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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 855 of 1098

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Page 855
* अध्याय २०९ *८४५
चेतसा दूयमानेन गूहमाना महद्भयम्।<br>वने पप्रच्छ भर्तारं द्रुमांश्चासद्दृशांस्तथा॥ २०<br>आश्वासयामास स राजपुत्रीं<br>क्लान्तां वने पद्मविशालनेत्राम्।<br>संदर्शनेनाथ द्रुमद्विजानां<br>तथा मृगाणां विपिने नृवीरः॥ २१उसने अपने इस महान् भयको अपने पतिसे व्यक्त नहीं किया, किंतु मन-बहलावके लिये वनमें छोटे-बड़े वृक्षोंके बारेमें पतिसे झूठ-मूठ पूछ-ताछ करती रही। शूरवीर सत्यवान् उस भयंकर वनमें विशाल वृक्षों, पक्षियों एवं पशुओंके दलको दिखला-दिखलाकर थकी हुई एवं कमलके समान विशाल नेत्रोंवाली राजकुमारी सावित्रीको आश्वासन देता रहा॥ ८—२१॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सावित्र्युपाख्याने सावित्रीवनप्रवेशो नामाष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सावित्री-उपाख्यानमें सावित्रीवनप्रवेश नामक दो सौ आठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०८॥


दो सौ नवाँ अध्याय

सत्यवान्‌का सावित्रीको वनकी शोभा दिखाना

सत्यवानुवाच<br>वनेऽस्मिञ्शाद्वलाकीर्णे सहकारं मनोहरम्।<br>नेत्रघ्राणसुखं पश्य वसन्ते रतिवर्धनम्॥ १<br>वनेऽप्यशोकं दृष्ट्वैवं रागवन्तं सुपुष्पितम्।<br>वसन्तो हसतीवायं मामेवायतलोचने॥ २<br>दक्षिणे दक्षिणेनैतां पश्य रम्यां वनस्थलीम्।<br>पुष्पितैः किंशुकैर्युक्तां ज्वलितानलसप्रभैः॥ ३<br>सुगन्धिकुसुमामोदो वनराजिविनिर्गतः।<br>करोति वायुर्दाक्षिण्यमावयोः क्लमनाशनम्॥ ४<br>पश्चिमेन विशालाक्षि कर्णिकारैः सुपुष्पितैः।<br>काञ्चनेन विभात्येषा वनराजी मनोरमा॥ ५<br>अतिमुक्तलताजालरुद्धमार्गा वनस्थली।<br>रम्या सा चारुसर्वाङ्गि कुसुमोत्करभूषणा॥ ६<br>मधुमत्तालिझंकारव्याजेन वरवर्णिनि।<br>चापाकृष्टं करोतीव कामः पान्थजिघांसया॥ ७<br>फलास्वादलसद्वक्त्रपुंस्कोकिलविनादिता ।<br>विभाति चारुतिलका त्वमिवैषा वनस्थली॥ ८<br>कोकिलश्चूतशिखरे मञ्जरीरेणुपिञ्जरः।<br>गदितैर्व्यक्ततां याति कुलीनश्चेष्टितैरिव॥ ९<br>पुष्परेणुविलिप्ताङ्गीं प्रियामनुसरन् वने।<br>कुसुमं कुसुमं याति कूजन् कामी शिलीमुखः॥ १०सत्यवान्‌ने कहा—विशाल नेत्रोंवाली सावित्री! हरी-हरी घासोंसे भरे हुए इस वनमें वसन्तमें रतिकी वृद्धि करनेवाले एवं नेत्र तथा नासिकाको सुख प्रदान करनेवाले इस मनोहर आमके वृक्षको देखो। इस वनमें फूलोंसे लदे हुए इस लाल अशोक-वृक्षको भी देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो यह वसन्त मेरा ही परिहास कर रहा है। दाहिनी ओर दक्षिण दिशामें जलते हुए अंगारकी-सी कान्तिवाले फूलोंसे लदे हुए किंशुक-वृक्षोंसे युक्त इस रमणीय वनस्थलीको देखो। सुगन्धित पुष्पोंकी सुगन्धसे युक्त वन-पंक्तियोंसे निकली हुई वायु उदारतापूर्वक हमलोगोंकी थकावटका नाश कर रही है। विशाललोचने! इधर पश्चिममें फूले हुए कनेरके पुष्पोंसे युक्त स्वर्णिम शोभावाली वनपङ्क्ति शोभायमान हो रही है। सुन्दरि! तिनिसके लतासमूहोंसे वनस्थलीका मार्ग अवरुद्ध हो गया है। पुष्पोंके समूहोंसे विभूषित हुई वह पृथ्वी कितनी मनोहर लग रही है। मधुसे उन्मत्त हुए भ्रमर-समूहोंकी गुञ्जारके व्याजसे मालूम पड़ता है कि कामदेव (हम-जैसे) पथिकोंको मारनेके लिये धनुषकी प्रत्यञ्चा खींच रहा है। नाना प्रकारके फलोंके आस्वादनसे उल्लसित मुखवाले कोकिलोंके स्वरसे निनादित एवं सुन्दर तिलक-वृक्षोंसे सुशोभित यह वनस्थली तुम्हारे ही समान शोभा दे रही है। आमकी ऊँची डालीपर बैठी हुई कोकिला मञ्जरीकी धूलसे पीत वर्ण होकर अपने सुरीले शब्दोंसे चेष्टाओंद्वारा कुलीन पुरुषकी भाँति अपना परिचय दे रही है। कामी मधुकर वनमें गुनगुनाता हुआ प्रत्येक पुष्पपर पुष्पोंकी धूलिसे धूसरित प्रियतमाका अनुसरण करता हुआ उड़ रहा है॥ १—१०॥