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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 890 of 1098

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Page 890

८८० | * मत्स्यपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
षडङ्गरक्षा कर्तव्या तथा तेन प्रयत्नतः।<br>अङ्गेभ्यो यस्त्वैकस्य द्रोहमाचरतेऽल्पधीः॥ २१<br>वधस्तस्य तु कर्तव्यः शीघ्रमेव महीक्षिता।<br>न राज्ञा मृदुना भाव्यं मृदुर्हि परिभूयते॥ २२<br>न भाव्यं दारुणेनातितीक्ष्णादुद्विजते जनः।<br>काले मृदुर्यो भवति काले भवति दारुणः॥ २३<br>राजा लोकद्वयापेक्षी तस्य लोकद्वयं भवेत्।<br>भृत्यैः सह महीपालः परिहासं विवर्जयेत्॥ २४<br>भृत्याः परिभवन्तीह नृपं हर्षवशं गतम्।<br>व्यसनानि च सर्वाणि भूपतिः परिवर्जयेत्॥ २५<br>लोकसंग्रहणार्थाय कृतकव्यसनी भवेत्।<br>शौण्डीरस्य नरेन्द्रस्य नित्यमुद्रिक्तचेतसः॥ २६<br>जना विरागमायान्ति सदा दुःसेव्यभावतः।<br>स्मितपूर्वाभिभाषी स्यात् सर्वस्यैव महीपतिः॥ २७<br>वध्येष्वपि महाभाग भ्रुकुटिं न समाचरेत्।<br>भाव्यं धर्मभृतां श्रेष्ठ स्थूललक्ष्येण भूभुजा॥ २८<br>स्थूललक्ष्यस्य वशगा सर्वा भवति मेदिनी।<br>अदीर्घसूत्रश्च भवेत् सर्वकर्मसु पार्थिवः॥ २९<br>दीर्घसूत्रस्य नृपतेः कर्महानिर्ध्रुवं भवेत्।<br>रागे दर्पे च माने च द्रोहे पापे च कर्मणि॥ ३०<br>अप्रिये चैव कर्तव्ये दीर्घसूत्रः प्रशस्यते।फिर राजाके द्वारा राज्यके शेष छः अङ्गोंकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा की जानी चाहिये। जो मूर्ख इन छः अङ्गोंमेंसे किसी एकके साथ द्रोह करता है उसे राजाको शीघ्र ही मार डालना चाहिये। राजाको कोमल वृत्तिवाला नहीं होना चाहिये; क्योंकि कोमल वृत्तिवाला राजा पराजयका भागी होता है। साथ ही अधिक कठोर भी नहीं होना चाहिये; क्योंकि अधिक कठोर शासकसे लोग उद्विग्न हो जाते हैं। जो लोकद्वयापेक्षी राजा समयपर मृदु तथा समयपर कठोर हो जाता है, वह दोनों लोकोंपर विजयी हो जाता है। राजाको अपने अनुचरोंके साथ परिहास नहीं करना चाहिये; क्योंकि उस समय आनन्दमें निमग्न हुए राजाका अनुचरगण अपमान कर बैठते हैं। राजाको सभी प्रकारके व्यसनोंसे दूर रहना चाहिये, किंतु लोकसंग्रहके लिये उसे कुछ ऊपरसे अच्छी बातोंका व्यसन करना उचित है। गर्वीले एवं नित्य ही उद्धत स्वभाववाले राजासे लोग कठिनतासे अनुकूल होनेके कारण विरक्त हो जाते हैं, अतः राजाको सभीसे मुसकानपूर्वक बातें करनी चाहिये। महाभाग! यहाँतक कि प्राणदण्डके अपराधीको भी वह भ्रुकुटि न दिखलाये। धार्मिकश्रेष्ठ! राजाको महान् लक्ष्ययुक्त होना चाहिये; क्योंकि सारी पृथ्वी स्थूललक्ष्य रखनेवाले राजाके अधीन हो जाती है। राजाको सभी कार्योंके निर्वाहमें विलम्ब नहीं करना चाहिये; क्योंकि विलम्ब करनेवाले राजाके कार्य निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं। केवल अनुराग, दर्प, आत्मसम्मान, द्रोह, पापकर्म तथा अप्रिय कार्योंमें दीर्घसूत्री प्रशंसित माना गया है॥ २१—३० १/२॥
राज्ञा संवृतमन्त्रेण सदा भाव्यं नृपोत्तम॥ ३१<br>तस्यासंवृतमन्त्रस्य राज्ञः सर्वापदो ध्रुवम्।<br>कृतान्येव तु कार्याणि ज्ञायन्ते यस्य भूपतेः॥ ३२<br>नारब्धानि महाभाग तस्य स्याद् वसुधा वशे।<br>मन्त्रमूलं सदा राज्यं तस्मान्मन्त्रः सुरक्षितः॥ ३३<br>कर्तव्यः पृथिवीपालैर्मन्त्रभेदभयात् सदा।<br>मन्त्रवित्साधितो मन्त्रः सम्पत्तीनां सुखावहः॥ ३४<br>मन्त्रच्छलेन बहवो विनष्टाः पृथिवीक्षितः।<br>आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषितेन च॥ ३५<br>नेत्रवक्त्रविकारैश्च गृह्यतेऽन्तर्गतं मनः।<br>न यस्य कुशलैस्तस्य वशे सर्वा वसुंधरा॥ ३६<br>भवतीह महीभर्तुः सदा पार्थिवनन्दन।नृपोत्तम! राजाको सदा अपनी मन्त्रणा गुप्त रखनी चाहिये; क्योंकि प्रकट मन्त्रणावाले राजाको निश्चय ही सभी आपत्तियाँ प्राप्त होती हैं। महाभाग! जिस राजाके कार्योंको आरम्भके समय नहीं, अपितु पूरा होनेपर ही लोग जान पाते हैं उसके वशमें वसुंधरा हो जाती है। मन्त्र ही सर्वदा राज्यका मूल है, अतः मन्त्रभेदके भयसे राजाओंको उसे सदा सुरक्षित रखना चाहिये। मन्त्रज्ञ मन्त्रीद्वारा दिया गया मन्त्र सभी सम्पत्तियों तथा सुखोंको देनेवाला होता है। मन्त्रके छलसे बहुत-से राजा विनष्ट हो चुके हैं। आकृति, संकेत, गति, चेष्टा, वचन, नेत्र तथा मुखके विकारोंसे अन्तःस्थित मनोभावोंका पता लगता है। राजपुत्र! जिस राजाके मनका इन उपर्युक्त उपायोंद्वारा कुशल लोग भी पता न लगा सकें, वसुंधरा उसके वशमें सदा बनी रहती है॥ ३१—३६ १/२॥