदेव हरेत् तस्य प्रत्यादेशाय पार्थिवः।<br>द्विजोऽध्वगः क्षीणवृत्तिर्द्वाविक्षू द्वे च मूलके॥ ११०<br>त्रपुसोर्वारुकौ द्वौ च तावन्मात्रं फलेषु च।<br>तथा च सर्वधान्यानां मुष्टिग्राहेण पार्थिव॥ १११<br>शाके शाकप्रमाणेण गृह्यमाणे न दुष्यति।<br>वानस्पत्यं फलं मूलं दार्वग्न्यर्थं तथैव च॥ ११२<br>तृणं गोऽभ्यवहारार्थमस्तेयं मनुरब्रवीत्।<br>अदेववाटिजं पुष्पं देवतार्थं तथैव च॥ ११३<br>आददानः परक्षेत्रान्न दण्डं दातुमर्हति। | देश एवं कालके अनुसार दण्डकी व्यवस्था करे। ब्राह्मणके घरसे गाय, भैंस और घोड़ेकी चोरी करनेवालेको तुरंत ही आधे पैरवाला कर देना चाहिये। सूत, कपास, आसव, गोबर, गुड़, मछली, पक्षी, तेल, घी, मांस, मधु, नमक, मदिरा, भात एवं इनसे बनी हुई अन्यान्य वस्तुओं तथा सभी प्रकारके पकवानोंकी चोरी करनेवालेको उस वस्तुके मूल्यसे दुगुना दण्ड देना चाहिये। पुष्प, कच्चा अन्न, गुल्म, लता, वल्ली तथा अधिक अन्नकी चोरी करनेवालेको पाँच मासा सुवर्णका दण्ड देना उचित है। प्रचुरमात्रामें अन्न, शाक, मूल और फलकी चोरी करनेवाले संतानहीनको सौ मुद्राका तथा संतानवालेको दो सौ पणका दण्ड देना चाहिये। चोर जिस-जिस अङ्गोंकी सहायतासे चोरी करनेकी चेष्टा करता है, राजा उसके उस अङ्गको कटवा दे। यदि कोई अकिंचन ब्राह्मण मार्गमें चलते हुए दो ईख, दो कन्द (मूली), दो खीरे, दो तरबूजे, दो अन्य फल, दो मुट्ठी सभी प्रकारके अन्न अथवा साग ले लेता है तो वह चोरीके दोषसे दूषित नहीं होता। भोजनके लिये वृक्षसे उत्पन्न हुए फल, मूल और जलौनी लकड़ीको काट लेना अथवा गौको खिलानेके लिये घास उखाड़ लेना चोरी नहीं है—ऐसा मनुजीने कहा है। देवताकी वाटिकासे भिन्न दूसरेके खेतमें उत्पन्न हुए पुष्पको देवताकी पूजाके लिये तोड़नेवाला दण्डका पात्र नहीं होता, उसे दण्ड नहीं देना चाहिये॥ १०२—११३ १/२॥ |
| शृङ्गिणं नखिनं राजन् दंष्ट्रिणं च वधोद्यतम्॥ ११४<br>यो हन्यान्न स पापेन लिप्यते मनुजेश्वर। | राजन्! जो अपनेको मारनेके लिये उद्यत सींगवाले, नखवाले तथा दाढ़वाले पशुको मारता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता। |
| गुरुं वा बालवृद्धं वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम्॥ ११५<br>आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्।<br>नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन॥ ११६ | गुरु, बालक, वृद्ध अथवा शास्त्रज्ञ ब्राह्मण ही क्यों न हो, यदि वह अपनेको मारनेके लिये आ रहा हो तो उसे बिना विचार किये ही मार डालना चाहिये;* क्योंकि आततायीका वध करनेपर वधकर्ताको कोई पाप नहीं लगता। |
| प्रकाशं वाप्रकाशं वा मन्युस्तं मन्यूमृच्छति। | प्रकटरूपमें अथवा गुप्तरूपमें भी पाप करनेवाला पापका भागी होता है। |
| गृहक्षेत्राभिहर्तारस्तथागम्याभिगामितः ॥ ११७<br>अग्निदो गरदश्चैव तथा चाभ्युद्यतायुधः।<br>अभिचारं तु कुर्वाणो राजगामि च पैशुनम्॥ ११८ | दूसरोंके घर तथा खेतका अपहरण करनेवाले, अगम्या स्त्रीके साथ समागम करनेवाले, आग लगानेवाले, विष देनेवाले, हथियार लेकर मारनेके लिये उद्यत, अभिचारपरायण, राजाके विरोधमें विद्रोह करनेवाले— |
* मिताक्षरादिके मतसे यह अर्थवाद है।