चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २४७
पा० १ ] चिकित्सितस्थानम् २४७
धर्म है, ऐसा समझ कर चिकित्सा में जो प्रवृत्त होता है उसकी सब कामनायें
पूर्ण होती हैं, उसको अत्यन्त सुख मिलता है ॥ ६०-६२ ॥
तत्र श्लोकः- आयुर्वेदसमुत्थानं दिव्यौषधिविधिः शुभः ।
अमृतालपान्तरगुणं सिद्धं रत्नरसायनम् ॥ ६३ ॥
सिद्धेभ्यो ब्रह्मचारिभ्यो यदुवाचामरेश्वरः ।
आयुर्वेदसमुत्थाने तत्सर्वं संप्रकाशितम् ॥ ६४ ॥
आयुर्वेद की उत्पत्ति, दिव्य ओषधियों का हितकर विधान, अमृत से थोड़े
कम गुण रखने वाले सिद्ध रसायन, जिन को देवराज इन्द्र ने सिद्ध, ब्रह्मचा-
रियों को उपदेश किया था, वह सब भगवान् पुनर्वसु ने इस 'आयुर्वेद-समुत्थान'
अध्याय में कह दिया ॥ ६३-६४ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते चिकित्सास्थाने आयुर्वेद-
समुत्थानीयो नाम रसायनपादश्चतुर्थः ॥ ४ ॥
समाप्तश्चायं प्रथमो रसायनाध्यायः ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः
( प्रथमः पादः )
[ स्वस्थ पुरुष के ऊर्ज को बढ़ाने के लिये रसायन और वाजीकरण हैं ।
रसायन के पीछे वाजीकरण औषध प्रयोग करने चाहियें । तभी इनका प्रभाव
उत्तम होता है । इसलिये इस अध्याय का अवतरण करते हैं । ]
अथातः संप्रयोगशरमूलीयं वाजीकरणपादं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब आगे 'संप्रयोग-शरमूलीय' नामक वाजीकरण पाद की व्याख्या करते हैं,
भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥
वाजीकरणमन्विच्छेत् पुरुषो नित्यमात्मवान् ।
तदायत्तौ हि धर्मार्थों प्रीतिश्च यश एव च ॥ ३ ॥
पुत्रस्याऽऽयतनं ह्येतद् गुणाश्चैते सुताश्रयाः ।
जितेन्द्रिय पुरुष प्रतिदिन वाजीकरण की इच्छा करे । इसके ऊपर ही धर्म,
अर्थ, प्रीति और यश आश्रित हैं । यह वाजीकरण पुत्रोत्पत्ति का कारण है और
धर्म, अर्थ, प्रीति, यश आदि समस्त गुण पुत्र के ऊपर आश्रित हैं ॥ ३ ॥
२४८ चरकसंहिता [ अ० २
वाजीकरणमग्र्यं च क्षेत्रं स्त्री या प्रहर्षिणी ॥ ४ ॥
इष्टा ह्येकैकशोऽप्यर्थाः परं प्रीतिकराः स्मृताः ।
किं पुनः स्त्रीशरीरे ये सङ्घातेन व्यवस्थिताः ॥ ५ ॥
सङ्घातो हीन्द्रियार्थानां स्त्रीषु नान्यत्र विद्यते ।
स्त्र्याश्रयो हीन्द्रियार्थो यः स प्रीतिजननोऽधिकम् ॥ ६ ॥
स्त्रीषु प्रीतिविशेषेण स्त्रीष्वपत्यं प्रतिष्ठितम् ।
धर्मार्थौ स्त्रीषु लक्ष्मीश्च स्त्रीषु लोकाः प्रतिष्ठिता ॥ ७ ॥
सुरूपा यौवनस्था या लक्षणैर्या विभूषिता ।
या वश्या शिक्षिता या च सा स्त्री वृष्यतमा मता ॥ ८ ॥
सब से प्रधान वाजीकरण— सब से श्रेष्ठ वाजीकरण 'क्षेत्र' है, और हर्ष को
उत्पन्न करने वाली स्त्री 'क्षेत्र' है । [ स्त्री में बीज का वपन अर्थात् आधान
होता है, इसलिये स्त्री को 'क्षेत्र' कहते हैं । ] एक एक भी मनचाहा ग्राह्य
विषय रूप, रस, गन्ध आदि अत्यन्त प्रीति को उत्पन्न करता है । परन्तु ये सब
रूप आदि विषय सम्मिलित होकर स्त्री के शरीर में उपस्थित होते हैं, तब फिर
क्यों न उसमें प्रीति उत्पन्न हो, अवश्य होगी । स्त्रियों में आश्रित इन्द्रियों के
विषय ही प्रीति को अधिक उत्पन्न करते हैं, अन्य स्थानों में आश्रित विषय
इतनी प्रीति को उत्पन्न नहीं करते । मनुष्य की स्त्रियों में ही विशेषतः प्रीति
अर्थात् ( स्नेह की मात्रा अति अधिक रहती है ) । सन्तान स्त्रियों में ही प्रति-
ष्ठित है । धर्म, अर्थ और लक्ष्मी भी स्त्रियों में ही प्रतिष्ठित है । स्त्रियों में ही
सब लोक प्रतिष्ठित हैं । जो स्त्री रूपवती, युवती, ( काम-शास्त्र में वर्णित )
उत्तम २ लक्षणों से सुभूषित, वश में रहनेवाली, ( कामशास्त्र में वर्णित ६४
कलाओं में ) शिक्षित, निपुण हो, वह स्त्री सबसे उत्तम वाजीकरण है ॥४-८॥
नानाभक्त्या तु लोकस्य दैवयोगाच्च योषिताम् ।
तं तं प्राप्य विवर्धन्ते नरं रूपादयो गुणाः ॥ ६ ॥
लोगों की भिन्न भिन्न रुचि होने के कारण और दैवयोग से स्त्रियों के रूप
आदि गुण उस उस प्रकार की रुचि वाले पुरुष के मिलने से बढ़ते हैं । [स्त्रियों
के गुणों के अनुकूल यदि पुरुष मिल जाये तब तो गुण बढ़ते हैं, अन्यथा घट
जाते हैं, नष्ट हो जाते हैं ] ॥ ६ ॥
वयोरूपवचोहावै १ र्या यस्य परमाङ्गना ।
प्रविशत्याशु हृदयं दैवाद्रा कर्मणोऽपि वा ॥ १० ॥
हृदयोत्सवरूपा या या समानमनोरमा २ ।
१. 'मृजाहावै' इति च पाठः । २. 'समानमनःशया' इति च पाठः ।