चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५७३
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५७३
का कारण वात आदि दोष तथा पंच महाभूत व सूक्ष्म कीट-प्राणियों को भी
माना है।
अधिकरणसिद्धान्तो नाम यस्मिन् यस्मिन्नधिकरणे संस्तूयमाने
सिद्धान्यन्यान्यधिकरणानि भवन्ति, यथा-न मुक्तः कर्मानुबन्धिकं कुरुते;
निस्पृहत्वादिति प्रस्तुते सिद्धाः कर्मफलमोक्षपुरुषप्रेत्यभावा भवन्ति ।
(३) अधिकरण सिद्धान्त—जिस जिस अधिकरण के उपस्थित करने पर
अन्य न कहे हुए अधिकरण भी अपने आप सिद्ध हो जाते हैं, उसका नाम
अधिकरण सिद्धान्त है । यथा—मुक्त पुरुष निःस्पृह होने से फलजनक कर्म
नहीं कर सकता । इस अवस्था में कर्मफल, मोक्ष, पुरुष और प्रेत्यभाव से प्रक-
रण भी स्वयं सिद्ध होते हैं । क्योंकि यदि कर्मफल न हो तो मुमुक्षु भी कर्म करें।
कर्मफल से उद्विग्न होकर ही वे कर्म नहीं करते । यदि मोक्ष हो तो मुक्त ऐसा नाम
हो । यदि पुरुष न हो तो बन्ध और मोक्ष किसका ।
अभ्युपगमसिद्धान्तो नाम—यमर्थमसिद्धमपरीक्षितमनुपदिष्टमहे-
तुकं वा वादकालेऽभ्युपगच्छन्ति भिषजः। तद्यथा—द्रव्यं न प्रधानमिति
कृत्वा वक्ष्यामः, गुणाः प्रधाना इति कृत्वा वक्ष्यामः, इत्येवमादिश्च-
तुर्विधः सिद्धान्तः ॥ ३७ ॥
(४) अभ्युपगम सिद्धान्त—जिसको बिना सिद्ध किये, बिना परीक्षा किये
और बिना हेतु आदि बतलाये ही विवादकाल में वैद्य लोग स्वीकार कर लेते हैं,
वह अभ्युपगम सिद्धान्त है । यथा—द्रव्य को प्रधान न मानकर सिद्धान्त रूप से
स्वीकार करके आगे विवाद करें । इसी प्रकार गुण को प्रधान मान कर, कर्म को
प्रधान मानकर वाद आरम्भ करे । ये चारों प्रकार के सिद्धान्त कह दिये हैं ।३७।
अथ शब्दः—शब्दो नाम वर्णसमाम्नायः, स चतुर्विधः-दृष्टार्थश्चा-
दृष्टार्थश्च सत्यश्चानृतश्चेति ।
शब्द—वर्णों के समाम्नाय (समूह) का नाम शब्द है । यह चार प्रकार का
है । यथा (१) दृष्टार्थ, (२) अदृष्टार्थ (३) सत्य और (४) अनृत ।
तत्र दृष्टार्थः—त्रिभिर्हेतुभिर्दोषाः प्रकुप्यन्ति षड्भिरुपक्रमैश्च प्रशा-
म्यन्ति, श्रोत्रादिसद्भावे शब्दादिग्रहणमिति ।
( १ ) दृष्टार्थ—तीन कारणों (असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग, प्रज्ञापराध और परि-
णाम ) से वात आदि दोष कुपित होते हैं । वे छः उपक्रमों ( बृंहण, लंघन,
स्नेहन, रूक्षण, स्वेदन और स्तम्भन ) से शान्त होते हैं । श्रोत्र आदि इन्द्रियों
के होने पर शब्द आदि विषयों का ग्रहण होता है । इन वाक्यों का अर्थ यहां
प्रत्यक्ष होता है, देखा जाता है ।
स दृष्टार्थः पुनः—अस्ति प्रेत्यभावोऽस्ति मोक्ष इति ।
( २ ) अदृष्टार्थ—जैसे प्रेत्यभाव अर्थात् ( पुनर्जन्म ) है और मोक्ष है,
यह अदृष्ट अर्थ है ।
सत्यो नाम यथार्थभूतः—सन्त्यायुर्वेदोपदेशाः, सन्त्युपायाः साध्या-
नां, सन्त्यारम्भफलानीति, सत्यविपर्ययाच्चानृतः ॥ ३८ ॥
सत्य—यथार्थ जैसा हो वैसा कहना सत्य है । यथा आयुर्वेद का उपदेश
है, साध्य रोगों की चिकित्सा के उपाय हैं। आरम्भ फल अर्थात् कर्मों के फल
होते हैं। सत्य से विपरीत अनृत ( मिथ्या ) है ॥ ३८ ॥
अथ प्रत्यक्षं—प्रत्यक्षं नाम तद्यदात्मना पञ्चेन्द्रियैश्च स्वयमुपल-
भ्यते । तत्राऽऽत्मप्रत्यक्षाः सुखदुःखेच्छाद्वेषादयः, शब्दादयस्त्विन्द्रिय-
प्रत्यक्षाः ॥ ३६ ॥
प्रत्यक्ष—आत्मा और इन्द्रियों द्वारा जो ज्ञान स्वयं प्राप्त किया जाता है,
उसका नाम प्रत्यक्ष¹ है, इनसे सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष आदि आत्मा द्वारा
प्रत्यक्ष होते हैं, शब्द आदि विषय श्रोत्र आदि इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष होते हैं॥३६॥
अथानुमानं—अनुमानं नाम तर्को युक्त्यपेक्षः । यथोक्तम्—अग्निं
जरणशक्त्या, बलं व्यायामशक्त्या, श्रोत्रादीनि शब्दादिग्रहणेनेत्ये-
वमादि ॥ ४० ॥
अनुमान—युक्ति की अपेक्षा करने वाला तर्क अनुमान है । कार्यकारण
भाव के ज्ञान से अविज्ञात अर्थ को जानना तर्क है । यथा—जीर्ण करने की
शक्ति से अग्नि का, व्यायाम शक्ति से बल का, शब्दादि के ग्रहण करने से
श्रोत्रादि इन्द्रियों का अनुमान किया जाता है ॥ ४० ॥
अथैतिह्यं—ऐतिह्यं नामाऽऽप्तोपदेशो वेदादिः ॥ ४१ ॥
ऐतिह्य—ऐसा वृद्ध पुरुषों ने कहा था यह 'ऐतिह्य' है। आप्त-वचन का
नाम ऐतिह्य है। यथा आप्त-वचन वेद आदि ॥ ४१ ॥
अथौपम्यं—औपम्यं नाम यदन्येनान्यस्य सादृश्यमधिकृत्य प्रका-
शनं, यथा—दण्डेन दण्डकस्य, धनुषा धनुष्टम्भस्य, इष्वासिना आ-
रोग्यदस्येति ॥ ४२ ॥
१ इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्य-
क्षम् । न्याय० १ । १ । ४ ।