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देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished889 pages

Page 872 of 889

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Page 872
अ० २८ ]षष्ठ स्कन्ध८६३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कालोऽपि तस्या रूपं हि रूपहीनः स्वरूपकृत्।<br>तद्वशे वर्तते देही विद्वान्मूर्खोऽथ मध्यमः॥ १९काल भी उसी मायाका ही रूप है। वह रूपहीन होते हुए भी स्वरूप धारण कर लेता है। विद्वान्, मूर्ख अथवा मध्यम श्रेणीका कोई भी व्यक्ति हो, वह उसके वशमें रहता है॥ १९॥
कालः करोति धर्मज्ञं कदाचिद्विकलं पुनः।<br>स्वभावात्कर्मतो वापि दुर्ज्ञेयं तस्य चेष्टितम्॥ २०कभी-कभी काल धर्मज्ञ पुरुषको भी उद्विग्न कर देता है। स्वभाव अथवा कर्मसे उस कालकी चेष्टा नहीं जानी जा सकती॥ २०॥
नारद उवाच<br>इत्युक्त्वा विरतो विष्णुरहं विस्मयमानसः।<br>तमब्रुवं जगन्नाथं वासुदेवं सनातनम्॥ २१<br><br>रमापते कथंरूपा माया सा कीदृशी पुनः।<br>कियद्बला क्वसंस्थाना कस्याधारा वदस्व मे॥ २२<br><br>द्रष्टुकामोऽस्मि तां मायां दर्शयाशु महीधर।<br>ज्ञातुमिच्छामि तां सम्यक्प्रसादं कुरु मापते॥ २३**नारदजी बोले—**ऐसा कहकर विष्णुके चुप हो जानेपर मेरा मन सन्देहसे भर गया और मैंने उन जगन्नाथ सनातन वासुदेवसे पूछा—हे रमाकान्त! आप मुझे यह बतायें कि उस मायाका रूप क्या है, उसकी आकृति कैसी है, उसमें कितनी शक्ति है, वह कहाँ रहती है तथा उसका आधार क्या है? हे महीधर! मैं उस मायाको देखना चाहता हूँ, अतः मुझे उसका शीघ्र दर्शन कराइये। हे लक्ष्मीकान्त! मैं उसके विषयमें सम्यक् जानना चाहता हूँ; मुझपर कृपा कीजिये॥ २१—२३॥
विष्णुरुवाच<br>त्रिगुणा साखिलाधारा सर्वज्ञा सर्वसम्मता।<br>अजेयानेकरूपा च सर्वं व्याप्य स्थिता जगत्॥ २४**भगवान् विष्णु बोले—**अखिल जगत्‌को धारण करनेवाली वह माया त्रिगुणात्मिका, सर्वज्ञा, सर्वसम्मता, अजेया, अनेकरूपा तथा सम्पूर्ण संसारको अपनेमें व्याप्त करके स्थित है॥ २४॥
दिदृक्षा यदि ते चित्ते नारदारोहणं कुरु।<br>गरुडे मत्समेतोऽद्य गच्छावोऽन्यत्र साम्प्रतम्॥ २५हे नारद! यदि तुम्हारे मनमें उस मायाको देखनेकी इच्छा है तो मेरे साथ अभी गरुडपर आरूढ़ हो जाओ; हम दोनों अन्य लोकमें इसी समय चलते हैं॥ २५॥
दर्शयिष्यामि ते मायां दुर्जयामजितात्मभिः।<br>दृष्ट्वा तां ब्रह्मपुत्र त्वं विषादे मा मनः कृथाः॥ २६हे ब्रह्मपुत्र! वहाँ मैं तुम्हें अजितात्माओंके लिये अजेय मायाका दर्शन कराऊँगा, किंतु उसे देखकर तुम अपने मनको विषादग्रस्त मत होने देना॥ २६॥
इत्युक्त्वा देवदेवो मां सस्मार विनतासुतम्।<br>स्मृतमात्रस्तु गरुडस्तदागाद्धरिसन्निधौ॥ २७मुझसे ऐसा कहकर देवाधिदेव भगवान् विष्णुने विनतापुत्र गरुडका स्मरण किया। स्मरण करते ही गरुड भगवान् विष्णुके समक्ष उपस्थित हो गये॥ २७॥
आगतं गरुडं वीक्ष्य आरुरोह जनार्दनः।<br>समारोप्य च मां पृष्ठे गमनाय कृतादरः॥ २८गरुडको आया हुआ देखकर भगवान् विष्णु मुझे अत्यन्त आदरपूर्वक पीछे बैठाकर प्रस्थान करनेके लिये उसपर आरूढ़ हो गये॥ २८॥
चलितो विनतापुत्रो वैकुण्ठाद्वायुवेगवान्।<br>प्रेरितो यत्र कृष्णेन गन्तुकामेन काननम्॥ २९जिस वन-प्रदेशमें भगवान् विष्णु जाना चाहते थे, वहाँके लिये प्रेरित किये गये वायुसदृश वेगवान् विनतापुत्र गरुडने वैकुण्ठसे प्रस्थान किया॥ २९॥