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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

अ० १ ] शारीरस्थानम् १३

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अ० १ ] शारीरस्थानम् १३
जायते बुद्धिरव्यक्ताद्बुद्ध्याऽहमिति मन्यते ।
परं खादीन्यहङ्कारादुत्पद्यन्ते यथाक्रमम् ॥ ६६ ॥
ततः सम्पूर्णसर्वाङ्गो जातोऽभ्युदित उच्यते ।
पुरुषः प्रलये चेष्टैः पुनर्भावैर्वियुज्यते ॥ ६७ ॥
अव्यक्त ( मूल प्रकृति से मिले हुए पुरुष ) से बुद्धितत्त्व उत्पन्न होता है ।
बुद्धि से 'मै' ऐसा अभिमान करता है । अर्थात् बुद्धि से अहङ्कार उत्पन्न होता
है । इसके पश्चात् अहङ्कार से क्रमशः आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी
ये पांच सूक्ष्म भूत ( तन्मात्रा ) उत्पन्न होते हैं १ । इन पञ्च तन्मात्राओ से पञ्च
महाभूत, इन भूतों से इन्द्रिया उत्पन्न होती हैं । इन पाच भूतों से सम्पूर्ण अगों
वाला पुरुष अव्यक्त अवस्था से व्यक्त अवस्था मे उत्पन्न होता है । अब
इसको उत्पन्न हो गया वा 'अभ्युदित' ऐसा कहते है और फिर यह पुरुष प्रलय
में ( शरीराम्भक भूतों के कारण में लय होने पर ) बुद्धि आदि इष्ट भावों
( कार्य पदार्थों ) से पृथक् हो जाता है, यही मृत्यु है । अव्यक्त कारण से व्यक्त
होना 'जन्म' कहाता है । व्यक्त का कारण में लीन होना 'मृत्यु' है ॥६६-६७॥
अव्यक्ताद् व्यक्ततां याति व्यक्तादव्यक्ततां पुनः ।
रजस्तमोभ्यामाविष्टश्चक्रवत्परिवर्तते ॥ ६८ ॥
पुरुष रज और तम के कारणों से बधा हुआ अव्यक्त ( कारण ) से व्यक्त
रूप में आता है, यही 'जन्म' है । व्यक्त अवस्था से फिर अव्यक्त अवस्था
( कारण ) में लीन हो जाता है । यही 'मरण' है । वह फिर व्यक्त होता है ।
फिर अव्यक्त होता है, इस प्रकार चक्र के भाति जब तक मोक्ष नहीं होता,
घूमता रहता है २ ॥ ६८ ॥
येषां द्वन्द्वे पराऽऽसक्तिरहङ्कारपराश्च ये ।
उदयप्रलयौ तेषां, न तेषां ये त्वतोऽन्यथा ॥ ६९ ॥
जिन पुरुषों की रज और तम के जोड़े मे अत्यन्त आसक्ति है और जो
'मै और यह मेरा है' ऐसा मिथ्या अभिमान रखते है, उनका ही उदय और
प्रलय अर्थात् जन्म और मरण होता है, और जो रज और तम से पृथक् और
निरहङ्कार हैं उनका जन्म और मरण नहीं होता ॥ ६९ ॥
१ तन्मात्रा का अर्थ अकेला वही तत्त्व, उसमे और किसी भूत का ससर्ग
नहीं-जैसे-शब्दतन्मात्र, रूपतन्मात्र आदि ।
२ अव्यक्तादीनि भूतानि, व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ गीता० अ० २।२८

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१४ चरकसंहिता [ अ० १
प्राणापानौ निमेषाद्या जीवनं मनसो गतिः ।
इन्द्रियान्तरसञ्चारः प्रेरणं धारणं च यत् ॥ ७० ॥
देशान्तरगतिः स्वप्ने पञ्चत्वग्रहणं तथा ।
दृष्टस्य दक्षिणेनाक्ष्णा सव्येनावगमस्तथा ॥ ७१ ॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं प्रयत्नश्चेतना धृतिः ।
बुद्धिः स्मृतिरहङ्कारो लिङ्गानि परमात्मनः ॥ ७२ ॥
यस्मात्समुपलभ्यन्ते लिङ्गान्येतानि जीवतः ।
न मृतस्यात्मलिङ्गानि तस्मादाहुर्महर्षयः ॥ ७३ ॥
पुरुष के लक्षण-शरीर से अतिरिक्त आत्मा के लक्षण प्राण (शरीर में
श्वास लेना) और अपान (श्वास पुनः छोड़ना) अर्थात् वायु की ऊर्ध्व और
अधोगति होना, उन्मेष-निमेष, जीवन, शरीर की वृद्धि, क्षत और भग्न का
संरोहण कार्य, मन का अभिमत विषय में गमन, एक इन्द्रिय को छोड़ कर दूसरी
इन्द्रिय में मन का जाना, इन्द्रियों को विषय में प्रवृत्त करना, देह को धारण
करना, स्वप्नावस्था में देशान्तर में जाना, मृत्यु का ज्ञान कर लेना, दायें आंख
ने देखे पदार्थ का बायें आंख से ग्रहण करना, इच्छा (स्वार्थ या परार्थ को प्राप्त
करने की चाह), द्वेष (अनिष्ट पदार्थ को त्यागने की इच्छा), सुख (आत्मा
के अनुकूल वेदनीय), दुःख (प्रतिकूल वेदनीय), प्रयत्न, उत्साह, चेतना, धृति
(धैर्य), बुद्धि (ज्ञान), स्मृति और अहंकार ये परम अर्थात् सर्वोपरि आत्मा
के लक्षण हैं। १ये प्राण आदि समस्त लक्षण जीवित पुरुष में ही उपलब्ध होते
हैं, मृत पुरुष में आत्मा के ये चिह्न नहीं मिलते, इसलिये महर्षियों ने प्राण,
अपान आदि सब को आत्मा का लक्षण कहा है ॥७०-७३॥
शरीरं हि गते तस्मिन् शून्यागारमचेतनम् ।
पञ्चभूतावशेषत्वात् पञ्चत्वं गतमुच्यते ॥ ७४ ॥
इस चेतन आत्मा के शरीर से चले जाने पर शरीर शून्य घर की भांति चेतना
से रहित हो जाता है। इस शरीर में केवल पांच भूत ही शेष रह जाते हैं, इस
लिए शरीर को पञ्चत्व को प्राप्त हुआ कहते हैं ॥ ७४ ॥
अचेतनं क्रियावच्च मनश्चेतयिता परः ।
युक्तस्य मनसा तस्य निर्दिश्यन्ते विभोः क्रियाः ॥ ७५ ॥
चेतनावान् यतश्चात्मा ततः कर्ता निरुच्यते ।
अचेतनत्वाच्च मनः क्रियावदपि नोच्यते ॥ ७६ ॥
१ प्राणापाननिमेषोन्मेषजीवनमनोगतीन्द्रियान्तरविकाराः सुखदुःखेच्छाद्वेष-
प्रयत्नाश्चात्मनो लिङ्गानि । वैशेषिक० ३ । २ । ४ ।