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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 871 of 889

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Page 871

८६२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २८

वीक्ष्य मां कमला देवी गतान्तर्धानमन्तिकात्।<br>सर्वलक्षणसम्पन्ना सर्वभूषणभूषिता॥ ७<br><br>नारीणां प्रवरा कान्ता रूपयौवनगर्विता।<br>सुप्रिया वासुदेवस्य वरचामीकरप्रभा॥ ८सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, समस्त आभूषणोंसे अलंकृत, कान्तियुक्त, अपने रूप-यौवनपर गर्व करनेवाली, नारियोंमें सर्वश्रेष्ठ, भगवान् विष्णुको अतिप्रिय तथा स्वर्णके समान आभावाली भगवती लक्ष्मी मुझे देखकर उनके पाससे अन्तःपुरमें चली गयीं॥ ७-८॥
अन्तर्गृहं गतां दृष्ट्वा सिन्धुजां व्यञ्जनान्विताम्।<br>मया पृष्टो देवदेवो वनमाली जगत्प्रभुः॥ ९<br><br>भगवन्देवदेवेश पद्मनाभ सुरारिहन्।<br>कथं च मा गता दृष्ट्वा मामागच्छन्तमन्तिकात्॥ १०<br><br>नाहं विटो न वा धूर्तः तापसोऽहं जगद्गुरो।<br>जितेन्द्रियो जितक्रोधो जितमायो जनार्दन॥ ११व्यंजित अंगोंवाली लक्ष्मीजीको भवनमें गयी देखकर मैंने वनमाला धारण करनेवाले देवाधिदेव जगन्नाथ विष्णुसे पूछा—हे भगवन्! हे देवाधिदेव! हे पद्मनाभ! हे असुरविनाशन! मुझे आते हुए देखकर माता लक्ष्मीजी आपके पाससे क्यों चली गयीं? हे जगद्गुरो! मैं न तो कोई नीच हूँ और न धूर्त! हे जनार्दन! मैं इन्द्रियों, क्रोध तथा मायाको जीत लेनेवाला एक तपस्वी हूँ॥ ९-११॥
नारद उवाच<br>निशम्य वचनं किञ्चिद् गर्वयुक्तं जनार्दनः।<br>उवाच मां स्मितं कृत्वा वीणावण्मधुरां गिरम्॥ १२**नारदजी बोले—**मेरा कुछ-कुछ अभिमानपूर्ण वचन सुनकर भगवान् विष्णु मुसकराकर वीणाके समान मधुर वाणीमें मुझसे कहने लगे॥ १२॥
विष्णुरुवाच<br>नारदैवंविधा नीतिर्न स्थातव्यं कदाचन।<br>पतिं विनान्यसान्निध्ये कस्यचिद्योषया क्वचित्॥ १३**भगवान् विष्णु बोले—**हे नारद! ऐसी नीति है कि पतिके अतिरिक्त अन्य किसी भी पुरुषके सांनिध्यमें स्त्रीको कभी नहीं रहना चाहिये॥ १३॥
माया सुदुर्जया विद्वन् योगिभिर्जितमारुतैः।<br>सांख्यविद्भिर्निराहारैस्तापसैश्च जितेन्द्रियैः॥ १४<br><br>देवैश्च मुनिशार्दूल यत्त्वयोक्तं वचोऽधुना।<br>जितमायोऽस्मि गीतज्ञ नैवं वाच्यं कदाचन॥ १५हे विद्वन्! वायु (श्वास)-को जीत लेनेवाले योगियों, सांख्यशास्त्रके ज्ञाताओं, निराहार रहनेवाले तपस्वियों तथा जितेन्द्रिय पुरुषों एवं देवताओंके लिये भी माया अत्यन्त दुर्जय है। हे मुनिवर! अभी आपने जो कहा है कि ‘मैंने मायापर विजय प्राप्त कर ली है’ तो हे गीतज्ञ! आपको ऐसा कभी नहीं बोलना चाहिये॥ १४-१५॥
नाहं शिवो न वा ब्रह्मा जेतुं तां प्रभवोऽप्यजाम्।<br>मुनयः सनकाद्याश्च कस्त्वं केऽन्ये क्षमा जये॥ १६जब मैं, शिव, ब्रह्मा तथा सनक आदि मुनि भी उस अजन्मा मायापर विजय नहीं प्राप्त कर सके तब आप तथा अन्य कौन हैं, जो उसे जीतनेमें समर्थ हो सकते हैं?॥ १६॥
देवदेहं नृदेहं वा तिर्यग्देहमथापि वा।<br>बिभृयाद्यः शरीरं च स कथं तां जयेदजाम्॥ १७देवता, मानव तथा पशु-पक्षी अथवा जो कोई शरीर धारण करनेवाला प्राणी हो, वह उस अजन्मा मायाको कैसे जीत सकता है?॥ १७॥
त्रियुतस्तां कथं मायां जेतुं शक्तः पुमान्भवेत्।<br>वेदविद्योगविद्वापि सर्वज्ञो विजितेन्द्रियः॥ १८वेदका ज्ञाता, योगी, सर्वज्ञ, जितेन्द्रिय एवं सत्त्व-रज-तमसे युक्त कोई भी पुरुष मायाको जीतनेमें कैसे समर्थ हो सकता है?॥ १८॥