चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
सं० २८ ] सूत्रस्थानम् ३४७
सं० २८ ] सूत्रस्थानम् ३४७
इस प्रकार से शरीर के अपने स्वरूप में ( न अधिक और न कम परिमाण में )
स्थित होने पर धातु-साम्यावस्था में रहते हैं। प्रसाद रूप धातुओं का क्षय या
वृद्धि जो निमित्त को लेकर होती है, वह आहार के कारण ही होती है, इस-
लिये आहार द्वारा वृद्धि और क्षय का सात्म्य उत्पन्न होकर आरोग्यता उत्पन्न
होती है इसी प्रकार किट्ट और मल भी शरीर के आरोग्य सम्पादन में सहायक
होते हैं। अपने परिमाण से अधिक बढ़े हुए किट्ट और मल को बाहर निकाल
कर तथा शीत से उत्पन्न मल में उष्ण, उष्ण से उत्पन्न मल में शीत परिचर्या
से मल शरीर के धातुओं को समानावस्था में रखते हैं। इन मल अर्थात् प्रसाद
नामक धातुओं के स्रोत गमन करने के मार्ग हैं और ये स्रोत जो जो जिन
जिनके हैं उन उन धातुओं को पूर्ण करते हैं। इस प्रकार से यह सम्पूर्ण शरीर
खाये, पिये, चाटे, चाले आहार रूपी रस से पूर्ण होता है। और रोग भी इस
शरीर में खाये, पिये, चाटे आदि भोजन से उत्पन्न होते हैं। इसमें हित
वस्तुओं का उपयोग शुभकारी और अहित वस्तुओं का उपयोग अशुभकारी
होता है ॥ ४ ॥
एवं वादिनं भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—दृश्यन्ते हि भगवन् !
हितसमाख्यातमप्याहारमुपयुञ्जाना व्याधिमन्तश्चागदाश्च, तथैवाहित-
समाख्यातम्, एवं दृष्टे कथं हिताहितोपयोगविशेषात्मकं शुभाशु-
भविशेषमुपलभामह इति ॥ ५ ॥
तमुवाच भगवानात्रेयः—न हिताहारोपयोगिनामग्निवेश ! तन्निमित्त-
व्याधयो जायन्ते, न च केवलं हिताहारोपयोगादेव सर्वं व्याधिभयमति-
क्रान्तं भवति, सन्ति हि ऋतेऽप्यहिताहारोपयोगादन्या रोगप्रकृतयः,
तद्यथा—कालविपर्ययः, प्रज्ञापराधः, परिणामश्च, शब्द-
स्पर्श-रूप-रस- गन्धाश्चासात्म्या इति, ताश्च रोगप्रकृतयो रसान् सम्यगु-
पयुञ्जानमपि पुरुषमशुभेनोपपादयन्ति, तस्माद्धिताहारोपयोगिनोऽपि
दृश्यन्ते व्याधिमन्तः । अहिताहारोपयोगिनां पुनः कारणतो न सद्यो
दोषवान् भवत्यपचारः, न हि सर्वाण्यपथ्यानि तुल्यदोषाणि, न च सर्वे
दोषास्तुल्यबलाः, न च सर्वाणि शरीराणि व्याधिक्षमत्वे समर्थानि
भवन्ति, तदेव ह्यपथ्यं देश-काल-संयोग-वीर्य-प्रमाणातिशेगाद् भूय-
शरीर शुक्रमय ही होना चाहिये और 'केदारकुल्या न्याय, वाला पक्ष तीसरे
प्रश्न के समान ही है। इसमें भी वृष्य वस्तुएं प्रभाव से शीघ्र शुक्र को उत्पन्न
कर देती हैं।
चरकसंहिता [अ० २८
स्तरमप्यल्पं संपद्यते, स एव दोषः संसृष्टस्तेनैवैकदेशेनावस्थाने गम्भीरस्तनुप्र-
तश्चिरस्थितः प्राणाायतनसमुत्थो मर्मोपघाती वा भूयान् कष्टतमः क्षिप्र-
कारितमश्च संपद्यते, शरीराणि चातिस्थूलाण्यतिकृशाण्यनिविष्टमांसशो-
णितास्थीनि दुर्बलान्यसात्म्याहारोपचितान्यल्पाहाराण्यल्पसत्त्वानि वा
भवन्त्यव्याधिसहानि, विपरीतानि पुनर्ब्याधिसहानि, एभ्यश्चैवापथ्या-
हार-दोष-शरीर-विशेषेभ्यो व्याधयो मृदवो दारुणाः क्षिप्रासमुत्थाश्चिर-
कारिणश्च भवन्ति। अत एव च वात-पित्त-श्लेष्माणः स्थानविशेषे प्रकु-
पिता व्याधिविशेषानभिनिर्वर्तयन्त्यग्निवेश ! ॥ ६ ॥
इस प्रकार से कहते हुए आत्रेय ऋषि को अग्निवेश बोले-'हे भगवान् ।
संसार में देखने में आता है, कि जो मनुष्य हितकारी आहार का उपभोग करते
हैं, वे रोगी दिखाई देते हैं और अहितकारी भोजन करने वाले भी नीरोग
दीखते हैं।
अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा-हे अग्निवेश ! जो मनुष्य हितकारी
अन्न खाते हैं उनको इनके कारण से उत्पन्न होने वाले रोग नहीं होते और न
केवल हित आहार का उपसेवन ही सब रोगों से बचा सकता। अहित आहार
को छोड़कर कुछ दूसरी भी रोग की प्रकृति है । यथा काल विपर्यय (ऋतुओं
का परिवर्तन ), प्रज्ञापराध और परिणाम, शब्द स्पर्श, रूप, रस, गन्ध का
असात्म्य ( अतियोग, मिथ्यायोग, या अयोग ) होना । ये रोग के कारण आहार
रसों का सम्यक् प्रकार से उपयोग करने पर भी पुरुष में अशुभ लक्षण उत्पन्न कर
देते हैं । इसलिये हितकारी आहार को सेवन करने वाले भी रोगी दिखाई देते
हैं । इसी प्रकार जो व्यक्ति अहित आहार का उपसेवन करते हैं, उनमें रोगों
के ये कारण जल्दी दोषयुक्त नहीं होते । क्योंकि सम्पूर्ण अपथ्य समान दोषकारक
नहीं हैं और सब दोष समान बल वाले भी नहीं हैं और सारे शरीर रोग को
सहन करने में समर्थ नहीं होते । इसलिये अपथ्य देश चावल पित्तकारक हैं,
यही आनूप देश के योग से अधिक अपथ्य कारक हो जाता है, काल (शरत्काल
में अपथ्य बलवान् और हेमन्त में निर्बल ), संयोग दही राब के साथ बलवान्
और शहद के साथ निर्बल ), वीर्य (संस्कार वा उष्ण करने से अपथ्यतम और
शीत से अपथ्य ), प्रमाण अर्थात् मात्रा के अतियोग से अपथ्यतम और हीन बल
से निर्बल बन जाते हैं। इसी प्रकार बहुत से कारणों के मिलने से, विरुद्ध
चिकित्सा होने से गम्भीर¹ आधयो में, शरीर के बहुत अन्दर प्रवेश कर जाने से
१. त्वङ्मांसाद्यवमुख्यानं गम्भीरं स्वन्तराश्रयम् ।