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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 905 of 1098

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Page 905
* अध्याय २२७ *८९५
श्लोकअर्थ
काणं वाप्यथवा खञ्जमन्धं चापि तथाविधम्।<br>तथ्येनापि ब्रुवन् दाप्यो दण्डं कार्षापणं धनम्॥ ७९कोई काना हो, लँगड़ा हो अथवा अन्धा हो, उसे सत्यतापूर्वक उसी प्रकारका कहनेपर भी उसे एक कार्षापणका* दण्ड देना चाहिये।
मातरं पितरं ज्येष्ठं भ्रातरं श्वशुरं गुरुम्।<br>आक्रोशयञ्शतं दण्ड्यः पन्थानं चार्दयन् गुरोः॥ ८०माता, पिता, ज्येष्ठ भाई, श्वशुर तथा गुरु—इनकी निन्दा करनेवाले तथा गुरुजनोंके मार्गको नष्ट करनेवालेको सौ कार्षापणका दण्ड देना चाहिये।
गुरुवर्ज्यं तु मानार्हं यो हि मार्गं न यच्छति।<br>स दाप्यः कृष्णलं राजंस्तस्य पापस्य शान्तये॥ ८१जो माननीय श्रेष्ठ लोगोंको मार्ग नहीं देता, उसे उस पापकी शान्तिके लिये राजा एक कृष्णलका दण्ड दे।
एकजातिर्द्विजातिं तु येनाङ्गेनापराध्नुयात्।<br>तदेव च्छेदयेत्तस्य क्षिप्रमेवाविचारयन्॥ ८२द्विजातिसे भिन्न जातिवाला व्यक्ति किसी द्विजातिका जिस अङ्गसे अपकार करता है, उसके उसी अङ्गको शीघ्र ही बिना कुछ विचार किये कटवा देना चाहिये।
अवनिष्ठीवतो दर्पाद् द्वावोष्ठौ छेदयेन्नृपः।<br>अवमूत्रयतो मेढ्रमपशब्दयतो गुदम्॥ ८३राजा सामने गर्वपूर्वक थूकनेवाले, पेशाब करनेवाले तथा अपानवायु छोड़नेवाले व्यक्तिका क्रमशः दोनों होंठ, लिङ्ग और गुदाद्वार कटवा दे।
सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टजः।<br>कट्यां कृताङ्को निर्वास्यः स्फिचं वाप्यस्य कर्तयेत्॥ ८४यदि कोई नीच जातिवाला व्यक्ति उत्कृष्ट व्यक्तिके साथ आसनपर बैठना चाहता है तो राजा उसकी कमरमें एक चिह्न बनाकर अपने राज्यसे निर्वासित कर दे या उसके गुदाभागको कटवा दे।
केशेषु गृह्णतो हस्तं छेदयेदविचारयन्।<br>पादयोर्नासिकायां च ग्रीवायां वृषणेषु च॥ ८५इसी प्रकार यदि कोई निम्न जातिवाला किसी उच्च जातीय व्यक्तिके केशोंको पकड़ता है तो उसके हाथको बिना विचार किये ही कटवा देना चाहिये। इसी प्रकारका दण्ड दोनों पैरों, नासिका, गला तथा अण्डकोशके पकड़नेपर भी देना चाहिये।
त्वग्भेदकः शतं दण्ड्यो लोहितस्य च दर्शकः।<br>मांसभेत्ता च षण्णिष्कान्निर्वास्यस्त्वस्थिभेदकः॥ ८६यदि कोई किसीके चमड़ेको काट देता है और उससे रक्त निकलने लगता है तो उसे शतमूद्राका दण्ड देना चाहिये। मांस काट लेनेवालेको छः निष्कोंका दण्ड तथा हड्डी तोड़नेवालेको देशनिकालाका दण्ड देना चाहिये।
अङ्गभङ्गकरस्याङ्गं तदेवापहरेन्नृपः।<br>दण्डपारुष्यकृद् दण्ड्यः समुत्थानव्ययं तथा॥ ८७यदि कोई व्यक्ति किसीके अङ्गको तोड़-फोड़ देता है तो राजाको चाहिये कि उसके उसी अङ्गको कटवा दे तथा उसे उतने द्रव्यका भी दण्ड दे, जितना उस आहत व्यक्तिके उठने-बैठनेके व्ययके लिये अपेक्षित हो।
अर्धपादकरः कार्यो गोगजाश्वोष्ट्रघातकः।<br>पशुक्षुद्रमृगाणां च हिंसायां द्विगुणो दमः॥ ८८गाय, हाथी, अश्व और ऊँटकी हत्या करनेवालेका आधा हाथ और आधा पैर काट लेना चाहिये। राजाको पशु तथा छोटे जानवरोंकी हत्या करनेपर अपराधीको उनके मूल्यके दुगुने पणका दण्ड देना चाहिये।
पञ्चाशच्च भवेद् दण्ड्यस्तथैव मृगपक्षिषु।<br>कृमिकीटेषु दण्ड्यः स्याद् रजतस्य च माषकम्॥ ८९मृग तथा पक्षियोंकी हत्या करनेपर पचास पणका दण्ड करनेका विधान है। कृमि तथा कीटोंके मारनेपर एक मासा चाँदीका दण्ड लगाना उचित है
तस्यानुरूपं मूल्यं च प्रदद्यात् स्वामिने तथा।<br>स्वस्वामिकानां सकलं शेषाणां दण्डमेव तु॥ ९०तथा उसके अनुकूल मूल्य भी उसके स्वामीको दिलाना चाहिये॥ ७९–८९ १/२ ॥<br><br>अब स्वतन्त्र पदार्थोंको नष्ट करनेपर लगनेवाले

* १६ माशेकी स्वर्णमुद्रा या १६ पणकी रजतमुद्रा। (दे० मनु० ८। १३६, ३३६ आदि)