देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
About this granth
The Shrimad Devi Bhagavata Mahapurana (श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण) is the central Purana of the Shakta tradition and is traditionally ascribed to Veda Vyasa. In eighteen thousand verses and twelve books it presents the primordial goddess as the supreme Brahman and the source of creation, preservation and dissolution; Shakta tradition counts it among the Mahapuranas.
This is the first volume of the Gita Press, Gorakhpur edition (book code 1897), giving books 1 to 6 in Sanskrit with a simple Hindi exposition and illustrations. It opens with the Mahatmya, the half-verse summary of the Purana, and instructions for ritual recitation. These books include the slaying of Madhu and Kaitabha, the birth of Shuka, the vision of the goddess in Manidvipa granted to Brahma, Vishnu and Shiva, the Navaratri vow, and the defeat of Mahishasura and of Shumbha and Nishumbha.
The imprint records this as the first edition of Samvat 2067 (2010), printed in 10,000 copies. Prepared with devotees and Navaratri recitation in mind, the volume has 889 pages.
८४८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५
८४८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रात्रौ संक्रीडितं प्रेम्णा तया सह मया भृशम्।<br>वरो दत्तः पुनस्तस्यै प्रसन्नेन तु नारद॥ २०<br><br>सुभगे भविता पुत्रः सर्वलक्षणसंयुतः।<br>सुरूपः सर्वधर्मज्ञः सत्यवादी शमे रतः॥ २१ | हे नारद! रात्रिमें मैंने उसके साथ प्रेमपूर्वक विहार किया और पुनः प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया—हे सुभगे! तुम्हें सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, रूपवान्, सभी धर्मोंका ज्ञाता, सत्यवादी तथा शान्त स्वभाववाला पुत्र उत्पन्न होगा॥ २०-२१॥ |
| स तदा विदुरो जातस्त्रयः पुत्रा मयाभवन्।<br>माया वृद्धिं गता साधो परक्षेत्रोद्भवे मम॥ २२ | समय आनेपर उसे विदुर नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। इस प्रकार मुझसे तीन पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई। हे साधो! परक्षेत्रमें मेरेद्वारा उत्पन्न किये गये इन पुत्रोंके प्रति मेरी ममता बढ़ने लगी॥ २२॥ |
| विस्मृतः शुकसम्बन्धी विरहः शोककारणम्।<br>दृष्ट्वा त्रीन्स्वसुतान्कामं बलिनो वीर्यसम्मतान्॥ २३ | उन तीनों पुत्रोंको अत्यन्त बलवान् तथा वीर्यवान् देखकर मैं अपने शोकके एकमात्र कारण शुकसम्बन्धी वियोगको भूल गया॥ २३॥ |
| माया बलवती ब्रह्मन् दुस्त्यजा ह्यकृतात्मभिः।<br>अरूपा च निरालम्बा ज्ञानिनामपि मोहिनी॥ २४ | हे ब्रह्मन्! माया बलवती होती है, आत्मज्ञानसे रहित पुरुषोंके लिये यह अत्यन्त दुस्त्यज है। रूपहीन तथा आलम्बरहित यह माया ज्ञानियोंको भी मोहित कर देती है॥ २४॥ |
| मातरि स्नेहसम्बद्धं तथा पुत्रेषु संवृतम्।<br>न मे चित्तं वने शान्तिमगान्मुनिवरोत्तम॥ २५ | हे मुनिवर! मातामें तथा उन पुत्रोंमें स्नेहासक्तिसे आबद्ध मेरे मनको वनमें भी शान्ति नहीं मिल पाती थी॥ २५॥ |
| दोलारूढं मनो जातं कदाचिद्धस्तिनापुरे।<br>पुनः सरस्वतीतीरे न चैकत्र व्यवस्थितिः॥ २६ | मेरा मन दोलायमान हो गया। वह कभी हस्तिनापुरमें रहता था तो कभी सरस्वतीनदीके तटपर चला आता था; इस प्रकार मेरा मन किसी जगह स्थिर नहीं रहता था॥ २६॥ |
| कदाचिच्चिन्तयन् ज्ञानं मानसे प्रतिभाति वै।<br>केऽमी पुत्राः क्व मोहोऽयं न श्राद्धार्हा मृतस्य मे॥ २७ | कभी-कभी मनमें ज्ञानका उदय हो जानेपर मैं सोचने लगता था कि ये पुत्र कौन हैं, यह मोह कैसा? मेरे मर जानेपर ये मेरा श्राद्ध भी तो नहीं कर सकेंगे॥ २७॥ |
| व्यभिचारोद्भवाः किं मे सुखदाः स्युः सुताः किल।<br>माया बलवती मोहं वितनोति हि मानसे॥ २८ | दुराचारसे उत्पन्न ये पुत्र मुझे कौन-सा सुख देंगे। माया बड़ी प्रबल होती है; यह मनमें मोह पैदा कर देती है॥ २८॥ |
| जानन्मोहान्धकूपेऽस्मिन्पतितोऽहं मृषा मुने।<br>इत्यकुर्वं रहस्तापं कदाचित्सुसमाहितः॥ २९ | हे मुने! कभी-कभी शान्तचित्त होकर एकान्तमें मैं यह सन्ताप करने लगता था कि मैं जान-बूझकर इस मोहरूपी अन्धकूपमें व्यर्थ ही गिर गया हूँ॥ २९॥ |
| राज्यं प्राप ततः पाण्डुर्बलवान्भीष्मसम्मतः।<br>तदा मम मनो जातं प्रसन्नं सुतकारणात्॥ ३० | भीष्मकी सम्मतिसे जब बलवान् पाण्डुको राज्य प्राप्त हुआ, उस समय मेरा मन इस बातसे बहुत प्रसन्न हुआ कि मेरा पुत्र राजसिंहासनपर बैठा है॥ ३०॥ |
अ० २५] षष्ठ स्कन्ध ८४९
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| कुन्ती माद्री सुरूपे द्वे भार्ये तस्य बभूवतुः।<br>शूरसेनसुता कुन्ती मद्रराजसुतापरा ॥ ३१ | तत्पश्चात् सुन्दर रूपवाली कुन्ती तथा माद्री उनकी दो भार्याएँ हुईं। उनमें कुन्ती महाराज शूरसेनकी पुत्री थी तथा दूसरी रानी माद्री मद्रदेशके राजाकी कन्या थी ॥ ३१ ॥ |
| स शापं द्विजतः प्राप्य कामिनीद्वयसंयुतः।<br>पाण्डुर्निर्वेदमापन्नस्त्यक्त्वा राज्यं वनं गतः ॥ ३२ | ब्राह्मणसे शाप प्राप्त करके राजा पाण्डु अत्यन्त दुःखित हुए और वे राज्यका परित्याग करके अपनी दोनों रानियोंके साथ वन चले गये ॥ ३२ ॥ |
| तदा मामाविशच्छोकः श्रुत्वा पुत्रं वने स्थितम्।<br>गतोऽहं तत्र यत्रासौ भार्याभ्यां सह संस्थितः ॥ ३३ | अपने पुत्रको वनमें स्थित सुनकर मुझे महान् शोक हुआ। मैं वहाँ पहुँच गया, जहाँ वे अपनी दोनों पत्नियोंके साथ रह रहे थे ॥ ३३ ॥ |
| तमाश्वास्य वने पाण्डुं पुनः प्राप्तो गजाह्वये।<br>धृतराष्ट्रं समाभाष्य ह्यगमं ब्रह्मजातटे ॥ ३४ | वनमें उन पाण्डुको सान्त्वना देकर मैं पुनः हस्तिनापुर आ गया और वहाँ धृतराष्ट्रके साथ बातचीत करके सरस्वतीनदीके तटपर पुनः चला गया ॥ ३४ ॥ |
| क्षेत्रजान्यञ्चपुत्रान्स समुत्पाद्य वनाश्रमे।<br>धर्मतो वायुतः शक्रादश्विभ्यां पञ्च पाण्डवान् ॥ ३५<br><br>युधिष्ठिरो भीमसेनस्तथैवार्जुन इत्यपि।<br>कुन्तीपुत्राः समाख्याता धर्मानिलसुरेशजाः ॥ ३६<br><br>नकुलः सहदेवश्च मद्रराजसुतासुतौ। | वनमें अपने आश्रममें उन्होंने धर्म, वायु, इन्द्र तथा दोनों अश्विनीकुमारोंसे पाँच क्षेत्रज पुत्रोंको पाँच पाण्डवोंके रूपमें उत्पन्न कराया। धर्म, वायु तथा इन्द्रसे उत्पन्न हुए युधिष्ठिर, भीमसेन तथा अर्जुन—ये कुन्तीपुत्र कहे गये हैं। इसी तरह नकुल तथा सहदेव—ये दोनों माद्रीके पुत्र हुए ॥ ३५-३६ १/२ ॥ |
| कदाचित्तु रहो माद्रीं समालिङ्ग्य महीपतिः ॥ ३७<br><br>मृतः शापात्तु मुनिभिः संस्कृतो हुतभुङ्मुखे।<br>माद्री तत्र सती भूत्वा प्रविष्टा पतिना सह ॥ ३८<br><br>स्थिता पुत्रयुता कुन्ती ज्वलिते जातवेदसि।<br>मुनयः सुतसंयुक्तां शूरसेनसुतां तदा ॥ ३९<br><br>दुःखितां पतिहीनां तामानिन्युर्गजसाह्वये।<br>समर्पिताथ भीष्माय विदुराय महात्मने ॥ ४०<br><br>श्रुत्वाहं सुखदुःखाभ्यां पीडितस्तु परात्मभिः। | एक दिन महाराज पाण्डु एकान्तमें माद्रीका आलिंगन करके पूर्वशापके कारण मृत्युको प्राप्त हो गये। तत्पश्चात् मुनियोंने उनका दाह-संस्कार किया और माद्री सती होकर पतिके साथ प्रज्वलित अग्निमें प्रविष्ट हो गयी और पुत्रोंसे युक्त कुन्ती वहीं स्थित रह गयी। तत्पश्चात् मुनिलोग पतिविहीन उस दुःखित शूरसेन-पुत्री कुन्तीको उसके पुत्रोंसहित हस्तिनापुर ले आये और उसे भीष्म तथा महात्मा विदुरको सौंप दिया। यह सुनकर मैं उन पाण्डुपुत्रोंके कारण सुख-दुःखसे पीड़ित हो गया। |
| भीष्मेण पालिताः पुत्राः पाण्डोरिति विचिन्त्य ते ॥ ४१<br><br>विदुरेण तथा प्रीत्या धृतराष्ट्रेण धीमता।<br>दुर्योधनादयस्तस्य पुत्रा ये क्रूरमानसाः ॥ ४२<br><br>एकत्र स्थितिमापन्ना विरोधं चक्रुरद्भुतम्।<br>द्रोणाचार्यस्तु सम्प्राप्तस्तत्र भीष्मेण मानितः ॥ ४३<br>अध्यापनाय पुत्राणां पुरे तस्मिन्निवासितः। | पाण्डुके ये पुत्र हैं—ऐसा सोचकर भीष्म, मतिमान् विदुर तथा धृतराष्ट्र प्रेमपूर्वक उनका पालन-पोषण करने लगे ॥ ३७-४१ १/२ ॥<br><br>धृतराष्ट्रके दुर्योधन आदि जो क्रूर हृदयवाले पुत्र थे, वे एक समूह बनाकर उनका घोर विरोध करने लगे। तत्पश्चात् द्रोणाचार्य वहाँ आये और भीष्मने उनका सम्मान किया। उन्होंने पुत्रोंको धनुर्विद्याकी शिक्षा देनेके लिये उन्हें उसी पुरमें रख लिया ॥ ४२-४३ १/२ ॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—28 A
८५० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५ ]
८५० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २५ ]
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कर्णः कुन्त्या परित्यक्तो जातमात्रः शिशुर्यदा ॥ ४४<br><br>सूतेन पालितो नद्यां प्राप्तश्चाधिरथेन ह।<br>दुर्योधनप्रियश्चाभूत्कर्णः शूरतमस्तथा ॥ ४५<br><br>परस्परं विरोधोऽभूद्भीमदुर्योधनादिषु।<br>धृतराष्ट्रस्तु सञ्चिन्त्य क्लेशं पुत्रेषु तेषु च ॥ ४६<br><br>निवासं कल्पयामास पाण्डवानां महात्मनाम्।<br>विरोधशमनायैव नगरे वारणावते ॥ ४७ | कुन्तीने उत्पन्न होते ही जब बालक कर्णका परित्याग कर दिया तब अधिरथ नामक सूतने नदीमें बहते हुए उस कर्णको पाया और उसका पालन-पोषण किया। सर्वश्रेष्ठ वीर होनेके कारण कर्ण दुर्योधनका प्रिय हो गया। बादमें भीम तथा दुर्योधन आदिमें परस्पर विरोध भाव उत्पन्न हो गया॥ ४४-४५ १/२ ॥<br><br>तब धृतराष्ट्रने अपने पुत्रों तथा उन पाण्डवोंके परस्पर संकटका विचार करके तथा उनके विरोध-भावको समाप्त करनेके उद्देश्यसे वारणावत नगरमें महात्मा पाण्डवोंको बसानेका निश्चय किया॥ ४६-४७॥ |
| दुर्योधनेन तत्रैव द्रोहाज्जतुगृहाणि वै।<br>कारितानि च दिव्यानि प्रेष्य मित्रं पुरोचनम् ॥ ४८ | द्रोहके कारण दुर्योधनने अपने मित्र पुरोचनको वहाँ भेजकर दिव्य लाक्षागृहका निर्माण करा दिया॥ ४८॥ |
| श्रुत्वा जतुगृहे दग्धान्पाण्डवान्पृथया युतान्।<br>पौत्रभावान्मुनिश्रेष्ठ मग्नोऽहं व्यसनार्णवे ॥ ४९<br><br>शोकातुरो भृशं शून्ये वने पश्यन्नहर्निशम्।<br>दृष्टा मयैकचक्रायां पाण्डवा दुःखकर्शिताः ॥ ५०<br><br>ततस्तुष्टमनाश्चाहं जातः पार्थान्विलोक्य च।<br>प्रेरितास्ते मया तूर्णं द्रुपदस्य पुरं प्रति ॥ ५१ | हे मुनिश्रेष्ठ! तत्पश्चात् कुन्तीसहित उन पाण्डवोंके उस लाक्षागृहमें दग्ध हो जानेका समाचार सुनकर उनके प्रति पौत्र-भाव होनेके कारण मैं दुःखके सागरमें डूब गया और उस निर्जन वनमें उन्हें दिन-रात खोजता हुआ अति शोकसन्तप्त रहता था। तभी मैंने दुःखके कारण अत्यन्त दुर्बल उन पाण्डवोंको एकचक्रा नगरीमें देखा। उन पाण्डवोंको देखकर मेरे मनमें अत्यधिक प्रसन्नता हुई और मैंने उन्हें तुरंत महाराज द्रुपदके नगरमें भेज दिया॥ ४९-५१॥ |
| ते गतास्तत्र दुःखार्ता विप्रवेषधराः कृशाः।<br>मृगचर्मपरीधानाः सभायां संस्थितास्तदा ॥ ५२<br><br>कृत्वा पराक्रमं जिष्णुः स जित्वा द्रुपदात्मजाम्।<br>चकुर्विवाहं मानिन्या पञ्चैव मातृवाक्यतः ॥ ५३ | कृश शरीरवाले वे दुःखित पाण्डव मृगचर्म पहनकर ब्राह्मणका वेश धारण करके वहाँ गये और द्रुपदकी स्वयंवर-सभामें जा पहुँचे। वहाँपर अर्जुन अपने पराक्रमका प्रदर्शन करके द्रुपद-पुत्री द्रौपदीको जीतकर ले आये। पुनः माता कुन्तीके आदेशसे पाँचों भाइयोंने मानिनी द्रौपदीके साथ विवाह किया॥ ५२-५३॥ |
| दृष्ट्वा विवाहं तेषां तु मुदितोऽहं भृशं तदा।<br>ततो नागाह्वये प्राप्ताः पाञ्चालीसहिता मुने ॥ ५४ | उनका विवाह देखकर मैं परम प्रसन्न हुआ। हे मुने! तत्पश्चात् वे सभी द्रौपदीसहित हस्तिनापुर चले आये॥ ५४॥ |
| निवासं खाण्डवप्रस्थं धृतराष्ट्रेण कल्पितम्।<br>पाण्डवानां द्विजश्रेष्ठ वसुदेवसुतेन वै ॥ ५५<br><br>तर्पितः पावकस्तत्र विष्णुना सह जिष्णुना।<br>राजसूयः कृतो यज्ञस्तदाहं मुदितोऽभवम् ॥ ५६ | धृतराष्ट्रने उन पाण्डवोंके रहनेके लिये खाण्डवप्रस्थ देनेका निश्चय किया। हे द्विजश्रेष्ठ नारद! वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनके साथ अग्निदेवको सन्तुष्ट किया। पाण्डवोंने जब राजसूय यज्ञ किया तब मैं बहुत प्रसन्न हुआ॥ ५५-५६॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 28 B
| अ० २६ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८५१ |
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| दृष्ट्वाथ विभवं तेषां तथा मयकृतां सभाम्।<br>दुर्योधनोऽतिसन्तप्तो दुरोदरमथाकरोत्॥ ५७<br><br>दुर्धूतवेदी शकुनिरनक्षज्ञश्च धर्मजः।<br>हृतं राज्यं धनं सर्वं याज्ञसेनी च क्लेशिता॥ ५८<br><br>वने द्वादश वर्षाणि पाण्डवास्ते विवासिताः।<br>पाञ्चालीसहितास्तेन दुःखं मे जनितं भृशम्॥ ५९ | उन पाण्डवोंका वैभव तथा मय दानवद्वारा निर्मित की गयी सभाको देखकर दुर्योधन अत्यन्त दुःखित हुआ और उसने द्यूतक्रीडाकी योजना बनायी। शकुनि कपटपूर्ण द्यूतमें अति निपुण था तथा धर्मराज युधिष्ठिर पासेके खेलसे अनभिज्ञ थे। अतएव दुर्योधनने [द्यूतक्रीडाके माध्यमसे] पाण्डवोंका सम्पूर्ण राज्य तथा धन छीन लिया तथा द्रौपदीको भी अपमानित किया। दुर्योधनने द्रौपदीसहित पाँचों पाण्डवोंको बारह वर्षकी अवधितक वनमें निवास करनेके लिये निर्वासित कर दिया; इससे मुझे बहुत दुःख हुआ॥ ५७—५९॥ |
| एवं नारद संसारे सुखदुःखात्मके भृशम्।<br>निमग्नोऽहं भ्रमेणैव जानन् धर्मं सनातनम्॥ ६० | हे नारद! इस प्रकार सनातन धर्मको जानते हुए भी मैं सुख तथा दुःखसे पूर्ण इस संसारमें भ्रमसे ही बन्धनमें पड़ा हूँ। |
| कोऽहं कस्य सुतास्तेऽमी का माता किं सुखं पुनः।<br>येन मे हृदयं मोहाद् भ्रमतीति दिवानिशम्॥ ६१ | मैं कौन हूँ, ये किसके पुत्र हैं, यह किसकी माता है और सुख क्या है? जिससे मेरा मन मोहित होकर दिन-रात इन्हींमें भ्रमण करता रहता है॥ ६०-६१॥ |
| किं करोमि क्व गच्छामि सन्तोषो नाधिगच्छति।<br>दोलारूढं मनो मेऽत्र चञ्चलं न स्थिरं भवेत्॥ ६२ | मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? किसी प्रकारसे भी मुझे सन्तोष नहीं मिलता। दोलायमान मेरा चंचल मन स्थिर नहीं हो पा रहा है॥ ६२॥ |
| सर्वज्ञोऽसि मुनिश्रेष्ठ सन्देहं मे निवर्तय।<br>तथा कुरु यथाऽहं स्यां सुखितो विगतज्वरः॥ ६३ | हे मुनिश्रेष्ठ! आप सर्वज्ञ हैं, अतएव मेरे सन्देहका निवारण कीजिये। आप कोई ऐसा उपाय कीजिये, जिससे मैं सन्तापरहित होकर सुखी हो जाऊँ॥ ६३॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे व्यासस्वकीयमोहवर्णनं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः॥ २५॥
अथ षड्विंशोऽध्यायः
देवर्षि नारद और पर्वतमुनिका एक-दूसरेको शाप देना, राजकुमारी दमयन्तीका नारदसे विवाह करनेका निश्चय
| व्यास उवाच<br>इति मे वचनं श्रुत्वा नारदः परमार्थवित्।<br>मामाह च स्मितं कृत्वा पृच्छन्तं मोहकारणम्॥ १ | व्यासजी बोले— [हे राजन्!] तब परमार्थवेत्ता नारदजी मेरी बात सुननेके पश्चात् मोहका कारण पूछनेवाले मुझसे मुसकराकर कहने लगे॥ १॥ |
|---|---|
| नारद उवाच<br>पाराशर्य पुराणज्ञ किं पृच्छसि सुनिश्चितम्।<br>संसारेऽस्मिन् विना मोहं कोऽपि नास्ति शरीरवान्॥ २ | नारदजी बोले— हे पुराणवेत्ता व्यासजी! आप क्या पूछ रहे हैं? यह पूर्णरूपसे निश्चित है कि इस संसारमें रहनेवाला कोई भी प्राणी मोहसे परे हो ही नहीं सकता॥ २॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—28 C
८५२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २६
८५२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २६
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रह्माविष्णुस्तथा रुद्रः सनकः कपिलस्तथा।<br>मायया वेष्टिताः सर्वे भ्रमन्ति भववर्त्मनि ॥ ३ | ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सनक तथा कपिल—ये सभी मायाके वशवर्ती होकर संसार-मार्गमें निरन्तर भ्रमण करते रहते हैं॥ ३॥ |
| ज्ञानिनं मां जनो वेत्ति भ्रान्तोऽहं सर्वलोकवत्।<br>शृणु मे पूर्ववृत्तान्तं प्रब्रवीमि सुनिश्चितम्॥ ४ | लोग मुझे ज्ञानी समझते हैं, किंतु मैं भी एक बार सभी लोगोंकी भाँति भ्रमित हो गया था। मैं अपना पूर्व वृत्तान्त यथार्थरूपसे बता रहा हूँ, सुनिये॥ ४॥ |
| दुःखं मया यथा पूर्वमनुभूतं महत्तरम्।<br>स्वकृतेन च मोहेन भार्यार्थे वासवीसुत॥ ५ | हे व्यासजी! स्त्री-प्राप्तिके लिये अपने द्वारा स्वयं उत्पन्न किये गये मोहके कारण मुझे पूर्वकालमें महान् कष्टका अनुभव करना पड़ा था॥ ५॥ |
| एकदा पर्वतश्चाहं देवलोकान्महीतलाम्।<br>प्राप्तौ विलोकनार्थाय भारतं खण्डमुत्तमम्॥ ६ | एक बार मैं तथा पर्वतमुनि उत्तम भारतवर्षको देखनेके लिये देवलोकसे पृथ्वीलोकपर आये थे॥ ६॥ |
| भ्रमन्तौ सहितावुर्व्यां पश्यन्तौ तीर्थमण्डलम्।<br>पावनानि च स्थानानि मुनीनामाश्रमाञ्छुभान् ॥ ७ | विभिन्न तीर्थों, पवित्र स्थानों तथा मुनियोंके पावन आश्रमोंको देखते हुए हम दोनों साथ-साथ पृथ्वीतलपर विचरण करने लगे॥ ७॥ |
| शपथं देवलोकात्तु कृत्वा पूर्वं परस्परम्।<br>चलितौ समयं चेमं सम्मन्त्र्य निश्चयेन वै॥ ८<br><br>चित्तवृत्तिस्तु वक्तव्या यादृशी यस्य जायते।<br>शुभा वाप्यशुभा वापि न गोप्तव्या कदाचन॥ ९ | देवलोकसे प्रस्थान करते समय हम दोनोंने आपसमें निश्चयपूर्वक सोच-विचारकर यह प्रतिज्ञा की थी कि जिसके मनमें जैसा भी पवित्र अथवा अपवित्र भाव उत्पन्न होगा, वह उसे कभी गोपनीय नहीं रखेगा॥ ८-९॥ |
| भोजनेच्छा धनेच्छापि रतीच्छा वा भवेदपि।<br>यादृशी यस्य चित्ते तु कथनीया परस्परम्॥ १० | भोजनकी इच्छा, धनकी इच्छा अथवा काम-विषयक इच्छा—इनमेंसे जिस तरहकी भी इच्छा जिसके मनमें होगी, एक-दूसरेको बता दी जानी चाहिये॥ १०॥ |
| इत्यावां समयं कृत्वा स्वर्गाद्भूलोकमागतौ।<br>एकचित्तौ मुनीभूतौ विचरन्तौ यथेच्छया॥ ११ | ऐसी प्रतिज्ञा करके हम दोनों स्वर्गलोकसे पृथ्वीतलपर आये और एकचित्त होकर मुनिरूपमें इच्छापूर्वक विचरण करने लगे॥ ११॥ |
| एवं भ्रमन्तौ लोकेऽस्मिन्ग्रीष्मान्ते समुपागते।<br>सञ्जयस्य पुरं रम्यं सम्प्राप्तौ नृपतेः पुनः॥ १२ | इस प्रकार इस लोकमें विचरण करते हुए हम दोनों ग्रीष्म ऋतुके समाप्त हो जानेपर राजा संजयके सुरम्य नगरमें पहुँचे॥ १२॥ |
| तेन सम्पूजितौ भक्त्या राज्ञा सम्मानितौ भृशम्।<br>स्थितौ तत्र गृहे तस्य चातुर्मास्यं महात्मनः॥ १३ | राजा संजयने हम दोनोंकी भक्तिपूर्वक पूजा की तथा अत्यधिक सम्मान दिया। महान् आत्मावाले उन्हीं संजयके भवनमें रहकर हम दोनों अपना चातुर्मास्य व्यतीत करने लगे॥ १३॥ |
| वार्षिकाश्चतुरो मासा दुर्गमाः पथि सर्वदा।<br>तस्मादेकत्र विबुधैः स्थातव्यमिति निश्चयः॥ १४ | वर्षाकालके चार महीने मार्गमें बहुत कष्टकारक होते हैं, अतएव विज्ञजनोंको उस अवधिमें एक ही स्थानपर रहना चाहिये—ऐसा सिद्धान्त है॥ १४॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 28 D
अ० २६] षष्ठ स्कन्ध ८५३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अष्टौ मासांस्तु प्रवसेत्सदा कार्यवशाद् द्विजः।<br>वर्षाकाले न गन्तव्यं प्रवासे सुखमिच्छता॥ १५ | द्विजको चाहिये कि वह आठ महीनेतक अपने कार्यवश देशान्तरमें प्रवास करे, किंतु सुख चाहनेवाले पुरुषको वर्षाकालमें प्रवासके लिये नहीं जाना चाहिये॥ १५॥ |
| इति सञ्चिन्त्य मनसा सञ्जयस्य गृहे तदा।<br>संस्थितौ मानितौ राज्ञा कृतातिथ्यौ महात्मना॥ १६ | ऐसा सोचकर हम दोनों राजा संजयके भवनमें ठहर गये और उन महात्मा नरेशने हमलोगोंका सम्मानपूर्वक आतिथ्य किया॥ १६॥ |
| दमयन्तीति विख्याता तस्य पुत्री महीपतेः।<br>आज्ञाप्ता परिचर्यार्थं सुदती सुन्दरी भृशम्॥ १७ | उन राजा संजयकी परम सुन्दरी तथा मनोहर दाँतोंवाली दमयन्ती नामसे विख्यात एक कन्या थी; उन्होंने उसे हमलोगोंकी सेवाके लिये आदेश दे दिया॥ १७॥ |
| विवेकज्ञा विशालाक्षी राजपुत्री कृतोद्यमा।<br>सेवनं सर्वकाले च व्यदधादुभयोरपि॥ १८ | विवेकका ज्ञान रखनेवाली तथा उद्यमी स्वभाववाली वह विशालनयना राजकुमारी सभी समय हम दोनोंकी सेवा करती रहती थी॥ १८॥ |
| स्नानार्थमुदकं काले भोजनं मृष्टमायतम्।<br>मुखवासं तथा चान्यं यदिष्टं तद्ददाति सा॥ १९ | वह हमारे स्नानके लिये जल, पर्याप्त मधुर भोजन, मुख-शुद्धिके लिये सुगन्धित गन्ध-द्रव्य तथा और भी जो हमारा अभीष्ट रहता, उसे समयसे हमलोगोंको दिया करती थी॥ १९॥ |
| मनोऽभिलषितान्कामानुभयोरपि कन्यका।<br>व्यजनासनशय्यादीन्वाञ्छितानप्यकल्पयत् ॥ २० | वह कन्या हम दोनोंकी मनोभिलषित वस्तुएँ उपस्थित किया करती थी। वह व्यजन (पंखा), आसन तथा शय्या आदि मनोवांछित सामग्रियोंको उपलब्ध कराती रहती थी॥ २०॥ |
| एवं संसेव्यमानौ तु स्थितौ राज्ञो गृहे किल।<br>वेदाध्ययनसंशीलावावां वेदव्रते रतौ॥ २१ | इस प्रकार उसके द्वारा सेवित होते हुए हम दोनों राजा संजयके भवनमें रहने लगे। वेदाध्ययनके स्वभाववाले हम दोनों मुनि सदा वेदव्रतमें संलग्न रहते थे॥ २१॥ |
| अहं वीणां करे कृत्वा साधयित्वा स्वरोत्तमम्।<br>गायत्रं साम सुस्वादमगां कर्णरसायनम्॥ २२ | मैं हाथमें वीणा धारणकर उत्तम स्वरकी साधना करके कानोंके लिये रसायनस्वरूप अत्यन्त मधुर गायत्र-सामका गान करता रहता था॥ २२॥ |
| राजपुत्री तु तच्छ्रुत्वा सामगानं मनोहरम्।<br>बभूव मयि रागाढ्या प्रीतियुक्ता विशारदा॥ २३ | मनोहर सामगान सुनकर वह विदुषी राजकुमारी मेरे प्रति अनुरागयुक्त तथा प्रीतिमय हो गयी॥ २३॥ |
| दिने दिनेऽनुरागोऽस्या मयि वृद्धिं गतः परः।<br>ममापि प्रीतियुक्तायां मनो जातं स्पृहापरम्॥ २४ | मेरे प्रति उस राजकुमारीका अनुराग दिनोदिन बढ़ता ही चला गया और मुझमें प्रेम-भाव रखनेवाली उस कन्याके प्रति मेरा भी मन अत्यन्त आसक्त हो उठा॥ २४॥ |
| मम तस्य च सा कन्या भोजनादिषु कर्हिचित्।<br>अकरोदन्तरं किञ्चित्सेवाभेदं रसान्विता॥ २५ | मुझपर विशेष अनुराग रखनेवाली वह राजकुमारी मेरे तथा उस पर्वतमुनिके लिये किये जानेवाले भोजनादिके प्रबन्धमें तथा सेवाकार्यमें कुछ भेदभाव करने लगी॥ २५॥ |
| ८५४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २६ |
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| स्नानायोष्णजलं मह्यं पर्वताय च शीतलम्।<br>दधि मह्यं तथा तक्रं पर्वतायाप्यकल्पयत्॥ २६ | स्नानके लिये मुझे उष्ण जल तथा पर्वतमुनिके लिये शीतल जल और इसी प्रकार मेरे लिये दही तथा पर्वतमुनिके लिये मट्ठेकी व्यवस्था करती थी॥ २६॥ |
| शयनास्तरणं शुभ्रं मदर्थे पर्यकल्पयत्।<br>प्रीत्या परमया यद्वत्पर्वताय न तादृशम्॥ २७ | वह मेरे लिये अत्यन्त प्रेमपूर्वक जैसा धवल आस्तरण (बिछौना) बिछाती थी, वैसा पर्वतके लिये नहीं॥ २७॥ |
| विलोकयति मां प्रेम्णा सुन्दरी न च पर्वतम्।<br>ततोऽस्यास्तादृशं दृष्ट्वा पर्वतः प्रेमकारणम्॥ २८<br><br>मनसा चिन्तयामास किमेतदिति विस्मितः।<br>पप्रच्छ मां रहः सम्यग्ब्रूहि नारद सर्वथा॥ २९<br><br>राजपुत्री त्वयि प्रेम करोति मुदिता भृशम्।<br>ददाति भक्ष्यभोज्यानि स्नेहयुक्ता समन्ततः॥ ३०<br><br>न तथा मयि भेदोऽत्र सन्देहं जनयत्यसौ।<br>मन्यते त्वां पतिं कर्तुं सर्वथा सञ्जयात्मजा॥ ३१ | वह सुन्दरी मुझे अत्यन्त प्रेमपूर्ण भावसे देखती थी, किंतु पर्वतमुनिको नहीं। तब मुनि पर्वत उस प्रकारका प्रेम-भेद देखकर मन-ही-मन विस्मित होकर सोचने लगे कि ऐसा क्यों हो रहा है? एकान्तमें उन्होंने मुझसे पूछा—हे नारद! मुझे भलीभाँति बताइये, यह राजकुमारी अत्यन्त प्रसन्न होकर आपसे अत्यधिक प्रेम करती है और स्नेहयुक्त होकर आपको नानाविध भोज्य-पदार्थ देती है, किंतु वैसा मेरे साथ नहीं करती है; यह भेद-भाव मेरे मनमें सन्देह उत्पन्न कर रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि राजा संजयकी पुत्री आपको निश्चय ही पति बनाना चाहती है॥ २८-३१॥ |
| तवापि तादृशं भावं जानामि लक्षणैरहम्।<br>नेत्रवक्त्रविकारैश्च ज्ञायते प्रीतिकारणम्॥ ३२ | आपकी चेष्टाओंसे आपका भी वैसा ही भाव मुझे परिलक्षित हो रहा है; क्योंकि नेत्र तथा मुखके विकारोंसे प्रेमके कारणका पता चल जाता है॥ ३२॥ |
| सत्यं वद न ते मिथ्या वक्तव्यं वचनं मुने।<br>स्वर्गतः समयं कृत्वा चलितौ संस्मराधुना॥ ३३ | हे मुने! सच-सच कहिये। मिथ्या वचन मत बोलिये। स्वर्गसे प्रस्थान करते समय हम दोनोंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे इस समय याद कीजिये॥ ३३॥ |
| नारद उवाच<br>पृष्टोऽहं पर्वतेनेदं कारणं तु हठाद्यदा।<br>तदाहं ह्रीसमाक्रान्तः सञ्जातश्चाब्रुवं पुनः॥ ३४<br><br>पर्वतैषा विशालाक्षी पतिं मां कर्तुमुद्यता।<br>ममापि मानसो भावो वर्ततेऽस्यां विशेषतः॥ ३५ | **नारदजी बोले—**जब पर्वतमुनिने हठपूर्वक इसका कारण मुझसे पूछा तब मैं अत्यन्त लज्जित हो गया और पुनः बोला—हे पर्वत! विशाल नयनोंवाली यह राजकुमारी मुझे पति बनानेके लिये उद्यत है और उसके प्रति मेरे भी मनमें विशेष अनुराग भाव उत्पन्न हो गया है॥ ३४-३५॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं सत्यं पर्वतः कोपसंयुतः।<br>मामुवाच मुनिर्वाक्यं धिग्धिगिति पुनः पुनः॥ ३६<br><br>प्रथमं शपथान्कृत्वा वञ्चितोऽहं त्वया यतः।<br>भव वानरवक्त्रस्त्वं शापाच्च मम मित्रध्रुक्॥ ३७ | मेरा यह सत्य वचन सुनकर पर्वतमुनि कुपित हो उठे और उन्होंने मुझसे कहा, ‘तुम्हें बार-बार धिक्कार है; क्योंकि प्रतिज्ञा करके पहले तुमने मुझे धोखा दिया है, अतएव हे मित्रद्रोही! मेरे शापसे तुम अभी बन्दरके मुखवाले हो जाओ’॥ ३६-३७॥ |
| इति शप्तस्तु तेनाहं कुपितेन महात्मना।<br>सहसा ह्यभवं क्रूरः शाखामृगमुखस्तदा॥ ३८ | उस कुपित महात्मा पर्वतके ऐसा शाप देते ही मैं तत्काल भयंकर बन्दरकी मुखाकृतिवाला हो गया॥ ३८॥ |
| अ० २६ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८५५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मयापि न कृता तस्मिन्क्षमा तु भगिनीसुते।<br>सोऽपि शप्तोऽतिकोपाद्वै मा स्वर्गे ते गतिः किल॥ ३९ | तब मैंने भी अपने उस भगिनीपुत्र (भांजे) पर्वतको क्षमा नहीं किया। मैंने भी क्रोध करके उसे शाप दे दिया कि तुम भी अबसे स्वर्गके अधिकारी नहीं रहोगे॥ ३९॥ |
| स्वल्पेऽपराधे यस्मान्मां शप्तवानसि पर्वत।<br>तस्मात्तवापि मन्दात्मन् मृत्युलोके स्थितिः किल॥ ४० | हे मन्दात्मन् पर्वत! क्योंकि मेरे छोटे-से अपराधके लिये तुमने मुझे ऐसा शाप दिया है, अतएव तुम्हारा भी अब मृत्युलोकमें निवास होगा॥ ४०॥ |
| पर्वतस्तु गतस्तस्मान्नगराद्विग्मना भृशम्।<br>अहं वानरवक्त्रस्तु सञ्जातस्तत्क्षणादपि॥ ४१ | इसके बाद पर्वतमुनि अत्यन्त उदास मनसे उस नगरसे निकल पड़े और मैं भी उसी समयसे बन्दरके मुखवाला हो गया॥ ४१॥ |
| दृष्ट्वा मां वानरं क्रूरं राजपुत्री विलक्षणा।<br>विमनातीव सञ्जाता वीणाश्रवणलालसा॥ ४२ | वीणा सुननेकी उत्कट अभिलाषा रखनेवाली वह परम विलक्षण राजकुमारी मुझे भयंकर बन्दरके रूपमें देखकर अत्यन्त उदास मनवाली हो गयी॥ ४२॥ |
| व्यास उवाच<br>ततः किमभवद् ब्रह्मन् कथं शापान्निवर्तितः।<br>मानुषास्यः पुनर्जातो भवान्ब्रूहि यथाविधि॥ ४३ | व्यासजी बोले— हे ब्रह्मन्! तत्पश्चात् क्या हुआ, आपको शापसे छुटकारा कैसे मिला तथा आप पुनः मानवकी मुखाकृतिवाले किस प्रकार हुए? ये सभी बातें भलीभाँति बताइये॥ ४३॥ |
| पर्वतः क्व गतो भूयः सङ्गमो युवयोरभूत्।<br>कदा कुत्र कथं सर्वं विस्तरेण वदस्व ह॥ ४४ | पर्वतमुनि कहाँ चले गये? आप दोनोंका पुनर्मिलन कब, कहाँ और कैसे हुआ? यह सब विस्तारपूर्वक बताइये॥ ४४॥ |
| नारद उवाच<br>किं ब्रवीमि महाभाग मायायाश्चरितं महत्।<br>दुःखितोऽहं भृशं तत्र पर्वते रुषिते गते॥ ४५ | नारदजी बोले— हे महाभाग! क्या कहूँ? मायाकी गति बड़ी विचित्र होती है। पर्वतमुनिके कुपित होकर चले जानेके पश्चात् मैं अत्यन्त दुःखित हो गया॥ ४५॥ |
| पुनः सेवापरात्यर्थं राजपुत्री ममाभवत्।<br>गतेऽथ पर्वते कामं स्थितस्तत्रैव सद्मनि॥ ४६ | पर्वतमुनिके चले जानेपर मैं उसी भवनमें ठहरा रहा और वह राजकुमारी मेरी सेवामें पुनः तत्पर हो गयी॥ ४६॥ |
| अहं दुःखान्वितो दीनस्तथा वानरवन्मुखः।<br>विशेषेण तु चित्तार्तः किं मे स्यादिति चिन्तयन्॥ ४७ | वानरके समान मुख हो जानेके कारण मैं दुःखी तथा उदास रहने लगा। अब मेरा क्या होगा? ऐसा सोच-सोचकर मैं विशेष चिन्तासे व्याकुल हो गया था॥ ४७॥ |
| सञ्जयोऽथ सुतां दृष्ट्वा किञ्चित्प्रकटयौवनाम्।<br>विवाहार्थे राजसुतामपृच्छत्सचिवं तदा॥ ४८ | अपनी पुत्री राजकुमारी दमयन्तीको कुछ-कुछ प्रकट यौवनवाली देखकर उसके विवाहके सम्बन्धमें राजा संजयने मन्त्रीसे पूछा— |
| विवाहकालः सम्प्राप्तः सुताया मम साम्प्रतम्।<br>योग्यं वरं मम ब्रूहि राजपुत्रं सुसम्मतम्॥ ४९<br>रूपौदार्यगुणैर्युक्तं शूरं सुकुलसम्भवम्। | अब मेरी पुत्रीका विवाह-योग्य समय हो गया है। अतएव योग्य वरके रूपमें कोई ऐसा राजकुमार आप मुझे बतलाइये, जो रूप-उदारता-गुण आदिसे सम्पन्न, |
| ८५६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २७ |
|---|
| विवाहं विधिवत्पुत्र्याः करोमि किल साम्प्रतम्॥ ५० | पराक्रमी, उत्तम कुलमें उत्पन्न तथा सभीके लिये श्रेष्ठ हो। उसके साथ मैं अपनी पुत्रीका विधिवत् विवाह अभी कर दूँगा॥ ४८—५०॥ |
| प्रधानस्त्वब्रवीद्राजन् राजपुत्रा ह्यनेकशः।<br>वर्तन्ते भुवि पुत्र्यास्ते योग्याः सर्वगुणान्विताः॥ ५१ | इसपर प्रधान सचिवने कहा—हे राजन्! आपकी कन्याके अनुरूप बहुतसे योग्य तथा सर्वगुणसम्पन्न राजकुमार इस पृथ्वीपर विद्यमान हैं॥ ५१॥ |
| यस्मिन् रुचिस्ते राजेन्द्र समाहूय नृपात्मजम्।<br>देहि कन्यां धनं भूरि हस्त्यश्वरथसंयुतम्॥ ५२ | हे राजेन्द्र! जिसमें आपकी रुचि हो, उस राजपुत्रको बुलाकर बहुत-से हाथी, घोड़े, रथ और धनसहित अपनी कन्या उसे प्रदान कर दीजिये॥ ५२॥ |
| नारद उवाच<br>पितुश्चिकीर्षितं ज्ञात्वा दमयन्ती तदा नृपम्।<br>धात्र्या मुखेन वाक्यज्ञा तमुवाच रहः स्थितम्॥ ५३ | नारदजी बोले—बातचीतमें परम कुशल दमयन्तीने पिताका अभिप्राय समझकर अपनी धायके मुखसे एकान्तमें स्थित राजासे कहलाया॥ ५३॥ |
| धात्र्युवाच<br>दमयन्ती महाराज पुत्री ते मामथाब्रवीत्।<br>पितरं ब्रूहि धात्रेयि वचनान्मे सुखान्वितम्॥ ५४ | धात्रीने कहा—हे महाराज! आपकी पुत्री दमयन्तीने मुझसे ऐसा कहा है—हे धात्रेयि! तुम मेरे वचनसे मेरे पिताजीसे यह सुखकर बात कह दो— |
| मया वृतोऽथ मेधावी नारदो महतीयुतः।<br>नादमोहितया कामं नान्यः कोऽपि प्रियो मम॥ ५५ | नादसे मोहित मैं महती वीणा धारण करनेवाले प्रतिभासम्पन्न नारदका वरण कर चुकी हूँ; अन्य कोई भी मुझे प्रिय नहीं है॥ ५४-५५॥ |
| कुरु मे वाञ्छितं तात विवाहं मुनिना सह।<br>नान्यं वरिष्ये धर्मज्ञ नारदं तु पतिं विना॥ ५६ | हे तात! आप मेरी इच्छाके अनुरूप मुनिके साथ मेरा विवाह कर दीजिये। हे धर्मज्ञ! मैं नारदको छोड़कर किसी दूसरेको अपना पति नहीं बनाऊँगी॥ ५६॥ |
| मग्नाहं नादसिन्धौ वै नक्रहीने रसात्मके।<br>अक्षारे सुखसम्पूर्णे तिमिङ्गिलविवर्जिते॥ ५७ | अब मैं घड़ियाल तथा भयंकर मत्स्य आदि जन्तुओंसे शून्य, खारेपनसे रहित, सुखसे परिपूर्ण एवं रसमय नादसिन्धुमें निमग्न हो गयी हूँ॥ ५७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे दमयन्तीविवाहप्रस्ताववर्णनं नाम षड्विंशोऽध्यायः॥ २६॥
अथ सप्तविंशोऽध्यायः
वानरमुख नारदसे दमयन्तीका विवाह, नारद तथा पर्वतका परस्पर शापमोचन
| नारद उवाच<br>तत्पुत्र्या वचनं श्रुत्वा राजा धात्रीमुखात्ततः।<br>भार्यां प्रोवाच कैकेयीं समीपस्थां सुलोचनाम्॥ १ | नारदजी बोले—धात्रीके मुखसे अपनी कन्याका वह वचन सुनकर राजा संजय पास ही बैठी सुन्दर नेत्रोंवाली अपनी भार्या कैकेयीसे कहने लगे—॥ १॥ |
| राजोवाच<br>यदुक्तं वचनं कान्ते धात्र्या तत्तु त्वया श्रुतम्।<br>वृतोऽयं नारदः कामं मुनिर्वानरवक्त्रभाक्॥ २ | राजा बोले—हे प्रिये! धात्रीने जो बात कही है, वह तो तुमने सुन ही ली। बन्दरके समान मुखवाले नारदमुनिका उसने वरण कर लिया है॥ २॥ |
| किमिदं चिन्तितं पुत्र्या बुद्धिहीनं विचेष्टितम्।<br>कथमस्मै मया देया कन्या हरिमुखाय सा॥ ३ | पुत्रीने यह कैसा मूर्खतापूर्ण कार्य सोच लिया। इस वानरमुख मुनिको मैं अपनी कन्या कैसे दे दूँ?॥ ३॥ |
| अ० २७ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८५७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी टीका |
|---|---|
| क्वासौ भिक्षुः कुरूपः क्व दमयन्ती ममात्मजा।<br>विपरीतमिदं कार्यं न विधेयं कदाचन॥ ४ | कहाँ भिक्षाटन करनेवाला यह कुरूप भिक्षुक और कहाँ मेरी पुत्री दमयन्ती! ऐसा विपरीत सम्बन्ध कभी नहीं करना चाहिये॥ ४॥ |
| तामेकान्ते सुकेशान्ते निवारय हठात्सुताम्।<br>युक्त्या मुनिरतां मुग्धां शास्त्रवृद्धानुसारया॥ ५ | हे सुन्दर केशोंवाली! तुम मुनिपर आसक्त अपनी उस भोली पुत्रीको एकान्तमें शास्त्रों तथा वृद्ध पुरुषोंके मर्यादित वचन बतलाकर युक्तिपूर्वक इस हठसे मुक्त करो॥ ५॥ |
| इति भर्तृवचः श्रुत्वा जननी तामथाब्रवीत्।<br>क्व ते रूपं मुनिः क्वासौ वानरास्योऽधनः पुनः॥ ६ | पतिकी बात सुनकर माताने उस कन्यासे कहा—कहाँ तुम्हारा ऐसा रूप और कहाँ वह धनहीन वानरमुख मुनि!॥ ६॥ |
| कथं मोहमवाप्तासि भिक्षुके चतुरा पुनः।<br>लताकोमलदेहा त्वं भस्मरूक्षतनुस्त्वयम्॥ ७ | तुम लताके समान कोमल देहवाली हो और यह मुनि भस्म लगानेके कारण कठोर देहवाला है; तुम बुद्धिमान् होकर भी उस भिक्षुकपर मोहित क्यों हो गयी हो?॥ ७॥ |
| वार्ता वानरवक्त्रेण कथं युक्ता तवानघे।<br>का प्रीतिः कुत्सिते पुंसि भविष्यति शुचिस्मिते॥ ८ | हे अनघे! वानरके समान मुखवाले इस मुनिके साथ तुम्हारा वार्तालाप कैसे उचित होगा? हे पवित्र मुसकानवाली! इस निन्दित पुरुषपर तुम्हारी कौन-सी प्रीति हो सकेगी?॥ ८॥ |
| वरस्ते राजपुत्रोऽस्तु मा कुरु त्वं वृथा हठम्।<br>पिता ते दुःखमाप्नोति श्रुत्वा धात्रीमुखाद्वचः॥ ९ | तुम्हारा वर तो कोई राजकुमार होना चाहिये, तुम व्यर्थ हठ मत करो। धात्रीके मुखसे ऐसी बात सुनकर तुम्हारे पिताजीको बहुत दुःख हुआ है॥ ९॥ |
| लग्नां बब्बूलवृक्षेण कोमलां मालतीलताम्।<br>दृष्ट्वा कस्य मनः खेदं चतुरस्य न गच्छति॥ १०<br><br>दासेरकाय ताम्बूलीदलानि कोमलानि कः।<br>ददाति भक्षणार्थाय मूर्खोऽपि धरणीतले॥ ११ | बबूलके वृक्षसे लिपटी हुई कोमल मालती लताको देखकर किस बुद्धिमान् व्यक्तिका मन दुःखित नहीं होगा? इस पृथ्वीतलपर ऐसा कौन मूर्ख होगा जो खानेके लिये ऊँटको कोमल पानके पत्ते देगा?॥ १०-११॥ |
| वीक्ष्य त्वां करसंलग्नां नारदस्य समीपतः।<br>विवाहे वर्तमाने तु कस्य चेतो न दह्यति॥ १२ | विवाह होते समय नारदके पास बैठकर तुम्हें उसका हाथ पकड़े हुए देखकर किसका हृदय नहीं जल उठेगा?॥ १२॥ |
| कुमुखेन समं वार्ता न रुचिं जनयत्यतः।<br>आमृतेस्तु कथं कालः क्षपितव्यस्त्वयामुना॥ १३ | इस कुत्सित मुखवालेके साथ बात करनेमें कोई रुचि भी तो नहीं उत्पन्न होगी; फिर इसके साथ तुम मृत्युपर्यन्त अपना समय कैसे व्यतीत करोगी?॥ १३॥ |
| नारद उवाच<br>इति मातुर्वचः श्रुत्वा दमयन्ती भृशातुरा।<br>मातरं प्राह तन्वङ्गी मयि सा कृतनिश्चया॥ १४<br><br>किं मुखेन च रूपेण मूर्खस्य च धनेन किम्।<br>किं राज्येनाविदग्धस्य रसमार्गाविदोऽस्य च॥ १५ | **नारदजी बोले—**माताकी यह बात सुनकर मेरे प्रति दृढ़ निश्चयवाली उस कोमलांगी दमयन्तीने अत्यन्त व्याकुलतापूर्वक अपनी मातासे कहा—रसमार्गसे अनभिज्ञ तथा कलाज्ञानसे रहित मूर्ख राजकुमारके सुन्दर मुख, रूप, धन तथा राज्यसे मेरा क्या प्रयोजन?॥ १४-१५॥ |
| ८५८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हरिण्योऽपि वने धन्या या नादेन विमोहिताः।<br>मातः प्राणान्प्रयच्छन्ति धिङ्मूर्खान्मानुषान्भुवि ॥ १६ | हे माता! वनमें रहनेवाली वे हरिणियाँ धन्य हैं जो नादसे मोहित होकर अपने प्राण भी दे देती हैं, किंतु इस भूलोकमें रहनेवाले उन मूर्ख मनुष्योंको धिक्कार है, जो मधुर स्वरसे प्रेम नहीं करते हैं! ॥ १६॥ |
| नारदो वेत्ति यां विद्यां मातः सप्तस्वरात्मिकाम्।<br>तृतीयः कोऽपि नो वेद शिवादन्यः पुमान्किल ॥ १७ | हे माता! नारदजी जिस सप्तस्वरमयी विद्याको जानते हैं, उसे भगवान् शंकरको छोड़कर तीसरा अन्य कोई भी व्यक्ति नहीं जानता है॥ १७॥ |
| मूर्खेण सह संवासो मरणं तत्क्षणे क्षणे।<br>रूपवान्धनवांस्त्याज्यो गुणहीनो नरः सदा ॥ १८<br><br>धिङ्मैत्रीं मूर्खभूपाले वृथा गर्वसमन्विते।<br>गुणज्ञे भिक्षुके श्रेष्ठा वचनात्सुखदायिनी ॥ १९<br><br>स्वरज्ञो ग्रामवित्कामं मूर्च्छनाज्ञानभेदभाक्।<br>दुर्लभः पुरुषश्चाष्टरसज्ञो दुर्बलोऽपि वै ॥ २०<br><br>यथा नयति कैलासं गङ्गा चैव सरस्वती।<br>तथा नयति कैलासं स्वरज्ञानविशारदः ॥ २१<br><br>स्वरमानं तु यो वेद स देवो मानुषोऽपि सन्।<br>सप्तभेदं न यो वेद स पशुः सुरराडपि ॥ २२<br><br>मूर्च्छनातानमार्गं तु श्रुत्वा मोदं न याति यः।<br>स पशुः सर्वथा ज्ञेयो हरिणाः पशवो न हि ॥ २३ | मूर्खके साथ रहना प्रतिक्षण मृत्युके समान होता है। अतएव सुन्दर रूपसे सम्पन्न तथा सम्पत्तिशाली होते हुए भी गुणरहित पुरुषको सर्वदाके लिये त्याग देना चाहिये। व्यर्थ गर्व करनेवाले मूर्ख राजाकी मित्रताको धिक्कार है; वचनोंसे सुख प्रदान करनेवाली गुणवान् भिक्षुककी मित्रता श्रेष्ठ है। स्वरका ज्ञाता, ग्रामोंकी पूरी जानकारी रखनेवाला, मूर्च्छनाके भेदोंको सम्यक् प्रकारसे समझनेवाला तथा आठों रसोंको जाननेवाला दुर्बल पुरुष भी इस संसारमें दुर्लभ है। जिस प्रकार गंगा तथा सरस्वती नदियाँ कैलास ले जाती हैं, उसी प्रकार स्वरज्ञानमें अत्यन्त प्रवीण पुरुष शिवलोक पहुँचा देता है। जो व्यक्ति स्वरके प्रमाणको जानता है, वह मनुष्य होता हुआ भी देवता है, किंतु जो स्वरोंके सप्तभेदका ज्ञान नहीं रखता, वह पशुके समान होता है, चाहे इन्द्र ही क्यों न हो। मूर्च्छना तथा तानमार्गको सुनकर जो आह्लादित नहीं होता, उसे साक्षात् पशु समझना चाहिये, बल्कि [स्वरप्रेमी] हरिणोंको पशु नहीं समझना चाहिये ॥ १८–२३॥ |
| वरं विषधरः सर्पः श्रुत्वा नादं मनोहरम्।<br>अश्रोत्रोऽपि मुदं याति धिक्सकर्णांश्च मानवान् ॥ २४ | विषधर सर्प श्रेष्ठ है; क्योंकि वह कान न होनेपर भी मनोहर नाद सुनकर प्रफुल्लित हो जाता है, किंतु उन मनुष्योंको धिक्कार है, जो कर्णयुक्त रहनेपर भी नाद सुनकर आनन्दित नहीं होते ॥ २४॥ |
| बालोऽपि सुस्वरं गेयं श्रुत्वा मुदितमानसः।<br>जायते किन्तु ते वृद्धा न जानन्ति धिगस्तु तान् ॥ २५ | मधुर स्वरसे गाये गये गीतको सुनकर बालक भी प्रसन्नचित्त हो जाता है, किंतु जो वृद्ध गानके रहस्यको नहीं जानते, उन्हें धिक्कार है ॥ २५॥ |
| पिता मे किं न जानाति नारदस्य गुणान् बहून्।<br>द्वितीयः सामगो नास्ति त्रिषु लोकेषु तत्समः ॥ २६<br><br>तस्मादसौ मया नूनं वृतः पूर्वं समागमात्।<br>पश्चाच्छापवशाज्जातो वानरास्यो गुणाकरः ॥ २७ | क्या मेरे पिताजी नारदके बहुतसे गुणोंको नहीं जानते? तीनों लोकोंमें उनके समान साम-गान करनेवाला दूसरा कोई भी नहीं है। अतः नारदसे प्रेम हो जानेके कारण मैंने पहलेसे ही इनका वरण कर लिया है। गुणोंके निधान ये नारद शापवश बादमें वानरके समान मुखवाले हो गये ॥ २६-२७॥ |
| अ० २७ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८५९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| किन्नरा न प्रियाः कस्य भवन्ति तुरगाननाः।<br>गानविद्यासमायुक्ताः किं मुखेन वरेण ह॥ २८ | अश्वके समान मुखवाले किन्नर गानविद्यासे सम्पन्न होनेके कारण किसको प्रिय नहीं होते, किसीके सुन्दर मुखसे क्या प्रयोजन ? ॥ २८ ॥ |
| पितरं ब्रूहि मे मातर्वृतोऽयं मुनिसत्तमः।<br>तस्मात्त्वमाग्रहं त्यक्त्वा देहि तस्मै च मां मुदा॥ २९ | हे माता! आप मेरे पिताजीसे कह दें कि मैं मुनिश्रेष्ठ नारदका वरण कर चुकी हूँ; अतएव हठ छोड़कर आप प्रसन्नतापूर्वक मुझे उन्हीं नारदको सौंप दें॥ २९॥ |
| नारद उवाच<br>इति पुत्र्या वचः श्रुत्वा राज्ञी राज्ञे न्यवेदयत्।<br>आग्रहं सुन्दरी ज्ञात्वा सुताया नारदे मुनौ॥ ३०<br>विवाहं कुरु राजेन्द्र दमयन्त्याः शुभे दिने।<br>मुनिना स च सर्वज्ञो वृतोऽसौ मनसानया॥ ३१ | नारदजी बोले—पुत्रीकी बात सुनकर तथा नारद-मुनिमें उसका अनुराग जानकर परम सुन्दरी रानीने राजासे कहा—हे राजेन्द्र! अब आप किसी शुभ दिनमें नारद-मुनिके साथ दमयन्तीका विवाह कर दीजिये; क्योंकि वह मन-ही-मन उन्हीं सर्वज्ञ मुनिका वरण कर चुकी है॥ ३०-३१॥ |
| नारद उवाच<br>इति सञ्चोदितो राज्ञा सञ्जयः पृथिवीपतिः।<br>चकार विधिवत्सर्वं विधिं वैवाहिकं ततः॥ ३२ | नारदजी बोले—इस प्रकार रानी कैकेयीके प्रेरित करनेपर राजा संजयने विधि-विधानसे समस्त वैवाहिक क्रिया सम्पन्न की॥ ३२॥ |
| एवं दारग्रहं कृत्वा वानरास्यः परन्तप।<br>स्थितस्तत्रैव मनसा दह्यमानेन चान्वहम्॥ ३३ | हे परन्तप! इस तरह विवाह हो जानेके पश्चात् वानरके समान मुखवाला मैं अत्यन्त दुःखी मनसे वहीं रहने लगा॥ ३३॥ |
| यदागच्छद्राजसुता सेवार्थं मम सन्निधौ।<br>अभवं दुःखसन्तप्तस्तदाहं वानराननः॥ ३४ | जब राजकुमारी दमयन्ती सेवाके लिये मेरे पास आती थी तब वानरसद्दश मुखवाला मैं दुःखसे पीड़ित हो उठता था॥ ३४॥ |
| दमयन्ती तु मां वीक्ष्य प्रफुल्लवदनाम्बुजा।<br>शोकं वानरवक्त्रत्वान्न चकार कदाचन॥ ३५ | किंतु खिले हुए कमलके समान मुखवाली दमयन्ती मुझे देखकर मेरी वानर मुखाकृतिके लिये कभी भी शोक नहीं करती थी॥ ३५॥ |
| एवं गच्छति काले तु सहसा पर्वतो मुनिः।<br>कुर्वंस्तीर्थान्यनेकानि द्रष्टुं मां समुपागतः॥ ३६ | इस प्रकार कुछ समय बीतनेपर अनेक तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए पर्वतमुनि मुझसे मिलनेके लिये अकस्मात् मेरे पास आये॥ ३६॥ |
| मयातिमानितः प्रेम्णा पूजितश्च यथाविधि।<br>आसीन आसने दिव्ये वीक्ष्य मां दुःखितो ह्यभूत्॥ ३७ | मैंने प्रेमपूर्वक उनका पर्याप्त सम्मान किया तथा विधिवत् पूजा की। दिव्य आसनपर विराजमान मुनि पर्वत मुझे देखकर अत्यन्त दुःखित हो उठे॥ ३७॥ |
| कृतदारं वानरास्यं दीनं चिन्तातुरं भृशम्।<br>दयावान्मामुवाचेदं पर्वतो मातुलं कृशम्॥ ३८ | वानरमुख होनेके कारण विवाह करके अत्यन्त दयनीय, दुर्बल तथा चिन्तायुक्त दशाको प्राप्त मुझ अपने मामासे पर्वतमुनिने यह वचन कहा॥ ३८॥ |
| मया नारद कोपात्त्वं शप्तोऽसि मुनिसत्तम।<br>निष्कृतिं तस्य शापस्य करोम्यद्य निशामय॥ ३९ | हे मुनिश्रेष्ठ नारद! क्रोधमें आकर मैंने तुम्हें शाप दे दिया था, किंतु मैं आज उस शापका निवारण करता हूँ, सुनो॥ ३९॥ |
| ८६० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भव त्वं चारुवदनो मम पुण्येन नारद।<br>दृष्ट्वा राजसुतां चित्ते कृपा जाता ममाधुना ॥ ४० | हे नारद! अब तुम मेरे पुण्यके प्रभावसे सुन्दर मुखवाले हो जाओ; क्योंकि इस समय राजकुमारीको देखकर मेरे मनमें करुणाभाव उत्पन्न हो गया है ॥ ४० ॥ |
| नारद उवाच<br>मयापि प्रवणं चित्तं कृत्वा श्रुत्वास्य भाषितम्।<br>अनुग्रहः कृतः सद्यस्तस्य शापस्य तत्क्षणात् ॥ ४१<br>भागिनेय तवाप्यस्तु गमनं सुरसद्मनि।<br>शापस्यानुग्रहः कामं कृतोऽयं पर्वताधुना ॥ ४२ | नारदजी बोले—उनकी बात सुनकर मैंने भी अपने मनको विनययुक्त करके उसी क्षण [अपने द्वारा उन्हें प्रदत्त] शापका मार्जन कर दिया। [मैंने कहा—] हे भागिनेय पर्वत! मैं तुम्हें मुक्त कर दे रहा हूँ। अब देवलोकमें तुम्हारा भी गमन हो; यह मैंने शापका विमोचन कर दिया ॥ ४१-४२ ॥ |
| नारद उवाच<br>जातोऽहं चारुवदनो वचनात्तस्य पश्यतः।<br>राजपुत्री तु सन्तुष्टा मातरं प्राह सत्वरम् ॥ ४३<br>मातस्ते सुमुखो जातो जामाता च महाद्युतिः।<br>वचनात्पर्वतस्याद्य मुक्तशापो मुनेर्भूत् ॥ ४४ | नारदजी बोले—पर्वतमुनिके वचनानुसार उनके देखते-देखते मैं सुन्दर मुखवाला हो गया। इससे राजकुमारी बहुत प्रसन्न हो गयी और शीघ्र ही मातासे बोली—हे माता! तुम्हारे परम तेजस्वी जामाता नारद अब सुन्दर मुखवाले हो गये हैं। मुनि पर्वतके वचनसे अब वे शापसे मुक्त हो चुके हैं ॥ ४३-४४ ॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञ्या कथितं तत्तु राजनि।<br>ययौ द्रष्टुं मुनिं तत्र सञ्जयः प्रीतिमांस्तदा ॥ ४५ | दमयन्तीकी बात सुनकर रानीने उसे राजासे कहा। तब प्रीतियुक्त होकर राजा संजय मुनिको देखनेके लिये वहाँ गये ॥ ४५ ॥ |
| धनं समर्पितं राज्ञा सन्तुष्टेन तदा महत्।<br>मह्यं च भागिनेयाय पारिबर्हं महात्मना ॥ ४६ | तब सन्तुष्ट हुए महात्मा राजाने मुझे तथा भागिनेय पर्वतको बहुत सारा धन एवं उपहार-सामग्री प्रदान की ॥ ४६ ॥ |
| एतत्ते सर्वमाख्यातं वर्तनं यत्पुरातनम्।<br>मायाया बलमाहात्म्यं ह्यनुभूतं यथा मया ॥ ४७ | जैसा मैंने मायाके बलकी महिमाका अनुभव किया है और जो पुरातन वृत्तान्त है, वह सब मैंने आपको बता दिया ॥ ४७ ॥ |
| संसारेऽस्मिन्महाभाग मायागुणकृतेऽनृते।<br>तनुभृत्तु सुखी नास्ति न भूतो न भविष्यति ॥ ४८ | हे महाभाग! मायाके गुणोंसे विरचित इस मिथ्या जगत्में कोई भी जीव न सुखी रहा है, न सुखी है और न तो सुखी रहेगा ॥ ४८ ॥ |
| कामक्रोधौ तथा लोभो मत्सरो ममता तथा।<br>अहङ्कारो मदः केन जिताः सर्वे महाबलाः ॥ ४९ | काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, ममता, अहंकार और मद—इन महाशक्तिशाली विषयोंको कौन जीत सका है ? ॥ ४९ ॥ |
| सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणास्त्रय इमे किल।<br>कारणं प्राणिनां देहसम्भवे सर्वथा मुने ॥ ५० | हे मुने! सत्त्व, रज तथा तम—ये तीनों गुण ही प्राणियोंकी देहोत्पत्तिमें सर्वथा कारण होते हैं ॥ ५० ॥ |
| कस्मिंश्चित्समये व्यास वनेऽहं विष्णुना सह।<br>गच्छन्हास्यविनोदेन स्त्रीभावं गमितः क्षणात् ॥ ५१ | हे व्यासजी! किसी समय भगवान् विष्णुके साथ वनमें जाता हुआ मैं परस्पर हास-परिहासमें सहसा स्त्रीभावको प्राप्त हो गया ॥ ५१ ॥ |
| राजपत्नीत्वमापन्नो मायाबलविमोहितः।<br>पुत्राः प्रसूता बहवो गेहे तस्य नृपस्य ह ॥ ५२ | मायाके प्रभावसे विमोहित होकर मैं राजाकी पत्नी बन गया और उस राजाके भवनमें रहकर मैंने अनेक पुत्र उत्पन्न किये ॥ ५२ ॥ |
अ० २८] षष्ठ स्कन्ध ८६१
अ० २८] षष्ठ स्कन्ध ८६१
| व्यास उवाच | |
|---|---|
| संशयोऽयं महान्साधो श्रुत्वा ते वचनं किल।<br>कथं नारीत्वमापन्नस्त्वं मुने ज्ञानवान्भृशम्॥ ५३ | व्यासजी बोले— हे साधो! हे मुने! आपकी बात सुनकर मुझे यह महान् सन्देह हो रहा है कि आप महान् ज्ञानी होते हुए भी नारी-रूपमें कैसे परिणत हो गये? आप पुनः पुरुष किस प्रकार हुए? यह सब पूर्णरूपसे बताइये। आपने पुत्र कैसे उत्पन्न किये तथा किस राजाके घरमें आप भलीभाँति रहे?॥ ५३-५४॥ |
| कथं च पुरुषो जातो ब्रूहि सर्वमशेषतः।<br>कथं पुत्रास्त्वया जाताः कस्य राज्ञो गृहेऽज्जसा॥ ५४ | |
| एतदाख्याहि चरितं मायाया महदद्भुतम्।<br>मोहितं च यया सर्वमिदं स्थावरजङ्गमम्॥ ५५ | आप उन महामायाके अत्यन्त अद्भुत चरित्रका वर्णन कीजिये, जिन्होंने स्थावर-जंगमात्मक समग्र जगत्को विमोहित कर रखा है॥ ५५॥ |
| न तृप्तिमधिगच्छामि शृण्वंस्तव कथामृतम्।<br>सर्वग्रन्थार्थतत्त्वं च सर्वसंशयनाशनम्॥ ५६ | सभी ग्रन्थोंके अर्थतत्त्वोंसे युक्त तथा समस्त संशयोंका नाश करनेवाले आपके कथामृतका श्रवण करता हुआ मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ॥ ५६॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे नारदस्य मायादमयन्त्या सह विवाहवर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः॥ २७॥
अथाष्टाविंशोऽध्यायः
भगवान् विष्णुका नारदजीसे मायाकी अजेयताका वर्णन करना, मुनि नारदको मायावश स्त्रीरूपकी प्राप्ति तथा राजा तालध्वजका उनसे प्रणय-निवेदन करना
| नारद उवाच | |
|---|---|
| निशामय मुनिश्रेष्ठ गदतो मम सत्कथाम्।<br>मायाबलं सुदुर्जेयं मुनिभिर्योगवित्तमैः॥ १ | नारदजी बोले— हे मुनिवर! अब आप मेरे द्वारा कही जा रही सत्कथाका श्रवण कीजिये। श्रेष्ठ योगवेत्ता मुनियोंके लिये भी मायाका बल अत्यन्त दुर्जेय है॥ १॥ |
| मायया मोहितं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्।<br>ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तमजया दुर्विभाव्यया॥ २ | उस अजेय तथा दुश्चिन्त्य मायाने ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त समस्त चराचर जगत्को मोहित कर रखा है॥ २॥ |
| कदाचित्सत्यलोकाद्वै श्वेतद्वीपे मनोहरे।<br>गतोऽहं दर्शनाकाङ्क्षी हरेरद्भुतकर्मणः॥ ३ | किसी समय मैं स्वर तथा तानसे विभूषित महती वीणा बजाता हुआ एवं सप्त स्वरोंसे युक्त गायत्र-सामका गान करता हुआ अद्भुत कर्मवाले भगवान् विष्णुके दर्शनकी अभिलाषासे सत्यलोकसे मनोहर श्वेतद्वीपमें गया था॥ ३-४॥ |
| वादयन्महतीं वीणां स्वरतानविभूषिताम्।<br>गायत्रं गायमानस्तु साम सप्तस्वरान्वितम्॥ ४ | |
| दृष्टो मया देवदेवश्चक्रपाणिर्गदाधरः।<br>कौस्तुभोद्भासितोरस्को मेघश्यामश्चतुर्भुजः॥ ५ | वहाँ मैंने देवाधिदेव विष्णुभगवान्को देखा। वे हाथमें चक्र तथा गदा धारण किये हुए थे, उनके वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणि शोभायमान हो रही थी, वे मेघ-सदृश श्याम वर्णवाले थे, उनकी चार भुजाएँ थीं। वे पीत वस्त्र धारण किये हुए थे, मुकुट तथा बाजूबन्दसे सुशोभित थे तथा वे विलासमयी लक्ष्मीके साथ प्रमुदित होकर क्रीडा कर रहे थे॥ ५-६॥ |
| पीताम्बरपरीधानो मुकुटाङ्गदराजितः।<br>लक्ष्म्या सह विलासिन्या क्रीडमानो मुदा युतः॥ ६ |
८६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २८
| वीक्ष्य मां कमला देवी गतान्तर्धानमन्तिकात्।<br>सर्वलक्षणसम्पन्ना सर्वभूषणभूषिता॥ ७<br><br>नारीणां प्रवरा कान्ता रूपयौवनगर्विता।<br>सुप्रिया वासुदेवस्य वरचामीकरप्रभा॥ ८ | सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, समस्त आभूषणोंसे अलंकृत, कान्तियुक्त, अपने रूप-यौवनपर गर्व करनेवाली, नारियोंमें सर्वश्रेष्ठ, भगवान् विष्णुको अतिप्रिय तथा स्वर्णके समान आभावाली भगवती लक्ष्मी मुझे देखकर उनके पाससे अन्तःपुरमें चली गयीं॥ ७-८॥ |
| अन्तर्गृहं गतां दृष्ट्वा सिन्धुजां व्यञ्जनान्विताम्।<br>मया पृष्टो देवदेवो वनमाली जगत्प्रभुः॥ ९<br><br>भगवन्देवदेवेश पद्मनाभ सुरारिहन्।<br>कथं च मा गता दृष्ट्वा मामागच्छन्तमन्तिकात्॥ १०<br><br>नाहं विटो न वा धूर्तः तापसोऽहं जगद्गुरो।<br>जितेन्द्रियो जितक्रोधो जितमायो जनार्दन॥ ११ | व्यंजित अंगोंवाली लक्ष्मीजीको भवनमें गयी देखकर मैंने वनमाला धारण करनेवाले देवाधिदेव जगन्नाथ विष्णुसे पूछा—हे भगवन्! हे देवाधिदेव! हे पद्मनाभ! हे असुरविनाशन! मुझे आते हुए देखकर माता लक्ष्मीजी आपके पाससे क्यों चली गयीं? हे जगद्गुरो! मैं न तो कोई नीच हूँ और न धूर्त! हे जनार्दन! मैं इन्द्रियों, क्रोध तथा मायाको जीत लेनेवाला एक तपस्वी हूँ॥ ९-११॥ |
| नारद उवाच<br>निशम्य वचनं किञ्चिद् गर्वयुक्तं जनार्दनः।<br>उवाच मां स्मितं कृत्वा वीणावण्मधुरां गिरम्॥ १२ | **नारदजी बोले—**मेरा कुछ-कुछ अभिमानपूर्ण वचन सुनकर भगवान् विष्णु मुसकराकर वीणाके समान मधुर वाणीमें मुझसे कहने लगे॥ १२॥ |
| विष्णुरुवाच<br>नारदैवंविधा नीतिर्न स्थातव्यं कदाचन।<br>पतिं विनान्यसान्निध्ये कस्यचिद्योषया क्वचित्॥ १३ | **भगवान् विष्णु बोले—**हे नारद! ऐसी नीति है कि पतिके अतिरिक्त अन्य किसी भी पुरुषके सांनिध्यमें स्त्रीको कभी नहीं रहना चाहिये॥ १३॥ |
| माया सुदुर्जया विद्वन् योगिभिर्जितमारुतैः।<br>सांख्यविद्भिर्निराहारैस्तापसैश्च जितेन्द्रियैः॥ १४<br><br>देवैश्च मुनिशार्दूल यत्त्वयोक्तं वचोऽधुना।<br>जितमायोऽस्मि गीतज्ञ नैवं वाच्यं कदाचन॥ १५ | हे विद्वन्! वायु (श्वास)-को जीत लेनेवाले योगियों, सांख्यशास्त्रके ज्ञाताओं, निराहार रहनेवाले तपस्वियों तथा जितेन्द्रिय पुरुषों एवं देवताओंके लिये भी माया अत्यन्त दुर्जय है। हे मुनिवर! अभी आपने जो कहा है कि ‘मैंने मायापर विजय प्राप्त कर ली है’ तो हे गीतज्ञ! आपको ऐसा कभी नहीं बोलना चाहिये॥ १४-१५॥ |
| नाहं शिवो न वा ब्रह्मा जेतुं तां प्रभवोऽप्यजाम्।<br>मुनयः सनकाद्याश्च कस्त्वं केऽन्ये क्षमा जये॥ १६ | जब मैं, शिव, ब्रह्मा तथा सनक आदि मुनि भी उस अजन्मा मायापर विजय नहीं प्राप्त कर सके तब आप तथा अन्य कौन हैं, जो उसे जीतनेमें समर्थ हो सकते हैं?॥ १६॥ |
| देवदेहं नृदेहं वा तिर्यग्देहमथापि वा।<br>बिभृयाद्यः शरीरं च स कथं तां जयेदजाम्॥ १७ | देवता, मानव तथा पशु-पक्षी अथवा जो कोई शरीर धारण करनेवाला प्राणी हो, वह उस अजन्मा मायाको कैसे जीत सकता है?॥ १७॥ |
| त्रियुतस्तां कथं मायां जेतुं शक्तः पुमान्भवेत्।<br>वेदविद्योगविद्वापि सर्वज्ञो विजितेन्द्रियः॥ १८ | वेदका ज्ञाता, योगी, सर्वज्ञ, जितेन्द्रिय एवं सत्त्व-रज-तमसे युक्त कोई भी पुरुष मायाको जीतनेमें कैसे समर्थ हो सकता है?॥ १८॥ |
| अ० २८ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८६३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कालोऽपि तस्या रूपं हि रूपहीनः स्वरूपकृत्।<br>तद्वशे वर्तते देही विद्वान्मूर्खोऽथ मध्यमः॥ १९ | काल भी उसी मायाका ही रूप है। वह रूपहीन होते हुए भी स्वरूप धारण कर लेता है। विद्वान्, मूर्ख अथवा मध्यम श्रेणीका कोई भी व्यक्ति हो, वह उसके वशमें रहता है॥ १९॥ |
| कालः करोति धर्मज्ञं कदाचिद्विकलं पुनः।<br>स्वभावात्कर्मतो वापि दुर्ज्ञेयं तस्य चेष्टितम्॥ २० | कभी-कभी काल धर्मज्ञ पुरुषको भी उद्विग्न कर देता है। स्वभाव अथवा कर्मसे उस कालकी चेष्टा नहीं जानी जा सकती॥ २०॥ |
| नारद उवाच<br>इत्युक्त्वा विरतो विष्णुरहं विस्मयमानसः।<br>तमब्रुवं जगन्नाथं वासुदेवं सनातनम्॥ २१<br><br>रमापते कथंरूपा माया सा कीदृशी पुनः।<br>कियद्बला क्वसंस्थाना कस्याधारा वदस्व मे॥ २२<br><br>द्रष्टुकामोऽस्मि तां मायां दर्शयाशु महीधर।<br>ज्ञातुमिच्छामि तां सम्यक्प्रसादं कुरु मापते॥ २३ | **नारदजी बोले—**ऐसा कहकर विष्णुके चुप हो जानेपर मेरा मन सन्देहसे भर गया और मैंने उन जगन्नाथ सनातन वासुदेवसे पूछा—हे रमाकान्त! आप मुझे यह बतायें कि उस मायाका रूप क्या है, उसकी आकृति कैसी है, उसमें कितनी शक्ति है, वह कहाँ रहती है तथा उसका आधार क्या है? हे महीधर! मैं उस मायाको देखना चाहता हूँ, अतः मुझे उसका शीघ्र दर्शन कराइये। हे लक्ष्मीकान्त! मैं उसके विषयमें सम्यक् जानना चाहता हूँ; मुझपर कृपा कीजिये॥ २१—२३॥ |
| विष्णुरुवाच<br>त्रिगुणा साखिलाधारा सर्वज्ञा सर्वसम्मता।<br>अजेयानेकरूपा च सर्वं व्याप्य स्थिता जगत्॥ २४ | **भगवान् विष्णु बोले—**अखिल जगत्को धारण करनेवाली वह माया त्रिगुणात्मिका, सर्वज्ञा, सर्वसम्मता, अजेया, अनेकरूपा तथा सम्पूर्ण संसारको अपनेमें व्याप्त करके स्थित है॥ २४॥ |
| दिदृक्षा यदि ते चित्ते नारदारोहणं कुरु।<br>गरुडे मत्समेतोऽद्य गच्छावोऽन्यत्र साम्प्रतम्॥ २५ | हे नारद! यदि तुम्हारे मनमें उस मायाको देखनेकी इच्छा है तो मेरे साथ अभी गरुडपर आरूढ़ हो जाओ; हम दोनों अन्य लोकमें इसी समय चलते हैं॥ २५॥ |
| दर्शयिष्यामि ते मायां दुर्जयामजितात्मभिः।<br>दृष्ट्वा तां ब्रह्मपुत्र त्वं विषादे मा मनः कृथाः॥ २६ | हे ब्रह्मपुत्र! वहाँ मैं तुम्हें अजितात्माओंके लिये अजेय मायाका दर्शन कराऊँगा, किंतु उसे देखकर तुम अपने मनको विषादग्रस्त मत होने देना॥ २६॥ |
| इत्युक्त्वा देवदेवो मां सस्मार विनतासुतम्।<br>स्मृतमात्रस्तु गरुडस्तदागाद्धरिसन्निधौ॥ २७ | मुझसे ऐसा कहकर देवाधिदेव भगवान् विष्णुने विनतापुत्र गरुडका स्मरण किया। स्मरण करते ही गरुड भगवान् विष्णुके समक्ष उपस्थित हो गये॥ २७॥ |
| आगतं गरुडं वीक्ष्य आरुरोह जनार्दनः।<br>समारोप्य च मां पृष्ठे गमनाय कृतादरः॥ २८ | गरुडको आया हुआ देखकर भगवान् विष्णु मुझे अत्यन्त आदरपूर्वक पीछे बैठाकर प्रस्थान करनेके लिये उसपर आरूढ़ हो गये॥ २८॥ |
| चलितो विनतापुत्रो वैकुण्ठाद्वायुवेगवान्।<br>प्रेरितो यत्र कृष्णेन गन्तुकामेन काननम्॥ २९ | जिस वन-प्रदेशमें भगवान् विष्णु जाना चाहते थे, वहाँके लिये प्रेरित किये गये वायुसदृश वेगवान् विनतापुत्र गरुडने वैकुण्ठसे प्रस्थान किया॥ २९॥ |
| ८६४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २८ |
|---|
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| महावनानि दिव्यानि सरांसि सरितस्तथा।<br>पुरग्रामाकरादींश्च खेटखर्वटगोव्रजान्॥ ३०<br>मुनीनामाश्रमान् रम्यान् वापीश्च सुमनोहराः।<br>पल्वलानि विशालानि ह्रदान् पङ्कजभूषितान्॥ ३१<br>मृगाणां च वराहाणां वृन्दान्यप्यवलोक्य च।<br>गतावावां कान्यकुब्जसमीपं गरुडासनौ॥ ३२ | गरुडपर आसीन हम दोनों बहुत-से विशाल वनों, दिव्य सरोवरों, नदियों, ग्राम-नगरों, पर्वतके आस-पासकी बस्तियों, गायोंके गोष्ठों, मुनियोंके मनोहर आश्रमों, सुन्दर बावलियों, छोटे-बड़े तालाबों, कमलोंसे सुशोभित विस्तृत तथा गहरे ह्रदों एवं मृगों तथा वराहोंके बहुतसे समूहोंको देखते हुए कान्यकुब्जनगरके पास पहुँच गये॥ ३०—३२॥ |
| तत्र रम्यं सरो दिव्यं दृष्टं पङ्कजमण्डितम्।<br>हंसकारण्डवाकीर्णं चक्रवाकोपशोभितम्॥ ३३<br>नानावर्णैः प्रफुल्लैश्च पङ्कजैरुपराजितम्।<br>शुचि मिष्टजलं भृङ्गयूथनादविराजितम्॥ ३४ | वहाँ कमलोंसे मण्डित, हंस तथा सारसोंसे युक्त, चक्रवाकोंसे सुशोभित, अनेक वर्णोंवाले खिले हुए कमलोंसे शोभायमान, झुण्ड-के-झुण्ड भौरोंकी ध्वनिसे गुंजित एवं पवित्र तथा मधुर जलवाला एक दिव्य तथा रमणीय सरोवर दिखायी पड़ा॥ ३३-३४॥ |
| मामाह भगवान् वीक्ष्य तडागं परमाद्भुतम्।<br>स्पर्धकं चोदधेः क्षीरं मिष्टं वारि विशेषतः॥ ३५ | क्षीरसागरके मधुर दुग्धकी समानता करनेवाले विशिष्ट जलसे युक्त उस परम अद्भुत सरोवरको देखकर भगवान् विष्णु मुझसे कहने लगे॥ ३५॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>पश्य नारद गम्भीरं सरः सारसनादितम्।<br>सर्वत्र पङ्कजैश्छन्नं स्वच्छनीरप्रपूरितम्॥ ३६ | श्रीभगवान् बोले— हे नारद! सर्वत्र कमलोंसे आच्छादित, स्वच्छ जलसे परिपूर्ण तथा सारसकी ध्वनिसे निनादित हो रहे इस अगाध सरोवरको देखो॥ ३६॥ |
| अत्र स्नात्वा गमिष्यावः कान्यकुब्जं पुरोत्तमम्।<br>इत्युक्त्वा गरुडादाशु मामुत्तार्य व्यतारयत्॥ ३७ | इसीमें स्नान करके हमलोग श्रेष्ठ नगर कान्यकुब्जमें चलेंगे—ऐसा कहकर भगवान् विष्णु मुझे शीघ्र ही गरुडसे उतारकर आगे ले गये॥ ३७॥ |
| विहस्य भगवांस्तत्र जग्राह मम तर्जनीम्।<br>स्तुवन्सरोवरं भूयस्तीरे मामनयत्प्रभुः॥ ३८ | उन्होंने हँसते हुए मेरी तर्जनी अँगुली पकड़ी और बार-बार उस सरोवरकी प्रशंसा करते हुए वे मुझे तीरपर ले गये॥ ३८॥ |
| विश्रम्य तटभागे तु स्निग्धच्छाये मनोहरे।<br>मामुवाच मुने स्नानं कुरु त्वं विमले जले॥ ३९<br>पश्चादहं करिष्यामि तडागेऽस्मिन्सुपावने।<br>साधूनामिव चेतांसि जलानि निर्मलानि च॥ ४०<br>सुरभीणि परागैस्तु पङ्कजानां विशेषतः। | वृक्षोंकी घनी छायावाले मनोहर तटभागपर कुछ समय विश्राम करनेके बाद भगवान् विष्णुने मुझसे कहा—हे मुने! आप इस स्वच्छ जलमें पहले स्नान कर लें, तत्पश्चात् मैं इस परम पवित्र सरोवरमें स्नान करूँगा। इस सरोवरका जल साधुजनोंके चित्तकी भाँति निर्मल तथा कमलोंके परागसे विशेषरूपसे सुगन्धित है॥ ३९-४० १/२॥ |
| इत्युक्तोऽहं भगवता मुक्त्वा वीणां मृगाजिनम्॥ ४१ | भगवान्के ऐसा कहनेपर मैंने स्नान करनेका मन बना लिया और अपनी वीणा तथा मृगचर्म वहीं रखकर मैं प्रेमपूर्वक तटपर चला गया॥ ४१ १/२॥ |
| स्नानाय कृतधीस्तीरे गतः प्रेमसमन्वितः।<br>पादौ प्रक्षाल्य हस्तौ च शिखां बद्ध्वा कुशग्रहम्॥ ४२<br>कृत्वाचम्य शुचिस्तोये स्नातवानस्मि तज्जले। | हाथ-पैर धोकर और शिखा बाँधकर मैंने हाथमें कुश ले लिया। पुनः पवित्र जलसे आचमन करके मैं उस जलमें स्नान करने लगा। जब मैं उस मनोहर |
अ० २८ ] षष्ठ स्कन्ध ८६५
अ० २८ ] षष्ठ स्कन्ध ८६५
| यदा तस्मिञ्जले रम्ये स्नातोऽहं पश्यतो हरेः ॥ ४३ <br><br> विहाय पौरुषं रूपं प्राप्तः स्त्रीत्वमनुत्तमम् ।<br>हरिर्गृहीत्वा वीणां मे तथा कृष्णाजिनं शुभम् ॥ ४४<br><br>आरुह्य गरुडं तूर्णं जगाम स्वगृहं क्षणात् ।<br>ततोऽहं स्त्रीत्वमापन्नश्चारुभूषणभूषितः ॥ ४५ | जलमें स्नान कर रहा था, उसी समय भगवान्के देखते-देखते मैं अपना पुरुषरूप छोड़कर एक सुन्दर नारीके रूपमें परिणत हो गया॥ ४२-४३ १/२॥<br><br>उसी क्षण मेरी वीणा तथा पवित्र मृगचर्म लेकर भगवान् विष्णु गरुडपर आरूढ़ होकर शीघ्र ही अपने धाम चले गये। इधर मैं सुन्दर भूषणोंसे भूषित होकर स्त्रीके रूपमें हो गया॥ ४४-४५॥ |
| तत्क्षणान्मनसो जाता पूर्वदेहस्य विस्मृतिः ।<br>विस्मृतोऽसौ जगन्नाथो महती विस्मृता पुनः ॥ ४६ | उसी समयसे मेरे मनमें पूर्वदेहकी विस्मृति हो गयी। मैं भगवान् विष्णु तथा अपनी महती वीणाको भी भूल गया॥ ४६॥ |
| सम्प्राप्य मोहिनीरूपं तडागान्निर्गतो बहिः ।<br>अपश्यं नलिनीजुष्टं सरस्तद्विमलोदकम् ॥ ४७ | मोहिनीरूप प्राप्त करके मैं सरोवरसे बाहर निकला और स्वच्छ जलवाले तथा कमलोंसे परिपूर्ण उस सरोवरको देखने लगा॥ ४७॥ |
| किमेतदिति मनसाकरवं विस्मयं मुहुः ।<br>एवं चिन्तयमानस्य नारीरूपधरस्य मे ॥ ४८ <br><br> सहसा दृक्पथं प्राप्तस्तत्र तालध्वजो नृपः ।<br>गजाश्वरथवृन्दैश्च संवृतो रथसंस्थितः ॥ ४९ <br><br> युवा भूषणसंवीतो देहवानिव मन्मथः । | मैं मनमें बार-बार विस्मय कर रहा था कि ‘यह क्या है!’ नारीरूपको प्राप्त मैं ऐसा सोच ही रहा था कि मुझे तालध्वज नामक राजा अचानक दिखायी पड़े। हाथीके समूहोंसे घिरे हुए वे रथपर बैठे हुए थे। युवावस्थावाले तथा आभूषणोंसे सुशोभित राजा तालध्वज शरीर धारण किये साक्षात् कामदेवके समान प्रतीत हो रहे थे॥ ४८-४९ १/२॥ |
| वीक्ष्य मां भूपतिस्तत्र दिव्यभूषणभूषिताम् ॥ ५० <br><br> राकाचन्द्रमुखीं योषां विस्मयं परमं गतः ।<br>पप्रच्छ कासि कल्याणि कस्य पुत्री सुरस्य वा ॥ ५१ <br><br> मानुषस्य च वा कान्ते गन्धर्वस्योरगस्य च ।<br>एकाकिनी कथं बाला रूपयौवनभूषिता ॥ ५२ | पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान मुखवाली तथा दिव्य आभूषणोंसे मण्डित मुझ रमणीको देखकर राजाको महान् आश्चर्य हुआ और उन्होंने मुझसे पूछा—हे कल्याणि! तुम कौन हो? हे कान्ते! तुम किस देवता, मनुष्य, गन्धर्व अथवा नागकी पुत्री हो? रूप तथा यौवनसे सम्पन्न युवती होते हुए भी तुम यहाँ अकेली क्यों हो?॥ ५०-५२॥ |
| विवाहिताथ कन्या वा सत्यं वद सुलोचने ।<br>किं पश्यसि सुकेशान्ते तडागेऽस्मिन्सुमध्यमे ॥ ५३ | हे सुनयने! तुम सच-सच बताओ कि तुम विवाहिता हो अथवा कुमारी! हे सुकेशान्ते! हे सुमध्यमे! तुम इस सरोवरमें क्या देख रही हो?॥ ५३॥ |
| चिकीर्षितं पिकालापे ब्रूहि मन्मथमोहिनि ।<br>भुङ्क्ष्व भोगान्मरालाक्षि मया सह कृशोदरि ।<br>वाञ्छितान्मनसा नूनं कृत्वा मां पतिमुत्तमम् ॥ ५४ | हे पिकभाषिणि! मन्मथमोहिनि! तुम अपनी अभिलाषा व्यक्त करो। हे मरालाक्षि! हे कृशोदरि! मुझ उत्तम राजाको अपना पति बनाकर मेरे साथ तुम निःसन्देह मनोवांछित सुखोंका उपभोग करो॥ ५४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे
नारदेन स्वस्त्रीत्वप्राप्तिवर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८ ॥
~ ~ ~ ० ~ ~ ~
| ८६६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २९ |
|---|
अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः
राजा तालध्वजसे स्त्रीरूपधारी नारदजीका विवाह, अनेक पुत्र-पौत्रोंकी उत्पत्ति और युद्धमें उन सबकी मृत्यु, नारदजीका शोक और भगवान् विष्णुकी कृपासे पुनः स्वरूपबोध
| नारद उवाच | |
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| इत्युक्तोऽहं तदा तेन राज्ञा तालध्वजेन च।<br>विमृश्य मनसात्यर्थं तमुवाच विशांपते॥ १<br>राजन्नाहं विजानामि पुत्री कस्येति निश्चयम्।<br>पितरौ क्व च मे केन स्थापिता च सरोवरे॥ २ | नारदजी बोले—हे विशाम्पते! राजा तालध्वजके यह पूछनेपर मैंने अपने मनमें सम्यक् प्रकारसे विचार करके उनसे कहा—हे राजन्! मैं निश्चितरूपसे नहीं जानती कि मैं किसकी कन्या हूँ, मेरे माता-पिता कौन हैं और मुझे इस सरोवरपर कौन लाया है॥ १-२॥ |
| किं करोमि क्व गच्छामि कथं मे सुकृतं भवेत्।<br>निराधारास्मि राजेन्द्र चिन्तयामि चिकीर्षितम्॥ ३ | अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, मेरा कल्याण कैसे हो सकेगा, मैं आश्रयहीन हूँ। हे राजेन्द्र! यही बात सोचती रहती हूँ॥ ३॥ |
| दैवमेव परं राजन्नास्त्यत्र पौरुषं मम।<br>धर्मज्ञोऽसि महीपाल यथेच्छसि तथा कुरु॥ ४ | हे राजन्! दैव ही सर्वोपरि है; इसमें मेरा पौरुष व्यर्थ ही है। हे भूपाल! आप धर्मज्ञ हैं; आप जैसा चाहते हों, वैसा करें॥ ४॥ |
| तवाधीनास्म्यहं भूप न मे कोऽप्यस्ति पालकः।<br>न पिता न च माता च न स्थानं न च बान्धवाः॥ ५ | हे राजन्! मैं आपके अधीन हूँ; क्योंकि मेरा यहाँ कोई भी रक्षक नहीं है। मेरे न पिता हैं, न माता हैं, न बन्धु-बान्धव हैं और न तो मेरा कोई स्थान ही है॥ ५॥ |
| इत्युक्तोऽसौ मया राजा बभूव मदनातुरः।<br>मां निरीक्ष्य विशालाक्षीं सेवकानित्युवाच ह॥ ६ | मेरे ऐसा कहनेपर वे राजा तालध्वज कामासक्त हो उठे और मुझ विशाल नयनोंवालीकी ओर दृष्टि डालकर उन्होंने अपने सेवकोंसे कहा—॥ ६॥ |
| नरयानमानयध्वं चतुर्वाहं मनोहरम्।<br>आरोहणार्थमस्यास्तु कौशेयाम्बरवेष्टितम्॥ ७<br>मृद्वास्तरणसंयुक्तं मुक्ताजालविभूषितम्।<br>चतुरस्रं विशालं च सुवर्णरचितं शुभम्॥ ८ | तुमलोग इस सुन्दर स्त्रीके आरोहणके लिये रेशमी वस्त्रसे आवेष्टित एक मनोहर पालकी ले आओ, जिसे ढोनेवाले चार पुरुष हों, उसमें कोमल आस्तरण बिछा हो तथा वह मोतियोंकी झालरोंसे सुशोभित हो, वह सोनेकी बनी हुई हो, चौकोर हो तथा पर्याप्त विशाल हो॥ ७-८॥ |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा भृत्याः सत्वरगामिनः।<br>आनिन्युः शिबिकां दिव्यां मदर्थे वस्त्रवेष्टिताम्॥ ९ | राजाकी बात सुनकर शीघ्रगामी सेवकोंने मेरे लिये वस्त्रसे ढकी हुई दिव्य पालकी लाकर उपस्थित कर दी॥ ९॥ |
| आरूढाऽहं तदा तस्यां तस्य प्रियचिकीर्षया।<br>मुदितोऽसौ गृहे नीत्वा मां तदा पृथिवीपतिः॥ १० | उन राजा तालध्वजका प्रिय कार्य करनेकी इच्छासे मैं उस पालकीपर आरूढ़ हो गया। मुझे अपने भवन ले जाकर राजा तालध्वज अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ १०॥ |
| विवाहविधिना राजा शुभे लग्ने शुभे दिने।<br>उपयेमे च मां तत्र हुतभुक्सन्निधौ ततः॥ ११ | किसी शुभ लग्न तथा उत्तम दिनमें राजाने वैवाहिक विधि-विधानसे अग्निके साक्ष्यमें मेरे साथ विवाह कर लिया॥ ११॥ |
| तस्याहं वल्लभा जाता प्राणेभ्योऽपि गरीयसी।<br>सौभाग्यसुन्दरीत्येवं नाम तत्र कृतं मम॥ १२ | उस समय मैं उनके लिये प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हो गया। उन्होंने वहाँ मेरा नाम सौभाग्यसुन्दरी—ऐसा रख दिया॥ १२॥ |
| अ० २९ ] | षष्ठ स्कन्ध | ८६७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| रममाणो मया सार्धं सुखमाप महीपतिः।<br>नानाभोगविलासैश्च कामशास्त्रोदितैस्तथा ॥ १३ | कामशास्त्रानुकूल अनेक प्रकारके भोग-विलासोंके द्वारा मेरे साथ रमण करते हुए राजाको आनन्द मिलता था॥ १३॥ |
| राजकार्याणि सन्त्यज्य क्रीडासक्तो दिवानिशम्।<br>नासौ विवेद गच्छन्तं कालं कामकलारतः॥ १४ | राज्यके कार्योंको छोड़कर वे दिन-रात मेरे साथ क्रीडारत रहते थे। कामकलामें आसक्त उन राजाको समय बीतनेका भी बोध नहीं रहता था॥ १४॥ |
| उद्यानेषु च रम्येषु वापीषु च गृहेषु च।<br>हर्म्येषु वरशैलेषु दीर्घिकासु वरासु च॥ १५<br>वारुणीमदमत्तोऽसौ विहरन्कानने शुभे।<br>विसृज्य सर्वकार्याणि मदधीनो बभूव ह॥ १६ | मनोहर उद्यानों, बावलियों, सुन्दर महलों, अट्टालिकाओं, श्रेष्ठ पर्वतों, उत्तम जलाशयों तथा रमणीक काननमें विहार करते हुए मधुपानसे उन्मत्त वे राजा समस्त कार्य छोड़कर मेरे अधीन हो गये॥ १५-१६॥ |
| व्यासाहं तेन संसक्ता क्रीडारसवशीकृता।<br>स्मृतवान्पूर्वदेहं न पुंभावं मुनिजन्म च॥ १७ | हे व्यासजी! उनमें मेरी भी पूर्ण आसक्ति हो गयी और मैं क्रीडारसके वशीभूत हो गया। मुझे अपने पूर्व पुरुष-शरीर तथा मुनि-जन्मका भी स्मरण नहीं रहा॥ १७॥ |
| ममैवायं पतिर्योषाहं पत्नीषु प्रिया सती।<br>पट्टराज्ञी विलासज्ञा सफलं जीवितं मम॥ १८<br>इति चिन्तयती तस्मिन्प्रेमबद्धा दिवानिशम्।<br>क्रीडासक्ता सुखे लुब्धा तं स्थिता वशवर्तिनी॥ १९<br>विस्मृतं ब्रह्मविज्ञानं ब्रह्मज्ञानं च शाश्वतम्।<br>धर्मशास्त्रपरिज्ञानं तदासक्तमनाः स्थिता॥ २० | ये ही मेरे पति हैं तथा इनकी अनेक पत्नियोंमें मैं ही इनकी प्रिय पतिव्रता भार्या हूँ, सम्पूर्ण विलासोंको जाननेवाली मैं इनकी पटरानी हूँ; इस प्रकार मेरा जीवन सफल है—ऐसा सोचती हुई मैं दिन-रात उन्हींके प्रेममें आबद्ध रहती थी तथा उनके साथ क्रीडारत रहती थी। इस तरह उनके सुखके लोभमें मैं सदा उन्हींके अधीन हो गयी। मेरा ब्रह्मविज्ञान, सनातन ब्रह्मज्ञान तथा धर्मशास्त्रका रहस्य पूर्णरूपसे विस्मृत हो गया और मैं उन्हींमें आसक्त-मन होकर रहने लगी॥ १८–२०॥ |
| एवं विहरतस्तत्र वर्षाणि द्वादशैव तु।<br>गतानि क्षणवत्कामक्रीडासक्तस्य मे मुने॥ २१ | हे मुने! इस प्रकार कामक्रीडामें आसक्त मेरे वहाँ विहार करते हुए बारह वर्ष एक क्षणकी भाँति व्यतीत हो गये॥ २१॥ |
| जाता गर्भवती चाहं मुदं प्राप नृपस्तदा।<br>कारयामास विधिवद् गर्भसंस्कारकर्म च॥ २२ | मेरे गर्भवती होनेपर राजाको परम प्रसन्नता हुई। राजाने विधिपूर्वक गर्भसम्बन्धी संस्कारकर्म सम्पन्न कराया॥ २२॥ |
| अपृच्छद्दोहदं राजा प्रीणयन्मां पुनः पुनः।<br>नाब्रुवं लज्जमानाहं नृपं प्रीतमना भृशम्॥ २३ | गर्भके समय मेरी मनोवांछित वस्तुओंके विषयमें राजा मुझे प्रसन्न करते हुए बार-बार पूछा करते थे। तब अत्यन्त प्रसन्नचित्त मैं लज्जाके कारण कुछ भी नहीं कह पाती थी॥ २३॥ |
| सम्पूर्णे दशमे मासि पुत्रो जातस्ततो मम।<br>शुभेऽह्नि ग्रहनक्षत्रलग्नताराबलान्विते॥ २४ | दस माह पूर्ण होनेपर ग्रह, नक्षत्र, लग्न तथा तारा-बलयुक्त शुभ दिनमें मुझे एक पुत्र उत्पन्न हुआ॥ २४॥ |
| बभूव नृपतेर्गेहे पुत्रजन्ममहोत्सवः।<br>राजा परमसन्तुष्टो बभूव सुतजन्मतः॥ २५ | राजाके भवनमें पुत्र-जन्मका उत्सव मनाया गया। पुत्र-जन्मसे राजा परम प्रसन्न हो गये॥ २५॥ |