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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 860 of 1098

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Page 860

८५० * मत्स्यपुराण *


दो सौ ग्यारहवाँ अध्याय

सावित्रीको यमराजसे द्वितीय वरदानकी प्राप्ति

सावित्र्युवाचसावित्रीने कहा—
कुतः क्लमः कुतो दुःखं सद्भिः सह समागमे।<br>सतां तस्मान्न मे ग्लानिस्त्वत्समीपे सुरोत्तम॥ १देवश्रेष्ठ! सत्पुरुषोंके साथ समागम होनेपर कैसा परिश्रम? और कैसा दुःख? आप-जैसे महानुभावोंके समीपमें मुझे किसी प्रकारकी भी ग्लानि नहीं है।
साधूनां वाप्यसाधूनां संत एव सदा गतिः।<br>नैवासतां नैव सतामसन्तो नैवमात्मनः॥ २चाहे साधु प्रकृतिके हों या असाधु प्रकृतिके, सभीके निर्वाहक सदा सत्पुरुष ही होते हैं, किंतु असत्पुरुष न तो सज्जनोंके काम आ सकते हैं, न असत्पुरुषोंके ही और न स्वयं अपना ही कल्याण कर सकते हैं।
विषाग्निसर्पशस्त्रेभ्यो न तथा जायते भयम्।<br>अकारणजगद्वैरिखलेभ्यो जायते तथा॥ ३विष, अग्नि, सर्प तथा शस्त्रसे लोगोंको उतना भय नहीं होता, जितना अकारण जगत्‌से वैर करनेवाले दुष्टोंसे होता है।
संतः प्राणानपि त्यक्त्वा परार्थं कुर्वते यथा।<br>तथासंतोऽपि संत्यज्य परपीडासु तत्पराः॥ ४जैसे सत्पुरुष अपने प्राणोंका विसर्जन करके भी परोपकार करते हैं, उसी प्रकार दुर्जन भी अपने प्राणोंका परित्याग कर दूसरेको कष्ट देनेमें तत्पर रहते हैं।
त्यजत्यसूनयं लोकस्तृणवद् यस्य कारणात्।<br>परोपघातशक्तास्तं परलोकं तथासतः॥ ५जिस परलोककी प्राप्तिके लिये सत्पुरुष अपने प्राणोंको भी तृणके समान त्याग देते हैं, उसी परलोककी परायी हानिमें निरत रहनेवाले दुर्जन कुछ भी चिन्ता नहीं करते।
निकायेषु निकायेषु तथा ब्रह्मा जगद्गुरुः।<br>असतामुपघाताय राजानं ज्ञातवान् स्वयम्॥ ६स्वयं जगद्गुरु ब्रह्माने सभी प्राणि-समूहोंमें असत्प्राणियोंके निग्रहके लिये राजाको नियुक्त किया है।
नरान् परीक्ष्येद् राजा साधून् सम्मानयेत् सदा।<br>निग्रहं चासतां कुर्यात् स लोके लोकजित्तमः॥ ७राजा सर्वदा पुरुषोंकी परीक्षा करे। जो सज्जन हों उनका आदर करे और दुष्टोंको दण्ड दे। जो ऐसा करता है, वह सभी लोकविजेता राजाओंमें श्रेष्ठ है।
निग्रहेणासतां राजा सतां च परिपालनात्।<br>एतावदेव कर्तव्यं राज्ञा स्वर्गमभीप्सुना॥ ८सत्पुरुषोंको सम्मान देने तथा दुष्टोंका निग्रह करनेके कारण ही वह राजा है। स्वर्ग-प्राप्तिकी इच्छा करनेवाले राजाको इन दोनों कार्योंका पालन करना चाहिये।
राजकृत्यं हि लोकेषु नास्त्यन्यज्जगतीपते।<br>असतां निग्रहादेव सतां च परिपालनात्॥ ९जगतीपते! राजाओंके लिये सत्पुरुषोंके परिपालन तथा दुष्टोंके नियमनके अतिरिक्त दूसरा कोई राजधर्म संसारमें नहीं है।
राजभिश्चाप्यशास्तानामसतां शासिता भवान्।<br>तेन त्वमधिको देवो देवेभ्यः प्रतिभासि मे॥ १०उन राजाओंद्वारा भी जो दुष्ट शासित नहीं किये जा सके, ऐसे दुर्जनोंके शासक आप हैं, इसी कारण आप मुझे सभी देवताओंसे अधिक महत्त्वशाली देवता प्रतीत हो रहे हैं।
जगत्तु धार्यते सद्भिः सतामग्र्यस्तथा भवान्।<br>तेन त्वामनुयान्त्या मे क्लमो देव न विद्यते॥ ११यह जगत् सत्पुरुषोंद्वारा धारण किया जाता है तथा आप उन सत्पुरुषोंके अग्रणी हैं, इसलिये देव! आपके पीछे चलते हुए मुझे कुछ भी क्लेश नहीं है॥ १—११॥