गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
कण्डिका ३ ॥
गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३ ॥ ५
जनयन्तीर्गर्भमग्रे समैरयन् । तस्योत जायमानस्योल्व आसीद्धिरण्मयः कस्मै देवाय हविषा
विधेम ॥) पहिले ही पहिले बालक रूप संसार को उत्पन्न करती हुई जल धाराओं ने गर्भ,
बालक रूप संसार को यथावत् प्रकट किया और उस उत्पन्न होते हुए जो [बालक, संसार]
का जरायु [ गर्भ की झिल्ली ] तेजोमय परमात्मा था, उस सुखदायक प्रजापति को दिव्य
गुण के लिये भक्ति के साथ हम सेवा करें-अथर्व० ४ । २ । ८ ॥
कण्डिका ३ ॥
ता अपः सृष्ट्वाऽन्वक्षत, तासू स्वां छायामपश्यत् तामस्येक्षमाणस्य स्वयं
रेतोऽस्कन्दत्तदप्सु प्रत्यतिष्ठत् तास्तत्रैवाभ्यश्राम्यदभ्यतपत्, समतपत्, ताः श्रान्ता-
स्तप्ताः सन्तप्ताः सार्द्धमेव रेतसा द्वैधमभवंस्तासामन्या अन्यतरा अतिलवणा
अपेया अस्वाद्व्यस्ता अशान्ता रेतः समुद्रं वृत्वाऽतिष्ठन्नथेतराः पेयाः स्वाद्व्यः
शान्तास्तास्तत्रैवाभ्यश्राम्यदभ्यतपत्, समतपत्, ताभ्यः श्रान्ताभ्यस्तप्ताभ्यः
सन्तप्ताभ्यो यद्रेत आसीत्तदभृज्यत, यदभृज्यत तस्माद् भृगुः समभवत्, तद् भृगो-
र्भृगुत्वं भृगुरिव वै स सर्वेषु लोकेषु भांति य एवं वेद ॥ ३ ॥
कण्डिका ३ । ब्रह्म के बीज का जल में गिरना, समुद्र
और भृगु की उत्पत्ति ॥
( ताः अपः सृष्ट्वा अनु ऐक्षत ) उन जलों को उत्पन्न करके उसने फिर देखा,
( तासु स्वां छायाम् अपश्यत् ) उनमें अपनी छाया [ कान्ति, तेज ] को देखा ।
( ताम् ईक्षमाणस्य अस्य ) उस [ छाया ] को देखते हुये इस [ ब्रह्म ] का ( रेतः
स्वयम् अस्कन्दत् ) बीज अपने आप टपका ( तत् अप्सु प्रति अतिष्ठत्) और वह
जलों में ठहर गया । ( ताः तत्र एव अभि अश्राम्यत् ) उनको वहां ही उसने सब
ओर से श्रम दिया [ दबाया ], ( अभि अतपत् ) सब ओर से तपाया, ( सम्
अतपत् ) भली भांति तपाया । ( ताः श्रान्ताः तप्ताः सन्तप्ताः ) वे दबाये हुये,
तपाये हुये, भली भांति तपाये हुये [ जल] ( रेतसा सार्द्धम् एव ) बीज के साथ
ही ( द्वैधम् अभवन् ) दो प्रकार से हो गये । ( तासाम् अन्याः अन्यतराः )
उनमें से कोई, दोनों में से कोई एक [ जलधारायें ] ( अतिलवणाः ) अति
खारी ( अपेयाः ) न पीने योग्य और ( अस्वाद्व्यः ) अरोचक थीं, ( ताः
अशान्ताः रेतः ) वे अशान्त बीज [ होती हुयी ] ( समुद्र वृत्वा ) समुद्र
[ परमात्मा] को स्वीकार करके ( अतिष्ठन् ) ठहरीं [ देखो कण्डिका ७] । ( अथ
( आपः ) आप्नोतेर्ह्रस्वश्च ( उ० २ । ५८ ) आप्लृ व्याप्तौ-क्विप्, जसि दीर्घः ।
व्यापनशक्तयः । जलानि ॥
३-( अपः ) जलानि ( छायाम् ) माछाशसिभ्यो यः ( उ० । ४ । १०६ )
छो छेदने-यप्रत्ययः । प्रकाशावरणम् । कान्तिम् । प्रतिविम्बम् ( अस्य ) ब्रह्मणः
( ईक्षमाणस्य ) पश्यतः ( रेतः ) बीजम् ( अस्कन्दत् ) अक्षरत ( द्वैधम् )
द्वित्र्योश्च धमुञ् ( पां० ५ । ३ । ४५ ) द्वि-धमुञ् । द्विविधम् ( अस्वाद्व्यः )
अरुचिकराः ( समुद्रम् ) सम् + उत् + दु-डप्रत्ययः । समुद्र आदित्यः, समुद्र आत्मा-
६ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३ ॥
इतराः) और दूसरी [ जलधारायें ] ( पेयाः ) पीने योग्य, (स्वाद्व्यः) रोचक और
(शान्ताः) शान्त थीं, (ताः तत्र एव अभि अश्राम्यत्) उनको वहाँ ही उसने
सब ओर से दबाया, (अभि अतपत्) सब ओर से तपाया, (सम् अतपत्) भली
भाँति तपाया। (ताभ्यः शान्ताभ्यः तप्ताभ्यः सन्तप्ताभ्यः) उन दबाई हुई,
तपाई हुई, भली भाँति तपाई हुई [ जल धाराओं ] से ( यत् रेतः आसीत् ) जो
बीज हुआ, (तत् अभृज्यत) वह पक गया [ अथवा चमक उठा ] । ( यत् अभृज्यत )
जो वह पक गया [वा चमक उठा], (तस्मात्) उससे (भृगुः) वह भृगु [भर्ग वाला
अर्थात् चमकीला तत्त्व विशेष ] ( सम् अभवत् ) उत्पन्न हुआ, (तत्) वह (भृगोः)
भृगु का (भृगुत्वम्) भृगुपन [पक्वपन वा चमकीलापन] हैं। (भृगुः इव वै) भृगु के
समान ही (सः सर्वेषु लोकेषु भाति) वह सब लोकों [जीवों] में चमकता है, (यः
एवं वेद) जो ऐसा विद्वान् है ॥ ३ ॥
भावार्थः-ब्रह्म ने जल रूप तत्त्व के दो रूप किये एक अतिसूक्ष्म परमाणु रूप जिसको
हम ग्रहण नहीं कर सकते, और दूसरा स्थूल रूप प्रकाश आदि ॥
विशेषः-१ अभृज्यत तथा भृगुः दोनों पद भ्रस्ज पाके दीप्तौ च इस एक ही धातु
से बने हैं यह दोनों में समता है ॥
विशेषः-२ मनु महाराज म० १ श्लोक ८, ६, १२, १३ में ऐसा
कहते हैं-सोऽभिध्याय शरीरात् स्वात् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः । अप एव ससर्जादौ तासु
बीजमवासृजत् ॥ ८ ॥ तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम् । तस्मिन् जज्ञे स्वयं ब्रह्मा
सर्वलोकपितामहः ॥ ६ ॥ तस्मिन्नण्डे स भगवानुषित्वा परिवत्सरम् । स्वयमेवात्मनो
ध्यानादण्डमकरोद् द्विधा ॥ १२ ॥ ताभ्यां स शकलाभ्यां च दिवं भूमिं च निर्ममे । मध्ये
व्योम दिशश्चाष्टावपां स्थानं च शाश्वतम् ॥ १३ ॥ उस [ परमात्मा ] ने अपने शरीर
से अनेक प्रजावें उत्पन्न करने की इच्छा करते हुए सब ओर से ध्यान करके अप् [ जल
तत्त्व ] को पहिले उत्पन्न किया और उसमें बीज छोड़ दिया ॥ ८ ॥ वह [ बीज ] सूर्य के
समान प्रकाशवाला चमकीला अण्डा हो गया, उस अण्डे में सब लोगों का पितामह ब्रह्मा
[ परमात्मा ] अपने आप प्रकट हुआ ॥ ६ ॥ उस अण्डे में उस भगवान् [ ऐश्वर्य्यवान्
परमात्मा ] ने वर्ष भर रह कर अपने आप ही अपने ध्यान से उस अण्डे को दो टुकड़े कर
दिया ॥ १२ ॥ उस [ परमात्मा ] ने उन दो टुकड़ों से सूर्य और पृथिवी, बीच में आकाश,
आठ दिशाओं और जलों के निश्चय स्थायी स्थान को बनाया ॥ १३ ॥
निरु० १४ । १६ । परमात्मानम् । जलौघम् (वृत्वा) स्वीकृत्य (अभृज्यत)
भ्रस्ज पाके लङ् । पक्वमभवत् । अदीप्यत (भृगुः) प्रथिम्रदिभ्रस्जो सम्प्रसारणं
सलोपश्च (उ० १ । २७) भ्रस्ज पाके च-कुः, सम्प्रसारणं सलोपो न्यङ्क्वादित्वात्
कुत्वं च । भृगवः, मध्यस्थानीदेवताः-निरु० ११ । १९ । भर्गयुक्तः । परिपक्वः ।
तेजस्वी । परमात्मरूपम् (वेद) विद ज्ञाने-लट् । वेत्ति । जानाति ॥