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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 853 of 1098

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Page 853

* अध्याय २०८ * । ८४३


चरणानि मुखं पुच्छं यस्य श्वेतानि गोपतेः ।<br>लाक्षारससवर्णश्च तं नीलमिति निर्दिशेत् ॥ ३८<br><br>वृष एवं स मोक्तव्यो न सन्धार्यो गृहे भवेत्।<br>तदर्थमेषा चरति लोके गाथा पुरातनी ॥ ३९<br><br>एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत्।<br>गौरीं चाप्युद्वहेत् कन्यां नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ॥ ४०<br><br>एवं वृषं लक्षणसम्प्रयुक्तं<br>गृहोद्भवं क्रीतमथापि राजन्।<br>मुक्त्वा न शोचेन्मरणं महात्मा<br>मोक्षं गतश्चाहमतोऽभिधास्ये ॥ ४१जिस वृषभके चारों चरण, मुख और पूँछ श्वेत हों तथा शेष शरीरका रंग लाह-रसके समान हो, उसे नील वृषभ कहते हैं। ऐसा वृषभ उत्सर्ग कर देना चाहिये, उसे घरमें पालना ठीक नहीं हैं; क्योंकि ऐसे वृषभके लिये लोकमें एक ऐसी पुरानी गाथा प्रचलित है कि बहुतेरे पुत्रोंकी कामना करनी चाहिये; क्योंकि उनमेंसे कोई भी तो गयाकी यात्रा करेगा या गौरी कन्याका दान करेगा या नीले वृषभका उत्सर्ग करेगा। राजन्! ऐसे लक्षणयुक्त वृषभका चाहे वह घरमें उत्पन्न हुआ हो या खरीदा गया हो, उत्सर्ग कर महात्मा पुरुष कभी मृत्युके भयसे शोकग्रस्त नहीं होता; उसे मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है। इसलिये मैं आपसे कह रहा हूँ॥ ३४—४१॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे वृषभलक्षणं नाम समाधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २०७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वृषभलक्षण नामक दो सौ सातवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०७॥


दो सौ आठवाँ अध्याय

सावित्री और सत्यवान्का चरित्र

सूत उवाच<br>ततः स राजा देवेशं पप्रच्छामितविक्रमः।<br>पतिव्रतानां माहात्म्यं तत्सम्बद्धां कथामपि॥ १सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर अपरिमित पराक्रमी राजा मनुने भगवान् मत्स्यसे पतिव्रता स्त्रियोंके माहात्म्य तथा तत्सम्बन्धी कथाके विषयमें प्रश्न किया॥ १॥
मनुरुवाच<br>पतिव्रतानां का श्रेष्ठा कया मृत्युः पराजितः।<br>नामसंकीर्तनं कस्याः कीर्तनीयं सदा नरैः।<br>सर्वपापक्षयकरमिदानीं कथयस्व मे॥ २मनुजीने पूछा—(प्रभो!) पतिव्रता स्त्रियोंमें कौन श्रेष्ठ है? किस स्त्रीने मृत्युको पराजित किया है? तथा मनुष्योंको सदा किस (सती नारी)-का नामोच्चारण करना चाहिये? आप अब मुझसे सभी पापोंको नष्ट करनेवाली इस कथाका वर्णन कीजिये॥ २॥
मत्स्य उवाच<br>वैलौम्यं धर्मराजोऽपि नाचरत्यथ योषिताम्।<br>पतिव्रतानां धर्मज्ञ पूज्यास्तस्यापि ताः सदा॥ ३<br><br>अत्र ते वर्णयिष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम्।<br>यथा विमोक्षितो भर्ता मृत्युपाशगतः स्त्रिया॥ ४<br><br>मद्रेषु शाकलो राजा बभूवाश्वपतिः पुरा।<br>अपुत्रस्तप्यमानोऽसौ पुत्रार्थी सर्वकामदाम्॥ ५**मत्स्यभगवान्ने कहा—**धर्मज्ञ! धर्मराज भी पतिव्रता स्त्रियोंके प्रतिकूल कोई व्यवहार नहीं कर सकते; क्योंकि वे उनके लिये भी सर्वदा सम्माननीय हैं। इस विषयमें मैं तुमसे पापोंको नष्ट करनेवाली वैसी कथाका वर्णन कर रहा हूँ कि किस प्रकार पतिव्रता स्त्रीने मृत्युके पाशमें पड़े हुए अपने पतिको बन्धनमुक्त कराया था। प्राचीन समयमें मद्रदेश (वर्तमान स्यालकोट जनपद)-में शाकलवंशी अश्वपति नामक एक राजा थे। उनके कोई पुत्र नहीं था।