चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०५
अ० ३ ] विमानस्थानम् ५०५
कालं तु खलु यथर्तुलिङ्गाद्विपरीतलिङ्गमधिकलिङ्गं हीनलिङ्गं वाहितं
व्यवस्येत् ॥ १० ॥
काल—शीत, उष्ण और वर्षा इन ऋतुओं के अपने लक्षणों से विपरीत
होना या उन लक्षणों का अधिक होना या कम होना ( मिथ्यायोग, अतियोग
और अयोग ) अनारोग्यकारक होता है ॥ १० ॥
इमानेवं दोषयुक्तांश्चतुरो भावान् जनपदोद्ध्वंसकरान् वदन्ति
कुशलाः । अतोऽन्यथाभूतांस्तु हितानाचक्षते ॥ ११ ॥
विगुणेष्वपि तु खल्वेतेषु जनपदोद्ध्वंसनकरेषु भेषजेनोपपाद्यमा-
नानामभयं भवति रोगेभ्य इति ॥ १२ ॥
निपुण वैद्य इस प्रकार के दोषों वाले वायु, जल, देश और काल इन
चारों को जनपद-नाश का कारण मानते हैं । इनसे विपरीत लक्षणों वाले इन
चारों को आरोग्यकारक गिनते हैं । इन चारों के विगुण होने व जनपद के
नाशक कारणों के उपस्थित होने पर भी, दोष और दूष्य की अपेक्षा करके
औषध द्वारा चिकित्सा करने पर पुरुषों को रोग नहीं होते, वे पुरुष रोगों से
बचे रहते हैं ॥ ११-१२ ॥
भवन्ति चात्र—वैगुण्यमुपपन्नानां देशकालानिलाम्भसाम् ।
गरीयस्त्वं विशेषेण हेतुमत्संप्रचक्ष्यते ॥ १३ ॥
वाताज्जलं जलाद्देशं, देशात्कालं, स्वभावतः ।
विद्याद् दुष्परिहार्यत्वाद् गरीयस्तरमर्थवित् ॥ १४ ॥
वाय्वादिषु यथोक्तानां दोषाणां तु विशेषवित् ।
प्रतीकारस्य सौकर्ये विद्याल्लाघवलक्षणम् ॥ १५ ॥
विकृत हुए देश, काल, वायु, और जल इनमें कारण के विचार-अनुसार-
किसका उत्कर्ष है इसका वर्णन करते हैं । यथार्थ तत्त्व को जानने वाला वैद्य
स्वभाव से वायु से जल को, जल से देश को, देश से काल को बढ़ कर समझे ।
क्योंकि इनका त्याग नहीं किया जा सकता । यदि वायु खराब हो तो दूसरे
स्थान पर सुगमता से जाया जा सकता है । जल तो जीवन के लिये सेवन
करना आवश्यक है । यदि प्रयत्न से जल को भी छोड़ दें, देश से बचना
कठिन है । देश से भी यदि देशान्तर में जायें तो काल से बचना अशक्य है ।
इसलिये सबसे अधिक प्रबल काल है । वायु, जल, देश और काल इन चारों
के दोषों को दूर करने के उपाय जाने और दोषों के प्रतिकार के सुगम होने
के कारक वैद्य इनके शान्ति के लक्षण भी जाने ॥ १३-१५ ॥
५०६ चरकसंहिता [ अ० ३
चतुर्ष्वपि तु दुष्टेषु कालान्तेषु यदा नराः ।
भेषजेनोपपाद्यन्ते न भवन्त्यातुरास्तदा ॥ १६ ॥
वायु आदि इन चारों के विकृत होने पर भी जब पुरुष औषध सेवन
करते हैं तब रोगी नहीं होते ॥ १६ ॥
येषां न मृत्युसामान्यं सामान्यं न च कर्मणाम् ।
कर्म पञ्चविधं तेषां भेषजं परमुच्यते ॥ १७ ॥
रसायनानां विधिवच्चोपयोगः प्रशस्यते ।
शस्यते देहवृत्तिश्च भेषजैः पूर्वमुद्धृतैः ॥ १८ ॥
जिन पुरुषों में मरण की समानता नहीं और न कर्मों की समानता है,
उनके लिये तो वमन, विरेचन आदि पञ्च कर्म सबसे श्रेयस्कर उपाय हैं । इसके
साथ में विधिपूर्वक रसायन (वृष्य प्रयोगों) का सेवन करना चाहिये । तथा
व्यापत्ति से पूर्व एकत्र की हुई औषधियो (अन्न आदि) से शरीर का पालन
करना चाहिये ॥ १७-१८ ॥
सत्यं भूते दया दानं बल्यो देवतार्चनम् ।
सद्वृत्तस्यानुवृत्तिश्च प्रशमो गुप्तिरात्मनः ॥ १९ ॥
हितं जनपदानां च शिवानामुपसेवनम् ।
सेवनं ब्रह्मचर्यस्य तथैव ब्रह्मचारिणाम् ॥ २० ॥
संस्कथा धर्मशास्त्राणां महर्षीणां जितात्मनाम् ।
धार्मिकैः सात्त्विकैर्नित्यं सहास्या वृद्धसंमतैः ॥ २१ ॥
इत्येतद्भेषजं प्रोक्तमायुषः परिपालनम् ।
येषामनियतो मृत्युस्तस्मिन् काले सुदारुणे ॥ २२ ॥
सत्य, प्राणियों में दया, दान, बलि, देवता की अर्चना, सद् वृत्त का पालन,
इन्द्रियों को विषयों से रोकना, अपनी रक्षा, अविकृत (अच्छे, जहाँ बीमारी न
हो) जनपदों (देशों) का सेवन करना, ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मचारियों का सेवन
करना, उनके पास रहना, धर्मशास्त्रों की कथा तथा जितात्मा महर्षियों से बात-
चीत करना, धार्मिक सत्त्वप्रकृति के वृद्धों के पास उठना-बैठना, (तथा दैव-
व्यपाश्रय कर्म का सेवन), आयु की रक्षा के लिये औषध है। जिन लोगों की
मृत्यु इस दारुण काल में निश्चित (अवश्यम्भावी) नहीं है, उन के लिये उप-
रोक्त कर्म औषध हैं ॥१९-२२॥
इति श्रुत्वा जनपदोद्ध्वंसने कारणान्यात्रेयस्य भगवतः पुनरपि
भगवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच—अथ खलु भगवन् ! कुतो मूलमेषां
वाय्वादीनां वैगुण्यमुत्पद्यते, येनोपपन्ना जनपदमुद्ध्वंसयन्तीति ॥२