चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५५५
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५५५
प्रत्येक रोग में सब विकारों में संशोधन, संशमन और निदान का त्याग यह
तीन प्रकार की चिकित्सा करे ॥ ३२-३४ ॥
तत्र श्लोकौ—व्याधितौ पुरुषौ ज्ञाज्ञौ भिषजौ सप्रयोजनौ ।
विशतिः कृमयस्तेषां हेत्वादिः सप्तको गणः ॥ ३५ ॥
उक्तो व्याधितरूपीये विमाने परमर्षिणा ।
शिष्यसंबोधनार्थं च व्याधिप्रशमनाय च ॥ ३६ ॥
व्याधि से पीड़ित दो प्रकार के पुरुष विज्ञ (जानने वाले) और अज्ञ
(मूढ), इनका प्रयोजन (जानने बाल से सिद्धि और मूढ से रोगवृद्धि या
मृत्यु), बीस प्रकार के कृमि, इन के हेतु, संस्थान वर्ण, प्रभाव, नाम और
चिकित्सा ये सात बातें, भगवान् आत्रेय ने शिष्य को समझाने के लिये तथा
रोग की शान्ति के लिये इस विमान स्थान में कह दी हैं ॥ ३५-३६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने
व्याधितरूपीयविमानं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अष्टमोऽध्यायः।
अथातो रोगभिषग्जितीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इस के आगे 'रोगभिषग्जितीय' नामक अध्याय को व्याख्यान करेंगे।
जैसा कि भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
बुद्धिमानात्मनः कार्यगुरुलाघवे कर्मफलमनुबन्धं देशकालौ च
विदित्वा युक्तिदर्शनाद् भिषग्बुभूषुः शास्त्रमेवाऽऽदितः परीक्षेत । विवि-
धानि हि शास्त्राणि भिषजां प्रचरन्ति लोके । तत्र यन्मन्येत सुमहद्यश-
स्विधीरपुरुषासेवितमर्थबहुलमाप्तजनपूजितं त्रिविधशिष्यबुद्धिहितमप-
गतपुनरुक्तदोषमार्षं सुप्रणीतसूत्रभाष्यसंग्रहक्रमं स्वाधारमनवपतित-
शब्दमकष्टशब्दं पुष्कलाभिधानं क्रमागतार्थमर्थतत्त्वविनिश्चयप्रधानं
संगतार्थमसंकुलप्रकरणमाशुप्रबोधकं लक्षणवच्चोदाहरणवच्च, तदभिप्रप-
द्येत शास्त्रम् । शास्त्रं ह्येवंविधममल इवाऽऽदित्यस्तमो विधूय प्रकाशयति
सर्वम् ॥ ३ ॥
शास्त्र-परीक्षा—बुद्धिमान् पुरुष अपने कार्य के गौरव (बहुत प्रयास से
साध्य) एवं लाघव (अल्प प्रयास से साध्य), कर्मों के फल, अनुबन्ध
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(कर्मजन्य शुभ-अशुभ फल), देश एवं काल को जान कर तथा युक्ति को
देख कर यदि वैद्य बनने की इच्छा करे तो सब से प्रथम शास्त्र की ही परीक्षा
करे, क्योंकि वैद्यों के नाना प्रकार के शास्त्र लोक में प्रचलित हैं। इन में से
जो शास्त्र निम्नलिखित गुणों वाला हो, उसे पढ़ने के लिये स्वीकार करे।
शास्त्र के गुण—शास्त्र खूब बड़ा, असंक्षिप्त, यशस्वी, धीर पुरुषों से उप-
सेवित, माननीय, थोड़े से शब्दों में बहुत अर्थ को बतलाने वाला, आप्त जनों
से अनुमत (निर्दोष), उत्तम, मध्यम और अधम इन तीन प्रकार के शिष्यों
की तीनों प्रकार की बुद्धि के लिये योग्य, सब जिस को समझ सकें, पुनरुक्ति
दोष से रहित, ऋषियों से बनाया, सुप्रीत (अच्छी प्रकार ग्रथित किया हो),
जिस में सूत्र (संक्षेप में अर्थों का ग्रहण) भाष्य (विस्तार से वर्णन), और
प्रतिपाद्य विषयों को क्रम से कहा हो, सुन्दर अधिकरणों वाली, ग्राम्य
शब्दों से रहित, कठिन दुर्बोध या बोलने में कठिन शब्दों से रहित, भली
प्रकार से बहुत तत्त्व बतलाने वाला, (क्रम से उद्देश्य क्रम से अर्थों को
बतलाने वाला), वस्तुतत्त्व को सन्देह से रहित, निश्चित तत्त्व को बतलाने
वाला, संगतियुक्त अर्थों को बतलाने वाला, अव्यवस्थित, बेमेल मिले
हुए प्रकरणों से रहित; सुनते ही स्पष्ट अर्थज्ञान कराने वाला,
लक्षण और उदाहरण वाला हो, ऐसा शास्त्र अध्ययन के लिये चुनना चाहिये।
क्योंकि जिस प्रकार बादल आदि से रहित, निर्मल सूर्य अन्धकार को दूर करके
सब पदार्थों को प्रकाशित कर देता है उसी प्रकार शास्त्र अज्ञान को दूर करके
सब अर्थ-तत्त्व को प्रकाशित कर देता है ॥ ३ ॥
ततोऽनन्तरमाचार्यं परीक्षेत। तद्यथा—पर्यवदातश्रुतं परिदृष्टक-
र्माणं दक्षं दक्षिगं शुचिं जितहस्तमुपकरणवन्तं सर्वेन्द्रियोपपन्नं प्रकृ-
तिज्ञं प्रतिपत्तिज्ञमनुपस्कृतविद्यमनहङ्कृतमनसूयकमकोपनं क्लेशक्षमं
शिष्यवत्सलमध्यापकं ज्ञापनसमर्थं चेति। एवंगुणो ह्याचार्यः सुक्षेत्रमा-
र्तवो मेघ इव सस्यगुणैः सुशिष्यमाशु वैद्यगुणैः संपादयति ॥ ४ ॥
आचार्य का लक्षण—शास्त्र की परीक्षा करने के अनन्तर आचार्य की परीक्षा
करे। यथा-वह निर्मल शास्त्रज्ञान से सम्पन्न हो, जिसने कर्म को उचित रीति
से देखा हो, केवल शास्त्र ही न पढ़ा हो, प्रत्युत वह कर्म में कुशल, शुचि
(पवित्र), शस्त्र आदि क्रिया में वशी, सिद्धहस्त, नाना उपयोगी उपकरणों
वाला सब इन्द्रियों से युक्त, रोगी की प्रकृति को पहिचानने वाला, उत्तम सूझ
वाला, रोगों की चिकित्सा को समझने वाला, अन्य शास्त्रों के ज्ञान से प्रकट
स्वच्छ विद्या वाला, अभिमान से रहित, गुणों में दोष न देखने वाला, क्रोध-