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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

चौथा अध्याय । १४७

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चौथा अध्याय । १४७
तस्मादविद्वान् बिभियाद्यस्मात्तस्मात्प्रतिग्रहात् ।
स्वल्पकेनाप्यविद्वान् हि पङ्के गौरिव सीदति ॥१९१॥
दान-निर्णय ।
ब्राह्मण अपनी तपस्या से दान लेने की शक्ति रखता हो तोभी
उसमें प्रीति न रक्खे । प्रतिग्रह-दान लेने से ब्रह्मतेज शीघ्र ही
नष्ट होजाता है । बिना धर्मानुसार विधि जाने, द्रव्यदान, दुःखी
होने पर भी न लेना चाहिए । जिस वस्तु का दान लेना हो, उसके
देवता, मंत्र, जप आदि न जानकर जो ब्राह्मण सोना, भूमि, घोड़ा,
गौ, अन्न, वस्त्र, तेल और घी आदि का दान लेता है वह काठ की
भांति जलकर खाक होजाता है । मूर्ख ब्राह्मण दान में सोना और
अन्न लेय तो आयु का नाश होता है । भूमि और गौ शरीर को सु-
खाती है । घोड़ा नेत्र, वस्त्र त्वचा, घृत तेज और तिल प्रजा को नष्ट
करता है । जो मूर्ख ब्राह्मण दान लेने की इच्छा रखता है, वह
पत्थर की नाव बैठनेवालों के साथ जैसे जल में डूब जाती है, वैसे
ही दाता के साथ नरक में डूब जाता है । इसलिये दानविधि न
जानकर, मूर्ख ब्राह्मणोंको हर एक से दान लेने में डरना चाहिये ।
जैसे कीचड़ में गौ फँसकर दुःखी होती है वैसेही थोड़ा भी दान
लेकर मूर्ख ब्राह्मण महादुःख को पाता है ॥ १८६-१९१॥
न वार्यपि प्रयच्छेत्तु वैडालव्रतिके द्विजे ।
न वकव्रतिके विप्रे नावेदविदि धर्मवित् ॥ १९२ ॥
त्रिष्वप्येतेषु दत्तं हि विधिनाप्यार्जितं धनम् ।
दातुर्भवत्यनर्थाय परत्रादातुरेव च ॥ १९३ ॥
यथा प्लवेनौपलेन निमज्जत्युदके तरन् ।
तथा निमज्जतोऽधस्तादज्ञौ दातृप्रतीच्छकौ ॥ १९४ ॥
जो ब्राह्मण बिलाव का सा मौन साधता है, बगला भगत है, वेद
नहीं जानता उसको जलपान को भी न पूछना । इन तीन भांति के
ब्राह्मणों को दिया धन चाहे वह धर्म से ही पैदा किया हो, पर पर-

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१४८ मनुस्मृति ।
लोक में दोनों का अशुभकारक होता है। जैसे पत्थर की नाव से
तैरता हुआ पुरुष जल में डूब जाता है, वैसेही मूर्खदाता और लेने
वाला नरक में डूबते हैं ॥ १६२-१६४ ॥
धर्मध्वजी सदा लुब्धश्छाद्मिको लोकदम्भकः ।
वैडालव्रतिको ज्ञेयो हिंस्रः सर्वाभिसन्धकः ॥ १६५॥
अधोदृष्टिर्नैकृतिकः स्वार्थसाधनतत्परः ।
शठो मिथ्या विनीतश्च वकव्रतचरो द्विजः ॥ १६६ ॥
ये वकव्रतिनो विप्रा ये च मार्जारलिङ्गिनः ।
ते पतन्त्यन्धतामिस्रे तेन पापेन कर्मणा ॥ १६७ ॥
जो संसार को छलने के लिये धर्माचरण करते हैं, लोगों को
धोखा देते हैं, दूसरे की बुराई में लगे रहते हैं, लोभी हैं और दूसरे
के गुणों को न सहकर लड़ा करते हैं, ऐसे पुरुषों को 'वैडाल
व्रतिक' कहते हैं। जो सदा नीची दृष्टिरखतेहैं, शान्तभाव से रहते
हैं, मन में मतलब गांठा करते हैं, जड़ हैं और झूठा विनय दिखाते
हैं, ऐसे पुरुषों को वकभक्त-बगलाभगत कहतेहैं, जो वैडालव्रतिक,
वकभक्त आदि हैं वे सब अपने पापवश 'अन्धतामिस्र' नरक में
पड़ते हैं ॥ १६५-१६७ ॥
न धर्मस्यापदेशेन पापं कृत्वा व्रतं चरेत् ।
व्रतेन पापं प्रच्छाद्य कुर्वन् स्त्रीशूद्रदम्भनम् ॥ १६८ ॥
कोई पाप करके, उसका प्रायश्चित्त करते हुए यह न कहै कि यह
प्रायश्चित्त नहीं, किन्तु धर्मार्थ करते हैं। ऐसा कहकर लोक को
छलना न चाहिए ॥ १६८ ॥
प्रेत्येह चेदृशा विप्रा गर्ह्यन्ते ब्रह्मवादिभिः ।
छद्मना चरितं यच्च व्रतं रक्षांसि गच्छति ॥ १६६ ॥
अलिङ्गी लिङ्गिवेषेण यो वृत्तिमुपजीवति ।