चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
About this granth
This is the second volume of the Charaka Samhita in Kaviraj Atridev Gupta's Hindi translation, containing the Sharira and Indriya sections and the first fifteen chapters of the Chikitsa section. The catalogue describes it as the Chikitsa, Kalpa and Siddhi part, but the title page and contents show these three sections.
The opening chapter of the Sharira section, Katidhapurushiya, is known for the philosophy behind Ayurveda: Agnivesha's twenty-three questions and Atreya's answers on the person, mind, intellect, senses, the five elements, nature and its evolutes, the self and a critique of materialist views. The Indriya section describes signs that foretell death and incurability. The Chikitsa chapters here deal with rejuvenation, virility, fever, raktapitta, gulma, prameha, skin disease, consumption, insanity, epilepsy, chest injury, swelling, abdominal disorders, piles and grahani.
The publisher is Bhargava Pustakalaya, Gaighat, Banaras, and the title page records the second edition of Samvat 2005 (1948) priced at twelve rupees. The Sanskrit verses are given with Hindi translation. The scan has 616 pages.
अ० ८ ] शारीरस्थानम् १०७
अ० ८ ] शारीरस्थानम् १०७
औषधियों को सदा पास में रखे। इस प्रकार जीवनीय गण में कही हुई सम्पूर्ण
औषधियो का नाना प्रकारों से सदा उपयोग करते रहना चाहिये। यह गर्भ
स्थापन विधिया कह दी हे ॥ १८ ॥
गर्भोपघातकरास्त्विमे भावा भवन्ति । तद्यथा—उत्कटुक-विषम-
कठिनासन-सेविन्या वात-मूत्र-पुरीष-वेगानुपरुन्धत्या दारुणानुचित-व्या-
याम-सेविन्यास्तीक्ष्णोष्णातिमात्रसेविन्याश्च गर्भो म्रियतेऽन्त कुक्षेरे-
काले वा स्रसते शुष्यी वा भवति, यथाऽभिघातप्रपीडनै. श्वभ्र-कूप-प्रपा-
तोदेशावलोकनैर्वाऽभीक्ष्ण मातुः प्रपतत्यकाले, तथाऽतिमात्रसंक्षोभि-
भिर्यानैरप्रियातिमात्रश्रवणैर्वा । प्रततोत्तानशायिन्याः पुनर्गर्भस्य नाभ्या-
श्रया नाडी कण्ठमनुवेष्टयति विवृतशायिनी नक्तचारिणी चोन्मत्तं
जनयति, अपस्मारिण पुनः कलिकलहशीला । व्यवायशीला दुर्वपुष-
मह्रीकं स्त्रैणं वा । शोकनित्या भीतमपचितमल्पायुष वा। अभिध्यात्री
परोपतापिनमीर्ष्युं स्त्रैणं वा । स्तेनात्यायासबहुमलमतिद्रोहिणमकर्मशील
वा। अमर्षिणी चण्डमौपधिकमसूतकं वा। स्वप्ननित्या तन्द्रालुमबुध-
मल्पाग्नि वा। मद्यनित्या पिपासालुमल्पस्मृतिमत्तवस्थितचित्त वा।
गोधा-मास-प्रिया शार्कंरिणमश्मरिण शनैर्मेहिन वा । वराहमांसप्रिया
रक्ताक्षं क्रथनमतिपरुषरोमाण वा। मत्स्यमासनित्या चिरनिमेष
स्तब्धाक्षं वा । मधुरनित्या प्रमेहिनं मूकमतिस्थूल वा । अम्लनित्या
रक्तपित्तिनं त्वगक्षिरोगिणं वा। लवणनित्या शीघ्रवलीपलितं खालित्य-
रोगिण वा । कटुकनित्या दुर्बलमल्पशुक्रमनपत्य वा । तिक्तनित्या शो-
षिणमबलमपचितं वा । कषायनित्या श्यावमानाहिनमुदावर्तिनं वा,
यद्यच्च यस्य यस्य व्याधेर्निदानमुक्तं तत्तदासेवमानाऽन्तर्वत्नी तद्विकार-
बहुलमपत्यं जनयति । पितृजास्तु शुक्रदोषा मातृजैरुपचारैर्व्याख्याताः ।
इति गर्भोपघातकरा भावा भवन्त्युक्ताः ॥ १६ ॥
निम्नलिखित बाते गर्भ का नाश करनेवाली हैं। यथा—उकडू ( घुटनों
के बल) अथवा विषम, टेढे मेड़े, ऊचे नीचे या कठिन आसन या स्थिति में
बैठने, वात, मूत्र और मल के वेग को रोकने, दारुण या अनुचित व्यायाम का
करने, अति तीक्ष्ण या अति उष्ण पदार्थों का सेवन, और भूख से कम (प्रमित)
भोजन करने से गर्भ गर्भाशय में मर जाता है, अथवा विना समय के बह जाता
है, या अन्दर ही सूख जाता है। इसी प्रकार चोट लगने से, दबने से, माता
के गहरे गड़्ढे में, कुए में, जल-प्रपात के स्थान को बार बार देखने से अकाल
१०८ चरकसंहिता [अ० ८
में गर्भ गिर जाता है। बहुत अधिक हिलने डुलनेवाली सवारी पर चलने से,
अप्रिय बातों के बहुत सुनने से, निरन्तर उत्तान (चित) सोने से, गर्भ की
नाभि में लगी नाड़ी गर्भ के गले में लिपट जाती है। खुले स्थान में, मैदान में
सोनेवाली या रात में घूमनेवाली स्त्री के नित्य पागल संतान उत्पन्न होती है,
झगड़ालु स्त्री अपस्मार रोगवाली संतान उत्पन्न करती है। मैथुनशील स्त्री बुरे
शरीर वाले, निर्लज्ज या स्त्री-प्रकृति के संतान को उत्पन्न करती है। नित्य शोका-
तुर रहनेवाली स्त्री भीत, निर्बल अथवा थोड़ी उमरवाले संतान को जन्म देती
है, मन से द्रोह करनेवाली, दूसरे को पीड़ित करनेवाले, ईर्ष्यालु या स्त्री-प्रकृति
के संतान को जन्माती है, चोरी के स्वभाववाली स्त्री बहुत मेहनत करनेवाले,
अतिद्रोही अथवा कर्म न करनेवाले संतान को पैदा करती है। क्रोधशील स्त्री
चण्ड, शठ या निन्दा करने वाले संतान को उत्पन्न करती है। नित्य सोने
वाली माता आलसी, मूढ अथवा मन्दाग्नि संतान को उत्पन्न करती है।
मद्यपान करने वाली स्त्री पिपासा वाले, थोड़ी स्मृति और चंचल मन वाले
संतान को उत्पन्न करती है ऴ। गोधा (गोह) के मांस को खाने वाली स्त्री
शर्करामोही, पथरी के रोगी या शनै.मेही को जन्म देती है, सूअर के मांस में
रुचि करने वाली स्त्री लाल आंखों वाले वा अकस्मात् जिसका श्वास बन्द हो
जाये, ऐसे, कठोर बालों वाले संतान को जन्म देती है। मछलियों के मांस में
रुचि करने वाली स्त्री देर में पलक गिराने वाले, अथवा बे झपक आंख वाले
संतान को पैदा करती है। मधुर रस (दूध को छोड़कर शेष मधुर) को खाने
वाली स्त्री प्रमेही, गूंगी या बहुत मोटे संतान को जन्म देती है। अम्ल रस का
सेवन करने वाली रक्तपित्त के रोगी वा त्वचा और आंख के रोगी को जन्म देती
है। लवण रस को सेवन करने वाली स्त्री शीघ्र वलि (झुरिया) या पलित (सफेद
बाल वाले) तथा गंजे संतान को जन्म देती है। कटु रस को सेवन करने वाली
स्त्री दुर्बल अल्पशुक्रवाली या संतान रहित संतति को उत्पन्न करती है। तिक्त रस
को सेवन करने वाली स्त्री शोषरोगी, निर्बल या छोटी संतति को उत्पन्न करती है।
कषाय रस को सेवन करने वाली स्त्री श्याव (काले) आनाह वा उदावर्त्त रोगी
ऴ रौटेण्डा अस्पताल में एक नव जात बच्चा लगातार चार पाच दिन तक
रोता रहा। इसको चुप कराने क लिये सब उपायें किये गये। प्यास के लिये
पानी भी दिया, दूध भी दिया, पर चुप न हुआ। अन्त मे मद्य देन पर ही
चुप हुआ। इस कारण को ढूढने पर पता चला कि इसकी माता शराब
पीती थी।
अ० ८] शारीरस्थानम् १०६
अ० ८] शारीरस्थानम् १०६
संतान को उत्पन्न करती है। जिस जिस रोग के जो जो कारण कहे हैं, उन २
कारणों को सेवन करने वाली माता उसी उसी रोग से ग्रस्त संतान को उत्पन्न
करती है गर्भ का नाश करने वाले पिता के शुक्र दोषों की व्याख्या माता के किये
अपचारों से कर दी है ॥ १६ ॥
तस्मादहितानाहारविहारान् प्रजासंपदमिच्छन्ती स्त्री विशेषेण वर्ज-
येत्। साध्वाचारा चाऽऽत्मानमुपचरेद्धिताभ्यामाहारविहाराभ्याम् ॥२०॥
इसलिये जो स्त्री यह चाहे कि उसकी संतान गुणवती हो वह अहितकारी
आहार-विहार का विशेष रूप से त्याग कर दे। वह साधु आचार से रह कर
हितकारी आहार-विहार का सेवन करे ॥ २० ॥
व्याधींश्चास्या मृदु-मधुर-शिशिर-सुख सुकुमार-प्रायैरौषधाहारोपचारै-
रुपचरेत् । न चास्या वमन-विरेचन-शिरोविरेचनानि प्रयोजयेत्, न रक्त-
मवसेचयेत्, सर्वकालं च नास्थापनमनुवासनं वा कुर्यादन्यत्रात्ययिका-
द्वयाधेः। अष्टमं मासमुपादाय वमनादिसाध्येषु पुनर्विकारेष्वात्ययिकेषु
मृदुभिर्वमनादिभिस्तदर्थकारिभिर्वोपचारः स्यात्, पूर्णमिव तैलपात्रम-
सङ्क्षोभयताऽन्तर्वत्नी भवत्युपचर्या ॥ २१ ॥
गर्भिणी के रोगों की चिकित्सा मृदु, मधुर, शीतल, सुख और सुकुमारप्राय
औषधियों और ऐसे ही आहार विहारों से करनी चाहिये। गर्भिणी को वमन,
विरेचन अथवा शिरोविरेचन नही देने चाहिये। रक्तमोक्षण भी नहीं करना
चाहिये। कोई खास रोग को छोड़ कर हर समय आस्थापन या अनुवासन क्रिया
भी नहीं बरतनी चाहिये । आठवा मास लग जाने पर यदि कोई ऐसा रोग आ
पड़े जिसमें कि वमन आदि क्रिया आवश्यक ही हो, तब कोमल रूप में वमन आदि
क्रियाओं को करावे, अथवा ऐसी ही क्रिया करने वाले अन्य उपाय करने चाहियें ।
गर्भ को तैल से भरे पात्र के समान जान कर क्षोभ आदि उत्पन्न न करते हुए
गर्भिणी का उपचार करना चाहिये ॥ २१ ॥
सा चेदपचाराद् द्वयोस्त्रिषु वा मासेषु पुष्पं पश्येन्नास्या गर्भः स्था-
स्यतीति विद्यात् । अजातसारा हि तस्मिन् काले भवन्ति गर्भाः ॥२२॥
यदि अपचार के कारण दूसरे या तीसरे मास में गर्भिणी को रजोदर्शन हो
जाय तो समझना चाहिये कि इसको गर्भ नहीं रहेगा, क्योंकि इस समय तक गर्भ
मे सार उत्पन्न नही होता ॥ २२ ॥
सा चेच्चतुष्प्रभृतिषु मासेषु क्रोध-शोकासूयेर्ष्या-भय-त्रास-व्यवाय-व्या-
याम-सङ्क्षोभ-संधारण-विषमासन-शयन-स्थान-क्षुत्पिपासाद्यतियोगात्क-
दाहाराद्वा पुष्प पश्येत्तस्या गर्भ-स्थापन-विधिमुपदेक्ष्यामः।
११० चरकसंहिता [ अ० ८
यदि गर्भिणी को चौथे आदि मासों मे क्रोध, शोक, ईर्ष्या, भय, त्रास, मैथुन,
व्यायाम, विक्षोभ, वेगों के रोकने, विषम आसन, विषम शयन, विषम स्थान,
भूख, प्यास के अति वेग से अथवा कुत्सित आहार के कारण पुष्प दर्शन होने
लगे उसके लिये गर्भ स्थापन विधि का उपदेश करते हैं ॥
पुष्पदर्शनादेवैना ब्रूयात् शयनं तावन्मृदु-सुख-शिशिरास्तरणं संस्ती-
र्णमीषदवनतशिरस्कं प्रतिपद्यस्वेति, ततो यष्टी-मधुक-सर्पिर्भ्यां परम-
शिशिर वारिणि संस्थिताभ्यां पिचुनासाव्योपस्थसमीपे स्थापयेत्तस्या ।
तथा शतधौत-सहस्रधौताभ्यां सर्पिर्भ्यामधो नाभेः सर्वतः प्रदिह्यात् ।
गव्येन चैनां पयसा सुशीतेन मधुकाम्बुना वा न्यग्रोधादिकषायेण
वा परिषेचयेदधो नाभेः । उदके वा सुशीतमवगाहयेत्, क्षीरिणां
कषायद्रुमाणां च स्वरसपरिपोतानि चेलानि ग्राहयेत् । न्यग्रोधादिसिद्ध-
योर्वा क्षीरसर्पिषोः पिचुं ग्राहयेत्, अतश्चैवाक्षमात्रं प्राशयेत् । प्राशयेद्वा
केवलं च क्षीरसर्पिः । पद्मोत्पल-कुमुद-किञ्जल्काश्चास्य समधुशर्करान्
लेहार्थं दद्यान् । शृङ्गाटक-पुष्करबीज-कशेरुकांश्च भक्षणार्थं, गन्ध-प्रियङ्गु
सितोत्पल-शालकोडुम्बर-शलाडु-न्यग्रोध शुङ्गानि वा पाययेदेनामाजेन
पयसा। पयसा चैनां बलातिबला-शालि-षष्टिकेशुमूल-काकोली-श्रुतेन
समधुशर्करं रक्तशालीनामादनं मृदु-सुरभि-शीतं भोजयेत् । लाव-कपि-
ञ्जल-कुरङ्ग-शम्बर-शश-हरिणैण कालपुच्छक-रसेन वा घृत-सलिल-सिद्धेन
सुख-शिशिरोपवात-देशस्था भोजयेत्, तथा क्रोध-शोकायासं-व्यवाय-व्या-
यामतश्चाभिरक्षेत्, सौम्याभिश्चैनां कथाभिर्मनोऽनुकूलाभिरुपासीत,
तथाऽस्या गर्भस्तिष्ठति ॥ २३ ॥
पुष्प दर्शन ( रजोदर्शन ) होने पर वैद्य इस गर्भिणी को आदेश देवे—
बिस्तर कोमल, सुखकारक, शीतल गद्देदार बनावे । इसका शिरोभाग पायते
से जरा नीचे रखे । फिर मुलहठी और घी को मिला कर बहुत ठण्डे पानी में
रख कर ठण्डा होने पर इससे फाया भिगो कर योनि में रखे । शतधौत या
सहस्रधौत ( पानी मे सौ बार या हजार बार धोये ) घी को नाभि के नीचे के
प्रदेश में चारों ओर लगा देना चाहिये । नाभि के निचले भाग पर गाय के
दूध से अथवा मुलहठी के ठण्डे क्वाथ से या वट आदि के शीतल कषाय से
परिसेचन करना चाहिये । अथवा खूब शीतल जल मे बिठावे। दूध वाले (बड़-
पीपल, गूलर आदि ) वृक्षों के या कषाय वृक्ष ( जामुन, पिलखन आदि ) के
स्वरस मे भीगे हुए कपड़ों को रखवावे । बड़, पीपल, गूलर आदि के कोमल
शुंगों ( फुनगियों ) से सिद्ध घी और दूध के फाया को रखवावे । इसी सिद्ध घी
अ० ८ ] शारीरस्थानम् १११
अ० ८ ] शारीरस्थानम् १११
की चार तोला मात्रा चाहिये । अथवा केवल दूध से निकाले घी का सेवन
करावे । पद्म (कमल) उत्पल, कुमुद इनका पराग मधु और शर्करा के साथ
मिला कर चाटने के लिये देना चाहिये । सिंघाड़ा, कमलगट्टा, कसेरू ये पदार्थ
खाने के लिये देना चाहिये । गन्ध प्रियंगु, मिश्री, शालूक कन्द, गूलर के कच्चे
फल और वट के शुंग (फुनगी) इनको पीसकर बकरी के दूध के साथ पिलाना
चाहिये । बला, अतिबला, शालि, साठी धान्य, गन्ने की जड़ और काकोली द्वारा
सस्कार कर दूध के साथ लाल चावलों के मृदु मधुर और शीतल भात को मधु
और शर्करा के साथ खिलाना चाहिये । बटेर, कपिञ्जल, करज, शम्बर (हरिण
भेद), खरगोश, हरिण, ऐणक, कालपुच्छ इनके मास-रस के साथ अथवा पानी
में सिद्ध किये घी के साथ, सुखदायक, शीतल वायु वाले स्थान मे बिठा कर
भोजन करना चाहिये । क्रोध, शोक, मेहनत, मैथुन और व्यायाम आदि से
बचाना चाहिये । मन के अनुकूल प्रिय कथाओं से इसका मन बहलाना
चाहिये । इस प्रकार करने से गर्भ स्थिर हो जाता है ॥ २३ ॥
यस्याः पुनरामान्वयात्पुष्पदर्शनं स्यात्, प्रायस्तत्तस्या गर्भबाधकं
भवति, विरुद्धोपक्रमत्वात्तयोः । यस्याः पुनरुष्णतीक्ष्णोपयोगाद् गर्भि-
ण्या महति सजातसारे गर्भे पुष्पदर्शनं स्यादन्यो वा योनिस्रावः,
तस्या गर्भो वृद्धिं न प्राप्नोति निःस्रुतत्वात् । स कालमवतिष्ठतेऽतिमात्रं,
तमुपविष्टकमित्याचक्षते केचित् । उपवास-व्रत-कर्म-परायाः पुनः कदाहा-
रायाः स्नेहद्वेषिण्याः वातप्रकोपणोक्तान्यासेवमानाया गर्भो न वृद्धिं
प्राप्नोति परिशुष्कत्वात्। स चापि कालमवतिष्ठतेऽतिमात्रं, अस्पन्दनश्च १
भवति, तं तु नागोदरमित्याचक्षते ॥ २४ ॥
जिस गर्भिणी मे आम को उत्पन्न करने वाले कारण से पुष्प दर्शन होता है
उसका गर्भ नष्ट ही हो जाता है। क्योकि इनकी चिकित्सा परस्पर विरोधी पड़ती
है। गर्भस्राव मे स्तम्भन औषध बरती जाती है। स्तम्भन औषध शीत, मृदु
और मधुर होती है और इधर शीत, मृदु और मधुर औषध आम दोष को
उत्पन्न करती है। इसलिये असाध्य है। जिस गर्भिणी मे उष्ण, तीक्ष्ण वस्तुओं
के सेवन से, गर्भ के अन्दर सार उत्पन्न होने पर पुष्पदर्शन अथवा आर्तव के
अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का योनि-स्राव होने लगे, तब गर्भ की वृद्धि रुक
जाती है। क्योंकि बहने से पोषक पदार्थ के बाहर आ जाने से यह गर्भ बहुत
१ अतिमात्रस्पन्दश्च भवति, यह भी पाठ है, परन्तु सुश्रुत मे मन्द स्पन्दते
दिया है, इसलिये अस्पन्दनश्च भवति ठीक है ।
११२ चरकसंहिता [ अ० ८
समय तक रुक जाता है। इसको 'उपविष्टक' कहते हैं। और जो गर्भिणी
प्राय. उपवास करती है या कुत्सित आहार का सेवन करती है, घी आदि
स्नेह से द्वेष करती है, वात-प्रकोपक कारणो का सेवन करती है, उसका भी
गर्भ वृद्धि को प्राप्त नही होता, क्योंकि वह गर्भ शुष्क हो जाता है ! वह गर्भ
बहुत समय तक गर्भाशय में रुका रहता है। इसके अन्दर हरकते नहीं होती।
इसको 'नागोदर' कहते है ॥ २४ ॥
नार्योस्तयोरुभयोरपि चिकित्सितविशेषमुपदेक्ष्यामः-भौतिक-जीवनी-
य-बृहणीय-मधुर-वातहर-सिद्धाना सर्पिषामुपयोगः, नागोदरे तु योनिव्या-
पन्निद्दिष्टपयसामामगर्भाणा गर्भद्वद्धिकराणा च, सम्भोजनमेतैरेव सिद्धैश्च
घृतादिभिः सुभिक्षायाः, अभीक्ष्ण यान-वाहनावमार्जनावजृम्भणैरुपपा-
दनमिति ॥ २५ ॥
उपरोक्त दोनों प्रकार की स्त्रियो की विशेष चिकित्सा का उपदेश करते है -
भूतों (सूक्ष्म जन्तुओं को दूर करन) के लिये उपयोगी गुग्गुलु सरसों आदि
अथवा महापैशाचादि घृत, जीवनीय, बृहणीय, मधुर और वातहर ओषधियों से
सिद्ध घृत का उपयोग करना चाहिये। नागोदर गर्भ को अवस्था मे योनि व्यापत्
अधिकार में कहे घृता का तथा आम-गर्भ और गर्भ को वृद्धि करने वाले भोजनों
का उपयोग और इनसे ही सिद्ध वृतों का उपयोग करना चाहिये । यान, वाहन,
शरीर शुद्धि, जृम्भण आदि कर्मों को बार बार करना चाहिये ॥ २५ ॥
यस्याः पुनर्गर्भः प्रसुप्तो न स्पन्दते ता श्येन-मत्स्य-गवय तित्तिर-ताम्र-
चूड-शिखिनामन्पतमस्य सर्पिष्मता रसेन माषयूषेण वा प्रभूतसर्पिषा
मूलकयूषेण वा रक्तशालीनामोदन मृदु-मधुर-शीतल भोजयेत्, तैलाभ्य-
क्तेन चास्या अभीक्ष्णमुदरवक्षणोरु-कटी-पार्श्व-पृष्ठ-प्रदेशानीषदुष्णे
नोपाचरेत् ॥ २६ ॥
जिस गर्भिणी मे सोया हुआ गर्भ गति न करे उस स्त्री को श्येन, मछली,
गवय, मोर कुक्कुट या तीतर इनके मास रस के साथ घी अथवा माषयूष के
साथ पर्याप्त घी, मूली के यूष के साथ लाल चावलो का मधुर, मृदु, शीतल
भात खिलाना चाहिये । इस स्त्री के शरीर पर तैल की मालिश करके हलके गरम
पानी से उदर, पेट, जाघ, कटी, पीठ और पार्श्व का बार बार स्नान कराना
चाहिये ॥ २६ ॥
यस्याः पुनरुदावर्त्त-विवन्धः स्यादष्टमे मासे न चानुवासनसाध्यं
मन्येत, ततस्तस्यास्तद्विकारप्रशमनमुपकल्पयेन्निरूहम् । उदावर्तो ह्युपे-
अ० ८] ८ शारीरस्थानम् ११३
अ० ८] ८ शारीरस्थानम् ११३
क्षितः सहसा सगर्भा गर्भिणीं गर्भमथवाऽतिपातयेत् । तत्र वीरण-शालि
षष्टिक-कुश-काशेक्षुवालिका-वेतस-परिव्याध-मूलानां भूतीकानन्ता-
काश्मर्य-परूषक-मधुक-मृद्वीकाना च पयसाऽर्धोदकेनोद्गमय्य रस
प्रियाळ-विभीतक-मज्ज-तिलकल्क- संप्रयुक्तमीषल्लवणमनत्युष्णं निरूहं
दद्यात् । व्यपगतविवन्धां चेना सुख-सालल-परिषिक्ताङ्गी स्थैर्यकरमवि-
दाहिनमाहार भुक्तवती साय मधुकसिद्धेन तैलेनानुवासयेत् । न्युब्जां
त्वेनामास्थापनानु वासनाभ्यामुपचरेत् ॥ २७ ॥
जिस स्त्री का आठवे मास में उदावर्त्त रोग आ पड़े और अनुवासन बस्ति
का प्रयोग उचित न हो, तो इस रोग का मिटाने क लिये उचित निरूह बस्ति
का प्रयोग करना चाहिये । उपेक्षा किया हुआ यह उदावर्त्त रोग अचानक ही
गर्भ के साथ गर्भिणी का अथवा गर्भ को ही नष्ट कर देता है। उदावर्त्त रोग
की शान्ति के लिये वीरण, शालिधान्य, कुश, काश, गन्ना, वेतस, परिव्याध
(वेतस का भेद) इनकी जड़, भूतीक, सारिवा, गम्भारी, फालसा, मुलैहठी,
किशमिश इनके पानी से अधवे दूध मे क्वाथ तैयार करना चाहिये । इस क्वाथ
में पियाल, बहेड़ा की मज्जा और तिल इनका कल्क डाल कर सिद्ध किये तथा
कुछ नमकीन बना कर अल्प गरम बस्ति (निरूह) देनी चाहिये । रुका-
वट हट जाने पर थोड़े गरम पानी से स्नान कराके, स्थिरता करने वाला,
अविदाही भोजन खिलाना चाहिये । सायंकाल (मधुक) मुलैहठी सिद्ध तैल
से अनुवासन बस्ति देना चाहिये । औंधी लेटी गर्भिणी को आस्थापन तथा
अनुवासन द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये । [उदर शूल के कारण गर्भिणी की
यह स्थिति स्वयं हो जाती है ] ॥२७॥
यस्याः पुनरतिमात्रदोषोपचयाद्वा तीक्ष्णोष्णातिमात्रसेवनाद्वा वात-
मूत्र पुरीष-वेग-धारणैर्वा विषमासन-शयन-स्थान-सपीडनाभिघातैर्वा
क्रोध-शोकेर्ष्या सूया-भय-त्रासादिभिर्वा साहसेर्वाऽपरैः कर्मभिरन्तः कुक्षे-
र्गर्भो म्रियते, तस्याः स्तिमित स्तब्धमुदरमाततं शीतमश्मान्तर्गतमिव भव-
त्य स्पन्दनो गर्भः शूलमधिकमुपजायते । न चाव्यः प्रादुर्भवन्ति । योनिनै
प्रस्रवत्यक्षिणी चास्याः स्रस्ते भवतस्ताम्यति व्यथते भ्रमते श्वसित्यर-
तिबहुला च भवति । न चास्या वेगप्रादुर्भावो यथावदुपलभ्यत इत्येव-
लक्षणां स्त्रियं मृतगर्भेयमिति विद्यात् ॥ २८ ॥
जिस गर्भिणी में दोषों के अधिक संचय होने से अथवा अति तीक्ष्ण या
अति उष्ण पदार्थों के सेवन से, वायु, मूत्र, मल के वेगों को रोकने से, विषम
११४ चरकसंहिता [ अ० ८
आसन, विषम शयन, विषम स्थान, पीड़न या चोट आदि से, क्रोध, शोक, भय,
ईर्षा, त्रास आदि से अथवा अन्य साहसिक कार्यों के कारण गर्भ गर्भाशय के
भीतर ही मर जाता है, उसमें इसके कारण पेट, चमडे मे ढपा, जैसा निश्चल,
फैला, शीतल हो जाता है । उदर में पत्थर सा पडा हुआ प्रतीत होता है ।
गर्भ में स्पन्दन नहीं होता, दर्द बहुत बढ़ जाती है । प्रसवकालिक दर्दें उत्पन्न
नहीं होतीं । योनि से किसी प्रकार का स्राव नहीं आता । आखे अपने आप
बाहर निकलती है, स्त्री भय से कातर हो जाती है । अन्धकार सा दीखता है,
पीड़ा होती है, चक्कर आते हैं, श्वास बहुत जोर से चलता है । ठीक प्रकार से
वेगों की उत्पत्ति नहीं होती । इन लक्षणों से समझ लेना चाहिये कि इस स्त्री का
गर्भ मर गया है ॥ २८ ॥
तस्य गर्भशल्यस्य जरायुप्रपातनं कर्म संशमनमित्याहुरेके । मन्त्रा-
दिकमथर्ववेदविहितमित्येके । परिदृष्टकर्मणा शल्यहर्त्राऽऽहरणमि-
त्येके ॥ २९ ॥
व्यपगतगर्भशल्यां तु स्त्रियममगर्भां सुराशीध्वरिष्ट मधु-मदिरासवा-
नामन्यतममग्रे सामर्थ्यतः पाययेद् गर्भकोष्ठाविशुद्ध्यर्थमार्त्तिविस्म-
रणार्थं प्रहर्षणार्थं च । अतः परं हृद्यैर्बलानुरक्षिभिरस्नेह-संप्रयुक्तै-
र्यवाग्वादिभिर्वा तत्कालयोगिभिराहारैरुपचरेदाव-धातु-क्लेद-विशोषण-
मात्रं कालम् । अतः परं स्नेहपानैर्वस्तिभिराहारविधिभिश्च दीपनीय-
जीवनीय-बृहणीय-मधुर-वातहर-समाख्यातैरुपचरेत् । परिपक्वगर्भशल्या-
याः पुनविमुक्तगर्भशल्यायास्तदहरेव स्नेहोपचारः स्यात् ॥ ३० ॥
इस मृत गर्भ रूपी शल्य को बाहर करने के लिये जरायु को निकालने की
विधि बरतनी चाहिये ऐसा कईयों का मत है । अथर्ववेदोक्त मंत्रों से कार्य
करना चाहिये यह दूसरों का मत है । जिस वैद्य ने इस कर्म को देखा हुआ
हो शल्य निकालने वाले उस वैद्य द्वारा यह काम करवाना चाहिये यह तीसरो
का मत है । दोष, धातु, क्लेद इनकी समय पर शान्ति रहे, इसलिये कच्चे गर्भ
(शल्य) के निकल जाने पर स्त्री को प्रथम सुरा, शीधु, अरिष्ट, मधु, मदिरा,
आसव इनमें से कोई एक पदार्थ शक्ति अनुसार पिला देना चाहिये । जिससे
कि गर्भाशय की शुद्धि हो जाये तथा दर्द को भूल जाये और मन में प्रसन्नता
आ जाये । इसके पीछे बल की रक्षा करने वाली घी आदि स्नेह से रहित
यवागू, आदि तत्कालोचित आहार तब तक देवे जब तक दोषयुक्त धातु की
क्लिन्नता न सूख जाये । इसके पश्चात् स्नेह-पान स्नेह बस्तिया, तथा दीपनीय,
अ० ८ ] शारीरस्थानम् ११५
अ० ८ ] शारीरस्थानम् ११५
जीवनीय, बृंहणीय, मधुर और वातनाशक आहार देना चाहिये । जिस स्त्री का
गर्भ-शल्य पूर्ण परिपक्व होकर फिर निकले उस स्त्री को उसी दिन ( जिस दिन
मृत गर्भ बाहर आवे ) स्नेह क्रिया ( स्नेह पान, स्नेहयुक्त भोजन ) देनी
चाहिये ॥ २६-३० ॥
परमतोनिविकारमाप्यायमानस्य गर्भस्य मासे मासे कर्मोपदक्ष्यामः ।
प्रथमे मासे शङ्किता चेद् गर्भमापन्ना क्षीरमनुपस्कृतं मात्रावच्छीतं काले
काले पिबेदन्तर्वत्नी, सात्म्यमेव च पुनर्भोजनं सायं प्रातश्च भुञ्जीत ।
द्वितीये मासे क्षीरमेव च मधुरौषधसिद्धम् , तृतीये मासे क्षीरं मधुस-
र्पिर्भ्यामुपसंसृज्य । चतुर्थे मासे तु क्षीरनवनीतमक्षमात्रमश्नीयात् ।
पञ्चमे मासे क्षीरसर्पिः । षष्ठे मासे क्षीर-सर्पिर्मधुरौषध-सिद्धम् । तदेव
सप्तमे मासे । तत्र गर्भस्य केशा जायमाना मातुर्विदाहं जनयन्तीति
स्त्रियो भाषन्ते, तन्नेति भगवानात्रेयः । किंतु गर्भोत्पीडनाद्धि वातपित्त-
श्लेष्माण उरः प्राप्य विदहन्ति । ततः कण्डूरूपजायते, कण्डूमूला च किक्कि-
शावाविर्भवति । तत्र कोलोदकेन नवनीतस्य मधुरौषधसिद्धस्य पाणि-
तलमात्र काले कालेऽस्यै दद्यात् । चन्दन-मृणाल-कल्केश्चास्याः स्तनादर
विमृदनीयात् शिरीष धातकी-सर्षप-मधुक-चूर्णैःकुटजार्जक-बीज-मुस्त-
हरिद्रा-कल्कैर्वा निम्ब-कोल-सुर-मञ्जिष्ठा-कल्कैर्वा पृषत हरिण-शश-रुधिर-
युतया त्रिफलया वा । करवीरपत्रसिद्धेन वा तैलेनाभ्यङ्ग, परिषेकः पुन-
र्मालतीमधुकसिद्धेनाम्भसा । जातकण्डूश्च कण्डूयनं वर्जयेत्त्वग्भेद-वैरू-
प्य-परिहारार्थं, असह्यायां तु कण्ड्वामुन्मर्दनोद्धर्षणाभ्यां परिहारः स्यात् ।
मधुरमाहारजातं वातहरमल्पमस्नेहलवणमल्पोदकानुपानं च भुञ्जीत ।
अष्टमे मासे क्षीरयवागू सर्पिष्मतीं काले काले पिबेत् ।
इसके आगे स्वस्थ गर्भ के लिये प्रत्येक मास में करने योग्य कर्मों का उप-
देश करते है । यदि प्रथम मास में गर्भ रह जाने की शंका हो तो गर्भवती स्त्री
कच्चे दूध को मात्रा मे थोड़ा थोड़ा करके दिन मे कई बार पीये । प्रातः और
सायं काल सात्म्य भोजन करे । दूसरे महीने में मधुर ( मुलहट्टी आदि ) औष-
धियों से सिद्ध दूध का पान करे । तीसरे मास में दूध को मधु और घी के साथ
मिलाकर सेवन करे । चौथे मास में दूध को तोले भर मक्खन के साथ खाये ।
पाचवे मास मे घी और दूध को । छठे मास में मधुर औषधियों से सिद्ध घी,
दूध का सेवन करे । यही सातवें मास में खाये । गर्भ के उत्पन्न होते हुए केश
माता के देह में जलन उत्पन्न करते हैं—ऐसा स्त्रियां कहती हैं । भगवान् आत्रेय
का कहना है कि यह ठीक नहीं है,
११६ चरकसंहिता [ अ० ८
तीसरे मास में ही केश बनने आरम्भ हो जाते है, सातवें मे नही ] परन्तु गर्भ
के उत्साडन के कारण वात, पित्त, कफ छाती में आकर जलन उत्पन्न करते
है। इस जलन से खाज उत्पन्न होती है । खाज के कारण ही किक्किश अर्थात्
चर्म का फटना होता है। इसके लिये बेर के पत्तों के पानी से मधुर औषधियो
से सस्कृत मक्खन की पाणितल ( चुल्लू भर ) मात्रा को थोड़ी थोड़ी देर मे
देना चाहिये । चन्दन, और बिस इनके कल्क से स्तन और उदर के बीच में
लेप करना चाहिये । अथवा सिरस, धाय के फूल, सरसो, महुवा, इनके चूणो
से, या कुड़े, अर्जक बीज, मुस्ता, हल्दी इनके कल्क से, अथवा नीम, बेर,
तुलसी, मजोठ इनके कल्क से, या पृषत्-हरिण, खरगोश इनके रक्त में मिले
त्रिफला से स्तन और उदर पर लेप करना चाहिये । अथवा कनेर के पत्तों से
सिद्ध तैल की मालिश करनी चाहिये । चमेली, मुलहठी से सस्कृत पानी में
स्नान कराना चाहिये । खाज उठने पर स्त्री नहीं खुजावै जिससे कि त्वचा न
फटे या रंग परिवर्त्तित न हो। यदि खाज असह्य हो तो मर्दन या उद्घर्षण
( उबटन आदि ) से शान्त करनी चाहिये । खाने के लिये मधुर वातनाशक,
थोड़े स्नेहवाला, नमकीन आहार, थोड़े पानी के साथ खाना चाहिये । आठवे
मास में घी से युक्त दूध में बनी यवागू खावे ।
तन्नेति भद्रकाप्यः, पैङ्गल्याबाधो ह्यस्या गर्भमागच्छेदिति ।
अस्त्वत्र पैङ्गल्याबाध इत्याह भगवान् पुनर्वसुरात्रेयः, नत्वेवैतन्न
कार्य, एवं कुर्वती ह्यरोगाऽऽरोग्य-बल-वर्ण-स्वर-सहनन-सपदुपेतं ज्ञातीना
श्रेष्ठमपत्य जनयति । नवमे तु खल्वेना मासे मधुरौषधसिद्धेन तैले-
नानुवासयेत्, अतश्चावास्यास्तलपिचु योनौ प्रणयेद्गर्भस्थानमार्गस्ने-
हनार्थम् । यदिदं कर्म प्रथम मासमुपादायोपदिष्टमानवमान्मासात्।
तेन गर्भिण्या गर्भसमये गर्भधारणे कुक्षिकटीपार्श्वपृष्ठ मृदु भवति ।
वातश्चानुलोमः संपद्यते, मूत्रपुरीषे च प्रकृतिभूते सुखेन मार्गावापद्येते,
चर्मनखानि च मार्दवमुपयान्ति, बलवर्णौ चोपचीयेते, पुत्रं चेष्ट सपदु-
पेत सुखिन सुखेनैषा काले प्रजायत इति ॥ ३१ ॥
भद्रकाप्य ऋषि का कहना है कि यह ठीक नही है। क्योंकि इस प्रकार
करने से गर्भ की आखें पीली हो जाएगी। भगवान् पुनर्वसु आत्रेय का कथन
है कि भले ही गर्भ मे पिंगलता का दोष आजाये तथापि आठवे मास में घी
युक्त यवागू ही देनी चाहिये । क्योकि ऐसा करने से रोगरहित नीरोग, बल, वर्ण
स्वर, शरीर इनके उत्तम गुणों से युक्त, बान्धवों में श्रेष्ठ सन्तान उत्पन्न होती
अ० ८ ] शारीरस्थानम् ११७
हैं। [ पिंगलता दोष की चिकित्सा उत्तर काल में सुगम है। ] नवम मास में
मधुर ओषधियों से सिद्ध तैल से अनुवासन बस्ति देनी चाहिये । मधुर औषध
मे सिद्ध इसी तैल के फोये को योनि में रखे जिससे गर्भ के आने के मार्ग में
स्नेहन ( चिकनापन ) हो जाये । * जो गर्भिणी प्रथम मास से लेकर नवम
मास तक इस ऊपर कहे अनुसार कार्य करती रहती है उस स्त्री के कुक्षि, कटि,
पीठ और पार्श्व गर्भ समय मे और गर्भ धारण काल में कोमल रहते हैं। वायु
का अनुलोमन होता है। मल मूत्र स्वस्थ रूप में सुखपूर्वक बाहर आते हैं।
त्वचा और नख भी कोमल रहते हैं। बल वर्ण बढता है, वाञ्छित, ऐश्वर्य-
शाली, सुखी पुत्र सुखपूर्वक ठीक समय में उत्पन्न होता है ॥ ३१ ॥
प्राक्चैवास्या नवमान्मासात्सूतिकागारं कारयेदपहतास्थिशर्करा-
कपाले देशे प्रशस्त-रूप-रस-गन्धाया भूमौ प्राग्द्वारमुदग्द्वारं वा बैल्वानां
काष्ठानां तैन्दुकैङ्गुदकानां भल्लातकानां वारुणानां खादिराणां वा । यानि
चान्यान्यपि ब्राह्मणाः शंसेयुरथर्ववेदविदः, तद्वसनालेपनाच्छादना-पि-
धान-संपदुपेतं वास्तुविद्या-हृदय-योगाग्नि-सलिलोलूखल-वर्चः स्थान-
स्नान-भूमिमहानसमृतुसुखं च से नयेत् ॥ ३२ ॥
गर्भिणी के नवा मास लगने से पूर्व ही ऐसा सूतिकागार बनवावे जिस
स्थान में हड्डी, मट्टी या ठोकरे आदि न हो। श्रेष्ठ रूप, रस, गन्धवाली भूमि
में पूर्व या उत्तर की ओर घर का मुख हो और जिसके चारों ओर तिन्दुक या
इगुदी अथवा भिलावे या खैर की लकड़ी से या विल्व की लकड़ी से चारों ओर
का घेरा बनाया जाये। इनके अतिरिक्त अथर्ववेद को जानने वाला ब्राह्मण जो
जो बतावे वह करे । घर में गर्भिणी के वस्त्र, आलेपन, बिस्तर, किवाड़ आदि
होने चाहिये । मकान को बनाने की कला के अनुसार आग, जल, ऊखल और
मल त्याग के स्थान हों, स्नानगृह, रसोई आदि प्रत्येक ऋतु में सुखकारक बनावे
और उनका उपयोग करें ॥ ३२ ॥
तत्र सर्पिस्तैल-मधु-सैन्धव-सौवर्चल-काल-विड्-विडङ्ग-कुष्ठ-किलिम-
नागर-पिप्पली-पिप्पलीमूल-हस्ति-पिप्पली-मण्डूकपर्ण्येलालाङ्गली-वचा-
चव्यचित्रक-चिरबिल्व-हिङ्गु-सर्षप-लशुन-कनक-कण-कणिकानी-पातसी-
बल्वज-भूर्ज-कुलत्थ-मैरेय-सुरासवाः सन्निहिताः स्युः, तथाऽश्मानौ द्वौ,
द्वे च कुण्डमुसले, द्वे उलूखले, खरो वृषभश्च, द्वौ च तीक्ष्णौ सूचीपिप्पल्यौ
सौवर्णराजतौ, शस्त्राणि च तीक्ष्णायसानि, द्वौ च बिल्वमयौ पर्यङ्कौ,
- जिससे वायु का शमन हो, प्रसव वेदना कम हो ।
११८ चरकसंहिता [ अ० ८
तैन्दुकैङ्गुदानि च काष्ठान्यग्निसंधुक्षणानि, स्त्रियश्च बह्वयो बहुशः प्रजाताः
सौहार्दयुक्ताः सततमनुरक्ताः प्रदक्षिणाचाराः प्रतिपत्तिकुशला प्रकृति-
वत्सलास्त्यक्तविषादा क्लेशसहिष्ण्योऽभिमताः, ब्राह्मणाश्चाथर्ववेदविदो
यच्चान्यदपि तत्र समर्थं मन्येत, यच्चान्यच्च ब्राह्मणा ब्रूयुः स्त्रियश्च वृद्धाः,
तत् तत् कार्यम् ॥ ३३ ॥
इस सूतिकागार में घी, तैल, शहद, सैन्धा नमक, सौवर्चल, काला नमक विडूर-
नमक बिडंग, कूठ, देवदारु, सोंठ, पिप्पली, पिप्पलीमूल, गजपिप्पली, मण्डूक-
पर्णी, एला, लागली, वच, चव्य, चित्रक, करज, हींग, सरसों, लहसुन, निर्मली
कण, कणिका (मोटे चावल, चावलों की कणिया), कदम्ब, अलसी, बल्वज,
भोजपत्र, कुलत्थी, मैरेय, सुरा आसव ये वस्तुए पास में होनी चाहियें। द
पत्थर, दो छोटे मूसल, दो ऊखल, चण्ड वृषभ, दो तीक्ष्ण सूई रखने के पात्र
(सूई समेत), सोना चांदी से बने शस्त्र, तीक्ष्ण लोहे से बने औज़ार, बेल
की लकड़ी से बने दो पलंग, अग्नि में जलाने के लिये तिन्दुक और हिंगोट
की लकड़िया । जिन्होंने बहुत सी संतान उत्पन्न की हो, स्नेह करने वाली,
सौहार्द युक्त, न घबराने वाली, कर्म में कुशल उत्तम सूझ वाली, स्वभाव
से प्रेम रखने वाली, आलस्य रहित, क्लेश को सहन करने वाली ऐसी अनेक
स्त्रिया रहनी चाहियें। अथर्ववेद को जानने वाले ब्राह्मण और अन्य ब्राह्मण और
वृद्ध स्त्रिया जो २ बतायें वह २ करना चाहिये ॥३३॥
ततः प्रवृत्ते नवमे मासे पुण्येऽहनि प्रशस्तनक्षत्रयोगमुपगते प्रशस्ते
भगवति शशिनि कल्याणे करणे मैत्रे मुहूर्ते शान्तिं कृत्वा गोब्राह्मणम-
ग्निमुदकं चादौ प्रवेश्य गोभ्यस्तृणोदकं मधुलाजांश्च प्रदाय ब्राह्मणेभ्यो-
ऽक्षतान्सुमनसो नान्दीमुखानि च फलानीष्टानि दत्त्वा, उदकपूर्वमास-
नस्थेभ्योऽभिवाद्य पुनराचम्य स्वस्ति वाचयेत्, ततः पुण्याहशब्देन
गोब्राह्मणमनुवर्तमाना प्रदक्षिणं प्रविशेत्सूतिकागारं, तत्रस्था च प्रसव-
काल प्रतीक्षेत ॥ ३४ ॥
नवम मास आरम्भ होने पर पवित्र दिन में, प्रशस्त नक्षत्र के साथ भग-
वान् चन्द्रमा का योग होने पर, कल्याणकारो मित्र मुहूर्त्त में, शान्ति होम करके
गाय, ब्राह्मण, अग्नि और पानी का प्रथम प्रवेश करावे । गायो को घास, पानी
और शहद तथा लाजा देनी चाहिये । ब्राह्मणों को आसन पर बैठा कर अक्षत,
फल, नान्दीमुख श्राद्ध मे उपयोगी फल (खजूर आदि) जल सहित प्रदान
करके आचमन करके स्वस्तिवाचन करावे । इसके पीछे मांगलिक शब्दों के
साथ, गौ, ब्राह्मण के पीछे चलती हुई स्त्री भली प्रकार से सूतिकागार में प्रवेश
करे, वहा पर प्रसव काल की प्रतीक्षा करे ॥ ३४ ॥
तस्यास्तु खल्विमानि लिङ्गानि प्रजननकालमभितो भवन्ति ।
तद्यथा—क्लमो गात्राणा, ग्लानिराननस्य, अक्ष्णोः शैथिल्यं, विमुक्त-
बन्धनत्वमिव वक्षसः, कुक्षेरवस्स्रंसनं, अधो गुरुत्व, वङ्क्षण-बस्ति-कटी-
कुक्षि-पार्श्व-पृष्ठ-निस्तोदो, योनेः प्रस्रवणं, अनन्नाभिलाषश्चेति । ततोऽन-
न्तरमावीनां प्रादुर्भावः प्रसेकश्च गर्भोदकस्य ॥ ३५ ॥
प्रमव काल उपस्थित होने पर निम्न लक्षण उपस्थित होते हैं। जैसे—
शरीर में श्रान्ति, चेहरे और आखों में ग्लानि (विवर्णता), बन्धन मुक्त होता
प्रतीत होता है, गर्भाशय का नीचे को आना, निचले अगो में भारीपन वंक्षण,
बस्ति, कटि, कुक्षि, पार्श्व और पीठ में वेदना, योनि मे स्राव और भोजन में
अनिच्छा होती है। इसके अनन्तर प्रसव काल की वेदना आरम्भ हो जाती है
और गर्भ का जल बहने लगता है ॥ ३५ ॥
आवीप्रादुर्भावे तु भूमौ शयनं विदध्यान्मृद्वास्तरणोपपन्नम् । तद-
ध्यासीत सा । तां ता समन्ततः परिवार्य यथोक्तगुणाः स्त्रिय पर्युपा-
सीरन्नाश्वासयन्त्यो वाग्भिर्ग्राहिणीभिः सान्त्वनीयाभिः ॥ ३६ ॥
प्रसव काल की वेदनाओं के आरम्भ होने पर भूमि पर कोमल बिस्तर
लगा देना चाहिये । इस बिस्तर पर वह बैठ कर जाये । इसको चारों ओर से
स्त्रिया (पूर्वोक्त गुणोवाली) घेर ले और शान्ति और आश्वासन देनेवाले
वचनों से सान्त्वना देती रहे ॥ ३६ ॥
सा चेदावाभिः संक्लिश्यमाना न प्रजायेताथैन ब्रूयात्—उत्तिष्ठ
मुसलमन्यतरत् गृहीष्व, अनेनतदुदूखलं धान्यपूर्ण मुहुर्मुहुरभिर्जाह मुहु-
र्मुहुरवजृम्भस्व चङ्क्रमस्व चान्तरन्तरा, इत्येवमुपदिशन्त्येके ॥ ३७ ॥
वेदनाओ के कारण पीड़ित होने पर भी यदि बच्चा पैदा न हो तो इसको
आदेश करे कि उठ, दोनों में से किसी एक मूसल को लेकर धान्य से परिपूर्ण
ऊखल को बार बार कूट, बार बार अगडाई और जभाई ले, बार बार बीच मे
चल फिर । ऐसा कई आचार्य कहते हैं ॥ ३७ ॥
तन्नेत्याह भगवानात्रेयः—दारुण व्यायाम-वर्जनं हि गर्भिण्याः
सततमुपदिश्यते, विशेषतश्च प्रजननकाले प्रचलित-सर्वधातु-दोषाया-
सुकुमार्या नार्या मुसल-व्यायाम समीरितो वायुरन्तरं लब्ध्वा प्राणान्
हिस्यात्, दुष्प्रतीकारा हि तस्मिन् काले विशेषेण भवति गर्भिणी, तस्मा-
१२० चरकसंहिता [ अ० ८
~~ ~~~ ~~ ~~~ ~ ~~~ ~
न्मुसलग्रहणं परिहार्यमृषयो मन्यन्ते, जृम्भणं चङ्क्रमणं च पुनरनु-
ज्ञेयमिति ॥ ३८॥
भगवान् आत्रेय का कहना है कि यह ठीक नहीं है । क्योंकि गर्भिणी स्त्री
के लिये कठोर व्यायाम करना सब अवस्थाओं में निषिद्ध है। खास कर प्रसव
के समय जब कि शरीर के सब धातु, दोष अस्थिर होते हैं, उस समय सुकुमार
शरीर वाली स्त्री का मूसल लेकर धान कूटने से वायु कारण को पा कर प्राणों
का नाश कर दे और उस समय गर्भिणी विशेष रूप से चिकित्सा के लिये
कृच्छ्रसाध्य होती है । इसलिये ऋषियों का मत है कि मूसल ग्रहण नहीं करना
चाहिये । अगड़ाई या चलना फिरना अवश्य करना चाहिये ॥ ३८ ॥
अथास्यै दद्यात्कुष्ठैला लाङ्गलीकी-वचा-चित्रक-चिरबिल्व-चूर्णमुपा-
घ्रातुं सा तन्मुहुर्मुहुरुपजिघ्रेत्, तथा भूर्जपत्रधूमं शिशपाधूमं वा, तस्या-
श्चान्तरान्तरा कटी-पार्श्व-पृष्ठ-सक्थि-देशानीषदूष्णेन तैलेनाभ्यज्यानुसु-
खमवमृद्नीयान्, इत्यनेन तु कर्मणा गर्भोऽवाक्प्रतिपद्यते ॥३६॥
इसको सूंघने के लिये कूट, इलायची, कलिहारी, वच, चित्रक, करज और
चविका इनका चूर्ण देना चाहिये । इस चूर्ण को स्त्री बार बार सूँघे । इसी
प्रकार भोज पत्र के या शीशम के पत्तों का धुवा देना चाहिये । बीच बीच में
गर्भिणी की कटि, पार्श्व, पीठ, टांगो को गुनगुने तैल से धीरे धीरे मलना
चाहिये । इस प्रकार करने से गर्भ नीचे की ओर आ जाता है ॥ ३६ ॥
स यदा जानीयाद्विमुच्य हृदयमुदरमस्यास्त्वाविशति, बस्तिशिरोऽ-
वगृह्णाति, त्वरयन्त्येनामाव्यः, परिवर्तते अधो गर्भ इति, अस्यामव-
स्थायां पर्यङ्कमेनामारोप्य प्रवाहितुमुपक्रामयेत्, कर्णे चास्या मन्त्रमिम-
मनुकूला स्त्री जपेत् ॥ ४० ॥
जिस समय यह पता लगे कि गर्भ उदर से पृथक् हो गया, गर्भ का शिर
बस्ति में घुस रहा है, प्रसवकाल की वेदनाये जल्दी जल्दी होने लगी हैं, गर्भ
नीचे की ओर घूम रहा है तब इस अवस्था में स्त्री को पलंग पर लेटा कर
प्रवाहण ( बलपूर्वक मूत्र करने का सा जोर लगाने ) के लिये कहे । इस स्त्री
के कानों में एक परिचित हितैषिणी स्त्री निम्नलिखित मंत्र का जप करे ॥४०॥
'क्षितिर्जलं वियत्तेजो वायुर्विष्णुः प्रजापतिः ।
सगर्भां त्वां सदा पान्तु वैशल्यं च दिशन्तु ते ॥४१॥
प्रसुव त्वमविक्षिष्टमविक्षिष्टा शुभानने ।
कार्तिकेयद्युति पुत्रं कार्तिकेयाभिरक्षितम्' ॥४२॥ इति
अ० ८ ] शारीरस्थानम् १२१
अ० ८ ] शारीरस्थानम् १२१
पृथ्वी, जल आकाश, अग्नि, वायु, विष्णु और प्रजापति तुझ सगर्भा का
सदा पालन करे और तुझे शल्यरहित करें । हे शुभ सुन्दर मुख वाली ! तू बिना
किसी कठिनाई के क्लेशरहित गर्भ का प्रसव कर । तू स्कन्द से अभिरक्षित,
स्कन्द के समान तेजवाले पुत्र को उत्पन्न कर ॥ ४१ ४२ ॥
ताश्चैना यथोक्तगुणाः स्त्रियोऽनुशिष्युः—अनागतावीर्मा प्रवाहिष्ठाः,
या ह्यनागतावीः प्रवाहयते व्यर्थमेवास्यास्तत्कर्म भवति । प्रजा चास्या
अविकृता विकृतिमापन्ना वा श्वास-कास-शोष-प्लीह-प्रसक्ता वा भवति ।
यथा हि क्षवथूद्गार-वात-मूत्र-पुरीष-वेगान् प्रयतमानोऽप्यप्राप्तकालान्न
लभते कृच्छ्रेण वाप्यवाप्नोति तथाऽनागतकालं गर्भमपि प्रवाहमाणा,
तथा चैषामेव क्षवथ्वादीनां संधारणमुपघातायोपपद्यते तथा प्राप्तका-
लस्य गर्भस्याप्रवाहणं, सा यथानिर्देशं कुरुष्वेति वक्तव्या, तथा च
कुर्वती शनैः शनैः पूर्वं प्रवाहेत ततोऽनन्तर बलवत्तरं, तस्या च प्रवाह-
माणायां स्त्रियः शब्दं कुर्युः 'प्रजाता प्रजाता धन्यं धन्यं पुत्र'-मिति,
तथाऽस्या हर्षेणाऽऽप्यायन्ते प्राणाः ॥ ४३ ॥
पूर्वोक्त गुणो वाली स्त्रिया इस स्त्री को शिक्षा देवे कि बिना वेदनाओं के
उत्पन्न हुए प्रवाहण ( जोर ) मत करना । जो स्त्री वेदनाओं के उत्पन्न हुए बिना
प्रवाहणकरती (जोर लगाती) है उसका श्रम व्यर्थ जाता है । इस स्त्री की स्वस्थ
प्रजा विकृत हो जाती है अथवा इस संतान को श्वास, कास, शोष, प्लीहा आदि
रोग लग जाते है । जिस प्रकार कि न उपस्थित हुए छींक, उद्गार, वायु,
मूत्र और मल के वेगों को बलपूर्वक बाहर नहीं कर सकते अथवा कठिनाई से
थोड़ा बाहर करते हैं, उसी प्रकार बिना समय के गर्भ को प्रवाहण करने से बाहर
नहीं निकाल सकते । जिस प्रकार कि छींक आदि के उपस्थित वेग को रोकने से
पीड़ा होती है, उसी प्रकार बाहर आते हुए गर्भ को रोकने में भी कष्ट होता है ।
इसलिये उसे निर्देशानुसार करने के लिए कहना चाहिये । इस प्रकार विधि
अनुसार करने मे प्रथम धीरे धीरे बल लगावे । इसके पीछे अधिक बल लगावे ।
बल लगाते ( प्रवाहण के ) समय स्त्रिया शब्द करें, “पैदा हुआ, पैदा हुआ
भाग्यशाली पुत्र, भाग्यशाली पुत्र पैदा हुआ ।” इस प्रकार प्रसन्नता के द्वारा
प्राणों को बल प्राप्त होता है, उसका उत्साह बना रहता है ॥ ४३ ॥
यदा च प्रजाता स्यात्तदैनामवेक्षेत काचिदस्या अपरा प्रपन्ना अप्र-
पन्ना वेति । तस्याश्चेदपरा न प्रपन्ना स्यादथैनामन्यतमा स्त्री दक्षिणेन
पाणिना नाभेरूपरिष्टाद्बलवनिष्पीड्य सव्येन पृष्ठत उपसंगृह्य सुनिर्धूतं
१२२ चरकसंहिता [ अ० ८
निर्धूनुयात्, अथास्याः पादपाष्र्ण्या श्रोणीमाकोटयेत्, तस्याः स्फिचा-
वुपसंगृह्य सुपीडितं पीडयेत् । अथास्या बालवेण्या कण्ठतालु परिमृ-
शेत् । भूर्जपत्र-काचमणि-सर्पनिर्मोकैश्चास्या योनिं धूपयेत् । कुष्ठताली-
शल्कं बलवजमूपे मैरेयसुरामण्डे तीक्ष्णे कोलत्थे वा मण्डूकपिप्पली-
संपाके वा समालोड्य पाययेदेना, तथा सूक्ष्मैला-किलिम-कुष्ठ-नागर विड-
ङ्ग-कालागुरु-चव्य-पिप्पली-चित्रकोपकुञ्चिका कल्कं खरवृषभस्य वा
जीवतो दक्षिणं कर्णमुत्कृत्य दृषदि जर्जरीकृत्य बल्वजयूषादीनामासा-
वनानामन्यतममस्मिन् प्रक्षिप्याऽऽलोड्य मुहूर्तस्थितमुद्धृत्य तदासावनं
पाययेदेनां शतपुष्पा-कुष्ठ-मदन-हिङ्गु-सिद्धस्य चैनां तैलस्य पिचु ग्राह-
येत् । अतश्चैवानुवासयेत्, एतैरेव चाऽऽसाधनैः फल जीमूत केक्ष्वाकु-धा-
मार्गव कुटज-कृतवेधन-हस्ति-पिप्पल्युपहितैरास्थापयेत्, तदास्थापनम-
स्या हि सह वात-मूत्र-पुरीषैर्निहृत्यपरामासक्ता वायोरनुलोमगमनात् ।
अन्यान्यपि हि वात-मूत्र-पुरीषाणि बहिर्गमनशीलानि सज्जन्ति ॥ ४४॥
जिस समय गर्भ उत्पन्न हो जाये उस समय देखे कि उसकी अपरा अर्थात्
( आवल नावल, जेर ) बाहर आ गई वा नहीं ? यदि अपरा बाहर न आई हो
तो कोई एक स्त्री दायें हाथ से नाभि के ऊपर जोर से दबाये और बायें हाथ से
पीठ को पकड़ कर खूब अच्छी प्रकार झटके देवे, कपाव । पाव की एड़ी से इस
गर्भिणी की कमर पर दबाव दे । बालो से बनी वेणी द्वारा इसके कण्ठ और
तालु को स्पर्श करे ( जिससे कि खाज होकर अपान वायु प्रबल होवे ) । भोज-
पत्र, काचमणि, साप को कैचुली का धुवा यानि में देना चाहिये । कूठ, तालीस-
पत्र के कल्क को, बल्वज के काथ मे या मैरेय, सुरा, मण्ड मे या कुलत्था के तीक्ष्ण
काथ मे, या मण्डूकपर्णी तथा पिप्पला के सम्मिलित कषाय मे घालकर पिलावे ।
इसी प्रकार छोटी इलायची, देवदारु, कूठ, सोंठ, विडंग, पिप्पली, काला अगरु,
चविका, चित्रक, काला जीरा इनके कल्क को अथवा जोते हुए तीक्ष्ण वृषभ
के दक्षिण कान को काट कर पत्थर पर पीस कर बल्वज काथ आदि में से
किसी एक क्वाथ में घोल कर कुछ देर रख कर फिर छान कर पिलावे । सौंफ,
कूठ, मैनफल, हींग इनमे सिद्ध तेल के कषाय के फाये को योनि मे रखे । इसके
उपरान्त अनुवासन बस्ति देवे । बल्वजादि क्वाथों के साथ मदनफल, जीमूत
इक्ष्वाकु, धामार्गव, कुटज, कृतवेधन, हस्तिपिप्पली के ( कल्पस्थान मे कहे )
कल्पों से आस्थापन करना चाहिये । इस आस्थापन क्रिया करने से फँसी हुई
अपरा, वायु, मूत्र, मल के साथ बाहर आ जाती है । वायु के प्रतिलोम होने
अ० ८ ] शारीरस्थानम् १२३
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से अन्य बाहर निकलने वाले वायु, मूत्र, मल भी अन्दर रुक जाते हैं। वे
आस्थापन से बाहर आ जाते हैं ॥ ४४ ॥
तस्यास्तु खल्वपरायाः प्रपतनार्थं कर्मणि क्रियमाणे जातमात्रे-
ऽस्यैव कुमारस्य कार्याण्येतानि कर्माणि भवन्ति । तद्यथा—अश्मनोः
संघट्टनं कर्णयोर्मूले, शीतादकेनोष्णोदकेन वा मुखेन परिषेकः, तथा
संक्लेशविहतान् प्राणान् पुनर्लभेत, कृष्णकपालिकाशूर्पेण चैनमभिनि-
ष्पुनीयुर्यद्यचेष्टः स्याद्यावत्प्राणानां प्रत्यागमनं ततः प्रत्यागतप्राणं
प्रकृतिभूतमभिसमीक्ष्य स्नानोदकग्रहणाभ्यामुपपादयेत् ।
अपरा को गिराने के लिये उपयुक्त कर्म करते हुए उत्पन्न हुए बच्चे के
निम्न कार्य करने योग्य होते हैं यथा—कानों के पास म [ श्रवण शक्ति को
जागृत करने के लिये ] पत्थरों को बजाना । ऋतु भेद से गरमियों मे शीतल
जल से, सरदियों मे गरम जल से स्नान कराना चाहिये । इस प्रकार करने से
योनिच्छिद्र में से आने के कारण पीड़ित क्लेश अनुभव करने वाले प्राणों को
पुनः सुख प्राप्त कराता है। यदि शिशु चेष्टारहित हो तो इस को सींक से बने
छाज से हवा करनी चाहिये, जब तक कि श्वास न आजाये। श्वास आने पर
तथा स्वस्थ अवस्था मे देख कर उसको स्नान कराना तथा उसके मलमार्ग
स्वच्छ करने चाहिये ।
अथास्य ताल्वोष्ठ-कण्ठ-जिह्वा-प्रमार्जनमारभेताङ्गुल्या सुपरिलि-
खितनखया सुप्राक्षालितोपधान-कार्पास-पिचुमत्या, प्रथमं प्रमार्जितस्य
चास्य शिरस्तालु कार्पासपिचुना स्नेहगर्भेण प्रतिच्छादयेत्, ततोऽस्या-
नन्तरं कार्यं सैन्धवोपहितेन सर्पिषा प्रच्छर्द्दनम् ॥ ४५ ॥
इस बच्चे के तालु, आठ, कण्ठ, जिह्वा को साफ करना प्रारम्भ करे, इसके
लिये जिसके नख कटे हो वह उस से अगुंली धोई हुई स्वच्छ रुई क फाये
द्वारा उसे साफ करे, नहाये बच्चे के प्रथम मुख को साफ़ करे और शिरतालु
के ऊपर तैल मे भीगे रुई के फाये को रखे। इसके पीछे सैन्धव मे मिले घी
के द्वारा वमन करावे जिससे कफ निकल जाये ॥ ४५ ॥
अथ नाड्यास्तस्य कल्पनविधिमुपदेक्ष्यामः—नाभिबन्धनात्प्रभृ-
त्यष्टाङ्गुलमभिज्ञानं कृत्वा छेदनावकाशस्य द्वयोरन्तरयोः शनैर्गृहीत्वा
तीक्ष्णेन रौक्मराजतायसानां छेदनानामन्यतमेनार्धधारेण छेदयेत्ताम् ।
अग्रे सूत्रेणोपनिबध्य कण्ठेऽस्य शिथिलमवसृजेत् । तस्य चेन्नाभिः
पच्येत, तां लोध्र-मधुक-प्रियङ्गु-देवदारु-हरिद्रा-कल्क-सिद्धेन तैलेनाभ्य-
१२४ चरकसंहिता [ अ० ८
ज्यात्, एषामेव तैलौषधानां चूर्णेनावचूर्णयेत्, एष नाडीकल्पनविधि-
रुक्तः सम्यक् ॥ ४६ ॥
इसके पश्चात् नाड़ी के काटने की विधि का उपदेश करते हैं । नाभिबन्ध
से लेकर आठ अगुल ऊपर एक, और उससे जरा ऊपर दूसरा बन्धन लगा
कर उन दोनों बन्धनों के बीच के अन्तर में मध्यभाग को धीरे से पकड़ कर
स्वर्ण, चांदी या लोहे के बने किसी एक तेज अर्धधार शस्त्र से नाड़ी काट दे ।
नाल के अग्रभाग मे धागा बांधकर धीरे से (ढीली) गले म बाँध देनी चाहिये ।
यदि बच्चे की नाभि पक जाए तो—लोध, मुलहठी, फूलप्रियंगु, देवदार हल्दी
इनके कल्क द्वारा संस्कृत तैल को लगाकर इन्हीं ओषधियो के चूर्ण को ऊपर से
छिड़क देना चाहिये । यह नाड़ी कल्पन करने की विधि कह दी है ॥ ४६ ॥
असम्यक्कल्पने हि नाड्या आयाम-व्यायामोत्तुण्डिका-पिण्डलिका-
विनामिका-विजृम्भिका-संज्ञेभ्यो भयम् । तत्राविदाहिभिर्वात-पित्त-प्रश-
मनैरभ्यङ्गोत्सादन-परिषेके सर्पिर्भिश्चोपक्रमेत गुरुलाघवमभिस-
मीक्ष्य ॥ ४७ ॥
नाड़ी के भली प्रकार न काटने से नाड़ी की आयाम ( लम्बाई ), व्यायाम
चौड़ाई ( विस्तार ), हुण्डिका, [ लम्बा और मोटापन ], पिण्डलिका [ गोल
चक्कर के आकार की ], विनामिका [ किनारों से ऊची, बीच में दबी ], विजृ-
म्भिका [ बार बार बढ़ने घटने वालो ] आदि रोग हो जाते हैं । दोषों की
गुरुता लघुता देख कर दाह उत्पन्न न करने वाले वात पित्त को शान्त करने
वाले घृतो से तैलमर्दन, उबटन और स्नान आदि करावे ॥ ४७ ॥
ततोऽनन्तर जातकर्म कुमारस्य कार्यम् । तद्यथा—मधुसर्पिषी
मन्त्रोपमन्त्रिते यथाम्नायं प्रथम प्राशितुमस्मै दद्यात्, स्तनमत ऊर्ध्व-
मेतेनैव विधिना दक्षिणं पातु पुरस्तात्प्रयच्छत्, अथातः शीर्षतः
स्थापयेदुदकुम्भं मन्त्रोपमन्त्रितम् । अथास्य रक्षा विदध्यात्—आदनी-
खदिर कर्कन्धु-पीलु-परूषक-शाखाभिरस्य गृह भिषक्समन्ततः परि-
वारयेत्, सर्वतश्च सूतिकागारस्य सर्पपातसी-तण्डुल-कण-कणिकाः प्रकि-
रेयुः, तथा तण्डुल-बलि-होमः सततमुभयतः काल क्रियेताऽऽनामकर्मणः।
द्वारे च मुसल देहलीमनुतिरश्चीनं न्यस्तं कुर्यात्, वचा-कुष्ठक्षौमक-हिङ्गु-
सर्षपातसी-लशुन-कण-कणिकानां रक्षोघ्नसमाख्यातानां चौषधीना
पोट्टलिकां बद्ध्वा सूतिकागारस्थोत्तरदेहल्यामवसृजेत्तथा सूतिकायाः
कण्ठे सपुत्रायाः स्थाल्युदक-कुम्भ-पर्यङ्केष्वपि तथैव च, द्वयोर्द्वारपक्षयोः
द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्। )
द्द्द्द्द्द्द्द्दद्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्द्
१२६ चरकसंहिता [ अ० ८
सर्पिस्तैलाभ्यामभ्यज्य वेष्टयेदुदरं महता वाससा, तथा 'तस्या न वायु-
रुदरे विकृतिमुत्पादयत्यनवकाशत्वात् । जीर्णे तु स्नेहे पिप्पल्यादिभिरेव
सिद्धा यवागू सुस्निग्धा द्रवा मात्रशः पाययेत्, उभयतः कालमच्छेन
चोष्णोदकेन परिषेचयेत्प्राक्स्नेहयवागूरानाभ्याम् । एव पञ्चरात्रं सप्तरात्रं
वानुपाल्य ततः क्रमेणाप्याययेत् । स्वस्थवृत्तमेतावत्सूतिकायाः ॥ ४९ ॥
जच्चा स्त्री को भूख लगने पर शक्ति के अनुसार खूब यत्न से स्नेहपान
कराना चाहिये । घी, तैल, वसा या मज्जा ५ जो स्नेह जच्चा के प्रकृति के
अनुकूल हो, उसके साथ पिप्पलीमूल, चविका, चित्रक और सोंठ का चूर्ण मिला
कर देना चाहिये । स्नेहपान करते समय पेट पर घी या तैल मल कर भारी
वस्त्र लपेट देना चाहिये । इस प्रकार करने से उदर में वायु विकार उत्पन्न
नहीं होते, क्योंकि वायु को अवकाश नहीं मिलता । स्नेह के जीर्ण होने पर
पिप्पलीमूल आदि से सिद्ध की हुई, घृत युक्त, पतली यवागू को थोड़ी मात्रा में
प्रातः और सायं दोनो समय देना चाहिये । स्नेह और यवागू पिलाने से पूर्व
निर्मल गरम पानी से स्नान करवा देना चाहिये । इस प्रकार पांच या सात
रात्रि तक इस विधि को बरत कर पीछे क्रम से [ साधारण आहार-विहार ]
बढ़ाना चाहिये । यह सूतिका स्त्री का स्वस्थवृत्त है ॥ ४९ ॥
तस्यास्तु खलु यो व्याधिरुत्पद्यते स कृच्छ्रसाध्यो भवत्यसाध्यो वा
गर्भवृद्धि क्षयित-शिथिल-सर्वशरीर-धातुत्वात्प्रवाहण-वेदना-क्लेदन-रक्त-
निःस्रुति-विशेष-शून्य-शरीरत्वाच्च, तस्मात्ता यथोक्तेन विधिनोपचरत् ।
भौतिक जीवनीय-बृहणीय-मधुर-वातहर-सिद्धैरभ्यङ्गोत्सादन-परिषेका-
वगाहनान्नपान-विधिभिर्विशेषतश्चोपचरेत् । विशेषतो हि शून्यशरीराः
स्त्रियः प्रजाता भवन्ति ॥ ५० ॥
प्रसूता स्त्री को विपरीत आहार विहार के कारण जो रोग उत्पन्न हो जाता
है, वह कष्टसाध्य अथवा असाध्य होता है । क्योंकि गर्भ की वृद्धि के कारण
अन्य धातुओं का पोषण न होने से सब धातु क्षीण और शिथिल हो जाते हैं ।
इसी प्रकार गर्भ के प्रवाहण के कारण उत्पन्न वेदना, क्लेदन ( स्राव ), तथा
रक्त के विशेष रूप में निकलने से सम्पूर्ण शरीर शून्य, नि सज्ञ बना होता है ।
भूतहर गुग्गुलु, महापैशाचादि घृत, जीवनीय, बृहणीय, मधुर और वातहर
ओषधियों से सिद्ध स्नेह-पान, अभ्यग, उत्सादन, परिषेक, अवगाहन, खान-
पान विधि विशेष रूप से बरतनी चाहिये । इस विधि के सेवन से अचेत हुई
स्त्रियों में भी चेतना आ जाती है ॥ ५० ॥