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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

दशवां अध्याय। ३८६

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दशवां अध्याय। ३८६
शस्त्र, अस्त्र धारण करना क्षत्रिय की और व्यापार, पशुपालन,
खेती वैश्य की आजीविका के लिए हैं और दान देना, वेद पढ़ना,
यज्ञकरना, इन दोनों का धर्म है ॥ ७२-७९ ॥
वेदाभ्यासो ब्राह्मणस्य क्षत्रियस्य च रक्षणम् ।
वार्ता कर्मैव वैश्यस्य विशिष्टानि स्वकर्मसु ॥ ८० ॥
अजीवंस्तु यथोक्तेन ब्राह्मणः स्वेन कर्मणा ।
जीवेत्क्षत्रियधर्मेण स ह्यस्य प्रत्यनन्तरः ॥ ८१ ॥
उभाभ्यामप्यजीवंस्तु कथं स्यादिति चेद्भवेत् ।
कृषिगोरक्षमास्थाय जीवेद्वैश्यस्य जीविकाम् ॥ ८२ ॥
वैश्यवृत्त्यापि जीवंस्तु ब्राह्मणः क्षत्रियोऽपि वा ।
हिंसाप्रायां पराधीनां कृषिं यत्नेन वर्जयेत् ॥ ८३ ॥
कृषिं साध्विति मन्यन्ते सा वृत्तिः सद्भिगर्हिता ।
भूमिं भूमिशयांश्चैव हन्ति काष्ठमयोमुखम् ॥ ८४ ॥
इदं तु वृत्तिवैकल्यात्त्यजतो धर्मनैपुणम् ।
विट्पण्यमुद्धृतोद्धारं विक्रेयं वित्तवर्धनम् ॥ ८५ ॥
सर्वान् रसानपोहेत कृतान्नं च तिलैः सह ।
अश्मनो लवणं चैव पशवो ये च मानुषाः ॥ ८६ ॥
सर्वं च तान्तवं रक्तं शाणक्षौमाविकानि च ।
अपि चेत्स्युररक्तानि फलमूले तथौषधीः ॥ ८७ ॥
ब्राह्मण का वेदाभ्यास करना, क्षत्रिय का रक्षा करना और वैश्य
का व्यापार करना ये अपने अपने कर्मों में विशेष कर्म हैं। ब्राह्मण
यदि वेद पढ़ाकर अपनी जीविका न करसके तो क्षत्रिय के कर्म से
जीविका करे । यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय दोनों के कर्मों से जीविका न

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३६० मनुस्मृति ।
करसके तो खेती, गोरक्षा आदि वैश्यजीविका से निर्वाह करे।
ब्राह्मण और क्षत्रिय वैश्य जीविका से निर्वाह करता हुआ भी
खेती को कभी न करे। कोई खेती को अच्छी मानते हैं, पर यह
सत्पुरुषों में निन्दित है। क्योंकि इसमें हलसे जीव हिंसा, अवर्षा-
सूखा आदि का डर है, पराधीन कर्म है। ब्राह्मण और क्षत्रिय की
जीविका अपने कर्मों से न चले तो निन्दित कर्मों को छोड़कर, वे
वैश्य वृत्ति, व्यापार का आश्रय लेवें। ब्राह्मण सब भांति के रस,
सब अन्न, तिल, पत्थर, निमक, पशुओं को न बेंचे। सब प्रकार के
लाल वस्त्र, सन-अलसी-ऊन के विनारँगे वस्त्र, फल, कंद, औषधों
को न बेंचे ॥ ८०-८७ ॥
अपःशस्त्रं विषं मांसं सोमं गन्धांश्च सर्वशः ।
क्षीरं क्षौद्रं दधि घृतं तैलं मधु गुडं कुशान् ॥ ८८ ॥
आरण्यांश्च पशून् सर्वान् दंष्ट्रिणश्च वयांसि च ।
मद्यं नीलिं च लाक्षां च सर्वांश्चैकशफांस्तथा ॥८६॥
काममुत्पाद्य कृष्यां तु स्वयमेव कृषीवलः ।
विक्रीणीत तिलाञ्छुद्धान् धर्मार्थमचिरस्थितान् ॥६०॥
भोजनाभ्यञ्जनादानाद्यदन्यत्कुरुते तिलैः ।
कृमिभूतःश्वविष्ठायां पितृभिः सह मज्जति ॥ ६१ ॥
सद्यः पतति मांसेन लाक्षया लवणेन च ।
त्र्यहेण शूद्रो भवति ब्राह्मणः क्षीरविक्रयात् ॥ ६२ ॥
इतरेषां तु पण्यानां विक्रयादिह कामतः ।
ब्राह्मणः सप्तरात्रेण वैश्यभावं नियच्छति ॥ ६३ ॥
जल, हथियार, विष, मांस, सोमरस, सब तरहकी सुगन्धि, दूध,
शहद, दही, घी, तेल, मद्य, गुड़, कुश, जंगली पशु, दाढ़वाले पशु,
पक्षी, भांग, गांजा, नील, लाख और एक खुरके पशु, इन सबका