गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
कण्डिका १ ॥ एकाह यज्ञ के माध्यन्दिन सवन में मैत्रावरुण
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १ ४११
कण्डिका १ ॥ एकाह यज्ञ के माध्यन्दिन सवन में मैत्रावरुण
के मन्त्र प्रयोग ॥
( ओम् । कया नश्चित्र आ भुवत्. कया त्वं न ऊत्या-इति मैत्रावरुणस्य
स्तोत्रियानुरूपौ ) कया नश्चित्र आ भुवत्......, और कया त्वं न ऊत्या..... यह
दो मन्त्र मैत्रावरुण [ ऋत्विज् ] के स्तोत्रिय और अनुरूप हैं। ( कस्तमिन्द्र
त्वावसुम्, इति बार्हंतः प्रगाथः ) कस्तमिन्द्र त्वावसुम्...... यह मन्त्र बृहती छन्द
वाला प्रगाथ [ अच्छे प्रकार गाने योग्य स्तोत्र ] है। ( तस्य उपरिष्टात् ब्राह्म-
णम् ) उसके ऊपर यह [ आगे वाला मन्त्र ] ब्राह्मण [ ब्रह्मज्ञान ] है। ( सद्यो
ह जातो वृषभः कनीनः, इति उक्थमुखम् ) सद्यो ह जातः वृषभः कनीनः... यह मन्त्र
उक्थ [ स्तोत्र ] का आरम्भ है। ( एवा त्वामिन्द्र वज्रिन्नत्र-इति पर्यायः ) एवा
त्वामिन्द्र वज्रिन्नत्र... यह मन्त्र [ उक्थ का ] पर्याय [ विराम ] है। ( उशन्नु पु णः
सुमना उपाके,-इति यजति ) उशन्नु पु णः सुमना उपाके... इस मन्त्र से वह यज्ञ करता
है [ याज्या आहुति देता है ] । ( एताम् एव देवतां तत् यथाभागं प्रीणाति, वषट्कृत्य
अनुवषट् करोति ) इस ही देवता को उससे अपने अपने भाग के अनुसार वह प्रसन्न करता
है, और वषट्कार करके अनुवषट्कार [ अन्तिम आहुति दान ] करता है। ( प्रति एव
अभिमुशन्ते, अनाराशंसाः न आप्याययन्ति न हि सीदन्ति ) वे [ ऋषि लोग ]
प्रत्यक्ष ही विचारते हैं—नरों की स्तुति के बिना [ यज्ञ यजमान को ] न बढ़ाते हैं और
नहीं चलते हैं [ नहीं आप बढ़ते हैं। देखो गो० उ० ३ । १५ ] ॥ १ ॥
भावार्थ:—समय के अनुकूल यथावत् स्तुति होनी चाहिये ॥ १ ॥
विशेष:—प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥
१—कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा । कया शचिष्ठया वृता—
अथर्व २० । १२४ । १, ऋक् ४ । ३१ । १, यजु० २७ । ३६ तथा साम० उ० १ ।
१ । १२ ॥ (चित्रः) विचित्र वा पूज्य और (सदावृधः) सदा बढ़ाने वाला [ राजा ]
( नः ) हमारी ( कया ) कमनीय वा सुख देने वाली [ वा कौन सी ] ( ऊती ) रक्षा से
और ( कया ) कमनीय वा सुख देने वाली [ वा कौन सी ] ( शचिष्ठया ) अति उत्तम कर्म
वा बुद्धि वाले ( वृता ) बर्ताव से ( सखा ) [ हमारा ] सखा ( आ ) ठीक ठीक
( भुवत् ) होवे ॥
१—( कया ) अन्येष्वपि दृश्यते ( पा० ३ । २ । १०१) कमेः—डः, टाप् । कः
कमनो वा क्रमणो वा सुखो वा—निरु० १० । २० कमनीयया। सुखप्रदया ।
अथवा प्रश्नवाचकोऽस्ति ( नः ) अस्माकम् ( चित्रः ) अद्भुत:। पूज्यः ( आ )
समन्तात् ( भुवत् ) भवेत् ( नः ) अस्मान् ( ऊत्या ) रक्षया ( त्वावसुम् ) त्वया
प्राप्तधनम् ( कनीनः ) कनी दीप्तिकान्तिगतिषु—ईनप्रत्ययः । दीप्तिमान् ( उशन् )
वश कान्तौ—शतृ । हे कामयमान ( सुमनाः ) प्रसन्नचित्तः ( उपाके ) समीपे ॥
४१२ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १
२—कया त्वं न ऊत्याऽभि प्र मन्दसे वृषन् । कया स्तोतृभ्य आ भर—
ऋग्० ८ । ९३ [ सायण भाष्य ८२ ] । १६, साम० उ० ७ । ३ । ७ ॥ ( वृषन् )
हे बलवान् ! [ परमेश्वर ] (त्वम्) तू ( कया ) कमनीय वा सुखदायक ( ऊत्या ) रक्षा से
( नः ) हमें ( अभि ) सब ओर से ( प्र मन्दसे ) आनन्द देता है, ( स्तोतृभ्यः ) स्तुति
करने वालों को ( कया ) कमनीय वा सुखदायक [ रक्षा ] से ( आ भर ) भरपूर कर ॥
३—कस्तमिन्द्र त्वावसुमा मर्त्यो दधर्षति । श्रद्धा इत्ते मघवन् पार्ये दिवि
वाजी वाजं सिषासति—ऋग्० ७ । ३२ । १४ ॥ ( इन्द्र ) हे इन्द्र ! [ बड़े ऐश्वर्य
वाले राजन् ] ( कः मर्त्यः ) कौन मनुष्य ( तम् ) उस ( त्वावसुम् ) तुझसे पाये हुए
धन वाले को ( आ दधर्षति ) तिरस्कार करता है। ( मघवन् ) हे महाधनी ! ( ते )
तेरे लिये ( श्रद्धा इत् ) श्रद्धा से ही ( पार्ये दिवि ) पालने योग्य व्यवहार में ( वाजी )
विज्ञानी पुरुष ( वाजम् ) विज्ञान को ( सिषासति ) बांटना चाहता है ॥
४—सद्यो ह जातो वृषभः कनीनः प्र भर्त्तुमावदन्धसः सुतस्य । साधोः पिब
प्रतिकामं यथा ते रसाशिरः प्रथमं सोम्यस्य—ऋग्० ३ । ४८ । १ ॥ ( सद्यः ह )
शीघ्र ही ( जातः ) प्रकट हुये, ( कनीनः ) प्रकाशमान, ( वृषभः ) सुखों की वर्षा
करने वाले [ आप, हे इन्द्र राजन् ! ] ( प्रभर्त्तुम् ) अच्छे प्रकार पालन करने के लिये
( सुतस्य अन्धसः ) सिद्ध किये हुये अन्न की ( आवत् ) रक्षा करें । ( रसाशिरः )
रसों का खाने वाला तू ( प्रतिकामम् ) प्रत्येक कामना में, ( यथा ते ) जैसे तेरे लिये हो,
( साधोः ) सिद्धि करने वाले ( सोम्यस्य ) सोम [ ऐश्वर्य ] में उत्पन्न रस का
( प्रथमम् ) पहिले ( पिब ) पान कर ॥
५—एवा त्वामिन्द्र वज्रिन्नत्र विश्वे देवासः सुहवास ऊमाः । महामुभे रोदसी
वृद्धमृष्वं निरेकमिद् वृणते वृत्रहत्ये—ऋग्० ४ । १६ । १ ॥ ( वज्रिन् ) हे प्रशंसित
शस्त्र अस्त्र वाले ( इन्द्र ) इन्द्र ! [ बड़े ऐश्वर्य वाले राजन् ] ( अत्र एव ) यहां पर
ही ( सुहवासः ) अच्छे प्रकार पुकारने वाले ( ऊमाः ) रक्षा करने वाले ( विश्वे )
सब ( देवासः ) विद्वान् लोग, ( उभे रोदसी ) दोनों सूर्य और भूमि [ के समान वर्त-
मान ] ( महाम् ) महान् ( वृद्धम् ) वृद्ध [ विद्यावृद्ध ], ( ऋष्वम् ) श्रेष्ठ ( एकम्
इत् ) अकेले ही ( त्वाम् ) तुझको ( वृत्रहत्ये ) शत्रुओं के नाश वाले संग्राम में ( निः
वृणते ) निरन्तर चुन लेते हैं ॥
६—उशन्नु षु णः सुमना उपाके सोमस्य नु सुषुतस्य स्वधावः । पा इन्द्र प्रति-
भृतस्य मध्वः समन्धसा ममदः पृष्ठचेन—ऋग्० ४ । २० । ४ ॥ ( नः उ.सु उशन् )
हे हमको निश्चय करके अच्छे प्रकार चाहने वाले ! ( स्वधावः ) हे उत्तम अन्न वाले !
( इन्द्र ) हे इन्द्र ! [ बड़े ऐश्वर्य वाले राजन् ] ( सुमनाः ) प्रसन्न चित्त वाला तू
( उपाके ) समीप में ( सुषुतस्य ) अच्छे प्रकार निचोड़े गये ( सोमस्य ) सोम [ ऐश्वर्य
युक्त पदार्थ ] की ( नु ) शीघ्र ( पाः ) रक्षा कर, और ( प्रतिभृतस्य ) प्रत्यक्ष पुष्ट किये
हुये ( मध्वः ) मधु [ उत्तम ज्ञान ] के ( पृष्ठचेन ) पीछे होने वाले सुख से ( अन्धसा )
अन्न के साथ ( सं ममदः ) अच्छे प्रकार आनन्द कर ॥