गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
कण्डिका ६ ॥
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ४ । क० ६ ॥ १८३
[ ऋत्विज् ] दीक्षा देता है । ( वायुः वै अध्वर्य्युः अधिदैवं, प्राणः अध्यात्मम्,
अन्नं वृष्टिः ) वायु [ के समान ] ही अध्वर्य्यु मुख्य देवता है, प्राण आत्मा के अधिकार
वाला है और अन्न वृष्टि है । (तत् वायुं च एव प्राण च अन्नेन सन्दधाति ) इसलिये
वायु को और प्राण को अन्न के साथ वह [ अध्वर्य्यु ] ठीक ठीक धरता है । (तस्मात्
एतौ अन्तरेण अन्यः न दीक्षेत ) इसलिये इन दोनों [ होता और अध्वर्य्यु ] के बीच में
कोई [ अयोग्य ] न दीक्षा लेवे । ( यत् एतौ अन्तरेण अन्यः दीक्षेत सः इमं तं लोकं
प्राणेन व्यापादयेत् ) यदि इन दोनों के बीच में कोई दीक्षा लेवे वह इस उस लोक को
प्राण से नष्ट कर देवे । (प्रमायुकाः ह स्युः ) वे [ लोक ] मृतक हो जावें, (तस्मात्
एतौ अन्तरेण अन्यः न दीक्षेत ) इसलिये इन दोनों के बीच में कोई न दीक्षा
लेवे ॥ ५ ॥
भावार्थः—कण्डिका ३ के समान ॥
कण्डिका ६ ॥
अथ ब्रह्मणे ब्राह्मणाच्छंसिनं दीक्षयति । अथोद्गात्रे प्रस्तोतारं दीक्षयति ।
अथ होत्रे मैत्रावरुणं दीक्षयति । अथाध्वर्य्यवे प्रतिप्रस्थातारं नेष्टा दीक्षयति ।
स हैनमन्वितरेषां वै नवानां क्लृप्तिरन्वितरे कल्पन्ते, नव वै प्राणाः, प्राणैर्यज्ञस्तायते ।
अथ ब्रह्मणे पोतारं दीक्षयति । अथोद्गात्रे प्रतिहर्त्तारं दीक्षयति । अथ होत्रेऽ
च्छावाकं दीक्षयति । अथाध्वर्य्यवे नेष्टारमुन्नेता दीक्षयति । स हैनन्वथ ब्रह्मण
आग्नीध्रं दीक्षयति । अथोद्गात्रे सुब्रह्मण्यं दीक्षयति । अथ होत्रे ग्रावस्तुतं दीक्ष-
यति । अथ तमन्तःस्नातको वा ब्रह्मचारी वा दीक्षयति, न पूतः पावयेदित्याहुः ।
सैषानुपूर्वं दीक्षा तद्य एवं दीक्षन्ते दीक्षिष्यमाणा एव ते सत्रियां प्रायश्चित्तं
न विन्दन्ते, सत्रियां प्रायश्चित्तमनु तस्यार्द्धस्य योगक्षेमः कल्पते, यस्मिन्नर्द्धे
दीक्षन्त इति ब्राह्मणम् ॥ ६ ॥
कण्डिका ६ ॥ सहायक ऋत्विजों की दीक्षा ॥
( अथ ब्रह्मणे ब्राह्मणाच्छंसिनं दीक्षयति ) फिर ब्रह्मा [ चारों वेद जानने वाले ]
के लिये ब्राह्मणाच्छंसी [ वेद ज्ञान से स्तुति करने वाले ] को वह [ ब्रह्मा आदि ] दीक्षा
देता है । ( अथ उद्गात्रे प्रस्तोतारं दीक्षयति ) फिर उद्गाता [ वेद गाने वाले ] के
लिये प्रस्तोता [ प्रकृष्ट स्तुति करने वाले ] को दीक्षा देता है । ( अथ होत्रे मैत्रावरुणं
दीक्षयति ) फिर होता [ हवन करने वाले ] के लिये मैत्रावरुण [ प्राण और अपान विद्या
जानने वाले ] को दीक्षा देता है । ( अथ अध्वर्य्यवे प्रतिप्रस्थातारं नेष्टा दीक्षयति )
५—( प्रमायुकाः ) लषपतपदस्थाभू० ( पा० ३ । २ । १५४ ) प्र + मीञ्-
हिंस्-याम्—उकञ् । प्रमीताः । सर्वथा मृताः ॥
६ - ( ब्राह्मणाच्छंसिनम् ) ब्रह्मज्ञानात् स्तोतारम् ( मैत्रावरुणम् ) प्राणा-
पानवेत्तारम् ( नेष्टा ) नायको याजकः ( क्लृप्तिः ) कृपू सामर्थ्ये—क्तिन् । ( कल्पन्ते )
१८४ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ४ । क० ६ ॥
फिर अध्वर्यु [हिंसा रहित यज्ञ करने वाले] के लिये प्रतिप्रस्थाता [सामने खड़े रहने
वाले] को नेष्टा [नायक याजक] दीक्षा देता है। (सः ह एनम् अनु+दीक्षते) वह
भी इसके पीछे [दीक्षा लेता है]। (इतरेषां वै नवानां कॢप्तिः अन्यतरे कल्पन्ते)
दूसरे नौ [ऋत्विजों] की व्यवस्था दूसरे कोई [इस प्रकार] करते हैं। (नव वै प्राणाः,
प्राणैः यज्ञः तायते) नौ [दो कान, दो नथने, दो आँखें एक मुख, एक पायु और एक
उपस्थ इन्द्रिय] ही प्राण हैं, प्राणों के साथ यज्ञ फैलता है। (अथ ब्रह्मणे पोतारं
दीक्षयति) फिर ब्रह्मा के लिये पोता [शोधने वाले] को दीक्षा देता है १। (अथ
उद्गात्रे प्रतिहर्त्तारं दीक्षयति) फिर उद्गाता के लिये प्रतिहर्त्ता [द्रव्य लाने वाले]
को दीक्षा देता है। २। (अथ होत्रे अच्छावाकं दीक्षयति) फिर होता के लिये अच्छा-
वाक् [शुद्ध बोलने वाले] को दीक्षा देता है। ३। (अथ अध्वर्य्यवे नेष्टारम् उन्नेता
दीक्षयति) फिर अध्वर्यु के लिये नेष्टा को उन्नेता [ऊपर उठाने वाला] दीक्षा देता
है। ४। (सः ह एनम् अनु+दीक्षते) वह [उन्नेता] भी इस [नेष्टा] के पीछे
[दीक्षा पाता है]। ५। (अथ ब्रह्मणे आग्नीध्रं दीक्षयति) फिर ब्रह्मा के लिये
आग्नीध्र [अग्नि प्रदीप्त करने वाले] को दीक्षा देता है। ६। (अथ उद्गात्रे सुब्रह्मण्यं
दीक्षयति) फिर उद्गाता के लिये सुब्रह्मण्य [अच्छे वेद में निपुण] को दीक्षा देता
है। ७। (अथ होत्रे ग्रावस्तुतं दीक्षयति) फिर होता के लिये ग्रावस्तुत् [सूक्ष्म
विचारों की स्तुति करने वाले] को दीक्षा देता है। ८। (अथ तम्+अनु,
अन्यः स्नातकः वा ब्रह्मचारी वा दीक्षयति) फिर उसके [पीछे] स्नातक [वेद विद्या
समाप्त कर चुकने वाला] अथवा ब्रह्मचारी [वेद विद्या पढ़ने वाला] दीक्षा पाता है।
६। (इतः न पावयेत् इति आहुः) अशुद्ध न शुद्ध करे [न संस्कार करावे]-ऐसा
कहते हैं। (सा एषा अनुपूर्वा दीक्षा) यही क्रमानुसार दीक्षा है। (तत् ये दीक्षिष्य-
माणाः एवं दीक्षन्ते, ते एवं सत्रिणां प्रायश्चित्तं न विन्दन्ते) जो दीक्षा चाहने वाले
पुरुष इस प्रकार दीक्षा पाते हैं, वे ही याजकों के प्रायश्चित्त को नहीं पाते [अर्थात् ठीक
ठीक यज्ञ करते हैं]। (सत्रिणां प्रायश्चित्तम् अनु तस्य अर्द्धस्य योगक्षेमः कल्पते
यस्मिन् अर्द्धे दीक्षन्ते इति ब्राह्मणम्) याजकों के प्रायश्चित्त के साथ उस ऋद्धि
[सम्पत्ति] का योगक्षेम [पाने योग्य का पाना और पाये हुये का बचाना] सिद्ध होता
है, जिस सम्पत्ति में वे दीक्षा पाते हैं-यह ब्राह्मण [ब्रह्मज्ञान] है॥ ६॥
भावार्थः-विद्वानों के हाथ से काम होने पर प्रायश्चित्त की आवश्यकता नहीं होती,
और जो कुछ त्रुटि हो जाय, तो प्रायश्चित्त करके कार्य सिद्ध कर लेना चाहिये ॥ ६ ॥
व्यवस्थां कुर्वन्ति (नव प्राणाः) सप्तशीर्षण्यानीन्द्रियाणि द्वे पायूपस्थे (पोतारम्)
शोधयितारम् (प्रतिहर्त्तारम्) द्रव्याणामानेतारम् (आग्नीध्रम्) अग्निदीपयि-
तारम् (सुब्रह्मण्यम्) सुब्रह्मन्-यत् साध्वर्थे। सुब्रह्मणि वेदज्ञाने साधुः (वा)
विरूरपे (पूतः) पूयी दुर्गन्धे विशरणे च-क्तः। अशुद्धः (पावयेत्) शोधयेत्।
संस्कारयेत् (अर्द्धस्य) गो० पू० १। १३। ऋद्धेः। संपत्तेः (योगक्षेमः) गो०
पू० १। १३। प्राप्यस्य प्रापणं प्राप्तस्य रक्षणं च (अर्द्धे) सम्पत्तौ ॥