देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished889 pages
Page 874 of 889
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अ० २८ ] षष्ठ स्कन्ध ८६५
| यदा तस्मिञ्जले रम्ये स्नातोऽहं पश्यतो हरेः ॥ ४३ <br><br> विहाय पौरुषं रूपं प्राप्तः स्त्रीत्वमनुत्तमम् ।<br>हरिर्गृहीत्वा वीणां मे तथा कृष्णाजिनं शुभम् ॥ ४४<br><br>आरुह्य गरुडं तूर्णं जगाम स्वगृहं क्षणात् ।<br>ततोऽहं स्त्रीत्वमापन्नश्चारुभूषणभूषितः ॥ ४५ | जलमें स्नान कर रहा था, उसी समय भगवान्के देखते-देखते मैं अपना पुरुषरूप छोड़कर एक सुन्दर नारीके रूपमें परिणत हो गया॥ ४२-४३ १/२॥<br><br>उसी क्षण मेरी वीणा तथा पवित्र मृगचर्म लेकर भगवान् विष्णु गरुडपर आरूढ़ होकर शीघ्र ही अपने धाम चले गये। इधर मैं सुन्दर भूषणोंसे भूषित होकर स्त्रीके रूपमें हो गया॥ ४४-४५॥ |
| तत्क्षणान्मनसो जाता पूर्वदेहस्य विस्मृतिः ।<br>विस्मृतोऽसौ जगन्नाथो महती विस्मृता पुनः ॥ ४६ | उसी समयसे मेरे मनमें पूर्वदेहकी विस्मृति हो गयी। मैं भगवान् विष्णु तथा अपनी महती वीणाको भी भूल गया॥ ४६॥ |
| सम्प्राप्य मोहिनीरूपं तडागान्निर्गतो बहिः ।<br>अपश्यं नलिनीजुष्टं सरस्तद्विमलोदकम् ॥ ४७ | मोहिनीरूप प्राप्त करके मैं सरोवरसे बाहर निकला और स्वच्छ जलवाले तथा कमलोंसे परिपूर्ण उस सरोवरको देखने लगा॥ ४७॥ |
| किमेतदिति मनसाकरवं विस्मयं मुहुः ।<br>एवं चिन्तयमानस्य नारीरूपधरस्य मे ॥ ४८ <br><br> सहसा दृक्पथं प्राप्तस्तत्र तालध्वजो नृपः ।<br>गजाश्वरथवृन्दैश्च संवृतो रथसंस्थितः ॥ ४९ <br><br> युवा भूषणसंवीतो देहवानिव मन्मथः । | मैं मनमें बार-बार विस्मय कर रहा था कि ‘यह क्या है!’ नारीरूपको प्राप्त मैं ऐसा सोच ही रहा था कि मुझे तालध्वज नामक राजा अचानक दिखायी पड़े। हाथीके समूहोंसे घिरे हुए वे रथपर बैठे हुए थे। युवावस्थावाले तथा आभूषणोंसे सुशोभित राजा तालध्वज शरीर धारण किये साक्षात् कामदेवके समान प्रतीत हो रहे थे॥ ४८-४९ १/२॥ |
| वीक्ष्य मां भूपतिस्तत्र दिव्यभूषणभूषिताम् ॥ ५० <br><br> राकाचन्द्रमुखीं योषां विस्मयं परमं गतः ।<br>पप्रच्छ कासि कल्याणि कस्य पुत्री सुरस्य वा ॥ ५१ <br><br> मानुषस्य च वा कान्ते गन्धर्वस्योरगस्य च ।<br>एकाकिनी कथं बाला रूपयौवनभूषिता ॥ ५२ | पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान मुखवाली तथा दिव्य आभूषणोंसे मण्डित मुझ रमणीको देखकर राजाको महान् आश्चर्य हुआ और उन्होंने मुझसे पूछा—हे कल्याणि! तुम कौन हो? हे कान्ते! तुम किस देवता, मनुष्य, गन्धर्व अथवा नागकी पुत्री हो? रूप तथा यौवनसे सम्पन्न युवती होते हुए भी तुम यहाँ अकेली क्यों हो?॥ ५०-५२॥ |
| विवाहिताथ कन्या वा सत्यं वद सुलोचने ।<br>किं पश्यसि सुकेशान्ते तडागेऽस्मिन्सुमध्यमे ॥ ५३ | हे सुनयने! तुम सच-सच बताओ कि तुम विवाहिता हो अथवा कुमारी! हे सुकेशान्ते! हे सुमध्यमे! तुम इस सरोवरमें क्या देख रही हो?॥ ५३॥ |
| चिकीर्षितं पिकालापे ब्रूहि मन्मथमोहिनि ।<br>भुङ्क्ष्व भोगान्मरालाक्षि मया सह कृशोदरि ।<br>वाञ्छितान्मनसा नूनं कृत्वा मां पतिमुत्तमम् ॥ ५४ | हे पिकभाषिणि! मन्मथमोहिनि! तुम अपनी अभिलाषा व्यक्त करो। हे मरालाक्षि! हे कृशोदरि! मुझ उत्तम राजाको अपना पति बनाकर मेरे साथ तुम निःसन्देह मनोवांछित सुखोंका उपभोग करो॥ ५४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे
नारदेन स्वस्त्रीत्वप्राप्तिवर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८ ॥
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