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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 863 of 1098

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Page 863

* अध्याय २१२ *

श्लोकअर्थ
तेजसानि शरीराणि सदा पुण्यवतां फलम्।<br>राज्यं नृपतिपूजा च कामसिद्धिस्तथेप्सिता ॥ ११<br>संस्काराणि च मुख्यानि फलं पुण्यस्य दृश्यते।पुण्यशाली मनुष्योंके तेजस्वी शरीर पुण्यके ही फल हैं। राज्यकी प्राप्ति, राजाओंद्वारा सम्मान, अभीष्ट मनोरथोंकी सिद्धि तथा मुख्य संस्कार—ये सभी पुण्यके ही फल देखे जाते हैं।
रुक्मवैदूर्यदण्डानि चण्डांशुसदृशानि च ॥ १२<br>चामराणि सुराध्यक्ष भवन्ति शुभकर्मणाम्।देवाध्यक्ष! पुण्यवान् पुरुषोंके चँवर सुवर्ण तथा वैदूर्यके बने हुए डंडेवाले तथा सूर्यके समान तेजोमय होते हैं।
पूर्णेन्दुमण्डलाभेन रत्नांशुकविकासिना ॥ १३<br>धार्यतां याति छत्रेण नरः पुण्येन कर्मणा।पूर्णिमाके चन्द्रमण्डलके समान कान्तिमान् एवं रत्नजटित वस्त्रसे सुशोभित छत्र मनुष्यको पुण्य कर्मसे ही प्राप्त होता है।
जयशङ्खस्वरौघेण सूतमागधनिःस्वनैः ॥ १४<br>वरासनं सभृङ्गारं फलं पुण्यस्य कर्मणः।विजयकी सूचना देनेवाले शङ्ख-स्वरों तथा मागध-बन्दियोंकी माङ्गलिक ध्वनियोंके साथ अभिषेक-पात्रसहित श्रेष्ठ सिंहासनका प्राप्त होना पुण्यकर्मका ही फल है।
वरान्नपानं गीतं च भृत्यमाल्यानुलेपनम् ॥ १५<br>रत्नवस्त्राणि मुख्यानि फलं पुण्यस्य कर्मणः।उत्तम अन्न, जल, गीत, अनुचर, मालाएँ, चन्दन, रत्न तथा बहुमूल्य वस्त्र—ये सब पुण्यकर्मोंके फल हैं।
रूपौदार्यगुणोपेताः स्त्रियश्चातिमनोहराः ॥ १६<br>वासाः प्रासादपृष्ठेषु भवन्ति शुभकर्मिणाम्।सुन्दरता और औदार्य गुणोंसे युक्त अतिशय मनोहर स्त्रियाँ और उच्च महलोंपर निवास शुभ कर्मियोंको प्राप्त होते हैं।
सुवर्णकिङ्किणीमिश्रचामरापीडधारिणः ॥ १७<br>वहन्ति तुरगा देव नरं पुण्येन कर्मणा।देव! मस्तकपर स्वर्णकी घंटियोंसे युक्त चमर धारण करनेवाले घोड़े पुण्यकर्मसे ही मनुष्यको वहन करते हैं।
हेमकक्षैश्च मातङ्गैश्चलत्पर्वतसंनिभैः ॥ १८<br>खेलद्भिः पादविन्यासैर्यान्ति पुण्येन कर्मणा।चलते हुए पर्वतोंके समान, सुवर्णनिर्मित अम्बारीसे सुशोभित तथा चञ्चल पादविन्याससे युक्त हाथियोंकी सवारी पुण्यकर्मके प्रभावसे ही प्राप्त होती है।
सर्वकामप्रदे देव सर्वाघदुरितापहे ॥ १९<br>वहन्ति भक्तिं पुरुषः सदा पुण्येन कर्मणा।देव! सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले एवं सभी पापोंको दूर करनेवाले स्वर्गमें पुरुष सदा पुण्यकर्मोंके प्रभावसे ही भक्ति प्राप्त करते हैं।
तस्य द्वाराणि यजनं तपो दानं दमः क्षमा ॥ २०<br>ब्रह्मचर्यं तथा सत्यं तीर्थानुसरणं शुभम्।<br>स्वाध्यायसेवा साधूनां सहवासः सुरार्चनम् ॥ २१<br>गुरूणां चैव शुश्रूषा ब्राह्मणानां च पूजनम्।<br>इन्द्रियाणां जयश्चैव ब्रह्मचर्यममत्सरम् ॥ २२उसकी प्राप्तिके उपाय हैं—यज्ञ, तप, दान, इन्द्रियनिग्रह, क्षमाशीलता, ब्रह्मचर्य, सत्य, शुभदायक तीर्थोंकी यात्रा, स्वाध्याय, सेवा, सत्पुरुषोंकी संगति, देवार्चन, गुरुजनोंकी शुश्रूषा, ब्राह्मणोंकी पूजा, इन्द्रियोंको वशमें रखना तथा मत्सररहित ब्रह्मचर्य।
तस्माद् धर्मः सदा कार्यो नित्यमेव विजानता।<br>न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्य न वाकृतम् ॥ २३इसलिये विद्वान् पुरुषको सर्वदा धर्माचरण करना चाहिये; क्योंकि मृत्यु इसकी प्रतीक्षा नहीं करती कि इसने अपना कार्य पूरा किया अथवा नहीं।
बाल एव चरेद् धर्ममनित्यं देव जीवितम्।<br>को हि जानाति कस्याद्य मृत्युरेवा पतिष्यति ॥ २४देव! मनुष्यको बाल्यावस्थासे ही धर्माचरण करना चाहिये; क्योंकि यह जीवन नश्वर है। यह कौन जानता है कि आज किसकी मृत्यु हो जायगी।
पश्यतोऽप्यस्य लोकस्य मरणं पुरतः स्थितम्।<br>अमरस्येव चरितमत्याश्चर्यं सुरोत्तम ॥ २५सुरोत्तम! इस जीवके देखते हुए भी मृत्यु सामने खड़ी रहती है, फिर भी वह मृत्युरहितकी भाँति आचरण करता है—यह महान् आश्चर्य है।
युवत्वापेक्षया बालो वृद्धत्वापेक्षया युवा।<br>मृत्योरुत्सङ्गमारूढः स्थविरः किमपेक्षते ॥ २६युवककी अपेक्षा बालक और वृद्धकी अपेक्षा युवक अपनेको मृत्युसे दूर मानता है, किंतु मृत्युकी गोदमें बैठा हुआ वृद्ध किसकी अपेक्षा करता है।