चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
त्रिंशच्चिकित्सितान्युक्त्वाऽन्यतः कल्पाम् परं शृणु ।
द्विव्रणीयं त्रिमर्मीयमूरुस्तम्भिकमेव च ।
वातरोगे वातरक्ते योनिव्यापदि चैव यत् ॥ ६० ॥
त्रिंशच्चिकित्सितान्युक्त्वाऽन्यतः कल्पाम् परं शृणु ।
अभयामलकीय, प्राणकामीय, करप्रचितीय, आयुर्वेदसमुत्थानीय, संयोग-
शरमूलीय, आसिक्तक्षीरीय, माषपर्ण, पुमाञ्जातबलादिक इन भिन्न २ आठ
प्रकरणों के दो अध्याय हैं । इनमें पहिले चार प्रकरणों में रसायनाध्याय और
दूसरे चार में वाजीकरणाध्याय कहा है । इसके पीछे ज्वरचिकित्सा, रक्तपित्त-
चिकित्सा, गुल्म-चिकित्सा, प्रमेह-चिकित्सा कुष्ठ, शोष, उन्माद, अपस्मार,
उरःक्षत, शोफ, उदर, अर्श, ग्रहणी, पाण्डुरोग, श्वास, कास, अतीसार, छर्दि,
वीसर्प, तृष्णा, विषरोग, मद्यरोग, द्विव्रणीय, त्रिमर्मीय, ऊरुस्तम्भ, वातव्याधि, वात-
रक्त इस प्रकार से कुल मिलाकर चिकित्सा स्थान में तीस अध्याय हैं ॥५५-६०॥
फलजीमूतकेक्ष्वाकु-कल्पो धामार्गवस्य च ॥ ६१ ॥
पञ्चमो वत्सकस्योक्तः षष्ठश्च कृतवेधने ।
श्यामात्रिवृतयोः कल्पस्तथैव चतुरङ्गुले ॥ ६२ ॥
तिल्वकस्य सुधायाश्च सप्तलाशङ्खिनीषु च ।
दन्तीद्रवन्त्योः कल्पश्च द्वादशोऽयं समाप्यते ॥ ६३ ॥
मदनफलकल्प जीमूतककल्प, ईक्ष्वाकुकल्प, धामार्गवकल्प, वत्सक-
कल्प, कृतवेधनकल्प, श्यामात्रिवृत्कल्प, महावृक्षकल्प, सप्तलाशंखिनीकल्प, और
दन्ती-द्रवन्तीकल्प ये बारह अध्याय कल्पस्थान में हैं ॥ ६१-६३ ॥
कल्पना पञ्चकर्माख्या बस्तिमूत्रा तथैव च ।
स्नेहव्यापदिकी सिद्धिर्नेत्रव्यापदिकी तथा ॥ ६४ ॥
सिद्धिः शोधनयोश्चैव बस्तिसिद्धिस्तथैव च ।
प्रासृती मर्मसंख्याता सिद्धिर्बस्त्याश्रया च या ॥ ६५ ॥
फलमात्रा तथा सिद्धिः सिद्धिश्चोत्तरसंज्ञिता ।
सिद्धयो द्वादशैवैतास्तन्त्रं चासु समाप्यते ॥ ६६ ॥
सिद्धिस्थान, कल्पसिद्धि, पंचकर्मीय सिद्धि, बस्तिसूत्रीय सिद्धि, स्नेहव्याप-
दिक सिद्धि, नेत्रव्यापदिक सिद्धि, वमनविरेचन-व्यापत्सिद्धि, बस्तिव्यापदिक
सिद्धि, प्रसृतयोगिकसिद्धि, त्रिमर्मीय सिद्धि, बस्ति सिद्धि, फलमात्र सिद्धि, और
उत्तर सिद्धि—ये बारह अध्याय सिद्धि स्थान में हैं। इस प्रकार से यह ग्रन्थ
समाप्त होता है ॥ ६४-६६ ॥
स्वे स्वे स्थाने तथाऽध्याये चाध्यायार्थः प्रवक्ष्यते ।
तं ब्रूयात्सर्वतः सर्वं यथास्वं ह्यर्थसंग्रहात् ॥ ६७ ॥
४०४ चरकसंहिता [ अ० ३०
प्रत्येक अध्याय में वर्णित विषयों का निरूपण संग्रह रूप से प्रत्येक अध्याय
के अन्त में दे दिया है और जो मुख्य विषय आया है, उसको स्थान २ पर
संक्षिप्त रूप से फिर कह दिया है। इसलिये एक अध्याय का वर्णन जो यत्र
तत्र आया है, वह सब वर्णन उसी एक अध्याय का समझना चाहिये ॥ ६७ ॥
पृच्छा तन्त्राद्यथाङ्गानां विधिना प्रश्न उच्यते ।
प्रश्नार्थे युक्तिमांस्तत्र तन्त्रेणैवार्थनिश्चयः ॥ ६८ ॥
निरुक्तं तन्त्रणातन्त्रं स्थानमर्थप्रतिष्ठया ।
अधिकृत्यार्थमध्यायानामसंज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ ६९॥
इति सर्वं यथाप्रश्नमष्टकं संप्रकाशितम् ।
कात्स्न्येन चोक्तस्तन्त्रस्य संग्रहः सुविनिश्चितः ॥ ७० ॥
ग्रन्थ के प्रारम्भ करने में सामान्य विशेष रूप से अथवा पूर्वापरविरोध से
रहित जो विचार करना है उसका नाम 'प्रश्न' और विचार पूर्वक किये हुए
प्रश्न का शास्त्र के आधार से युक्तिपूर्वक जो निर्णय है उसका नाम 'प्रश्नार्थ'
है। जिसमें अनेक विषय एक साथ में एकत्र किये गये हों उसका नाम 'तन्त्र'
है। तन्त्र अर्थात् शास्त्र में मुख्य मुख्य विषयों में से एक एक भाग को जो
पृथक् पृथक् लेकर प्रतिपादन किया है उसका नाम 'अध्याय' है (जैसे-दीर्घे-
जीवितीय, अपामार्गतण्डुलीय इत्यादि प्रत्येक विषय के अनुक्रम में निर्दिष्ट भाग
का नाम अध्याय है)। इस प्रकार तन्त्र, तन्त्रार्थ, स्थान स्थानार्थ आदि जो
आठ प्रश्न किये उनका उत्तर दे दिया है। यह सम्पूर्ण ग्रन्थ का
संक्षेप है ॥ ६८-७० ॥
सन्ति पाङ्गविकोत्पाताः संक्षोभं जनयन्ति ये ।
वर्तकानामिबोत्पाताः सहसैवाविभाविताः ॥ ७१ ॥
तस्मात्तान् पूर्वसंजल्पे सर्वत्राष्टकमादिशेत् ।
परावरपरीक्षार्थं तत्र शास्त्रविदां बलम् ॥ ७२ ॥
शब्दमात्रेण तन्त्रस्य केवलस्यैकदेशिकाः ।
भ्रमन्त्यल्पबलास्तन्त्रे ज्याशब्देनैव वर्तकाः ॥ ७३ ॥
पशुः पशूनां दौर्बल्यात्कश्चिन्मध्ये वृकायते ।
ससत्त्वं वृकमासाद्य प्रकृतिं भजते पशुः ॥ ७४ ॥
तद्वदज्ञोऽज्ञमध्यस्थः कश्चिन्मौखर्यसाधनः ।
स्थापयत्याप्तमात्मानमाप्तं त्वासाद्य भिद्यते ॥ ७५ ॥
वस्त्रमूर्ढ इवोर्णाभिरबुद्धिरबहुश्रुतः ।
किं व वक्ष्यति संजल्पे कुण्डभेदी जडो यथा ॥ ७६ ॥