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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ७ ] विमानस्थानम् ५४७

अ० ७ ] विमानस्थानम् ५४७
अनन्तरं निदानोक्तानां भावानामनुपसेवनमिति यदुक्तं निदा-
नविधौ तस्य विसर्जनं तथाप्रायाणां चापरेषां द्रव्याणामिति लक्षणतश्चि-
कित्सितमनुव्याख्यातमेतदेव पुनर्विस्तरेणोपदेक्ष्यते ॥ १७ ॥
इसके आगे निदान में कहे पदार्थों का सेवन का त्यागना आवश्यक है।
ऐसा निदान विधि में जिन जिन द्रव्यों को निदान रूप से कहा है, उनका
परित्याग करना चाहिये । इसी प्रकार न कहे हुए निदान के अनुरूप द्रव्यों
का भी परित्याग करना चाहिये । इस प्रकार संक्षेप से चिकित्साक्रम कह दिया
है, अब इसी को विस्तार से कहते हैं ॥ १७ ॥
अथैनं कृमिकोष्ठमातुरमग्रे षड्रात्रं सप्तरात्रं वा स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्य
श्वोभूते एनं संशोधनं पाययितास्मीति क्षीर-दधि-गुड-तिल-मत्स्यानू-
पमांस-पिष्टान्न-परमान्न-कुसुम्भस्नेह-संयुक्तैर्भोज्यैः सायं प्रातश्चोपपादये-
त्समुदीरणार्थं चैव कृमीणां कोष्ठाभिसरणार्थं च भिषक् । अथ व्युष्टायां
रात्रौ सुखोषितं सुप्रजीर्णभुक्तं च विज्ञाय।ऽऽस्थापन-वमन-विरेचनैस्तवह-
रेवोपपादयेदुपपादनीयश्चेत्स्यात्सर्वान् परीक्ष्यविशेषान् परीक्ष्य सम्यक्।
इस कृमि-कोष्ठ वाले रोगी को संशोधन देने से पूर्व छः या सात रात तक
स्नेहन और स्वेदन देना चाहिये । फिर सातवें वा आठवें दिन ( अगले दिन )
इस को संशोधन दूंगा ऐसा निश्चय करके सायं-प्रातः दोनों समय क्षीर ( दूध ),
गुड़, दही, तिल, मछली, जलचर प्राणियों का मांस, पिष्टान्न, कुसुम्भ तैल से
बने भोजन खिलावे । इस प्रकार के भोजनों से कोष्ठ के क्रिमि भली प्रकार से
उत्क्लेशित हो जाते हैं ( निकल आते हैं ) और अन्यत्र गये हुए कृमि भी
कोष्ठ की ओर आने लगते हैं । इस के अनन्तर रात्रि के बीतने पर ( प्रातः
काल होने पर ) भली प्रकार नींद आई तथा खाया हुआ भोजन भली प्रकार
जीर्ण हो गया यह देखकर उस दिन ( नवम दिन ) आस्थापन, वमन, विरेचन
( इन में से कोई एक क्रिया ) देना चाहिये । क्रिया करने से पूर्व रोगी की
सब प्रकार से ( प्रकृति-सात्म्य, सत्त्व आदि से ) परीक्षा कर लेनी चाहिये ।
अथाऽऽहरेति ब्रूयात्-मूलक-सर्षप-लशुन-करञ्ज-शिग्रु-मधुशिग्रु-कमठ -
खर पुष्पा-भूस्तृण-सुमुख-सुरस-कुठेरक-गण्डीर-कालमालक-पर्णास-क्षवक-
फणिज्जकानि सर्वाण्यथवा यथालाभं, तान्याहृतान्यभिसमीक्ष्य खण्ड-
शश्छेदयित्वा प्रक्षाल्य पानीयेन सुप्रक्षालितायां स्थाल्यां समावाप्य
गोमूत्रेणार्धोदकेनाभ्यासिच्य साधयेत् सततमवघट्टयन् दर्व्या। तस्मिन्
शीतीभूते तूपयुक्तभूयिष्ठेऽम्भसि गतरसेष्वोषधेषु स्थालीमवतार्य, सुप-
रिपूतं कषायं सुखोष्णं मदनपिप्पलीफलं विडङ्गकल्कतैलोपहितं, सर्जि-

कालवणितमभ्यासिच्य बस्तौ विधिवदास्थापयेदेनं, तथाऽर्काऽलर्क-कुट-
जाढकी-कुष्ठ-कैडर्य-कषायेण वा, तथा शिग्रु-पीलु-कुस्तुम्बुरु-कटुकासर्षप-
कषायेण, तथाऽऽमलक-शृङ्गवेर-दारुहरिद्रा-पिचुमर्द-कषायेण मदनफल-
संयोगसंयोजितेन त्रिरात्रं सप्तरात्रं वाऽऽस्थापयेत् ॥ १८ ॥
आस्थापन आदि क्रिया करने की विधि—अनन्तर कहे कि निम्न सब
वस्तुओ को अथवा इन में से जितनी प्राप्त हो सकें उन वस्तुओं को लावे—
मूलक ( मूली ), सरसों, लशुन, नाटा करञ्ज, शिग्रु ( शोभांजन ), मधुशिग्रु
( मीठा सहजन ), कमठ ( कोई लाल फूल का कचनार मानते हैं ), खर-
पुष्पा ( अजवायन ), भूस्तृण, सुमुख, सुरस, कुठेरक, गण्डीर, कालमाल,
पर्णास, क्षवक और फणिज्जक ( ये सब तुलसी के भेद हैं ) इन सब को अथवा
इन में से जो मिलें उनको लाकर, टुकड़े टुकड़े करके, पानी से भली प्रकार
धोकर, अच्छी प्रकार धुली हांडी में रखकर, आधे, पानी मिले गोमूत्र में भिगो
कर ( डालकर ) निरन्तर कड़छो ( खोंचे ) से चलाते हुए अग्नि पर पकाना
चाहिये। जब औषधियों का सम्पूर्ण रस जल में आ जाय तब हांडी को उतार
कर वस्त्र में से भली प्रकार छान ले। इस कुछ गरम क्वाथ में मॅनफल, पिप्पली,
वायविडंग इन का कल्क और तैल मिश्रित सर्जक्षार ( सज्जी खार ) एवं नमक
मिलाकर विधिपूर्वक इस रोगी को आस्थापन बस्ति देनी चाहिये। इसी
प्रकार आक, अलर्क ( मदार ), कुटज, आढकी, ( अरहर ), कुष्ठ ( कूठ )
और कैटर्य ( पर्वतनिम्ब्र ) कषाय से बस्ति देनी चाहिये, ( तैल मिश्रत नमक
एवं मैनफल आदि पूर्व की भाँति डाले )। इसी प्रकार शिग्रु, पीलु,
कुस्तुम्बुरु, कुटकी और सरसों के कषाय से, इसी प्रकार आंवला, अदरक
( सोंठ ), दारुहल्दी, पिचुमर्द ( नीम ) के कषाय से, मैनफल आदि डालकर
लवण युक्त तैल मिलाकर तीन बार अथवा सात बार आस्थापन-कर्म करना
चाहिये ॥ १८ ॥
प्रत्यागते च पश्चिमे बस्तौ प्रत्याश्वस्तं तदहरेवोभयतोभागहरणं
संशोधनं पाययेद्युक्त्या। तस्य विधिरुपदेक्ष्यते। मदनफलपिप्पलीकषा-
यस्यार्धाञ्जलिमात्रेण त्रिवृत्कल्काक्षमात्रमालोड्य पातुमस्मै प्रयच्छेत्,
तदस्य दोषमुभयतो निर्हरति साधु, एवमेव कल्पोक्तानि वमनविरे-
चनानि संसृज्य पाययेदेनं बुद्ध्या सर्वविशेषानवेक्षमाणो भिषक् ॥१९॥
शेष बस्ति के गुदा द्वारा बाहर निकल आने पर रोगी को आश्वासन
देकर उसी दिन ( जिस दिन बस्ति दी है ) दोनों ऊर्ध्व एवं अधोमागों से