मत्स्य महापुराण

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८९४ * मत्स्यपुराण *
| श्लोक | अर्थ |
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| स्थापितां चापि मर्यादां ये भिन्द्युः पापकर्मिणः।<br>सर्वे पृथग्दण्डनीया राज्ञा प्रथमसाहसम्॥ ६५<br>शतं ब्राह्मणमाक्रुश्य क्षत्रियो दण्डमर्हति।<br>वैश्यस्तु द्विशतं राजञ्छूद्रस्तु वधमर्हति॥ ६६<br>पञ्चाशद्ब्राह्मणो दण्ड्यः क्षत्रियस्याभिशंसने।<br>वैश्यस्याप्यर्धपञ्चाशच्छूद्रे द्वादशको दमः॥ ६७<br>क्षत्रियस्याप्नुयाद्वैश्यः साहसं पुनरेव च।<br>शूद्रः क्षत्रियमाक्रुश्य जिह्वाच्छेदनमाप्नुयात्॥ ६८ | जो पापाचारी प्राणी निश्चित की गयी मर्यादाको तोड़ देते हैं, उन्हें राजा पृथक्-पृथक् जाति-क्रमके अनुसार उत्तम साहसका दण्ड दे। राजन्! यदि क्षत्रिय होकर ब्राह्मणको कटु वचन कहता है तो उसे सौ मुद्राका दण्ड देना चाहिये। यदि वैश्य है तो उसे दो सौ मुद्राका और यदि शूद्र है तो उसे प्राण-दण्ड देना चाहिये। यदि ब्राह्मण क्षत्रियको कटु बातें कहे तो उसे पचास पण, वैश्यको कहे तो पचीस पण तथा शूद्रको कहे तो बारह पणका दण्ड देना चाहिये। यदि वैश्य क्षत्रियको कटु वचन कहता है तो उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये और शूद्र क्षत्रियको कटूक्ति सुनाता है तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिये॥ ५९—६८॥ |
| पञ्चाशत्क्षत्रियो दण्ड्यस्तथा वैश्याभिशंसने।<br>शूद्रे चैवार्धपञ्चाशत्तथा धर्मो न हीयते॥ ६९<br>वैश्यस्याक्रोशने दण्ड्यः शूद्रश्चोत्तमसाहसम्।<br>शूद्राक्रोशे तथा वैश्यः शतार्धं दण्डमर्हति॥ ७०<br>सवर्णाक्रोशने दण्ड्यस्तथा द्वादशकं स्मृतम्।<br>वादेष्ववचनीयेषु तदेव द्विगुणं भवेत्॥ ७१<br>एकजातिर्द्विजातिं तु वाचा दारुणया क्षिपन्।<br>जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यः प्रथमो हि सः॥ ७२<br>नामजातिगृहं तेषामभिद्रोहेण कुर्वतः।<br>निक्षेप्योऽयोमयः शङ्कुर्ज्वलन्नास्ये दशाङ्गुलः॥ ७३<br>धर्मोपदेशं शूद्रस्तु द्विजानामभिकुर्वतः।<br>तप्तमासेचयेत्तैलं वक्त्रे श्रोत्रे च पार्थिवः॥ ७४<br>श्रुतिं देशं च जातिं च कर्म शारीरमेव च।<br>वितथं च ब्रुवन् दण्ड्यो राज्ञा द्विगुणसाहसम्॥ ७५<br>यस्तु पातकसंयुक्तः क्षिपेद् वर्णान्तरं नरः।<br>उत्तमं साहसं दण्डः पात्यस्तस्मिन् यथाक्रमम्॥ ७६<br>राज्ञो निवेशनियमं वितथं यान्ति वै मिथः।<br>सर्वे द्विगुणदण्ड्यास्ते विप्रलम्भान्नृपस्य तु॥ ७७<br>प्रीत्या मयास्याभिहितं प्रमादेनाथवा वदेत्।<br>भूयो न चैवं वक्ष्यामि स तु दण्डार्धभागभवेत्॥ ७८ | क्षत्रिय यदि वैश्यको बुरा-भला कहता है तो उसे पचास और शूद्रको कहता है तो पचीस दमका दण्ड देना चाहिये। ऐसा करनेसे उसका धर्म क्षीण नहीं होता। शूद्र यदि वैश्यको कटु वचन कहे तो उसे उत्तम साहसका दण्ड देना चाहिये और वैश्य होकर शूद्रको बुरा-भला कह रहा है तो वह पचास दमके दण्डका भागी होता है। यदि कोई अपने वर्णवालेको कटूक्ति सुनाता है तो उसे बारह दमका दण्ड देना चाहिये तथा अकथनीय बातें कहनेपर वह दण्ड दुगुना हो जाता है। यदि द्विजातिसे भिन्न जातिवाला किसी द्विजातिको कठोर वाणीसे बुरा-भला कहता है तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिये और उसे परम नीच समझना चाहिये। अधिक द्रोहवश नाम, जाति तथा घरकी निन्दा करनेवालेके मुखमें लोहेकी बारह अंगुल लम्बी जलती हुई शलाका डाल देनी चाहिये। राजाको द्विजातिको धर्मोपदेश करनेवाले शूद्रके मुख और कानमें खौलता हुआ तेल डाल देना चाहिये। वेद, देश, जाति और शारीरिक कर्मको निष्फल बतलानेवाला राजाद्वारा दुगुने साहसके दण्डका भागी होता है। जो मनुष्य स्वयं पापाचारी होकर दूसरे वर्णकी निन्दा करता है, उसे राजा जातिके अनुरूप उत्तम साहसका दण्ड दे। जो राजाके बनाये हुए नियमकी अवहेलना करते हैं अथवा राजाकी निन्दा करते हैं, उन सबको दुगुने साहसका दण्ड देना चाहिये। जो व्यक्ति 'मैंने प्रेमवश अथवा प्रमादसे ऐसा कहा है, अब पुनः ऐसा नहीं कहूँगा' ऐसा कहकर अपराध स्वीकार कर लेता है, वह आधे दण्डका पात्र है॥ ६९—७८॥ |