गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
कण्डिका २३ ॥ माध्यन्दिन सवन के देवता इन्द्र की महिमा ॥
४०८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० २३ ॥
कण्डिका २३ ॥ माध्यन्दिन सवन के देवता इन्द्र की महिमा ॥
( तद् आहुः, किंदेवत्यः यज्ञः इति ) फिर वे [ ऋषि ] कहते हैं—कौन देवता
वाला यज्ञ है। ( ऐन्द्रः, इति ब्रूयात्, ऐन्द्रे वाव यज्ञे सति यथाभागम् अन्याः देवताः
नुअवयन् ) इन्द्र देवता वाला है - ऐसा वह कहे, इन्द्र देवता वाले ही यज्ञ होने पर अपने
अपने भाग के अनुसार दूसरे देवता अवश्य आते हैं। (ताः प्रातःसवने मरुत्वतीये
तृतीयसवने च ) वे [ देवता ] प्रातःसवन, मरुत्वतीय [ माध्यन्दिन सवन ] और तृतीय
सवन में [ आते हैं ]। ( अथ ह इन्द्रस्य एव एतत् केवलं यत् मरुत्वतीयात् ऊर्ध्वम् )
फिर यह इन्द्र का ही केवल [ सेवनीय स्वरूप ] है, जो मरुत्वतीय [ यज्ञ ] से ऊपर है।
( तस्मात् सर्वे निष्केवल्य़ानि शंसन्ति ) इसलिये सब [ याजक ] निष्केवल्य [ केवल
इन्द्र के स्तोत्रों ] को बोलते हैं। (यत् एव निष्केवल्य़ानि, तत् स्वर्गस्य लोकस्य
रूपम्, यत् उ एव निष्केवल्य़ानि ) जो ही निष्केवल्य [ स्तोत्र ] हैं, वह स्वर्गलोक का
रूप है, क्योंकि यही निष्केवल्य [ केवल इन्द्र के स्तोत्र ] हैं। ( अग्रे ह वै एकं सवनं
प्रातःसवनम् एव आसीत् ) पहिले निश्चय करके एक सवन प्रातःसवन ही था। ( अथ ह
प्रजापतिः एतं [ = एतस्मै ] ज्येष्ठाय पुत्राय इन्द्राय एतत् सवनं निरमिमत, यत्
माध्यंदिनं सवनम् ) फिर प्रजापति परमेश्वर ने सबसे बड़े पुत्र इस इन्द्र [ परम ऐश्वर्य्यवान्
पुरुष ] के लिये यह सवन बनाया, जो माध्यन्दिन सवन है। ( तस्मात् माध्यन्दिने सवने
सर्वे निष्केवल्य़ानि शंसन्ति ) इसलिये माध्यन्दिन सवन में सब [ याजक ] निष्केवल्य
[ स्तोत्रों ] को बोलते हैं [ अर्थात् इन्द्र के ही स्तोत्र बोलते हैं ]। (यत् एव निष्केवल्य़ानि
तत् स्वर्गस्य लोकस्य रूपम्, यत् उ एव निष्केवल्य़ानि ) जो ही निष्केवल्य [ स्तोत्र ]
हैं, वह स्वर्ग लोक का रूप है, क्योंकि यही निष्केवल्य [ केवल इन्द्र के स्तोत्र ] हैं। ( याः ह
वै देवताः प्रातःसवने होता शंसति, ताः शस्त्वा होत्राशंसिनः अनुशसंन्ति ) जिन
ही देवताओं को प्रातःसवन में होता बुलाता है, उनको स्तुति करके होत्राशंसी [ वेदवाणी
से स्तुति करने वाले ऋत्विज् ] पीछे से बुलाते हैं। ( मैत्रावरुणं तृचं प्रउगे होता शंसति,
मैत्रावरुणं मैत्रावरुणः अनुशंसाति, तत् उभयं मैत्रावरुणम् ) मैत्रावरुण [ मित्र और
वरुण देवता वाले ] तृच [ तीन मंत्रों के समूह ] को प्रउग यज्ञ में होता बोलता है,
मैत्रावरुण स्तोत्र को मैत्रावरुण [ ऋत्विज् ] पीछे से बोलता है, वह दोनों
[ होता और मैत्रावरुण ऋत्विज् का स्तोत्र ] मित्र और वरुण देवता वाला
है। ( ऐन्द्रं तृचं प्रउगे होता शंसति, ऐन्द्रं ब्राह्मणाच्छंसी अनुशंसाति, तत् उभयम्
ऐन्द्रम् ) इन्द्र देवता वाले तृच को प्रउग यज्ञ में होता बोलता है, इन्द्र देवता वाले [तृच] को
२३—( निष्केवल्य़ानि ) वृषादिभ्यश्चित् ( उ० १ । १०६ ) निः+केवृ सेवने
—कलच्, ततो यत् । निरन्तरस्वरूपयुक्तानि । इन्द्रस्तोत्राणि (होत्राशंसिनः )
होत्रा वाङ्नाम-निघ० १ । ११ । वेदवाणीभाषिणः ( अनु ) पश्चात् ( अदेवीः )
विदुषां विरुद्धाः । आसुरीः (असहिएंष्ट) अभ्यभूत् (मायाः ) छलकापटक्रियाः
( अथ ) अनन्तरमेव ( केवलः ) सेवनीयः ( सोमः ) अमृतरसः । मोक्षानन्दः
( अजिघांसन् ) हन्तुमैच्छन् (वामदेवम् ) उत्तमविद्वांसम् (वसिष्ठम्) . अति-
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० २३ ४०६
ब्राह्मणाच्छंसी पीछे से बोलता है, वे दोनों [ दोनों के स्तोत्र ] इन्द्र देवता वाले हैं।
( ऐन्द्राग्नं तृचं प्रउगे होता शंसति, ऐन्द्राग्नम् अच्छावाकः अनुशंसाति, तत् उभयम्
ऐन्द्राग्नम् ) इन्द्र और अग्नि देवता वाले तृच को प्रउग यज्ञ में होता बोलता है और
इन्द्र और अग्नि देवता वाले [ तृच ] को अच्छावाक पीछे से बोलता है, वह दोनों [ दोनों
का स्तोत्र ] इन्द्र और अग्नि देवता वाला है। ( अथ ह एनत् केवलम् एव इन्द्रस्य यत्
मरुत्वतीयात् ऊर्ध्वम् ) फिर यह इन्द्र का ही केवल [ सेवनीय स्वरूप ] है, जो मरुत्व-
तीय [ यज्ञ ] से ऊपर है। ( तस्मात् सर्वे निष्केवल्यानि शंसन्ति ) इसलिये सब
[ याजक ] निष्केवल्य [ केवल इन्द्र के स्तोत्रों ] को बोलते हैं। ( यत् एव निष्केवल्यानि
तत् स्वर्गस्य लोकस्य रूपं, यत् उ एव निष्केवल्यानि ) जो ही निष्केवल्य [ स्तोत्र ]
हैं, वह स्वर्ग लोक का रूप है, क्योंकि यह ही निष्केवल्य [ केवल इन्द्र के स्तोत्र ] हैं।
( यदेददेवीरसहिष्ट माया अथाभवत् केवलः सोमो अस्य-इति ऋचा अभ्यनूक्तम् )
( यदा इत् ) जब ही ( अदेवीः ) विद्वानों के विरुद्ध [ आसुरी ] ( मायाः ) मायाओं
[ छल कपट क्रियाओं ] को ( असहिष्ट ) उसने जीत लिया, ( अथ ) तब ही ( सोमः )
सोम [ अमृत रस अर्थात् मोक्षसुख ] ( अस्य ) उस [ पुरुषार्थी ] का ( केवलः )
सेवनीय ( अभवत् ) हुआ है [ अथ० २० । ८७ । ५ पाद ३, ४ ]—इस ऋचा करके
अनुकूल कहा गया है। (यज्ञं तन्वानान् देवान् असुररक्षांसि अजिघांसन् ) यज्ञ को
फैलाते हुए देवताओं को असुर राक्षसों ने मारना चाहा। ( वामदेवम् अब्रुवन्, त्वं
दक्षिणतः नः इमं यज्ञं गोपाय इति, वसिष्ठम् मध्यतः, भरद्वाजम् उत्तरतः, अनु
विश्वामित्रं सर्वान् ) वे वामदेव [ उत्तम विद्वान् ] से बोले—तू दक्षिण से हमारे इस
यज्ञ की रक्षा कर, वसिष्ठ से [ अति श्रेष्ठ पुरुष से, वे बोले ]—बीच से [ रक्षा कर ],
भरद्वाज से [ अन्न वा ज्ञान धारण करने वाले पुरुष से बोले ]—उत्तर से [ रक्षा कर ]
और पीछे से विश्वामित्र से [ सबके मित्र पुरुष से बोले ]—सबों की [ सब यज्ञों की ]
[ रक्षा कर ]। ( तस्मात् मैत्रावरुणः वामदेवात् न प्रच्यवते, ब्राह्मणाच्छंसी वसिष्ठात्,
अच्छावाकः भरद्वाजात्, सर्वे विश्वामित्रात् ) इसलिये मित्र और वरुण देवता
वाला ऋत्विज् वामदेव [ श्रेष्ठ विद्वान् ] से नहीं बढ़ कर जाता है, ब्राह्मणाच्छंसी
[ वेद से स्तुति करने वाला ऋत्विज् ] वसिष्ठ [ अति श्रेष्ठ पुरुष ] से, अच्छावाक [ अच्छा
उच्चारण करने वाला ऋत्विज् ] भरद्वाज [ बहुत अन्न वा ज्ञान रखने वाले पुरुष ] से,
और सब [ ऋत्विज् ] विश्वामित्र से [ सबके मित्र पुरुष से नहीं बढ़ कर जाते हैं
अर्थात् सब समान ऋत्विज् हैं ] । ( अस्मै एव तत् एते ऋषयः अहरहः नमर्गाः
अप्रमत्ताः यज्ञं रक्षन्ति, यः एवं वेद यः एवं वेद ) उस पुरुष के लिये ही तब यह
ऋषि लोग दिन दिन न मरते हुये [ अमर ] और अप्रमत्त [ भूल चूक बिना ] होकर
श्रेष्ठं पुरुषम् ( भरद्वाजम् ) अन्नस्य ज्ञानस्य वा धर्त्तारम् ( विश्वामित्रम्·) सर्वस्य
मित्रम् ( न ) निषेधे ( प्रच्यवते ) च्युङ् गतौ । प्रकर्षेण गच्छति ( नमर्गाः )
गन् गम्यद्योः ( उ० १ । १२३ ) नञ् + मृङ् प्राणत्यागे—गन् । अमर्गाः । अमृताः
( अप्रमत्ताः ) प्रमादरहिताः ॥