चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ५ ] सूत्रस्थानम् ७७
अ० ५ ] सूत्रस्थानम् ७७
तैलाद्दशगुणं शेषं कषायमवतारयेत् ॥ ६४ ॥
तेन तैलं कषायेण दशकृत्वो विपाचयेत् ।
अथास्य दशमे पाके समांशं छागलं पयः ॥ ६५ ॥
दद्यादेषोऽणुतैलस्य नावनीयस्य संविधिः ।
चन्दन, अगर, तेजपत्र, वायविडंग, बेल वृक्ष की जड़, नील कमल
पुण्डरीक, श्वेत कमल, छोटी इलायची, दारूहल्दी की छाल, मुलेहटी, बला
खरैटी, नेत्रबाला, जंगी, हरड़, वन्य (कैवर्त्तमुस्ता या मुद्गपर्णी), त्वक् ( दाल
चीनी ), नागर मोथा, अनन्तमूल, शालपर्णी, जीवन्ती, पीठवन, देवदारु, शतावर,
रेणुकाबीज, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी, सल्लकी, पद्म केशर, (कमल का केशर ),
इन को निर्मल, आकाश से बरसे सौ गुने वृष्टि के जल में पकाना चाहिये और तैल
से दस गुना ( दशांश भाग ) रहने पर कषाय को उतार कर छान ले । इस
कषाय के दस भाग करके प्रत्येक में उस तैल को पकाये, अर्थात् प्रथम एक
भाग के साथ तैल सिद्ध करे, फिर उसी तैल का दूसरे भाग के साथ, इसी
प्रकार दसों भागों के साथ तैल सिद्ध कर लेने पर दसवें भाग में समांश तैल के
बराबर बकरी का दूध कषाय में मिला दे । यह नस्य कर्म के योग्य अणु तैल
बनाने की विधि है १ ॥ ६१-६५ ॥
अस्य मात्रां प्रयुञ्जीत तैलस्यार्धपलोन्मिताम् ॥ ६६ ॥
स्निग्धस्विन्नोत्तमाङ्गस्य पिचुना नावनैस्त्रिभिः ।
त्र्यहात्त्र्यहाच्च सप्ताहमैतत्कर्म समाचरेत् ॥ ६७ ॥
निवातोष्णसमाचारी हिताशी नियतेन्द्रियः ।
तैलमेतत्रिदोषघ्नमिन्द्रियाणां बलप्रदम् ॥ ६८ ॥
प्रयुञ्जानो यथाकालं यथोक्तान्श्नुते गुणान् ।
इस तैल की अर्धपल अर्थात् ( दो तोला ) मात्रा को ले शिर के तेल लगा
कर, चिकना कर के एवं पसीना लेकर तब रूई के फांये से तीन बार नस्य
देना चाहिये ।
१. "अकल्कोऽपि भवेत्स्नेह्य यः साध्यः केवलै द्रवे" इस परिभाषा के
अनुसार चन्दन आदि पदार्थों को ऊखल में कूट कर ५० तोले परिमित
लेकर ४०० तोले पानी में क्वाथ करना चाहिये । ४० तोले रहने पर छान कर
दस भाग कर लेने चाहिये । और एक भाग के बराबर अर्थात् ४ तोले तिल
तैल मिला कर पाक पूर्व विधि से करना चाहिये । इस प्रकार ६ बार करके
दसवीं बार बकरी का दूध ४ तोले मिला कर तैल पाक कर लेना चाहिये । यह
अणु तैल विधि है । अणु तैल का नस्य सप्ताह में लगभग दो बार लेना चाहिये ।
७८ चरकसंहिता [ अ० ५
यह (दो तोला तैल) तीन तीन दिन के पीछे नस्य करे। अर्थात् यदि
आज नस्य लिया है, तो तीन दिन छोड़कर पांचवें दिन नस्य ले। इस प्रकार से
प्रत्येक ऋतु में कुल सात दिन तक लेना चाहिये। सप्ताह में लगभग दो
वार नस्य ले।
इस तैल का नस्य लेने वाला व्यक्ति वायु के झोंके में, खुली वायु में न रहे,
शरीर को गरम बनाये रक्खे, पथ्याशी, जितेन्द्रिय, ब्रह्मचारी, संयमी रहे। यह
तैल वात, पित्त कफ तीनों दोषों का नाश करने वाला और आंख, कान, नाक
आदि इन्द्रियों को बल देने वाला है। जो व्यक्ति इस अणु तैल को समय ३ पर
विधिपूर्वक प्रयोग करता है उसे ऊपर लिखे हुए गुण मिलते हैं ॥ ६६-६८ ॥
दन्त धावन की विधि—
आपोथिताग्रं द्वौ कालौ कषायकटुतिक्तकम् ॥ ६६ ॥
भक्षयेद्दन्तपवनं दन्तमांसान्यबाधयन्।
कसैले, कटु (कडुवे) नीम आदि, तिक्त (तीखे) तेजबल, जीयापोता
आदि, रसयुक्त दातुन को आगे से चबाकर कूट कर अर्थात् नरम बनाकर,
मसूड़ों को नुक्सान न पहुँचाते हुए, प्रातःकाल बिस्तर से उठ कर और सायंकाल
सोने के समय दांत साफ करे ॥ ६६ ॥
दातुन करने से लाभ—
निहन्ति गन्धवैरस्यं जिह्वादन्तास्यजं मलम् ॥ ७० ॥
निष्कृष्य रुचिमाधत्ते सद्यो दन्तविशोधनम्।
दातुन दुर्गन्ध को, बुरे स्वाद को, जीभ दांत और मुख के मल, और मुख
के दुर्गन्ध को नष्ट करती है। दांतों को साफ करने से मुख में रुचि प्रसन्नता
अथवा भोजन में रुचि उत्पन्न होती है ॥ ७० ॥
जीभ को साफ करने की विधि—
सुवर्णरूप्यताम्राणि त्रपुरीतिमयानि च ॥ ७१ ॥
जिह्वा-निर्लेखनानि स्युरतीक्ष्णान्यनृजूनि च।
जिह्वा-मूल-गतं यच्च मलमुच्छ्वासरोधि च ॥ ७२ ॥
दौर्गन्ध्यं भजते तेन तस्माज्जिह्वां विनिर्लिखेत्।
जीभ को निर्लेखन अर्थात् खुरेंच करके साफ करनेके लिए सोना, चाँदी,
ताम्बा, राँगा, जस्ता, पीतल और लोह इनकी बनी जीभी अतीक्ष्ण, जो तेज
धारवाली न हो, टेढ़ी मुड़ी हुई होनी चाहिये। जो मल जिह्वा के पिछले भाग में
लगा हुआ हो और जो मल श्वास को रोकता हो या दूषित करता हो उसको
इससे खुरेंचकर निकाल देना चाहिये ॥ ७१-७२ ॥