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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 907 of 1098

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Page 907
  • अध्याय २२७ * | ८९७
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| कालमासाद्य कार्यं च राजा दण्डं प्रकल्पयेत्।<br>गोषु ब्राह्मणसंस्थासु महिषीषु तथैव च॥ १०४<br>अश्वापहारकश्चैव सद्यः कार्योऽर्धपादकः।<br>सूत्रकार्पासकिण्वानां गोमयस्य गुडस्य च॥ १०५<br>मत्स्यानां पक्षिणां चैव तैलस्य च घृतस्य च।<br>मांसस्य मधुनश्चैव यच्चान्यद्द्रव्यसम्भवम्॥ १०६<br>अन्येषां लवणादीनां मद्यानामोदनस्य च।<br>पक्वान्नानां च सर्वेषां तन्मूल्याद् द्विगुणो दमः॥ १०७<br>पुष्पेषु हरिते धान्ये गुल्मवल्लीलतासु च।<br>अन्नेषु परिपूर्णेषु दण्डः स्यात् पञ्चमाषकम्।<br>परिपूर्णेषु धान्येषु शाकमूलफलेषु च॥ १०८<br>निरन्वये शतं दण्ड्यः सान्वये द्विशतं दमः।<br>येन येन यथाङ्गेन स्तेनोऽन्येषु विचेष्टते॥ १०९<br>तत्तदेव हरेत् तस्य प्रत्यादेशाय पार्थिवः।<br>द्विजोऽध्वगः क्षीणवृत्तिर्द्वाविक्षू द्वे च मूलके॥ ११०<br>त्रपुसोर्वारुकौ द्वौ च तावन्मात्रं फलेषु च।<br>तथा च सर्वधान्यानां मुष्टिग्राहेण पार्थिव॥ १११<br>शाके शाकप्रमाणेण गृह्यमाणे न दुष्यति।<br>वानस्पत्यं फलं मूलं दार्वग्न्यर्थं तथैव च॥ ११२<br>तृणं गोऽभ्यवहारार्थमस्तेयं मनुरब्रवीत्।<br>अदेववाटिजं पुष्पं देवतार्थं तथैव च॥ ११३<br>आददानः परक्षेत्रान्न दण्डं दातुमर्हति। | देश एवं कालके अनुसार दण्डकी व्यवस्था करे। ब्राह्मणके घरसे गाय, भैंस और घोड़ेकी चोरी करनेवालेको तुरंत ही आधे पैरवाला कर देना चाहिये। सूत, कपास, आसव, गोबर, गुड़, मछली, पक्षी, तेल, घी, मांस, मधु, नमक, मदिरा, भात एवं इनसे बनी हुई अन्यान्य वस्तुओं तथा सभी प्रकारके पकवानोंकी चोरी करनेवालेको उस वस्तुके मूल्यसे दुगुना दण्ड देना चाहिये। पुष्प, कच्चा अन्न, गुल्म, लता, वल्ली तथा अधिक अन्नकी चोरी करनेवालेको पाँच मासा सुवर्णका दण्ड देना उचित है। प्रचुरमात्रामें अन्न, शाक, मूल और फलकी चोरी करनेवाले संतानहीनको सौ मुद्राका तथा संतानवालेको दो सौ पणका दण्ड देना चाहिये। चोर जिस-जिस अङ्गोंकी सहायतासे चोरी करनेकी चेष्टा करता है, राजा उसके उस अङ्गको कटवा दे। यदि कोई अकिंचन ब्राह्मण मार्गमें चलते हुए दो ईख, दो कन्द (मूली), दो खीरे, दो तरबूजे, दो अन्य फल, दो मुट्ठी सभी प्रकारके अन्न अथवा साग ले लेता है तो वह चोरीके दोषसे दूषित नहीं होता। भोजनके लिये वृक्षसे उत्पन्न हुए फल, मूल और जलौनी लकड़ीको काट लेना अथवा गौको खिलानेके लिये घास उखाड़ लेना चोरी नहीं है—ऐसा मनुजीने कहा है। देवताकी वाटिकासे भिन्न दूसरेके खेतमें उत्पन्न हुए पुष्पको देवताकी पूजाके लिये तोड़नेवाला दण्डका पात्र नहीं होता, उसे दण्ड नहीं देना चाहिये॥ १०२—११३ १/२॥ |
| शृङ्गिणं नखिनं राजन् दंष्ट्रिणं च वधोद्यतम्॥ ११४<br>यो हन्यान्न स पापेन लिप्यते मनुजेश्वर। | राजन्! जो अपनेको मारनेके लिये उद्यत सींगवाले, नखवाले तथा दाढ़वाले पशुको मारता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता। |
| गुरुं वा बालवृद्धं वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम्॥ ११५<br>आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्।<br>नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन॥ ११६ | गुरु, बालक, वृद्ध अथवा शास्त्रज्ञ ब्राह्मण ही क्यों न हो, यदि वह अपनेको मारनेके लिये आ रहा हो तो उसे बिना विचार किये ही मार डालना चाहिये;* क्योंकि आततायीका वध करनेपर वधकर्ताको कोई पाप नहीं लगता। |
| प्रकाशं वाप्रकाशं वा मन्युस्तं मन्यूमृच्छति। | प्रकटरूपमें अथवा गुप्तरूपमें भी पाप करनेवाला पापका भागी होता है। |
| गृहक्षेत्राभिहर्तारस्तथागम्याभिगामितः ॥ ११७<br>अग्निदो गरदश्चैव तथा चाभ्युद्यतायुधः।<br>अभिचारं तु कुर्वाणो राजगामि च पैशुनम्॥ ११८ | दूसरोंके घर तथा खेतका अपहरण करनेवाले, अगम्या स्त्रीके साथ समागम करनेवाले, आग लगानेवाले, विष देनेवाले, हथियार लेकर मारनेके लिये उद्यत, अभिचारपरायण, राजाके विरोधमें विद्रोह करनेवाले— |


* मिताक्षरादिके मतसे यह अर्थवाद है।