About this granth
The Matsya Mahapurana (मत्स्य महापुराण) is one of the eighteen major Puranas, named after Vishnu's fish incarnation. In the traditional frame, the divine Fish narrates it to King Vaivasvata Manu and the seven sages during the great deluge; authorship is ascribed to Maharshi Veda Vyasa.
This is the illustrated Gita Press, Gorakhpur edition with a Hindi translation alongside the Sanskrit, running to about 1,098 pages; the imprint records the fourteenth reprint of Samvat 2076. Its chapters cover creation and the manvantaras, the lineage of Kashyapa, the life of King Prithu and the milking of the earth, the solar and lunar dynasties with the story of Ila, the lineages of the Pitris and the 108 names of the Goddess, and the well-known episode of Yayati, Devayani and Puru.
The Matsya Purana is especially valued for its detailed rules on shraddha (ordinary, ekoddishta and sapindikarana rites, proper times and tirthas), and also treats vows, gifts, pilgrimage and image-making, which makes it a frequent source for students of dharmashastra, history and Indian art.
२११- सावित्रीको यमराजसे द्वितीय वरदानकी प्राप्ति
८४२ * मत्स्यपुराण *
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| श्वेतं तु जठरं यस्य भवेत् पृष्ठं च गोपतेः।<br>वृषभः स समुद्राक्षः सततं कुलवर्धनः॥ २४<br><br>मल्लिकापुष्पचित्रश्च धन्यो भवति पुङ्गवः।<br>कमलैर्मण्डलैश्चापि चित्रो भवति भाग्यदः॥ २५<br><br>अतसीपुष्पवर्णश्च तथा धन्यतरः स्मृतः।<br>एते धन्यास्तथाऽन्यान् कीर्तयिष्यामि ते नृप॥ २६<br><br>कृष्णतालवोष्ठवदना रूक्षशृङ्गशफाश्च ये।<br>अव्यक्तवर्णा ह्रस्वाश्च व्याघ्रसिंहनिभाश्च ये॥ २७<br><br>ध्वाङ्क्षगृध्रसवर्णाश्च तथा मूषकसंनिभाः।<br>कुण्ठाः काणास्तथा खञ्जाः केकराक्षास्तथैव च॥ २८<br><br>विषमश्वेतपादाश्च उद्भ्रान्तनयनास्तथा।<br>नैते वृषाः प्रमोक्तव्या न च धार्यास्तथा गृहे॥ २९<br><br>मोक्तव्यानां च धार्याणां भूयो वक्ष्यामि लक्षणम्।<br>स्वस्तिकाकारशृङ्गाश्च तथा मेघौघनिःस्वनाः॥ ३०<br><br>महाप्रमाणाश्च तथा मत्तमातङ्गगामिनः।<br>महोरस्का महोच्छाया महाबलपराक्रमाः।<br>शिरः कर्णौ ललाटं च वालधिश्चरणास्तथा॥ ३१<br><br>नेत्रे पार्श्वे च कृष्णानि शस्यन्ते चन्द्रभासिनाम्।<br>श्वेतान्येतानि शस्यन्ते कृष्णस्य तु विशेषतः॥ ३२<br><br>भूमौ कर्षति लाङ्गूलं प्रलम्बस्थूलवालधिः।<br>पुरस्तादुद्यतो नीलो वृषभश्च प्रशस्यते॥ ३३ | जिस वृषभका पेट तथा पीठ श्वेतवर्ण हो, वह समुद्राक्ष नामक वृषभ कहा जाता है। वह सर्वदा कुलकी वृद्धि करनेवाला होता है। जो वृष मल्लिकाके फूलके समान चितकबरे रंगवाला होता है, वह धन्य है। जो कमल-मण्डलके समान चितकबरा होता है, वह सौभाग्यवर्द्धक होता है तथा अलसीके फूलके समान नीले रंगवाला बैल धन्यतर कहा गया है। राजन्! ये उत्तम लक्षणोंवाले वृष हैं। अब मैं आपसे अशुभ लक्षणसम्पन्न वृषभोंका वर्णन कर रहा हूँ। जो काले तालु, ओंठ और मुखवाले, रूखे सींगों एवं खुरोंवाले, अव्यक्त रंगवाले, नाटे, बाघ तथा सिंहके समान भयानक, कौवे और गृध्रके समान रंगवाले या मूषकके समान अल्पकाय, मन्द स्वभाववाले, काने, लँगड़े, नीची-ऊँची आँखोंवाले, विषम (तीन या एक) पैरोंमें श्वेत रंगवाले तथा चञ्चल नेत्रोंवाले हों, ऐसे वृषभोंका न तो उत्सर्ग करना चाहिये और न उन्हें अपने घरमें ही रखना ठीक है। मैं पुनः उत्सर्ग करने तथा पालने योग्य (श्रेष्ठ) वृषभोंका लक्षण बतला रहा हूँ। जिनके सींग स्वस्तिकके आकारके हों और स्वर बादलोंकी गर्जनाके सदृश हो, जो ऊँचे कदवाले, हाथीके समान चलनेवाले, विशाल छातीवाले, बहुत ऊँचे, महान् बल-पराक्रमसे युक्त हों तथा चन्द्रमाके समान श्वेत वर्णके जिन वृषभोंके सिर, दोनों कान, ललाट, पूँछ, चारों पैर, दोनों नेत्र, दोनों बगलें काले रंगके हों एवं काले रंगवाले वृषभोंके ये स्थान श्वेत हों तो वे उत्तम माने गये हैं। जिसकी लम्बी और मोटी पूँछ पृथ्वीपर रगड़ खाती हो और जिसका अगला भाग उठा हुआ हो, वह नील वृषभ प्रशंसनीय माना गया है॥ २३—३३॥ |
| शक्तिध्वजपताकाढ्या येषां राजी विराजते।<br>अनड्वाहस्तु ते धन्याश्चित्रसिद्धिर्जयावहाः॥ ३४ | जिनके शरीरमें शक्ति, ध्वज और पताकाओंकी रेखा बनी हो, वे वृषभ धन्य हैं और विचित्र सिद्धि एवं विजय प्रदान करनेवाले हैं। |
| प्रदक्षिणं निवर्तन्ते स्वयं ये विनिवर्तिताः।<br>समुन्नतशिरोग्रीवा धन्यास्ते यूथवर्धनाः॥ ३५ | जो घुमाये जानेपर या स्वयं घूमनेपर दाहिनी ओर घूमते हों तथा जिनके सिर एवं कंधे समुन्नत हों, वे धन्य तथा अपने समूहके वृद्धिकारक हैं। |
| रक्तशृङ्गाग्रनयनः श्वेतवर्णो भवेद् यदि।<br>शफैः प्रवालसदृशैर्नास्ति धन्यतरस्ततः॥ ३६ | जिसके सींगोंके अग्रभाग तथा नेत्र लाल हों और वह यदि श्वेतवर्णका हो तथा उसके खुर प्रवालके समान लाल हों तो उससे श्रेष्ठ कोई वृषभ नहीं होता। |
| एते धार्याः प्रयत्नेन मोक्तव्या यदि वा वृषाः।<br>धारिताश्च तथा मुक्ता धनधान्यप्रवर्धनाः॥ ३७ | ऐसे वृषभोंका प्रयत्नपूर्वक पालन अथवा उत्सर्ग करना चाहिये; क्योंकि ये रखने अथवा उत्सर्ग करने—दोनों दशाओंमें धन-धान्यको बढ़ाते हैं। |
* अध्याय २०८ * । ८४३
| चरणानि मुखं पुच्छं यस्य श्वेतानि गोपतेः ।<br>लाक्षारससवर्णश्च तं नीलमिति निर्दिशेत् ॥ ३८<br><br>वृष एवं स मोक्तव्यो न सन्धार्यो गृहे भवेत्।<br>तदर्थमेषा चरति लोके गाथा पुरातनी ॥ ३९<br><br>एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत्।<br>गौरीं चाप्युद्वहेत् कन्यां नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ॥ ४०<br><br>एवं वृषं लक्षणसम्प्रयुक्तं<br>गृहोद्भवं क्रीतमथापि राजन्।<br>मुक्त्वा न शोचेन्मरणं महात्मा<br>मोक्षं गतश्चाहमतोऽभिधास्ये ॥ ४१ | जिस वृषभके चारों चरण, मुख और पूँछ श्वेत हों तथा शेष शरीरका रंग लाह-रसके समान हो, उसे नील वृषभ कहते हैं। ऐसा वृषभ उत्सर्ग कर देना चाहिये, उसे घरमें पालना ठीक नहीं हैं; क्योंकि ऐसे वृषभके लिये लोकमें एक ऐसी पुरानी गाथा प्रचलित है कि बहुतेरे पुत्रोंकी कामना करनी चाहिये; क्योंकि उनमेंसे कोई भी तो गयाकी यात्रा करेगा या गौरी कन्याका दान करेगा या नीले वृषभका उत्सर्ग करेगा। राजन्! ऐसे लक्षणयुक्त वृषभका चाहे वह घरमें उत्पन्न हुआ हो या खरीदा गया हो, उत्सर्ग कर महात्मा पुरुष कभी मृत्युके भयसे शोकग्रस्त नहीं होता; उसे मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है। इसलिये मैं आपसे कह रहा हूँ॥ ३४—४१॥ |
|---|
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे वृषभलक्षणं नाम समाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वृषभलक्षण नामक दो सौ सातवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०७॥
दो सौ आठवाँ अध्याय
सावित्री और सत्यवान्का चरित्र
| सूत उवाच<br>ततः स राजा देवेशं पप्रच्छामितविक्रमः।<br>पतिव्रतानां माहात्म्यं तत्सम्बद्धां कथामपि॥ १ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर अपरिमित पराक्रमी राजा मनुने भगवान् मत्स्यसे पतिव्रता स्त्रियोंके माहात्म्य तथा तत्सम्बन्धी कथाके विषयमें प्रश्न किया॥ १॥ |
|---|---|
| मनुरुवाच<br>पतिव्रतानां का श्रेष्ठा कया मृत्युः पराजितः।<br>नामसंकीर्तनं कस्याः कीर्तनीयं सदा नरैः।<br>सर्वपापक्षयकरमिदानीं कथयस्व मे॥ २ | मनुजीने पूछा—(प्रभो!) पतिव्रता स्त्रियोंमें कौन श्रेष्ठ है? किस स्त्रीने मृत्युको पराजित किया है? तथा मनुष्योंको सदा किस (सती नारी)-का नामोच्चारण करना चाहिये? आप अब मुझसे सभी पापोंको नष्ट करनेवाली इस कथाका वर्णन कीजिये॥ २॥ |
| मत्स्य उवाच<br>वैलौम्यं धर्मराजोऽपि नाचरत्यथ योषिताम्।<br>पतिव्रतानां धर्मज्ञ पूज्यास्तस्यापि ताः सदा॥ ३<br><br>अत्र ते वर्णयिष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम्।<br>यथा विमोक्षितो भर्ता मृत्युपाशगतः स्त्रिया॥ ४<br><br>मद्रेषु शाकलो राजा बभूवाश्वपतिः पुरा।<br>अपुत्रस्तप्यमानोऽसौ पुत्रार्थी सर्वकामदाम्॥ ५ | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**धर्मज्ञ! धर्मराज भी पतिव्रता स्त्रियोंके प्रतिकूल कोई व्यवहार नहीं कर सकते; क्योंकि वे उनके लिये भी सर्वदा सम्माननीय हैं। इस विषयमें मैं तुमसे पापोंको नष्ट करनेवाली वैसी कथाका वर्णन कर रहा हूँ कि किस प्रकार पतिव्रता स्त्रीने मृत्युके पाशमें पड़े हुए अपने पतिको बन्धनमुक्त कराया था। प्राचीन समयमें मद्रदेश (वर्तमान स्यालकोट जनपद)-में शाकलवंशी अश्वपति नामक एक राजा थे। उनके कोई पुत्र नहीं था। |
२१२- यमराज-सावित्री-संवाद तथा यमराजद्वारा सावित्रीको तृतीय वरदानकी प्राप्ति
८४४ * मत्स्यपुराण *
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| आराध्यति सावित्रीं लक्षितोऽसौ द्विजोत्तमैः।<br>सिद्धार्थकैर्हूयमानां सावित्रीं प्रत्यहं द्विजैः॥ ६<br><br>शतसंख्यैश्चतुर्थ्यां तु दशमासागते दिने।<br>काले तु दर्शयामास स्वां तनुं मनुजेश्वरम्॥ ७ | तब ब्राह्मणोंके निर्देशपर वे पुत्रकी कामनासे सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली सावित्रीकी आराधना करने लगे। वे प्रतिदिन सैकड़ों ब्राह्मणोंके साथ सावित्रीदेवीकी प्रसन्नताके लिये सफेद सरसोंका हवन करते थे। दस महीना बीत जानेपर चतुर्थी तिथिको सावित्री (गायत्री) देवीने राजाको दर्शन दिया॥ ३–७॥ |
| सावित्र्युवाच<br>राजन् भक्तोऽसि मे नित्यं दास्यामि त्वां सुतां सदा।<br>तां दत्तां मत्प्रसादेन पुत्रीं प्राप्स्यसि शोभनाम्॥ ८<br><br>एतावदुक्त्वा सा राज्ञः प्रणतस्यैव पार्थिव।<br>जगामादर्शनं देवी खे तथा नृप चञ्चला॥ ९<br><br>मालती नाम तस्यासीद् राज्ञः पत्नी पतिव्रता।<br>सुषुवे तनयां काले सावित्रीमिव रूपतः॥ १०<br><br>सावित्र्याहुतया दत्ता तद्रूपसदृशी तथा।<br>सावित्री च भवत्वेषा जगाद नृपतिर्द्विजान्॥ ११<br><br>नामाकुर्वन् द्विजश्रेष्ठाः सावित्रीति नृपोत्तम।<br>कालेन यौवनं प्राप्तं ददौ सत्यवते पिता॥ १२<br><br>नारदस्तु ततः प्राह राजानं दीप्ततेजसम्।<br>संवत्सरेण क्षीणायुर्भविष्यति नृपात्मजः।<br>सकृत् कन्याः प्रदीयन्ते चिन्तयित्वा नराधिपः॥ १३<br><br>तथापि प्रददौ कन्यां द्युमत्सेनात्मजे शुभे।<br>सावित्र्यपि च भर्त्तारमासाद्य नृपमन्दिरे॥ १४<br><br>नारदस्य तु वाक्येन दूयमानेन चेतसा।<br>शुश्रूषां परमां चक्रे भर्तुःश्वशुरयोर्वने॥ १५<br><br>राज्याद् भ्रष्टः सभार्यस्तु नष्टचक्षुर्नराधिपः।<br>न तुतोष समासाद्य राजपुत्रीं तथा स्नुषाम्॥ १६<br><br>चतुर्थेऽहनि मर्तव्यं तथा सत्यवता द्विजाः।<br>श्वशुरेणाभ्यनुज्ञाता तदा राजसुतापि सा॥ १७<br><br>चक्रे त्रिरात्रं धर्मज्ञा व्रतं तस्मिंस्तदा दिने।<br>दारुपुष्पफलाहारी सत्यवांस्तु ययौ वनम्॥ १८<br><br>श्वशुरेणाभ्यनुज्ञाता याचनामङ्गभीरुणा।<br>सावित्र्यपि जगामार्ता सह भर्त्रा महद्वनम्॥ १९ | सावित्रीने कहा— राजन्! तुम मेरे नित्य भक्त हो, अतः मैं तुम्हें कन्या प्रदान करूँगी। मेरी कृपासे तुम्हें मेरी दी हुई सर्वाङ्गसुन्दरी कन्या प्राप्त होगी। राजन्! चरणोंमें पड़े हुए राजासे इतना कहकर वह देवी आकाशमें बिजलीकी भाँति अदृश्य हो गयी। नरेश! उस राजाकी मालती नामकी पतिव्रता पत्नी थी। समय आनेपर उसने सावित्रीके समान रूपवाली एक कन्याको जन्म दिया। तब राजाने ब्राह्मणोंसे कहा—तपके द्वारा आवाहन किये जानेपर सावित्रीने इसे मुझे दिया है तथा यह सावित्रीके समान रूपवाली है, अतः इसका नाम सावित्री होगा। नृपश्रेष्ठ! तब उन ब्राह्मणोंने उस कन्याका सावित्री नाम रख दिया। समयानुसार सावित्री युवती हुई, तब पिताने उसका सत्यवान्के लिये वाग्दान कर दिया। इसी बीच नारदने उस उद्दीप्त तेजस्वी राजासे कहा कि 'उस राजकुमारकी आयु एक ही वर्षमें समाप्त हो जायगी।' (नारदजीकी वाणी सुनकर) यद्यपि राजाके मनमें चिन्ता तो हुई, पर यह विचारकर कि 'कन्यादान एक ही बार किया जाता है' उन्होंने अपनी कन्या सावित्रीको द्युमत्सेनके सुन्दर पुत्र सत्यवान्को प्रदान कर दिया। सावित्री भी पतिको पाकर अपने भवनमें नारदकी अशुभ वाणी सुनकर दुःखित मनसे काल व्यतीत करने लगी। वह वनमें सास-श्वसुर तथा पतिदेवकी बड़ी शुश्रूषा करती थी; किंतु राजा द्युमत्सेन अपने राज्यसे च्युत हो गये थे तथा पत्नीसहित अन्धा होनेके कारण वैसी गुणवती राजपुत्रीको पुत्रवधू-रूपमें प्राप्तकर संतुष्ट नहीं थे। 'आजसे चौथे दिन सत्यवान् मर जायगा' ऐसा ब्राह्मणोंके मुखसे सुनकर धर्मपरायणा राजपुत्री सावित्रीने श्वशुरसे आज्ञा लेकर त्रिरात्र-व्रतका अनुष्ठान किया। चौथा दिन आनेपर जब सत्यवान्ने लकड़ी, पुष्प एवं फलकी टोहमें जंगलकी ओर प्रस्थान किया, तब याचनाभङ्गसे डरती हुई सावित्री भी सास-श्वशुरकी आज्ञा लेकर दुःखित मनसे पतिके साथ उस भयंकर जंगलमें गयी। (नारदके वचनका ध्यान कर) चित्तमें अतिशय कष्ट रहनेपर भी |
| * अध्याय २०९ * | ८४५ |
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| चेतसा दूयमानेन गूहमाना महद्भयम्।<br>वने पप्रच्छ भर्तारं द्रुमांश्चासद्दृशांस्तथा॥ २०<br>आश्वासयामास स राजपुत्रीं<br>क्लान्तां वने पद्मविशालनेत्राम्।<br>संदर्शनेनाथ द्रुमद्विजानां<br>तथा मृगाणां विपिने नृवीरः॥ २१ | उसने अपने इस महान् भयको अपने पतिसे व्यक्त नहीं किया, किंतु मन-बहलावके लिये वनमें छोटे-बड़े वृक्षोंके बारेमें पतिसे झूठ-मूठ पूछ-ताछ करती रही। शूरवीर सत्यवान् उस भयंकर वनमें विशाल वृक्षों, पक्षियों एवं पशुओंके दलको दिखला-दिखलाकर थकी हुई एवं कमलके समान विशाल नेत्रोंवाली राजकुमारी सावित्रीको आश्वासन देता रहा॥ ८—२१॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने सावित्रीवनप्रवेशो नामाष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें सावित्रीवनप्रवेश नामक दो सौ आठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०८॥
दो सौ नवाँ अध्याय
सत्यवान्का सावित्रीको वनकी शोभा दिखाना
| सत्यवानुवाच<br>वनेऽस्मिञ्शाद्वलाकीर्णे सहकारं मनोहरम्।<br>नेत्रघ्राणसुखं पश्य वसन्ते रतिवर्धनम्॥ १<br>वनेऽप्यशोकं दृष्ट्वैवं रागवन्तं सुपुष्पितम्।<br>वसन्तो हसतीवायं मामेवायतलोचने॥ २<br>दक्षिणे दक्षिणेनैतां पश्य रम्यां वनस्थलीम्।<br>पुष्पितैः किंशुकैर्युक्तां ज्वलितानलसप्रभैः॥ ३<br>सुगन्धिकुसुमामोदो वनराजिविनिर्गतः।<br>करोति वायुर्दाक्षिण्यमावयोः क्लमनाशनम्॥ ४<br>पश्चिमेन विशालाक्षि कर्णिकारैः सुपुष्पितैः।<br>काञ्चनेन विभात्येषा वनराजी मनोरमा॥ ५<br>अतिमुक्तलताजालरुद्धमार्गा वनस्थली।<br>रम्या सा चारुसर्वाङ्गि कुसुमोत्करभूषणा॥ ६<br>मधुमत्तालिझंकारव्याजेन वरवर्णिनि।<br>चापाकृष्टं करोतीव कामः पान्थजिघांसया॥ ७<br>फलास्वादलसद्वक्त्रपुंस्कोकिलविनादिता ।<br>विभाति चारुतिलका त्वमिवैषा वनस्थली॥ ८<br>कोकिलश्चूतशिखरे मञ्जरीरेणुपिञ्जरः।<br>गदितैर्व्यक्ततां याति कुलीनश्चेष्टितैरिव॥ ९<br>पुष्परेणुविलिप्ताङ्गीं प्रियामनुसरन् वने।<br>कुसुमं कुसुमं याति कूजन् कामी शिलीमुखः॥ १० | सत्यवान्ने कहा—विशाल नेत्रोंवाली सावित्री! हरी-हरी घासोंसे भरे हुए इस वनमें वसन्तमें रतिकी वृद्धि करनेवाले एवं नेत्र तथा नासिकाको सुख प्रदान करनेवाले इस मनोहर आमके वृक्षको देखो। इस वनमें फूलोंसे लदे हुए इस लाल अशोक-वृक्षको भी देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो यह वसन्त मेरा ही परिहास कर रहा है। दाहिनी ओर दक्षिण दिशामें जलते हुए अंगारकी-सी कान्तिवाले फूलोंसे लदे हुए किंशुक-वृक्षोंसे युक्त इस रमणीय वनस्थलीको देखो। सुगन्धित पुष्पोंकी सुगन्धसे युक्त वन-पंक्तियोंसे निकली हुई वायु उदारतापूर्वक हमलोगोंकी थकावटका नाश कर रही है। विशाललोचने! इधर पश्चिममें फूले हुए कनेरके पुष्पोंसे युक्त स्वर्णिम शोभावाली वनपङ्क्ति शोभायमान हो रही है। सुन्दरि! तिनिसके लतासमूहोंसे वनस्थलीका मार्ग अवरुद्ध हो गया है। पुष्पोंके समूहोंसे विभूषित हुई वह पृथ्वी कितनी मनोहर लग रही है। मधुसे उन्मत्त हुए भ्रमर-समूहोंकी गुञ्जारके व्याजसे मालूम पड़ता है कि कामदेव (हम-जैसे) पथिकोंको मारनेके लिये धनुषकी प्रत्यञ्चा खींच रहा है। नाना प्रकारके फलोंके आस्वादनसे उल्लसित मुखवाले कोकिलोंके स्वरसे निनादित एवं सुन्दर तिलक-वृक्षोंसे सुशोभित यह वनस्थली तुम्हारे ही समान शोभा दे रही है। आमकी ऊँची डालीपर बैठी हुई कोकिला मञ्जरीकी धूलसे पीत वर्ण होकर अपने सुरीले शब्दोंसे चेष्टाओंद्वारा कुलीन पुरुषकी भाँति अपना परिचय दे रही है। कामी मधुकर वनमें गुनगुनाता हुआ प्रत्येक पुष्पपर पुष्पोंकी धूलिसे धूसरित प्रियतमाका अनुसरण करता हुआ उड़ रहा है॥ १—१०॥ |
२१३- सावित्रीकी विजय और सत्यवान्की बन्धन-मुक्ति
८४६ | * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मञ्जरीं सहकारस्य कान्ताचञ्च्वाग्रखण्डिताम्।<br>स्वदते बहुपुष्पेऽपि पुंस्कोकिलयुवा वने॥ ११ | वनमें तरुण पुंस्कोकिल अनेक पुष्पोंके रहते हुए भी अपनी प्रियतमाकी चोंचके अग्रभागसे खण्डित हुई आम्र-मञ्जरीका स्वाद ले रहा है। |
| काकः प्रसूतां वृक्षाग्रे स्वामेकाग्रेण चञ्चुना।<br>काकीं सम्भावयत्येष पक्षाच्छादितपुत्रिकाम्॥ १२ | कौआ वृक्षके अग्रभागपर बैठकर पंखोंसे बच्चेको छिपाकर बैठी हुई अपनी प्रसूता पत्नीको चोंचके अग्रभागसे आनन्दित कर रहा है। |
| भूभागं निम्नमासाद्य दयितासहितो युवा।<br>नाहारमपि चादत्ते कामाक्रान्तः कपिंजलः॥ १३ | अपनी पत्नीके साथ कामदेवसे अभिभूत हुआ तरुण कपिंजल (तीतर) निचले भूभागपर बैठा हुआ आहार भी नहीं ग्रहण कर रहा है। |
| कलविंकस्तु रमयन् प्रियोत्सङ्गं समास्थितः।<br>मुहुर्मुहुर्विशालाक्षि उत्कण्ठयति कामिनः॥ १४ | विशालनेत्रे ! चटक (गौरैया) अपनी प्रियाकी गोदमें स्थित हो बारम्बार रमण करता हुआ कामीजनॉंको उत्कण्ठित कर रहा है। |
| वृक्षशाखां समारूढः शुकोऽयं सह भार्यया।<br>भरेण लम्बयञ् शाखां करोति सफलामिव॥ १५ | अपनी प्रियाके साथ वृक्षकी डालीपर बैठा हुआ यह शुक पंजेसे शाखाको खींचता हुआ उसे फलयुक्त-सा कर रहा है। |
| वनेऽत्र पिशितास्वादतृप्तो निद्रामुपागतः।<br>शेते सिंहयुवा कान्ता चरणान्तरगामिनी॥ १६ | इस वनमें मांसाहारसे तृप्त युवा सिंह निद्रामें लीन हो सो रहा है और उसकी प्रियतमा उसके पैरोंके मध्यभागमें शयन कर रही है। |
| व्याघ्रयोर्मिथुनं पश्य शैलकन्दरसंस्थितम्।<br>ययोर्नेत्रप्रभालोके गुहा भिन्नेव लक्ष्यते॥ १७ | पर्वतकी कन्दरामें बैठे हुए व्याघ्र-दम्पतिको देखो, जिनके नेत्रोंकी कान्तिसे गुफा भिन्न-सी दिखायी दे रही है। |
| अयं द्वीपी प्रियां लेढि जिह्वाग्रेण पुनः पुनः।<br>प्रीतिमायाति च तया लिह्यमानः स्वकान्तया॥ १८ | यह गैंडा अपनी प्रियाको जीभके अग्रभागसे बारम्बार चाट रहा है और अपनी उस प्रियाद्वारा चाटे जानेपर आनन्दका अनुभव कर रहा है। |
| उत्सङ्गकृतमूर्धानं निद्रापहृतचेतसम्।<br>जन्तूद्धरणतः कान्तं सुखयत्येव वानरी॥ १९ | वह वानरी अपनी गोदमें सिर रखकर गाढ़ निद्रामें सोते हुए पतिको जूक आदि जन्तुओंको निकालकर सुख दे रही है। |
| भूमौ निपतितां रामां मार्जारो दर्शितोदरीम्।<br>नखैर्दन्तैर्दशत्येष न च पीडयते तथा॥ २० | वह बिडाल पृथ्वीपर लेटकर पेटको दिखाती हुई अपनी प्रियतमाको नखों और दाँतोंसे काट रहा है, परंतु वास्तवमें वह पीड़ा नहीं दे रहा है॥ ११–२०॥ |
| शशकः शशकी चोभे संसुप्ते पीडिते इमे।<br>संलीनगात्रचरणे कर्णैर्व्यक्तिमुपागते॥ २१ | ये खरगोश-दम्पति पीड़ित होकर अपने पैरोंको शरीरमें छिपाकर सो रहे हैं। ये कानोंद्वारा ही जाने जा सकते हैं। |
| स्नात्वा सरसि पद्माढ्ये नागस्तु मदनप्रियः।<br>सम्भावयति तन्वङ्गि मृणालकवलैः प्रियाम्॥ २२ | सूक्ष्माङ्गि ! कामार्त हाथी कमलयुक्त सरोवरमें स्नान कर कमल-डंठलोंके ग्रासोंसे प्रियाको संतुष्ट कर रहा है। |
| कान्तप्रोथसमुत्थानैः कान्तमार्गानुगामिनी।<br>करोति कवलं मुस्तैर्वराही पोतकानुगा॥ २३ | पीछे-पीछे चलनेवाले अपने बच्चोंसे घिरी हुई शूकरी प्रियतमके मार्गपर चलती हुई प्रियतमके द्वारा उखाड़े गये मोथोंको खाती जा रही है। |
| दृढाङ्गसंधिर्महिषः कर्दमाक्ततनुर्वने।<br>अनुव्रजति धावन्तीं प्रियामुद्धतमुत्सुकः॥ २४ | इस वनमें दृढ़ अङ्गोंवाला एवं शरीरमें कीचड़ पोते हुए कामार्त महिष भागती हुई प्रियाके पीछे दौड़ रहा है। |
| पश्य चार्वङ्गि सारङ्गं त्वं कटाक्षविभावनैः।<br>सभार्यं मां हि पश्यन्तं कौतूहलसमन्वितम्॥ २५ | सुन्दरि! अपनी प्रियाके सहित इस मृगको देखो, जो कुतूहलवश मुझे मनोहर कटाक्षोंसे देख रहा है। |
| पश्य पश्चिमपादेन रोही कण्डूयते मुखम्।<br>स्नेहार्द्रभावात् कर्षन्ती भर्तारं शृङ्गकोटिना॥ २६ | देखो, वह मृगी स्नेहयुक्त हो अपने सींगोंके अग्रभागसे प्रियतमको ढकेलती हुई पिछले पैरसे मुखको खुजला रही है। अरे, उस |
| * अध्याय २०९ * | ८४७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| द्रागिमां चमरीं पश्य सितवालानुगच्छतीम्।<br>अन्वास्ते चमरः कामी मां च पश्यति गर्वितः॥ २७<br><br>आतपे गवयं पश्य प्रकृष्टं भार्यया सह।<br>रोमन्थनं प्रकुर्वाणं काकं ककुदि वारयन्॥ २८<br><br>पश्याजं भार्यया सार्धं न्यस्ताग्रचरणद्वयम्।<br>विपुले बदरीस्कन्धे बदराशनकाम्यया॥ २९<br><br>हंसं सभार्यं सरसि विचरन्तं सुनिर्मलम्।<br>सुमुक्तस्येन्दुबिम्बस्य पश्य वै श्रियमुद्वहन्॥ ३०<br><br>सभार्यश्चक्रवाकोऽयं कमलाकरमध्यगः।<br>करोति पद्मिनीं कान्तां सुपुष्पामिव सुन्दरि॥ ३१<br><br>मया फलोच्चयः सुभ्रु त्वया पुष्पोच्चयः कृतः।<br>इन्धनं न कृतं सुभ्रु तत्करिष्यामि साम्प्रतम्॥ ३२<br><br>त्वमस्य सरसस्तीरे द्रुमच्छायां समाश्रिता।<br>क्षणमात्रं प्रतीक्षस्व विश्रमस्व च भामिनि॥ ३३ | श्वेत चमरी गायको देखो, जो चमरके पीछे चली जा रही है। इधर कामार्त चमर खड़ा है और गर्वके साथ मेरी ओर देख रहा है। धूपमें बैठे हुए उस नीलगायको देखो, जो अपनी प्रियाके साथ आनन्दपूर्वक जुगाली कर रहा है और ककुदपर बैठे हुए कौवेका निवारण कर रहा है। प्रियाके साथ उस बकरेको देखो, जो बेर वृक्षकी मोटी शाखापर फल खानेकी इच्छासे अगले दोनों पैरोंको रखे हुए है। सरोवरमें विचरण करते हुए हंसिनीसहित उस अत्यन्त निर्मल हंसको देखो, जो सुप्रकाशित चन्द्रबिम्बकी शोभा धारण कर रहा है। सुन्दरि! चक्रवाक अपनी प्रियाके साथ कमलोंसे सुशोभित सरोवरमें अपनी प्रियाको फूली हुई पद्मिनीके समान कर रहा है। (ऐसा कहकर सत्यवान्ने फिर कहा—) सुन्दर भौंहोंवाली! मैं फलोंको एकत्र कर चुका तथा तुम पुष्पोंको एकत्र कर चुकी, किंतु अभी ईंधनका कोई प्रबन्ध नहीं किया गया, अतः अब मैं उसे एकत्र करूँगा। भामिनि! तबतक तुम इस सरोवरके तटपर वृक्षकी छायामें बैठकर क्षणभर प्रतीक्षा करते हुए विश्राम करो॥ २१—३३॥ |
| सावित्र्युवाच<br>एवमेतत् करिष्यामि मम दृष्टिपथस्त्वया।<br>दूरं कान्त न कर्तव्यो बिभेमि गहने वने॥ ३४ | **सावित्री बोली—**कान्त! जैसा आप कहेंगे, मैं वैसा ही करूँगी, परंतु आप मेरे नेत्रोंके सामनेसे दूर न जायें; क्योंकि मैं इस घने वनमें डर रही हूँ॥ ३४॥ |
| मत्स्य उवाच<br>ततः स काष्ठानि चकार तस्मिन्<br>वने तदा राजसुतासमक्षम्।<br>तस्या हृदूरे सरसस्तदानीं<br>मेने च सा तं मृतमेव राजन्॥ ३५ | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**राजन्! सावित्रीके ऐसा कहनेपर सत्यवान् उस वनमें राजपुत्रीके सम्मुख ही उस सरोवरसे थोड़ी ही दूरपर काष्ठ एकत्र करने लगे, परंतु राजपुत्री उतनी दूर जानेपर भी उन्हें मरा हुआ-सा मानने लगी॥ ३५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने वनदर्शनं नाम नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें वनदर्शन नामक दो सौ नवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०९॥
२१४- सत्यवान्को जीवनलाभ तथा पत्नीसहित राजाको नेत्रज्योति एवं राज्यकी प्राप्ति
८४८
* मत्स्यपुराण *
दो सौ दसवाँ अध्याय
यमराजका सत्यवान्के प्राणको बाँधना तथा सावित्री और यमराजका वार्तालाप
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| तस्य पाटयतः काष्ठं जज्ञे शिरसि वेदना।<br>स वेदनार्तः संगम्य भार्यां वचनमब्रवीत्॥ १<br>आयासेन ममानेन जाता शिरसि वेदना।<br>तमश्च प्रविशामीव न च जानामि किञ्चन॥ २<br>त्वदुत्सङ्गे शिरः कृत्वा स्वप्तुमिच्छामि साम्प्रतम्।<br>राजपुत्रीमेवमुक्त्वा तदा सुष्वाप पार्थिव ॥ ३<br>तदुत्सङ्गे शिरः कृत्वा निद्रयाऽऽविलोचनः।<br>पतिव्रता महाभागा ततः सा राजकन्यका॥ ४<br>ददर्श धर्मराजं तु स्वयं तं देशमागतम्।<br>नीलोत्पलदलश्यामं पीताम्बरधरं प्रभुम्॥ ५<br>विद्युल्लतानिबद्धाङ्गं सतोयमिव तोयदम्।<br>किरीटेनार्कवर्णेन कुण्डलाभ्यां विराजितम्॥ ६<br>हारभारार्पितोरस्कं तथाङ्गदविभूषितम्।<br>तथानुगम्यमानं च कालेन सह मृत्युना॥ ७<br>स तु सम्प्राप्य तं देशं देहात् सत्यवतस्तदा।<br>अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं पाशबद्धं वशं गतम्॥ ८<br>आकृष्य दक्षिणामाशां प्रययौ सत्वरं तदा।<br>सावित्र्यपि वरारोहा दृष्ट्वा तं गतजीवितम्॥ ९<br>अनुवव्राज गच्छन्तं धर्मराजमतन्द्रिता।<br>कृताञ्जलिरुवाचाथ हृदयेन प्रवेपता॥ १०<br>इमं लोकं मातृभक्त्या पितृभक्त्या तु मध्यमम्।<br>गुरुशुश्रूषया चैव ब्रह्मलोकं समश्नुते॥ ११<br>सर्वे तस्यादृता धर्मा यस्यैते त्रय आदृताः।<br>अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफलाः क्रियाः॥ १२<br>यावत् त्रयस्ते जीवेयुस्तावन्नान्यं समाचरे।<br>तेषां च नित्यं शुश्रूषां कुर्यात् प्रियहिते रतः॥ १३<br>तेषामनुपरोधेन पारतन्त्र्यं यदा चरेत्।<br>तत्तन्निवेदयेत् तेभ्यो मनोवचनकर्मभिः।<br>त्रिष्वप्येतेषु कृत्यं हि पुरुषस्य समाप्यते॥ १४ | राजन्! लकड़ी काटते हुए सत्यवान्के सिरमें पीड़ा उत्पन्न हुई, तब वे पीड़ासे व्याकुल हो पत्नीके पास आकर इस प्रकार कहने लगे—‘इस परिश्रमसे मेरे सिरमें बहुत पीड़ा हो रही है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मैं अन्धकारमें प्रविष्ट हो रहा हूँ। मुझे कुछ भी सूझ नहीं रहा है। इस समय मैं तुम्हारी गोदमें सिर रखकर सोना चाहता हूँ।’ राजन्! राजपुत्रीसे ऐसा कहकर सत्यवान् उस समय उसकी गोदमें सो गये। जब सावित्रीकी गोंदमें सिर रखकर सोते हुए सत्यवान्के नेत्र निद्रावश मुँद गये, तब उस पतिव्रता महाभागा राजपुत्री सावित्रीने उस स्थानपर आये हुए सामर्थ्यशाली स्वयं धर्मराजको देखा, जो नीले कमलके-से श्यामवर्णसे सुशोभित और पीताम्बर धारण किये हुए थे। वे चमकती हुई बिजलियोंसे युक्त जलपूर्ण मेघ-जैसे दीख रहे थे तथा सूर्यके समान तेजस्वी मुकुट और दो कुण्डलोंसे सुशोभित थे। उनके वक्षःस्थलपर हार लटक रहा था। वे बाजूबंदसे विभूषित थे तथा उनके पीछे मृत्युसहित महाकाल भी था। धर्मराजने उस स्थानपर पहुँचकर उस समय सत्यवान्के शरीरसे अंगूठेके परिमाणवाले पुरुषको पाशमें बाँधकर अपने अधीन किया और उसे खींचकर शीघ्रतापूर्वक दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान किया। तब आलस्यरहित हो सुन्दरी सावित्री पतिको प्राणरहित देखकर जाते हुए धर्मराजके पीछे-पीछे चली और काँपते हुए हृदयसे अञ्जलि बाँधकर धर्मराजसे बोली—‘माताकी भक्तिसे इस लोक, पिताकी भक्तिसे मध्यम लोक और गुरुकी शुश्रूषासे ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। जो इन तीनोंका आदर करता है, उसने मानो सभी धर्मोंका पालन कर लिया तथा जिसने इन तीनोंका आदर नहीं किया, उसकी सारी सत्क्रियाएँ निष्फल हो जाती हैं। जबतक ये तीनों जीवित रहें, तबतक किसी अन्य धर्मके पालनकी आवश्यकता नहीं है। उनके प्रिय एवं सुखके कार्योंमें तत्पर रहकर नित्य उनकी शुश्रूषा करनी चाहिये। उनकी आज्ञासे यदि कभी परतन्त्रता भी स्वीकार करनी पड़े तो वह सब मन-वचन-कर्मद्वारा उन्हें निवेदित कर देना चाहिये। पुरुषके सारे कर्म माता, पिता और गुरु—इन्हीं तीनोंमें समाप्त हो जाते हैं॥ १—१४॥ |
२१५- राजाका कर्तव्य, राजकर्मचारियोंके लक्षण तथा राजधर्मका निरूपण
| * अध्याय २१० * | ८४९ |
|---|
| यम उवाच<br>कृतेन कामेन निवर्तयाशु<br>धर्मो न तेभ्योऽपि हि उच्यते च।<br>ममोपरोधस्तव च क्लमः स्या-<br>त्तथाधुना तेन तव ब्रवीमि॥ १५<br><br>गुरुपूजारतिर्भर्ता त्वं च साध्वी पतिव्रता।<br>विनिवर्तस्व धर्मज्ञे ग्लानिर्भवति तेऽधुना॥ १६ | यमराजने कहा— तुम हमसे जिस कामनाको पूर्ण करानेके लिये आ रही हो उस कामनाको छोड़ दो और शीघ्र लौट जाओ। सचमुच संसारमें माता-पिता तथा गुरुकी सेवासे बढ़कर कोई अन्य धर्म नहीं है। तुम्हारे इस प्रकार पीछे-पीछे आनेसे मेरे काममें विघ्न पड़ रहा है और तुम भी थकावटसे चूर हो रही हो। इसलिये मैं इस समय तुमसे ऐसा कह रहा हूँ। धर्मज्ञे! तुम्हारा पति सचमुच गुरुजनोंकी पूजामें प्रेम करनेवाला है और तुम भी पतिव्रता साध्वी हो। इस समय तुम्हें कष्ट हो रहा है, अतः तुम लौट जाओ॥ १५-१६॥ |
| सावित्र्युवाच<br>पतिर्हि दैवतं स्त्रीणां पतिरेव परायणम्।<br>अनुगम्यः स्त्रिया साध्व्या पतिः प्राणधनेश्वरः॥ १७<br>मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुतः।<br>अमितस्य प्रदातारं भर्तारं का न पूजयेत्॥ १८<br>नीयते यत्र भर्ता मे स्वयं वा यत्र गच्छति।<br>मयापि तत्र गन्तव्यं यथाशक्ति सुरोत्तम॥ १९<br>पतिमादाय गच्छन्तमनुगन्तुमहं यदा।<br>त्वां देव न हि शक्ष्यामि तदा त्यक्ष्यामि जीवितम्॥ २०<br>मनस्विनी तु या काचिद्वैधव्याक्षरदूषिता।<br>मुहूर्तंमपि जीवेत मण्डनार्हा ह्यमण्डिता॥ २१ | सावित्री बोली— स्त्रियोंका पति ही देवता है, पति ही उसको शरण देनेवाला है, इसलिये साध्वी स्त्रियोंको प्राणपति प्रियतमका अनुगमन करना चाहिये। पिता, भाई तथा पुत्र परिमित सम्पत्ति देनेवाले हैं, किंतु पति अपरिमित सम्पत्तिका दाता है। भला, ऐसे पतिकी कौन स्त्री पूजा नहीं करेगी। सुरोत्तम! आप मेरे पतिको जहाँ ले जा रहे हैं अथवा स्वयं जहाँ जा रहे हैं, वहीं मुझे भी यथाशक्ति जाना चाहिये। देव! मेरे प्राणपतिको ले जाते हुए आपके पीछे चलनेमें यदि मैं समर्थ न हो सकूँगी तो प्राणोंको त्याग दूँगी। जो कोई मनस्विनी स्त्री वैधव्य-धर्मसे दूषित होकर मुहूर्तभर जीवित रहती है तो वह सभी आभूषणोंसे अलंकृत होते हुए भी भाग्यहीन है॥ १७–२१॥ |
| यम उवाच<br>पतिव्रते महाभागे परितुष्टोऽस्मि ते शुभे।<br>विना सत्यवतः प्राणैर्वरं वरय मा चिरम्॥ २२ | यमने कहा— महाभाग्यशालिनी पतिव्रते! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, अतः शुभे! सत्यवान्के प्राणोंको छोड़कर कोई भी वरदान माँग लो, देर मत करो॥ २२॥ |
| सावित्र्युवाच<br>विनष्टचक्षुषो राज्यं चक्षुषा सह कारय।<br>च्युतराष्ट्रस्य धर्मज्ञ श्वशुरस्य महात्मनः॥ २३ | सावित्री बोली— धर्मज्ञ! जो राज्यसे च्युत हो गये हैं तथा जिनकी आँखें नष्ट हो गयी हैं, ऐसे मेरे महात्मा श्वशुरको राज्य और नेत्रसे संयुक्त कर दीजिये॥ २३॥ |
| यम उवाच<br>दूरे पथे गच्छ निवर्त भद्रे<br>भविष्यतीदं सकलं त्वयोक्तम्।<br>ममोपरोधस्तव च क्लमः स्या-<br>त्तथाधुना तेन तव ब्रवीमि॥ २४ | यमराजने कहा— भद्रे! तुम बहुत दूरतक चली आयी हो, अतः अब लौट जाओ। तुम्हारी यह सब अभिलाषा पूर्ण होगी। तुम्हारे मेरे पीछे चलनेसे मेरे काममें विघ्न पड़ेगा और तुम्हें भी थकावट होगी, इसीलिये इस समय मैं तुमसे ऐसा कह रहा हूँ॥ २४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने प्रथमवरलाभो नाम दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें प्रथम वरलाभ नामक दो सौ दसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१०॥
८५० * मत्स्यपुराण *
दो सौ ग्यारहवाँ अध्याय
सावित्रीको यमराजसे द्वितीय वरदानकी प्राप्ति
| सावित्र्युवाच | सावित्रीने कहा— |
|---|---|
| कुतः क्लमः कुतो दुःखं सद्भिः सह समागमे।<br>सतां तस्मान्न मे ग्लानिस्त्वत्समीपे सुरोत्तम॥ १ | देवश्रेष्ठ! सत्पुरुषोंके साथ समागम होनेपर कैसा परिश्रम? और कैसा दुःख? आप-जैसे महानुभावोंके समीपमें मुझे किसी प्रकारकी भी ग्लानि नहीं है। |
| साधूनां वाप्यसाधूनां संत एव सदा गतिः।<br>नैवासतां नैव सतामसन्तो नैवमात्मनः॥ २ | चाहे साधु प्रकृतिके हों या असाधु प्रकृतिके, सभीके निर्वाहक सदा सत्पुरुष ही होते हैं, किंतु असत्पुरुष न तो सज्जनोंके काम आ सकते हैं, न असत्पुरुषोंके ही और न स्वयं अपना ही कल्याण कर सकते हैं। |
| विषाग्निसर्पशस्त्रेभ्यो न तथा जायते भयम्।<br>अकारणजगद्वैरिखलेभ्यो जायते तथा॥ ३ | विष, अग्नि, सर्प तथा शस्त्रसे लोगोंको उतना भय नहीं होता, जितना अकारण जगत्से वैर करनेवाले दुष्टोंसे होता है। |
| संतः प्राणानपि त्यक्त्वा परार्थं कुर्वते यथा।<br>तथासंतोऽपि संत्यज्य परपीडासु तत्पराः॥ ४ | जैसे सत्पुरुष अपने प्राणोंका विसर्जन करके भी परोपकार करते हैं, उसी प्रकार दुर्जन भी अपने प्राणोंका परित्याग कर दूसरेको कष्ट देनेमें तत्पर रहते हैं। |
| त्यजत्यसूनयं लोकस्तृणवद् यस्य कारणात्।<br>परोपघातशक्तास्तं परलोकं तथासतः॥ ५ | जिस परलोककी प्राप्तिके लिये सत्पुरुष अपने प्राणोंको भी तृणके समान त्याग देते हैं, उसी परलोककी परायी हानिमें निरत रहनेवाले दुर्जन कुछ भी चिन्ता नहीं करते। |
| निकायेषु निकायेषु तथा ब्रह्मा जगद्गुरुः।<br>असतामुपघाताय राजानं ज्ञातवान् स्वयम्॥ ६ | स्वयं जगद्गुरु ब्रह्माने सभी प्राणि-समूहोंमें असत्प्राणियोंके निग्रहके लिये राजाको नियुक्त किया है। |
| नरान् परीक्ष्येद् राजा साधून् सम्मानयेत् सदा।<br>निग्रहं चासतां कुर्यात् स लोके लोकजित्तमः॥ ७ | राजा सर्वदा पुरुषोंकी परीक्षा करे। जो सज्जन हों उनका आदर करे और दुष्टोंको दण्ड दे। जो ऐसा करता है, वह सभी लोकविजेता राजाओंमें श्रेष्ठ है। |
| निग्रहेणासतां राजा सतां च परिपालनात्।<br>एतावदेव कर्तव्यं राज्ञा स्वर्गमभीप्सुना॥ ८ | सत्पुरुषोंको सम्मान देने तथा दुष्टोंका निग्रह करनेके कारण ही वह राजा है। स्वर्ग-प्राप्तिकी इच्छा करनेवाले राजाको इन दोनों कार्योंका पालन करना चाहिये। |
| राजकृत्यं हि लोकेषु नास्त्यन्यज्जगतीपते।<br>असतां निग्रहादेव सतां च परिपालनात्॥ ९ | जगतीपते! राजाओंके लिये सत्पुरुषोंके परिपालन तथा दुष्टोंके नियमनके अतिरिक्त दूसरा कोई राजधर्म संसारमें नहीं है। |
| राजभिश्चाप्यशास्तानामसतां शासिता भवान्।<br>तेन त्वमधिको देवो देवेभ्यः प्रतिभासि मे॥ १० | उन राजाओंद्वारा भी जो दुष्ट शासित नहीं किये जा सके, ऐसे दुर्जनोंके शासक आप हैं, इसी कारण आप मुझे सभी देवताओंसे अधिक महत्त्वशाली देवता प्रतीत हो रहे हैं। |
| जगत्तु धार्यते सद्भिः सतामग्र्यस्तथा भवान्।<br>तेन त्वामनुयान्त्या मे क्लमो देव न विद्यते॥ ११ | यह जगत् सत्पुरुषोंद्वारा धारण किया जाता है तथा आप उन सत्पुरुषोंके अग्रणी हैं, इसलिये देव! आपके पीछे चलते हुए मुझे कुछ भी क्लेश नहीं है॥ १—११॥ |
* अध्याय २९१ * ८५१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यम उवाच<br>तुष्टोऽस्मि ते विशालाक्षि वचनैर्धर्मसङ्गतैः।<br>विना सत्यवतः प्राणाद् वरं वरय मा चिरम्॥ १२ | यमराज बोले— विशालाक्षि! तुम्हारे इन धर्मयुक्त वचनोंसे मैं प्रसन्न हूँ, अतः सत्यवान्के प्राणोंके अतिरिक्त दूसरा वर माँग लो, देर न करो॥ १२॥ |
| सावित्र्युवाच<br>सहोदराणां भ्रातॄणां कामयामि शतं विभो।<br>अनपत्यः पिता प्रीतिं पुत्रलाभात् प्रयातु मे॥ १३ | सावित्रीने कहा— विभो! मैं सौ सहोदर भाइयोंकी अभिलाषिणी हूँ। मेरे पिता पुत्रहीन हैं, अतः वे पुत्रलाभसे प्रसन्न हों। |
| तामुवाच यमो गच्छ यथागतमनिन्दिते।<br>और्ध्वदेहिककार्येषु यत्नं भर्तुः समाचर॥ १४ | तब यमराजने सावित्रीसे कहा—‘अनिन्दिते! तुम जैसे आयी हो, वैसे ही लौट जाओ तथा अपने पतिके और्ध्वदैहिक क्रियाओंके लिये यत्न करो। |
| नानुगन्तुमयं शक्यस्त्वया लोकान्तरं गतः।<br>पतिव्रतासि तेन त्वं मुहूर्तं मम यास्यसि॥ १५ | अब यह दूसरे लोकमें चला गया है, अतः तुम इसके पीछे नहीं चल सकती। चूँकि तुम पतिव्रता हो, अतः दो घड़ीतक और मेरे साथ चल सकती हो। |
| गुरुशुश्रूषणाद् भद्रे तथा सत्यवता महत्।<br>पुण्यं समार्जितं येन नयाम्येनमहं स्वयम्॥ १६ | भद्रे! सत्यवान्ने गुरुजनोंकी शुश्रूषा कर महान् पुण्य अर्जित किया है, अतः मैं स्वयं इसे ले जा रहा हूँ। |
| एतावदेव कर्तव्यं पुरुषेण विजानता।<br>मातुः पितुश्च शुश्रूषा गुरोश्च वरवर्णिनि॥ १७ | सुन्दरि! विद्वान् पुरुषको माता, पिता तथा गुरुकी सेवामें सदा तत्पर रहना चाहिये। |
| तोषितं त्रयमेतच्च सदा सत्यवता वने।<br>पूजितं विजितः स्वर्गस्त्वयानेन चिरं शुभे॥ १८ | सत्यवान्ने वनमें इन तीनोंको अपनी शुश्रूषासे प्रसन्न किया है। शुभे! इसके साथ तुमने भी स्वर्गको जीत लिया है। |
| तपसा ब्रह्मचर्येण अग्निशुश्रूषया शुभे।<br>पुरुषाः स्वर्गमायान्ति गुरुशुश्रूषया तथा॥ १९ | शुभे! मनुष्य तपस्या, ब्रह्मचर्य तथा अग्नि और गुरुकी शुश्रूषासे स्वर्गको प्राप्त करते हैं, |
| आचार्यश्च पिता चैव माता भ्राता च पूर्वजः।<br>नाचैतेऽप्यवमन्तव्या ब्राह्मणेन तु विशेषतः॥ २० | अतः विशेषरूपसे ब्राह्मणको आचार्य, पिता, माता तथा बड़े भाईका कभी अपमान नहीं करना चाहिये; |
| आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः।<br>माता पृथिव्या मूर्तिस्तु भ्राता वै मूर्तिरात्मनः॥ २१ | क्योंकि आचार्य ब्रह्माका, पिता प्रजापतिका, माता पृथ्वीका और भाई अपना ही स्वरूप है। |
| जन्मना पितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम्।<br>न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि॥ २२ | मनुष्यके जन्मके समय माता और पिता जो कष्ट सहन करते हैं, उसका बदला सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं चुकाया जा सकता। |
| तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य तु सर्वदा।<br>तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वं समाप्यते॥ २३ | अतः मनुष्यको माता, पिता तथा आचार्यका सर्वदा प्रिय कार्य करना चाहिये; क्योंकि इन तीनोंके संतुष्ट होनेपर सभी तपस्याएँ सम्पन्न हो जाती हैं। |
| तेषां त्रयाणां शुश्रूषा परमं तप उच्यते।<br>न च तैरननुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत्॥ २४ | इन तीनोंकी शुश्रूषा परम तपस्या कही गयी है, अतः उनकी आज्ञाके बिना किसी अन्य धर्मका आचरण नहीं करना चाहिये। |
| त एव हि त्रयो लोकास्त एव त्रय आश्रमाः।<br>त एव च त्रयो वेदास्तथैवोक्तास्त्रयोऽग्नयः॥ २५ | वे ही तीनों लोक हैं, वे ही तीनों आश्रम हैं, वे ही तीनों वेद हैं तथा तीनों अग्नियाँ भी वे ही कहलाते हैं। |
| पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माता दक्षिणातः स्मृतः।<br>गुरुराहवनीयश्च साग्नित्रेता गरीयसी॥ २६ | पिता गार्हपत्याग्नि, माता दक्षिणाग्नि तथा गुरु आहवनीयाग्नि है। ये तीनों अग्नियाँ सर्वश्रेष्ठ हैं। |
| ८५२ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| त्रिषु प्रमाद्यते नैषु त्रींल्लोकान् जयते गृही।<br>दीप्यमानः स्ववपुषा देववद् दिवि मोदते॥ २७<br><br>कृतेन कामेन निवर्त भद्रे<br>भविष्यतीदं सकलं त्वयोक्तम्।<br>ममोपरोधस्तव च क्लमः स्या-<br>त्तथाधुना तेन तव ब्रवीमि॥ २८ | जो गृहस्थ इन तीनों गुरुजनोंकी सेवामें कभी असावधानी नहीं करता, वह तीनों लोकोंको जीत लेता है और अपने शरीरसे देवताओंके समान देदीप्यमान होते हुए स्वर्गमें आनन्दका अनुभव करता है। भद्रे! तुम्हारा काम पूरा हो गया, अब तुम लौट जाओ। तुम्हारे द्वारा कही हुई वे सारी बातें पूर्ण होंगी। इस प्रकार हमारे पीछे आनेसे मेरे कार्यमें विघ्न पड़ता है और तुम्हें भी कष्ट हो रहा है, इसीलिये मैं इस समय तुमसे ऐसा कह रहा हूँ॥ २३–२८॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने द्वितीयवरलाभो नामैकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २११॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें द्वितीय वरका लाभ नामक दो सौ ग्यारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २११॥
दो सौ बारहवाँ अध्याय
यमराज-सावित्री-संवाद तथा यमराजद्वारा सावित्रीको तृतीय वरदानकी प्राप्ति
| सावित्र्युवाच | सावित्रीने कहा— |
|---|---|
| धर्मार्जने सुरश्रेष्ठ कुतो ग्लानिः क्लमस्तथा।<br>त्वत्पादमूलसेवा च परमं धर्मकारणम्॥ १<br><br>धर्मार्जनं तथा कार्यं पुरुषेण विजानता।<br>तल्लाभः सर्वलाभेभ्यो यदा देव विशिष्यते॥ २<br><br>धर्मश्चार्थश्च कामश्च त्रिवर्गो जन्मनः फलम्।<br>धर्महीनस्य कामार्थौ वन्ध्यासुतसमौ प्रभौ॥ ३<br><br>धर्मादर्थस्तथा कामो धर्माल्लोकद्वयं तथा।<br>धर्म एकोऽनुयात्येनं यत्र क्वचनगामिनम्॥ ४<br><br>शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति।<br>एको हि जायते जन्तुरेक एव विपद्यते॥ ५<br><br>धर्मस्तमनुयात्येको न सुहृन्न च बान्धवाः।<br>क्रिया सौभाग्यलावण्यं सर्वं धर्मेण लभ्यते॥ ६<br><br>ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्रशर्वेन्दुयमार्काग्न्यनिलाम्भसाम् ।<br>वस्वश्विधनदाद्यानां ये लोकाः सर्वकामदाः॥ ७<br><br>धर्मेण तानवाप्नोति पुरुषः पुरुषान्तक।<br>मनोहराणि द्वीपानि वर्षाणि सुसुखानि च॥ ८<br><br>प्रयान्ति धर्मेण नरास्तथैव नरगण्डिकाः।<br>नन्दनादीनि मुख्यानि देवोद्यानानि यानि च॥ ९<br><br>तानि पुण्येन लक्ष्यन्ते नाकपृष्ठं तथा नरैः।<br>विमानानि विचित्राणि तथैवाप्सरसः शुभाः॥ १० | देवश्रेष्ठ! धर्मोपार्जनके कार्यमें कैसी ग्लानि और कैसा कष्ट? आपके चरणमूलकी सेवा ही परम धर्मका कारण है। देव! ज्ञानी पुरुषको सर्वदा धर्मोपार्जन करना चाहिये; क्योंकि उसका लाभ सभी लाभोंसे विशेष महत्त्वपूर्ण है। प्रभो! धर्म, अर्थ और काम—ये तीनों एक साथ संसारमें जन्म लेनेके फल हैं; क्योंकि धर्महीन पुरुषके अर्थ और काम वन्ध्याके पुत्रकी भाँति निष्फल हैं। धर्मसे अर्थ और कामकी प्राप्ति होती है तथा धर्मसे ही दोनों लोक सिद्ध होते हैं। जहाँ-कहीं भी जानेवाले प्राणीके पीछे अकेले धर्म ही जाता है। अन्य सभी वस्तुएँ शरीरके साथ ही नष्ट हो जाती हैं। प्राणी अकेला ही पैदा होता है और अकेला ही मरकर जाता है। एक धर्म ही उसके पीछे-पीछे जाता है, मित्र एवं भाई-बन्धु कोई भी साथ नहीं देता। कार्योंमें सफलता, सौभाग्य और सौन्दर्य आदि सब कुछ धर्मसे ही प्राप्त होते हैं। पुरुषान्तक! ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, शिव, चन्द्रमा, यम, सूर्य, अग्नि, वायु, वरुण, वसुगण, अश्विनीकुमार एवं कुबेर आदि देवताओंके जो सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले लोक हैं, उन सबको मनुष्य धर्मके द्वारा ही प्राप्त करता है। मनुष्य मनोहर द्वीपों एवं सुखदायी वर्षोंको धर्मके द्वारा ही प्राप्त करते हैं। देवताओंके जो नन्दनादि मुख्य उद्यान हैं, वे भी मनुष्योंको पुण्यसे ही प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार स्वर्ग, विचित्र विमान और सुन्दर अप्सराएँ पुण्यसे ही प्राप्त होती हैं॥ १–१०॥ |
* अध्याय २१२ *
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| तेजसानि शरीराणि सदा पुण्यवतां फलम्।<br>राज्यं नृपतिपूजा च कामसिद्धिस्तथेप्सिता ॥ ११<br>संस्काराणि च मुख्यानि फलं पुण्यस्य दृश्यते। | पुण्यशाली मनुष्योंके तेजस्वी शरीर पुण्यके ही फल हैं। राज्यकी प्राप्ति, राजाओंद्वारा सम्मान, अभीष्ट मनोरथोंकी सिद्धि तथा मुख्य संस्कार—ये सभी पुण्यके ही फल देखे जाते हैं। |
| रुक्मवैदूर्यदण्डानि चण्डांशुसदृशानि च ॥ १२<br>चामराणि सुराध्यक्ष भवन्ति शुभकर्मणाम्। | देवाध्यक्ष! पुण्यवान् पुरुषोंके चँवर सुवर्ण तथा वैदूर्यके बने हुए डंडेवाले तथा सूर्यके समान तेजोमय होते हैं। |
| पूर्णेन्दुमण्डलाभेन रत्नांशुकविकासिना ॥ १३<br>धार्यतां याति छत्रेण नरः पुण्येन कर्मणा। | पूर्णिमाके चन्द्रमण्डलके समान कान्तिमान् एवं रत्नजटित वस्त्रसे सुशोभित छत्र मनुष्यको पुण्य कर्मसे ही प्राप्त होता है। |
| जयशङ्खस्वरौघेण सूतमागधनिःस्वनैः ॥ १४<br>वरासनं सभृङ्गारं फलं पुण्यस्य कर्मणः। | विजयकी सूचना देनेवाले शङ्ख-स्वरों तथा मागध-बन्दियोंकी माङ्गलिक ध्वनियोंके साथ अभिषेक-पात्रसहित श्रेष्ठ सिंहासनका प्राप्त होना पुण्यकर्मका ही फल है। |
| वरान्नपानं गीतं च भृत्यमाल्यानुलेपनम् ॥ १५<br>रत्नवस्त्राणि मुख्यानि फलं पुण्यस्य कर्मणः। | उत्तम अन्न, जल, गीत, अनुचर, मालाएँ, चन्दन, रत्न तथा बहुमूल्य वस्त्र—ये सब पुण्यकर्मोंके फल हैं। |
| रूपौदार्यगुणोपेताः स्त्रियश्चातिमनोहराः ॥ १६<br>वासाः प्रासादपृष्ठेषु भवन्ति शुभकर्मिणाम्। | सुन्दरता और औदार्य गुणोंसे युक्त अतिशय मनोहर स्त्रियाँ और उच्च महलोंपर निवास शुभ कर्मियोंको प्राप्त होते हैं। |
| सुवर्णकिङ्किणीमिश्रचामरापीडधारिणः ॥ १७<br>वहन्ति तुरगा देव नरं पुण्येन कर्मणा। | देव! मस्तकपर स्वर्णकी घंटियोंसे युक्त चमर धारण करनेवाले घोड़े पुण्यकर्मसे ही मनुष्यको वहन करते हैं। |
| हेमकक्षैश्च मातङ्गैश्चलत्पर्वतसंनिभैः ॥ १८<br>खेलद्भिः पादविन्यासैर्यान्ति पुण्येन कर्मणा। | चलते हुए पर्वतोंके समान, सुवर्णनिर्मित अम्बारीसे सुशोभित तथा चञ्चल पादविन्याससे युक्त हाथियोंकी सवारी पुण्यकर्मके प्रभावसे ही प्राप्त होती है। |
| सर्वकामप्रदे देव सर्वाघदुरितापहे ॥ १९<br>वहन्ति भक्तिं पुरुषः सदा पुण्येन कर्मणा। | देव! सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले एवं सभी पापोंको दूर करनेवाले स्वर्गमें पुरुष सदा पुण्यकर्मोंके प्रभावसे ही भक्ति प्राप्त करते हैं। |
| तस्य द्वाराणि यजनं तपो दानं दमः क्षमा ॥ २०<br>ब्रह्मचर्यं तथा सत्यं तीर्थानुसरणं शुभम्।<br>स्वाध्यायसेवा साधूनां सहवासः सुरार्चनम् ॥ २१<br>गुरूणां चैव शुश्रूषा ब्राह्मणानां च पूजनम्।<br>इन्द्रियाणां जयश्चैव ब्रह्मचर्यममत्सरम् ॥ २२ | उसकी प्राप्तिके उपाय हैं—यज्ञ, तप, दान, इन्द्रियनिग्रह, क्षमाशीलता, ब्रह्मचर्य, सत्य, शुभदायक तीर्थोंकी यात्रा, स्वाध्याय, सेवा, सत्पुरुषोंकी संगति, देवार्चन, गुरुजनोंकी शुश्रूषा, ब्राह्मणोंकी पूजा, इन्द्रियोंको वशमें रखना तथा मत्सररहित ब्रह्मचर्य। |
| तस्माद् धर्मः सदा कार्यो नित्यमेव विजानता।<br>न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्य न वाकृतम् ॥ २३ | इसलिये विद्वान् पुरुषको सर्वदा धर्माचरण करना चाहिये; क्योंकि मृत्यु इसकी प्रतीक्षा नहीं करती कि इसने अपना कार्य पूरा किया अथवा नहीं। |
| बाल एव चरेद् धर्ममनित्यं देव जीवितम्।<br>को हि जानाति कस्याद्य मृत्युरेवा पतिष्यति ॥ २४ | देव! मनुष्यको बाल्यावस्थासे ही धर्माचरण करना चाहिये; क्योंकि यह जीवन नश्वर है। यह कौन जानता है कि आज किसकी मृत्यु हो जायगी। |
| पश्यतोऽप्यस्य लोकस्य मरणं पुरतः स्थितम्।<br>अमरस्येव चरितमत्याश्चर्यं सुरोत्तम ॥ २५ | सुरोत्तम! इस जीवके देखते हुए भी मृत्यु सामने खड़ी रहती है, फिर भी वह मृत्युरहितकी भाँति आचरण करता है—यह महान् आश्चर्य है। |
| युवत्वापेक्षया बालो वृद्धत्वापेक्षया युवा।<br>मृत्योरुत्सङ्गमारूढः स्थविरः किमपेक्षते ॥ २६ | युवककी अपेक्षा बालक और वृद्धकी अपेक्षा युवक अपनेको मृत्युसे दूर मानता है, किंतु मृत्युकी गोदमें बैठा हुआ वृद्ध किसकी अपेक्षा करता है। |
| ८५४ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| तत्रापि विन्दतस्त्राणं मृत्युना तस्य का गतिः।<br>न भयं मरणं चैव प्राणिनामभयं क्वचित्।<br>तत्रापि निर्भयाः सन्तः सदा सुकृतकारिणः॥ २७<br><br>यम उवाच<br>तुष्टोऽस्मि ते विशालाक्षि वचनैर्धर्मसंगतैः।<br>विना सत्यवतः प्राणान् वरं वरय मा चिरम्॥ २८<br><br>सावित्र्युवाच<br>वरयामि त्वया दत्तं पुत्राणां शतमौरसम्।<br>अनपत्यस्य लोकेषु गतिः किल न विद्यते॥ २९<br><br>यम उवाच<br>कृतेन कामेन निवर्त भद्रे<br>भविष्यतीदं सफलं यथोक्तम्।<br>ममोपरोधस्तव च क्लमः स्यात्<br>तथाधुना तेन तव ब्रवीमि॥ ३० | इतनेपर भी जो मृत्युसे रक्षाके उपाय सोचते हैं, उनकी क्या गति होगी? प्राणधारियोंको इस जगत्में केवल मृत्युसे भय ही नहीं है, उनके लिये कहीं अभयस्थान भी नहीं है। तथापि पुण्यवान् सत्पुरुष सर्वदा निर्भय होकर संसारमें जीवित रहते हैं॥ १९–२७॥<br><br>यमराज बोले— विशालाक्षि! तुम्हारी इन धर्मयुक्त बातोंसे मैं विशेष संतुष्ट हूँ, अतः तुम सत्यवान्के प्राणोंके अतिरिक्त अन्य वर माँग लो, देर मत करो॥ २८॥<br><br>सावित्रीने कहा— देव! मैं आपसे अपनी कोखसे उत्पन्न होनेवाले सौ पुत्रोंका वरदान माँगती हूँ; क्योंकि लोकोंमें पुत्रहीनकी सद्गति नहीं होती॥ २९॥<br><br>यमराज बोले— भद्रे! अब तुम शेष अभीष्ट कामनाको छोड़कर लौट जाओ, तुम्हारी यह याचना भी सफल होगी। इस प्रकार तुम्हारे अनुगमनसे मेरे कार्योंमें विघ्न होगा और तुम्हें भी कष्ट होगा, इसीलिये मैं तुमसे इस समय ऐसा कह रहा हूँ॥ ३०॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने तृतीयवरलाभो नाम द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें तृतीय वर-लाभ नामक दो सौ बारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१२॥
दो सौ तेरहवाँ अध्याय
सावित्रीकी विजय और सत्यवान्की बन्धन-मुक्ति
| सावित्र्युवाच<br>धर्माधर्मविधानज्ञ सर्वधर्मप्रवर्तक।<br>त्वमेव जगतो नाथः प्रजासंयमनो यमः॥ १<br>कर्मणामनुरूपेण यस्माद् यमयसे प्रजाः।<br>तस्माद् वै प्रोच्यसे देव यम इत्येव नामतः॥ २<br>धर्मेणेमाः प्रजाः सर्वा यस्माद् रञ्जयसे प्रभो।<br>तस्मात् ते धर्मराजेति नाम सद्भिर्निगद्यते॥ ३<br>सुकृतं दुष्कृतं चोभे पुरोधाय यदा जनाः।<br>त्वत्सकाशं मृता यान्ति तस्मात् त्वं मृत्युरुच्यते॥ ४<br>कालं कलार्धं कलयन् सर्वेषां त्वं हि तिष्ठसि।<br>तस्मात् कालेति ते नाम प्रोच्यते तत्त्वदर्शिभिः॥ ५<br>सर्वेषामेव भूतानां यस्मादन्तकरो महान्।<br>तस्मात् त्वमन्तकः प्रोक्तः सर्वदेवैर्महाद्युते॥ ६ | सावित्रीने कहा— धर्म-अधर्मके विधानको जाननेवाले एवं सभी धर्मोंके प्रवर्तक देव! आप ही जगत्के स्वामी तथा प्रजाओंका नियमन करनेवाले यम हैं। देव! चूँकि आप कर्मोंके अनुरूप प्रजाओंका नियमन करते हैं, इसलिये 'यम' नामसे पुकारे जाते हैं। प्रभो! चूँकि आप धर्मपूर्वक इस सारी प्रजाको आनन्दित करते हैं, इसीलिये सत्पुरुष आपको धर्मराज नामसे पुकारते हैं। लोग मरनेपर अपने सत्-असत्—दोनों प्रकारके कर्मोंको अपने आगे रखकर आपके समीप जाते हैं, इसलिये आप मृत्यु कहलाते हैं। आप सभी प्राणियोंके क्षण, कला आदिसे कालकी गणना करते रहते हैं, इसीलिये तत्त्वदर्शी लोग आपको 'काल' नामसे पुकारते हैं। महादीप्तिसम्पन्न! चूँकि आप संसारके सभी चराचर जीवोंके महान् अन्तकर्ता हैं, इसीलिये आप सभी देवताओंकेद्वारा 'अन्तक' कहे जाते हैं। |
- अध्याय २१३ *
८५५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विवस्वतस्त्वं तनयः प्रथमं परिकीर्तितः।<br>तस्माद् वैवस्वतो नाम्ना सर्वलोकेषु कथ्यसे ॥ ७<br>आयुष्ये कर्मणि क्षीणे गृह्णासि प्रसभं जनम्।<br>तदा त्वं कथ्यसे लोके सर्वप्राणहरेति वै ॥ ८<br>तव प्रसादाद् देवेश त्रयीधर्मो न नश्यति।<br>तव प्रसादाद् देवेश धर्मे तिष्ठन्ति जन्तवः।<br>तव प्रसादाद् देवेश संकरो न प्रजायते ॥ ९<br>सतां सदा गतिर्देव त्वमेव परिकीर्तितः।<br>जगतोऽस्य जगन्नाथ मर्यादापरिपालकः ॥ १०<br>पाहि मां त्रिदशश्रेष्ठ दुःखितां शरणागताम्।<br>पितरौ च तथैवास्य राजपुत्रस्य दुःखितौ ॥ ११ | आप विवस्वान्के प्रथम पुत्र कहे गये हैं, अतः सम्पूर्ण विश्वमें वैवस्वत नामसे कहे जाते हैं। आयुकर्मके क्षीण हो जानेपर आप लोगोंको हठात् पकड़ लेते हैं, इसी कारण लोकमें सर्वप्राणहर नामसे कहे जाते हैं। देवेश! आपकी कृपासे ऋक्, साम और यजुः—इन तीनों वेदोंद्वारा प्रतिपादित धर्मका विनाश नहीं होता। देवेश! आपकी महिमासे सभी प्राणी अपने-अपने धर्मोंमें स्थित रहते हैं। देवेश! आपकी सत्कृपासे वर्णसंकर संततिकी उत्पत्ति नहीं होती। देव! आप ही सदा सत्पुरुषोंकी गति बतलाये गये हैं। जगन्नाथ! आप इस जगत्की मर्यादाका पालन करनेवाले हैं। देवताओंमें श्रेष्ठ! अपनी शरणमें आयी हुई मुझ दुखियाकी रक्षा कीजिये। इस राजपुत्रके माता-पिता भी दुःखी हैं॥१—११॥ |
| यम उवाच<br>स्तवेन भक्त्या धर्मज्ञे मया तुष्टेन सत्यवान्।<br>तव भर्त्ता विमुक्तोऽयं लब्धकामा व्रजाबले ॥ १२<br>राज्यं कृत्वा त्वया सार्धं वर्षाणां शतपञ्चकम्।<br>नाकपृष्ठमथारुह्य त्रिदशैः सह रंस्यते ॥ १३<br>त्वयि पुत्रशतं चापि सत्यवान् जनयिष्यति।<br>ते चापि सर्वे राजानः क्षत्रियास्त्रिदशोपमाः ॥ १४<br>मुख्यास्त्वन्नाम पुत्रस्ते भविष्यन्ति हि शाश्वताः।<br>पितुश्च ते पुत्रशतं भविता तव मातरि ॥ १५<br>मालव्यां मालवा नाम शाश्वताः पुत्रपौत्रिणः।<br>भ्रातरस्ते भविष्यन्ति क्षत्रियास्त्रिदशोपमाः ॥ १६<br>स्तोत्रेणानेन धर्मज्ञे कल्पमुत्थाय यस्तु माम्।<br>कीर्तयिष्यति तस्यापि दीर्घमायुर्भविष्यति ॥ १७ | यमराज बोले—धर्मज्ञे! तुम्हारी स्तुति तथा भक्तिसे संतुष्ट होकर मैंने तुम्हारे पति इस सत्यवान्को विमुक्त कर दिया है। अबले! अब तुम सफलमनोरथ होकर लौट जाओ। यह सत्यवान् तुम्हारे साथ पाँच सौ वर्षोंतक राज्यसुख भोगकर अन्तकालमें स्वर्गलोकमें जायगा और देवताओंके साथ विहार करेगा। सत्यवान् तुम्हारे गर्भसे सौ पुत्रोंको भी उत्पन्न करेगा, वे सब-के-सब देवताओंके समान तेजस्वी तथा क्षत्रिय राजा होंगे। वे चिरकालतक जीवित रहते हुए तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होंगे। तुम्हारे पिताको भी तुम्हारी माताके गर्भसे सौ पुत्र उत्पन्न होंगे। वे तुम्हारे भाई मालवा (मध्यदेश)-में उत्पन्न होनेके कारण मालव नामसे विख्यात होंगे और चिरकालतक जीवित रहते हुए पुत्र-पौत्रादिसे युक्त होंगे तथा देवताओंके समान ऐश्वर्यसम्पन्न एवं क्षत्रियोचित गुणोंका पालन करेंगे। धर्मज्ञे! जो कोई पुरुष प्रातःकाल उठकर इस स्तोत्रद्वारा मेरा स्तवन करेगा, उसकी भी आयु दीर्घ होगी ॥ १२—१७ ॥ |
| मत्स्य उवाच<br>एतावदुक्त्वा भगवान् यमस्तु<br>प्रमुच्य तं राजसुतं महात्मा।<br>अदर्शनं तत्र यमो जगाम<br>कालेन सार्धं सह मृत्युना च ॥ १८ | मत्स्यभगवान्ने कहा—राजन्! इतनी बातें कहकर ऐश्वर्यशाली महात्मा यमराज उस राजपुत्र सत्यवान्को छोड़कर काल तथा मृत्युके साथ वहीं अदृश्य हो गये॥१८॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने यमस्तुतिसत्यवज्जीवितलाभो नाम त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें यमस्तुति और सत्यवान्का जीवन-लाभ नामक दो सौ तेरहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २१३ ॥
२१६- राजकर्मचारियोंके धर्मका वर्णन
८५६ | * मत्स्यपुराण *
दो सौ चौदहवाँ अध्याय
सत्यवान्को जीवनलाभ तथा पत्नीसहित राजाको नेत्रज्योति एवं राज्यकी प्राप्ति
| मत्स्य उवाच | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**तदनन्तर पतिव्रता सुन्दरी सावित्री वहाँसे जिस मार्गसे गयी थी, उसी मार्गसे लौटकर उस स्थानपर आयी, जहाँ सत्यवान्का मृत शरीर पड़ा हुआ था। तब कृशाङ्गी सावित्री पतिके निकट जाकर उसके सिरको अपनी गोदमें रखकर पूर्ववत् बैठ गयी। उस समय भगवान् भास्कर अस्ताचलको जा रहे थे। नरेश्वर! धर्मराजसे मुक्त हुए सत्यवान्ने भी धीरे-धीरे आँखें खोली और अँगड़ाई ली। तत्पश्चात् प्राणोंके लौट आनेपर उसने अपनी स्त्री सावित्रीसे इस प्रकार कहा—'वह पुरुष कहाँ चला गया, जो मुझे खींचकर लिये जा रहा था। सुन्दरि! मैं नहीं जानता कि वह पुरुष कौन था! सर्वाङ्गसुन्दरि! इस वनमें सोते हुए मेरा पूरा दिन बीत गया और शुभे! तुम भी उपवाससे परिश्रान्त एवं दुःखी हुई तथा मुझ-जैसे दुष्टसे आज माता-पिताको भी दुःख भोगना पड़ा। सुन्दर भौंहोंवाली! मैं उन्हें देखना चाहता हूँ, चलो, जल्दी चलो'॥ १—६॥ |
| सावित्री तु ततः साध्वी जगाम् वरवर्णिनी।<br>पथा यथागतेनैव यत्रासीत् सत्यवान् मृतः॥ १<br>सा समासाद्य भर्तारं तस्योत्सङ्गतं शिरः।<br>कृत्वा विवेश तन्वङ्गी लम्बमाने दिवाकरे॥ २<br>सत्यवानपि निर्मुक्तो धर्मराजाच्छनैः शनैः।<br>उन्मीलयत नेत्राभ्यां प्रास्फुरच्च नराधिप॥ ३<br>ततः प्रत्यागतप्राणः प्रियां वचनमब्रवीत्।<br>क्वासौ प्रयातः पुरुषो यो मामप्यपकर्षति॥ ४<br>न जानामि वरारोहे कश्चासौ पुरुषः शुभे।<br>वनेऽस्मिंश्चारुसर्वाङ्गि सुप्तस्य च दिनं गतम्॥ ५<br>उपवासपरिश्रान्ता दुःखिता भवती मया।<br>अस्मद्धृतेनाद्य पितरौ दुःखितौ तथा।<br>द्रष्टुमिच्छाम्यहं सुभ्रु गमने त्वरिता भव॥ ६ | |
| सावित्र्युवाच | **सावित्री बोली—**प्रभो! सूर्य तो अस्त हो गये। पर यदि आपको पसंद हो तो हमलोग आश्रमको लौट चलें; क्योंकि मेरे सास-श्वशुर अंधे हैं। मैं वहीं आश्रममें यह सब घटित हुआ वृत्तान्त आपको बतलाऊँगी। सावित्री उस समय पतिसे ऐसा कहकर पतिके साथ ही चल पड़ी और वह राजकुमारी पतिके साथ आश्रमपर आ पहुँची। भार्गव! इसी समय पत्नीसहित द्युमत्सेनको नेत्र-ज्योति प्राप्त हो गयी। वे अपने प्रिय पुत्र और दुबली-पतली पुत्रवधूको न देखकर दुःखी हो रहे थे। उस समय तपस्वी ऋषि राजाको सान्त्वना दे रहे थे। इतनेमें ही उन्होंने पुत्रवधूके साथ पुत्रको वनसे आते हुए देखा। उस समय सुन्दरी सावित्रीने सत्यवान्के साथ सपत्नीक क्षत्रियश्रेष्ठ राजा द्युमत्सेनको प्रणाम किया। पिताने राजकुमार सत्यवान्को गले लगाया। तब सभी धर्मोंको जाननेवाले सत्यवान्ने उस वनमें निवास करनेवाले तपस्वियोंको अभिवादनकर रातमें ऋषियोंके साथ वहीं निवास किया। उस समय अनिन्दितचरित्रा सावित्रीने जैसी घटना घटित हुई थी, |
| आदित्योऽस्तमनुप्राप्तो यदि ते रुचितं प्रभो।<br>आश्रमं तु प्रयास्यावः श्वशुरौ हीनचक्षुषौ॥ ७<br>यथावृत्तं च तत्रैव तव वक्ष्ये यथाश्रमे।<br>एतावदुक्त्वा भर्तारं सह भर्त्रा तदा ययौ॥ ८<br>आससादाश्रमं चैव सह भर्त्रा नृपात्मजा।<br>एतस्मिन्नेव काले तु लब्धचक्षुर्महीपतिः॥ ९<br>द्युमत्सेनः सभार्यस्तु पर्यतप्यत भार्गव।<br>प्रियं पुत्रमपश्यन् वै स्नुषां चैवाथ कर्शिताम्॥ १०<br>आश्वास्यमानस्तु तथा स तु राजा तपोधनैः।<br>ददर्श पुत्रमायान्तं स्नुषया सह काननात्॥ ११<br>सावित्री तु वरारोहा सह सत्यवता तदा।<br>ववन्दे तत्र राजानं सभार्यं क्षत्रपुङ्गवम्॥ १२<br>परिष्वक्तस्तदा पित्रा सत्यवान् राजनन्दनः।<br>अभिवाद्य ततः सर्वान् वने तस्मिंस्तपोधनान्॥ १३<br>उवास तत्र तां रात्रिमृषिभिः सर्वधर्मवित्।<br>सावित्र्यपि जगादाथ यथावृत्तमनिन्दिता॥ १४ | |
| * अध्याय २१५ * | ८५७ |
|---|
| व्रतं समापयामास तस्यामेव तदा निशि।<br>ततस्तूर्यैस्त्रियामान्ते ससैन्यस्तस्य भूपतेः॥ १५<br>आजगाम जनः सर्वो राज्यार्थाय निमन्त्रणे।<br>विज्ञापयामास तदा तत्र प्रकृतिशासनम्॥ १६<br>विचक्षुषस्ते नृपते येन राज्यं पुरा हृतम्।<br>अमात्यैः स हतो राजा भवांस्तस्मिन् पुरे नृपः॥ १७<br>एतच्छ्रुत्वा ययौ राजा बलेन चतुरङ्गिणा।<br>लेभे च सकलं राज्यं धर्मराजान्महात्मनः॥ १८<br>भ्रातृणां तु शतं लेभे सावित्र्यपि वराङ्गना।<br>एवं पतिव्रता साध्वी पितृपक्षं नृपात्मजा॥ १९<br>उज्जहार वरारोहा भर्तृपक्षं तथैव च।<br>मोक्षयामास भर्तारं मृत्युपाशवशं गतम्॥ २०<br>तस्मात् साध्व्यः स्त्रियः पूज्याः सततं देववन्नरैः।<br>तासां राजन् प्रसादेन धार्यते वै जगत्त्रयम्॥ २१<br>तासां तु वाक्यं भवतीह मिथ्या<br> न जातु लोकेषु चराचरेषु।<br>तस्मात् सदा ताः परिपूजनीयाः<br> कामान् समग्रानभिकामयानैः॥ २२<br>यश्चेदं शृणुयान्नित्यं सावित्र्याख्यानमुत्तमम्।<br>स सुखी सर्वसिद्धार्थो न दुःखं प्राप्नुयान्नरः॥ २३ | उसका वर्णन किया और उसी रातमें अपने व्रतको भी समाप्त किया। तदनन्तर तीन पहर बीत चुकनेपर राजाकी सारी प्रजा सेनासहित तुरही आदि बाजोंको बजाते हुए राजाको पुनः राज्य करनेके लिये निमन्त्रण देने आयी और यह सूचना दी कि राज्यमें आपका शासन अब पूर्ववत् हो। राजन्! नेत्रहीन होनेके कारण जिस राजाने आपके राज्यको छीन लिया था, वह राजा मन्त्रियोंद्वारा मार डाला गया। अब उस नगरमें आप ही राजा हैं। यह सुनकर राजा चतुरंगिणी सेनाके साथ वहाँ गये और महात्मा धर्मराजकी कृपासे पुनः अपने सम्पूर्ण राज्यको प्राप्त किये। सुन्दरी सावित्रीने भी सौ भाइयोंको प्राप्त किया। इस प्रकार साध्वी पतिव्रता सुन्दरी राजकुमारी सावित्रीने अपने पितृपक्ष तथा पतिपक्ष—दोनोंका उद्धार किया और मृत्युके पाशमें बँधे हुए अपने पतिको मुक्त किया॥ ७—२०॥<br><br>राजन्! इसलिये मनुष्योंको सदा साध्वी स्त्रियोंकी देवताओंके समान पूजा करनी चाहिये; क्योंकि उनकी कृपासे ये तीनों लोक स्थित हैं। उन पतिव्रता स्त्रियोंके वाक्य इस चराचर जगत्में कभी भी मिथ्या नहीं होते, इसलिये सभी मनोरथोंकी कामना करनेवालोंको सर्वदा इनकी पूजा करनी चाहिये। जो मनुष्य सावित्रीके इस सर्वोत्तम आख्यानको नित्य सुनता है, वह सभी प्रयोजनोंमें सफलता प्राप्तकर सुखका अनुभव करता है और कभी भी दुःखका भागी नहीं होता॥ २१—२३॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्यानसमाप्तिर्नाम चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २१४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सावित्री-उपाख्यान-समाप्ति नामक दो सौ चौदहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१४॥
दो सौ पंद्रहवाँ अध्याय *
राजाका कर्तव्य, राजकर्मचारियोंके लक्षण तथा राजधर्मका निरूपण
| मनुरुवाच<br>राज्ञोऽभिषिक्तमात्रस्य किं नु कृत्यतमं भवेत्।<br>एतन्मे सर्वमाचक्ष्व सम्यग्वेत्ति यतो भवान्॥ १<br>मत्स्य उवाच<br>अभिषेकार्द्रशिरसा राज्ञा राज्यावलोकिना।<br>सहायवरणं कार्यं तत्र राज्यं प्रतिष्ठितम्॥ २ | मनुने पूछा— भगवन्! अभिषेक होनेके बाद राजाको तुरंत कौन-सा कर्म करना आवश्यक है? वह सब मुझे बताइये; क्योंकि आप इसे अच्छी तरह जानते हैं॥ १॥<br>मत्स्यभगवान्ने कहा— राजन्! राज्यकी रक्षा करनेवाले राजाको चाहिये कि वह अभिषेकके जलसे सिरके भीगते ही सहायकों (मन्त्रियों)-की नियुक्ति करे; क्योंकि राज्य उन्हींपर प्रतिष्ठित रहता है। |
* चण्डेश्वरादिके 'राजनीतिरत्नाकर' आदि संग्रह बड़े श्रेष्ठ हैं। वे रामायण, महाभारत तथा पुराणादिसे ही संगृहीत हैं। उनमें भी मत्स्यपुराणोक्त इस राजनीतिप्रकरणका स्थान श्रेष्ठतर है, अतः यह अंश आजके राजनेताओंके लिये विशेष मननीय है।
८५८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यदप्यल्पतरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम्।<br>पुरुषेणासहायेन किमु राज्यं महोदयम्॥ ३<br>तस्मात् सहायान् वरयेत् कुलीनान् नृपतिः स्वयं।<br>शूरान् कुलीनजातीयान् बलयुक्ताञ्छ्रियान्वितान्॥ ४<br>रूपसत्त्वगुणोपेतान् सजनान् क्षमयान्वितान्।<br>क्लेशक्षमान् महोत्साहान् धर्मज्ञांश्च प्रियंवदान्॥ ५<br>हितोपदेशकालज्ञान् स्वामिभक्तान् यशोऽर्थिनः।<br>एवंविधान् सहायांश्च शुभकर्मसु योजयेत्॥ ६<br>गुणहीनानपि तथा विज्ञाय नृपतिः स्वयं।<br>कर्मस्वेव नियुञ्जीत यथायोग्येषु भागशः॥ ७<br>कुलीनः शीलसम्पन्नो धनुर्वेदविशारदः।<br>हस्तिशिक्षाश्वशिक्षासु कुशलः श्लक्ष्णभाषितः॥ ८<br>निमित्ते शकुनज्ञाने वेत्ता चैव चिकित्सिते।<br>कृतज्ञः कर्मणां शूरस्तथा क्लेशसहस्त्वृजुः॥ ९<br>व्यूहतत्त्वविधानज्ञः फल्गुसारविशेषवित्।<br>राज्ञा सेनापतिः कार्यो ब्राह्मणः क्षत्रियोऽथवा॥ १० | जो छोटे-से-छोटा भी कार्य होता है, वह भी सहायकरहित अकेले व्यक्तिके लिये दुष्कर होता है, फिर राज्य-जैसे महान् उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यके लिये तो कहना ही क्या है? इसलिये राजाको चाहिये कि जो उत्तम कुलमें उत्पन्न, शूर, उच्च जातिमें उत्पन्न, बलवान्, श्रीसम्पन्न, रूपवान्, सत्त्वगुणसे युक्त, सज्जन, क्षमाशील, कष्टसहिष्णु, महोत्साही, धर्मज्ञ, प्रियभाषी, हितोपदेशके कालका ज्ञाता, स्वामिभक्त तथा यशके अभिलाषी हों, ऐसे सहायकोंका स्वयं वरण करके उन्हें माङ्गलिक कर्मोंमें नियुक्त करे। उसी प्रकार स्वयं राजाको कुछ गुणहीन सहायकोंको भी जान-बूझकर उन्हें यथायोग्य कार्योंमें विभागपूर्वक नियुक्त करना चाहिये। राजाको उत्तम कुलोत्पन्न, शीलवान्, धनुर्वेदमें प्रवीण, हाथी और अश्वकी शिक्षामें कुशल, मृदुभाषी, शकुन और अन्यान्य शुभाशुभ कारणों तथा ओषधियोंको जाननेवाला, कृतज्ञ, शूरतामें प्रवीण, कष्टसहिष्णु, सरल, व्यूह-रचनाके विधानको जाननेवाला, निस्तत्त्व एवं सारतत्त्वका विशेषज्ञ, ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय पुरुषको सेनापति-पदपर नियुक्त करना चाहिये॥ २-१०॥ |
| प्रांशुः सुरूपो दक्षश्च प्रियवादी न चोद्धतः।<br>चित्तग्राहश्च सर्वेषां प्रतीहारो विधीयते॥ ११ | ऊँचे कदवाला, सौन्दर्यशाली, कार्यकुशल, प्रियवक्ता, गम्भीर तथा सबके चित्तको आकर्षित करनेवालेको प्रतिहारी बनानेका विधान है। |
| यथोक्तवादी दूतः स्याद् देशभाषाविशारदः।<br>शक्तः क्लेशसहो वाग्मी देशकालविभागवित्॥ १२<br>विज्ञातदेशकालश्च दूतः स स्यान्महीक्षितः।<br>वक्ता नयस्य यः काले स दूतो नृपतेर्भवेत्॥ १३ | जो सत्यवादी, देशी भाषामें प्रवीण, सामर्थ्यशाली, सहिष्णु, वक्ता, देश-कालके विभागको जाननेवाला, देश-कालका जानकार तथा मौकेपर नीतिकी बातें कहनेवाला हो, वह राजाका दूत हो सकता है। |
| प्रांशवो व्यायताः शूरा दृढभक्ता निराकुलाः।<br>राज्ञा तु रक्षिणः कार्याः सदा क्लेशसहा हिताः॥ १४ | जो लम्बे कदवाले, कम सोनेवाले, शूर, दृढ़ भक्ति रखनेवाले, धैर्यवान्, कष्टसहिष्णु और हितैषी हों, ऐसे पुरुषोंको राजाद्वारा अङ्गरक्षकके कार्यमें नियुक्त किया जाना चाहिये। |
| अनाहार्योऽनृशंसश्च दृढभक्तिश्च पार्थिवे।<br>ताम्बूलधारी भवति नारी वाप्यथ तद्गुणा॥ १५ | जो दूसरोंद्वारा बहकाया न जा सके, दुष्ट स्वभावका न हो, राजामें अगाध भक्ति रखता हो—ऐसा पुरुष ताम्बूलधारी हो सकता है, अथवा ऐसे गुणवाली स्त्री भी नियुक्त की जा सकती है। |
| षाड्गुण्यविधितत्त्वज्ञो देशभाषाविशारदः।<br>सांधिविग्रहिकः कार्यो राज्ञा नयविशारदः॥ १६ | राजाको नीति शास्त्रके छः गुणोंके तत्त्वोंको जाननेवाले, देशी भाषामें प्रवीण एवं नीतिनिपुणको सन्धि-विग्राहिक बनाना चाहिये। |
| कृताकृतज्ञो भृत्यानां ज्ञेयः स्याद् देशरक्षिता।<br>आयव्ययज्ञो लोकज्ञो देशोत्पत्तिविशारदः॥ १७ | भृत्योंके कृत-अकृत कार्योंको जाननेवाले, आय-व्ययके ज्ञाता, लोकका जानकार और देशोत्पत्तिमें निपुण पुरुषको देशरक्षक बनाना चाहिये। |
२१७- दुर्ग-निर्माणकी विधि तथा राजाद्वारा दुर्गमें संग्रहणीय उपकरणोंका विवरण
* अध्याय २१५ * ८५९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सुरूपस्तरुणः प्रांशुर्दृढभक्तिः कुलोचितः।<br>शूरः क्लेशसहश्चैव खड्गधारी प्रकीर्त्तितः॥ १८<br><br>शूरश्च बलयुक्तश्च गजाश्वरथकोविदः।<br>धनुर्धारी भवेद् राज्ञः सर्वक्लेशसहः शुचिः॥ १९<br><br>निमित्तशकुनज्ञानी हयशिक्षाविशारदः।<br>हयायुर्वेदतत्त्वज्ञो भुवो भागविचक्षणः॥ २०<br><br>बलाबलज्ञो रथिनः स्थिरदृष्टिः प्रियंवदः।<br>शूरश्च कृतविद्यश्च सारथिः परिकीर्तितः॥ २१ | सुन्दर आकृतिवाले, लम्बे कदवाले, राज्यभक्त, कुलीन, शूर-वीर तथा कष्टसहिष्णुको खड्गधारी बनाना चाहिये। शूर, बलवान्, हाथी, घोड़े और रथकी विशेषताको जाननेवाला, सभी प्रकारके क्लेशोंको सहन करनेमें समर्थ तथा पवित्र व्यक्ति राजाका धनुर्धारी हो सकता है। शुभाशुभ शकुनको जाननेवाला, अश्वशिक्षामें विशारद, अश्वोंके आयुर्वेदविज्ञानको जाननेवाला, पृथ्वीके समस्त भागोंका ज्ञाता, रथियोंके बलाबलका पारखी, स्थिरदृष्टि, प्रियभाषी, शूर-वीर तथा विद्वान् पुरुष सारथिके योग्य कहा गया है॥ १९-२१॥ |
| अनाहार्यः शुचिर्दक्षश्चिकित्सितविदां वरः।<br>सूपशास्त्रविशेषज्ञः सूदाध्यक्षः प्रशस्यते॥ २२<br><br>सूदशास्त्रविधानज्ञाः पराभेद्याः कुलोद्गताः।<br>सर्वे महानसे धार्याः कृत्तकेशनखा नराः॥ २३<br><br>समः शत्रौ च मित्रे च धर्मशास्त्रविशारदः।<br>विप्रमुख्यः कुलीनश्च धर्माधिकरणो भवेत्॥ २४<br><br>कार्यास्तथाविधास्तत्र द्विजमुख्याः सभासदः।<br>सर्वदेशाक्षराभिज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः॥ २५<br><br>लेखकः कथितो राज्ञः सर्वाधिकरणेषु वै।<br>शीर्षोपेतान् सुसम्पूर्णान् समश्रेणिगतान् समान्॥ २६<br><br>अक्षरान् वै लिखेद् यस्तु लेखकः स वरः स्मृतः।<br>उपायवाक्यकुशलः सर्वशास्त्रविशारदः॥ २७<br><br>बह्वर्थवक्ता चाल्पेन लेखकः स्यान्नृपोत्तम।<br>वाक्याभिप्रायतत्त्वज्ञो देशकालविभागवित्॥ २८<br><br>अनाहार्यो भवेत्सक्तो लेखकः स्यान्नृपोत्तम।<br>पुरुषान्तरतत्त्वज्ञाः प्रांशवश्चाप्यलोलुपाः॥ २९<br><br>धर्माधिकारिणः कार्या जना दानकरा नराः।<br>एवंविधास्तथा कार्या राज्ञा दौवारिका जनाः॥ ३०<br><br>लोहवस्त्राजिनादीनां रत्नानां च विधानवित्।<br>विज्ञाता फल्गुसाराणामनाहार्यः शुचिः सदा॥ ३१<br><br>निपुणश्चाप्रमत्तश्च धनाध्यक्षः प्रकीर्तितः॥ ३२ | दूसरोंके बहकावेमें न आनेवाले, पवित्र, प्रवीण, ओषधियोंके गुण-दोषोंको जाननेवालोंमें श्रेष्ठ, भोजनकी विशेषताओंके जानकारको उत्तम भोजनाध्यक्ष कहा जाता है। जो भोजनशास्त्रके विधानोंमें कुशल, वंश-परम्परासे चले आनेवाले, दूसरोंद्वारा अभेद्य तथा कटे हुए नख-केशवाले हों, ऐसे सभी पुरुषोंको चौकेमें नियुक्त करना चाहिये। शत्रु और मित्रमें समताका व्यवहार करनेवाले, धर्मशास्त्रमें विशारद, कुलीन श्रेष्ठ ब्राह्मणको धर्माध्यक्षका पद सौंपना चाहिये। ऊपर कही हुई विशेषताओंसे युक्त ब्राह्मणोंको सभासद् नियुक्त करना चाहिये। जो सभी देशोंकी भाषाओंका ज्ञाता तथा सम्पूर्ण शास्त्रोंमें पटु हो, ऐसा व्यक्ति सभी विभागोंमें राजाका लेखक कहा गया है। जो ऊपरकी शिरोरेखासे पूर्ण, पूर्ण अवयववाले, समश्रेणीमें प्राप्त एवं समान आकृतिवाले अक्षरोंको लिखता है, वह अच्छा लेखक कहा जाता है। नृपश्रेष्ठ! जो उपाययुक्त वाक्योंमें प्रवीण, सम्पूर्ण शास्त्रोंमें विशारद तथा थोड़े शब्दोंमें अधिक प्रयोजनकी बात कहनेकी क्षमता रखता हो, उसे लेखक बनाना चाहिये। नृपोत्तम! जो वाक्योंके अभिप्रायको जाननेवाला, देश-कालके विभागका ज्ञाता तथा अभेदज्ञ यानी भेद न करनेवाला हो, उसे लेखक बनाना चाहिये। मनुष्योंके हृदयकी बातों तथा भावोंको परखनेवाले, दीर्घकाय, निर्लोभ एवं दानशील व्यक्तियोंको धर्माधिकारी बनाना चाहिये तथा राजाद्वारा इसी प्रकारके लोगोंको द्वारपालका पद भी सौंपा जाना चाहिये। लोह, वस्त्र, मृग-चर्मादि तथा रत्नोंकी परख करनेवाला, अच्छी-बुरी वस्तुओंका जानकार, दूसरोंके बहकावेमें न आनेवाला, पवित्र, निपुण एवं सावधान व्यक्तिको धनाध्यक्ष बनाना चाहिये॥ २२-३२॥ |
| आयद्वारेषु सर्वेषु धनाध्यक्षसमा नराः।<br>व्ययद्वारेषु च तथा कर्तव्याः पृथिवीक्षिता॥ ३३ | राजाद्वारा आय तथा व्ययके सभी स्थानोंपर धनाध्यक्षके समान गुणवाले पुरुषोंको नियुक्त करना चाहिये। जो |
८६० * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| परम्परागतो यः स्यादष्टाङ्गे सुचिकित्सिते ।<br>अनाहार्यः स वैद्यः स्याद् धर्मात्मा च कुलोद्गतः ॥ ३४<br>प्राणाचार्यः स विज्ञेयो वचनं तस्य भूभुजा ।<br>राजन् राज्ञा सदा कार्यं यथा कार्यं पृथग्जनैः ॥ ३५<br>हस्तिशिक्षाविधानज्ञो वनजातिविशारदः ।<br>क्लेशक्षमस्तथा राज्ञो गजाध्यक्षः प्रशस्यते ॥ ३६<br>एतैरेव गुणैर्युक्तः स्थविरश्च विशेषतः ।<br>गजारोही नरेन्द्रस्य सर्वकर्मसु शस्यते ॥ ३७<br>हयशिक्षाविधानज्ञश्चिकित्सितविशारदः ।<br>अश्वाध्यक्षो महीभर्तुः स्वासनश्च प्रशस्यते ॥ ३८<br>अनाहार्यश्च शूरश्च तथा प्राज्ञः कुलोद्गतः ।<br>दुर्गाध्यक्षः स्मृतो राज्ञ उद्युक्तः सर्वकर्मसु ॥ ३९<br>वास्तुविद्याविधानज्ञो लघुहस्तो जितश्रमः ।<br>दीर्घदर्शी च शूरश्च स्थपतिः परिकीर्तितः ॥ ४०<br>यन्त्रमुक्ते पाणिमुक्ते विमुक्ते मुक्तधारिते ।<br>अस्त्राचार्यो निरुद्वेगः कुशलश्च विशिष्यते ॥ ४१<br>वृद्धः कुलोद्गतः सूक्तः पितृपैतामहः शुचिः ।<br>राज्ञामन्तःपुराध्यक्षो विनीतश्च तथेष्यते ॥ ४२ | वंशपरम्परासे आनेवाला, आठों अङ्गोंकी चिकित्साको अच्छी तरह जाननेवाला, स्वामिभक्त, धर्मात्मा एवं सत्कुलोत्पन्न हो, ऐसे व्यक्तिको वैद्य बनाना चाहिये। राजन्! उसे प्राणाचार्य जानना चाहिये और सर्वसाधारणकी भाँति उसके वचनोंका सदा पालन करना चाहिये। जो जंगली जातिवालोंके रीति-रस्मोंका ज्ञाता, हस्तिशिक्षाका विशेषज्ञ, सहिष्णुतामें समर्थ हो, ऐसा व्यक्ति राजाका श्रेष्ठ गजाध्यक्ष हो सकता है। उपर्युक्त गुणोंसे युक्त तथा अवस्थामें वृद्ध व्यक्ति राजाका गजारोही होकर सभी कार्योंमें श्रेष्ठ कहा गया है। अश्व-शिक्षाके विधानमें प्रवीण, उनकी चिकित्सामें विशारद तथा स्थिर आसनसे बैठनेवाला व्यक्ति राजाका श्रेष्ठ अश्वाध्यक्ष कहा गया है। जो स्वामि-भक्त, शूर-वीर, बुद्धिमान्, कुलीन, सभी कार्योंमें उद्यत हो, वह राजाका दुर्गाध्यक्ष कहा गया है। वास्तुविद्याके विधानमें प्रवीण, फुर्तीला, परिश्रमी, दीर्घदर्शी एवं शूर व्यक्तिको श्रेष्ठ कारीगर कहा गया है। यन्त्रमुक्त (तोप-बन्दूक) आदि, पाणिमुक्त (शक्ति आदि), विमुक्त, मुक्तधारित आदि अस्त्रोंके परिचालनकी विशेषताओंमें सुनिपुण, उद्वेगरहित व्यक्ति श्रेष्ठ अस्त्राचार्य कहा गया है। वृद्ध, सत्कुलोत्पन्न, मधुरभाषी, पिता-पितामहके समयसे उसी कार्यपर नियुक्त होनेवाले, पवित्र एवं विनीत व्यक्तिको राजाओंके अन्तःपुरके अध्यक्ष-पदपर नियुक्त करना उचित है॥ ३३—४२॥ |
| एवं सप्ताधिकारेषु पुरुषाः सप्त ते पुरे ।<br>परीक्ष्य चाधिकार्याः स्यू राज्ञा सर्वेषु कर्मसु ।<br>स्थापनाजातितत्त्वज्ञाः सततं प्रतिजागृताः ॥ ४३<br>राज्ञः स्यादायुधागारे दक्षः कर्मसु चोद्यतः ।<br>कर्माण्यपरिमेयानि राज्ञो नृपकुलोद्वह ॥ ४४<br>उत्तमाधममध्यानि बुद्ध्वा कर्माणि पार्थिवः ।<br>उत्तमाधममध्येषु पुरुषेषु नियोजयेत् ॥ ४५<br>नरकर्मविपर्यासाद्राजा नाशमवाप्नुयात् ।<br>नियोगं पौरुषं भक्तिं श्रुतं शौर्यं कुलं नयम् ॥ ४६<br>ज्ञात्वा वृत्तिर्विधातव्या पुरुषाणां महीक्षिता ।<br>पुरुषान्तरविज्ञानतत्त्वसारनिबन्धनात् ॥ ४७ | इस प्रकार राजाको इन सात अधिकार-पदोंपर सभी कार्योंमें भलीभाँति परीक्षा कर सातों व्यक्तियोंको अधिकारी बनाना चाहिये। कार्योंमें नियुक्त किये गये व्यक्तियोंको उद्योगशील, जागरूक तथा पटु होना चाहिये। राजकुलोत्पन्न! राजाओंके अस्त्रागारमें दक्ष तथा उद्यमशील व्यक्ति होना चाहिये। राजाके कार्योंकी गणना नहीं की जा सकती, अतः राजाको उत्तम, मध्यम तथा अधम कार्योंको भलीभाँति समझ-बूझकर वैसे ही उत्तम, मध्यम एवं अधम पुरुषोंको सौंपना चाहिये। सौंपे गये कार्योंमें परिवर्तन अर्थात् अधमको उत्तम और उत्तमको अधम कार्य सौंप देनेसे राजाका विनाश हो जाता है। राजाको चाहिये कि अपने पुरुषोंके निश्चय, पौरुष, भक्ति, शास्त्रज्ञान, शूरता, कुल और नीतिको जानकर उनका वेतन निश्चित करे। कोई दूसरा व्यक्ति न जान सके—इस अभिप्रायसे |
| * अध्याय २१५ * | ८६१ |
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| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| बहुभिर्मन्त्रयेत् कामं राजा मन्त्रं पृथक्-पृथक्।<br>मन्त्रिणामपि नो कुर्यान्मन्त्रिमन्त्रप्रकाशनम्॥ ४८<br>क्वचिन्न कस्य विश्वासो भवतीह सदा नृणाम्।<br>निश्चयस्तु सदा मन्त्रे कार्यो ऐकेन सूरिणा॥ ४९<br>भवेद् वा निश्चयावाप्तिः परबुद्ध्युपजीवनात्।<br>एकस्यैव महीभर्तुर्भूयः कार्यो विनिश्चयः॥ ५०<br>ब्राह्मणान् पर्युपासीत त्रयीशास्त्रसुनिश्चितान्।<br>नासच्छास्त्रवतो मूढांस्ते हि लोकस्य कण्टकाः॥ ५१<br>वृद्धान् हि नित्यं सेवेत विप्रान् वेदविदः शुचीन्।<br>तेभ्यः शिक्षेत विनयं विनीतात्मा च नित्यशः।<br>समग्रां वशगां कुर्यात् पृथिवीं नात्र संशयः॥ ५२<br>बहवोऽविनयाद् भ्रष्टा राजानः सपरिच्छदाः।<br>वनस्थाश्चैव राज्यानि विनयात् प्रतिपेदिरे॥ ५३<br>त्रैविद्येभ्यस्त्रयीं विद्यां दण्डनीतिं च शाश्वतीम्।<br>आन्वीक्षिकीं त्वात्मविद्यां वार्तारम्भांश्च लोकतः॥ ५४<br>इन्द्रियाणां जये योगं समातिष्ठेद् दिवानिशम्।<br>जितेन्द्रियो हि शक्नोति वशे स्थापयितुं प्रजाः॥ ५५<br>यजेत राजा बहुभिः ऋतुभिश्च सदक्षिणैः।<br>धर्मार्थं चैव विप्रेभ्यो दद्याद् भोगान् धनानि च॥ ५६ | राजा अनेकों मन्त्रियोंके साथ अलग-अलग मन्त्रणा करे, परंतु एक मन्त्रीकी मन्त्रणाको दूसरे मन्त्रियोंपर प्रकट न होने दे। इस संसारमें मनुष्योंको सदा कहीं भी किसीका विश्वास नहीं होता, अतः राजाको एक ही विद्वान् मन्त्रीकी मन्त्रणाका निश्चय नहीं करना चाहिये। अन्यथा दूसरेकी बुद्धिके सहारे निश्चयकी प्राप्ति हो जाती है। उस अकेले किये गये निश्चयमें भी राजाको चाहिये कि फिरसे विचार कर ले। उसे त्रयीधर्ममें अटल निश्चय रखनेवाले ब्राह्मणोंकी सेवा करनी चाहिये। जो शास्त्रज्ञ नहीं हैं, उन मूर्खोंकी पूजा न करे; क्योंकि वे लोकके लिये कण्टकस्वरूप हैं। पवित्र आचरणवाले, वेदवेत्ता, वृद्ध ब्राह्मणोंकी नित्य सेवा करनी चाहिये और उन्हींसे सदा विनम्र होकर विनयकी शिक्षा लेनी चाहिये। ऐसा करनेसे वह (राजा) निःसंदेह सम्पूर्ण वसुन्धराको वशमें कर सकता है। बहुत-से राजा उद्दण्डताके कारण अपने परिजन एवं अनुचरोंके साथ नष्ट हो गये और अनेकों वनस्थ राजाओंने विनयसे पुनः राज्यश्रीको प्राप्त किया है। राजाओंको वेदवेत्ताओंसे तीनों वेद, शाश्वती दण्डनीति, आन्वीक्षिकी (तर्कशास्त्र) तथा आत्मविद्या ग्रहण करनी चाहिये और सर्वसाधारणसे लौकिक वार्ताओंकी सूचना प्राप्त करनी चाहिये। राजाको दिन-रात इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करनेकी युक्ति करते रहना चाहिये; क्योंकि जितेन्द्रिय राजा ही प्रजाओंको वशमें रखनेमें समर्थ हो सकता है। राजाको दक्षिणायुक्त बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान करना चाहिये तथा ब्राह्मणोंको धर्मकी प्राप्तिके लिये भोग्य सामग्रियाँ और धन देना चाहिये॥ ४३-५६॥ |
| सांवत्सरिकमाप्तैश्च राष्ट्रादाहारयेद् बलिम्।<br>स्यात् स्वाध्यायपरो लोके वर्तेत पितृबन्धुवत्॥ ५७ | बुद्धिमान् कर्मचारियोंद्वारा राज्यसे वार्षिक कर वसूल कराये। उसे सर्वदा स्वाध्यायमें लीन तथा लोगोंके साथ पिता और भाईका-सा व्यवहार करना चाहिये। |
| आवृत्तानां गुरुकुलाद् द्विजानां पूजको भवेत्।<br>नृणामक्षयो ह्येष निधिर्ब्राह्मोऽभिधीयते॥ ५८ | राजाको गुरुकुलसे लौटे हुए ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। राजाओंके लिये यह अक्षय ब्राह्म-निधि (कोश-खजाना) कही गयी है। |
| तं च स्तेना नवामित्रा हरन्ति न विनश्यति।<br>तस्माद् राज्ञा विधातव्यो ब्राह्मो वै ह्यक्षयो निधिः *॥ ५९ | चोर अथवा शत्रुगण उसका हरण नहीं कर सकते और न उसका विनाश ही होता है। इसलिये राजाको इस अक्षय ब्राह्म-निधि (खजाने)-का संचय अवश्य करना चाहिये। |
| समोत्तमाधमै राजा ह्याहूय पालयेत् प्रजाः।<br>न निवर्तेत संग्रामात् क्षात्रं व्रतमनुस्मरन्॥ ६० | राजाको चाहिये कि वह अपने उत्तम, मध्यम तथा अधम अनुचरोंद्वारा प्रजाको बुलाकर उनका पालन करे और अपने क्षात्रधर्मका स्मरण कर संग्रामसे कभी विचलित न हो। |
* ये सभी प्रायः २० श्लोक मनुयाज्ञवल्क्य-स्मृतिमें भी हैं। तदनुसार शुद्ध किये गये हैं।