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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ७६५

अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ७६५
गुर्वादयश्च द्रवान्ताः, कर्म पञ्चविधमुक्तं वमनादि । तत्र द्रव्याणि गुरु-
खर-कठिन-मन्द-स्थिर-विशद-सान्द्र-स्थूल-गन्धगुण- बहुलानि पार्थिवानि,
तान्युपचय-संघात-गौरव-स्थैर्य-कराणि; द्रव-स्निग्ध-शीतमन्द-मृदु-पि-
च्छिल-रस-गुण-बहुलान्याप्यानि, तान्युत्क्लेद-स्नेह-बन्ध-विष्यन्द-मार्दव-
प्रह्लाद-कराणि; उष्ण-तीक्ष्ण-सूक्ष्म-लघु-रूक्ष-विशद-रूपगुण-बहुलान्याग्ने-
यानि, तानि दाह-पाक-प्रभा-प्रकाश-वर्ण-कराणि । लघु-शीत-रूक्ष-खर-
विशद-सूक्ष्म-स्पर्श-गुणबहुलानि वायव्यानि, तानि रौक्ष्य-ग्लानि-विचार-
वैशद्य-लाघव-कराणि; मृदु-लघु-सूक्ष्म-श्लक्ष्ण-शब्द-गुण-बहुलान्याकाशा-
त्मकानि, तानि मार्दव-सौषिर्य-लाघव-कराणि ॥ १० ॥
इस के आगे आयुर्वेद के उपयोगी द्रव्यों के भेद को लेकर कुछ कहेंगे-यहां
पर जो भी द्रव्य कहेंगे वे सब पांचभौतिक अर्थात् पांच महाभूतों से बने हैं। ये
दो प्रकार के हैं, चेतना से युक्त और अचेतन । इस द्रव्य के जहां शब्दादि गुण
हैं, वहां गुरु आदि (बीस) गुण हैं । द्रव्य का कर्म पांच प्रकार का है। यथा
वमन, विरेचन, शिरोविरेचन, आस्थापन, अनुवासन । इन द्रव्यों में जो द्रव्य
पार्थिव (पृथ्वीजन्य) है वे गुरु, कर्कश, कठोर, धीमे, स्थिर, विशद, (पृथक्
पृथक् ), सान्द्र, स्थूल और गन्ध युक्त इन गुणों वाले प्रायः करके होते हैं। ये
पार्थिव पदार्थ उपचय संघात, गौरव (भारीपन) और स्थिरता करते हैं।
जलीय पदार्थ तरल, स्निग्ध शीत, मन्द, पिच्छिल और जलीयगुण युक्त
प्रायः करके होते हैं। ये द्रव्य उत्क्ले द नमी, स्नेह, बन्धन परस्पर मिलाने वाले,
कोमलता, प्रह्लाद शरीर इन्द्रियों का तर्पण करनेवाले हैं। अग्नि-गुणयुक्त
अर्थात् आग्नेय द्रव्य गरम, तीक्ष्ण, सूक्ष्म, लघु, रूक्ष, विशद एवं रूप गुण में
(अग्निबत्) होते हैं। ये द्रव्य जलन, पकाना, कान्ति, प्रकाश और वर्ण (रंग)
को उत्पन्न करते हैं। वायवीय पदार्थ लघु, शीत, रूक्ष, खर, विशद, सूक्ष्म, स्पर्श
गुण (वायवीय गुण) वाले होते हैं। ये शरीर में रूक्षता, ग्लानि, विचारों की
निर्मलता और लघुता उत्पन्न करते हैं। आकाश गुण वाले द्रव्य मृदु, लघु, सूक्ष्म,
स्रोतों में पहुंचाने वाला, चिकना एवं शब्द गुण आकाश गुण युक्त होते हैं। ये
द्रव्य शरीर में मृदुता, सौषिर्य (छिद्राधिक्य) और लघुता उत्पन्न करते हैं ॥१०॥
अनेनोपदेशेन नानौषधिभूतं जगति किंचिद् द्रव्यमुपलभ्यते तां तां
युक्तिमर्थं च तं तमभिप्रेत्य । न तु केवलं गुणप्रभावादेव कार्मुकाणि
भवन्ति। द्रव्याणि हि द्रव्यप्रभावाद् गुणप्रभावाद् द्रव्यगुणप्रभावाच्च तस्मि-
स्तस्मिन् काले तत्तदधिष्ठानमासाद्य तां तां च युक्तिमर्थं च तं तमभिप्रेत्य यत्कु-

२६६ चरकसंहिता [ अ० २६

र्व्वन्ति तत्कर्म, येन कुर्व्वन्ति तद्वीर्यं, यत्र कुर्व्वन्ति तदधिकरणं, यदा
कुर्व्वन्ति स कालः, यथा कुर्व्वन्ति स उपायः, यत्साधयन्ति तत्फलम् ॥११।
इस उपरोक्त उपदेश द्वारा जगत् में जो भी द्रव्य मिलते हैं, वे सब उपाय,
प्रयोजन के उद्देश्य से औषध समझने चाहियें अर्थात् वे सब द्रव्य दोष-
नाशक हैं, निरुपयोगी नहीं हैं। पार्थिवादि द्रव्य केवल गुरु खर आदि गुणों
से औषध या दोष नष्ट करने वाले नहीं बन जाते, परन्तु द्रव्य द्रव्य के
प्रभाव से, गुण के प्रभाव से, द्रव्य एवं गुण दोनों के प्रभाव से, उस उस
समय में, उस अधिष्ठान का आश्रय लेकर, और उस योजना तथा प्रयोजन को
लक्ष्य में करके जो करते हैं, उसका नाम 'कर्म' है, यथा-द्रव्य के प्रभाव से
दन्ती ( जमाल गोटा ) विरेचक है, मणि आदि का धारण विष को दूर करता
है । गुण के प्रभाव से—ज्वर में तिक्त रस, शीत में अग्नि । द्रव्य एवं गुण के
प्रभाव से जैसे—कृष्णाजिन ( काली मृगछाला ) । यहां पर मृगछाला द्रव्य
और कृष्ण गुण है। उसपर वे जो कार्य करते हैं। यथा—शिरोविरेचन द्रव्य
शिर का विरेचन करते हैं, यह कर्म है। जिस के द्वारा ( उष्ण गुण के द्वारा
शिरो विरेचन ) करते हैं वह 'वीर्य' अर्थात् 'शक्ति' है। जहां कर्म करते हैं, वह
'अधिकरण' है जैसे शिर । जिस समय करते हैं वह 'काल' है। जिस प्रकार
करते है वह उपाय है । इस प्रकार से जो सिद्ध करते हैं वह फल है ॥११॥
भेदश्चैषां त्रिषष्टिविधविकल्पो द्रव्यदेशकालप्रभावाद् भवति, तमु-
पदेक्ष्यामः ॥ १२ ॥
रसों के भेद इन छः रसों के द्रव्य प्रभाव से, देश प्रभाव से ( यथा--
हिमालय की द्राक्षा और दाडिम मीठे होते हैं दूसरे स्थानों के खट्टे ), काल
प्रभाव से ( यथा-कच्चा आम और कसैला, कुछ बड़ा होने पर भी कच्चा आम
खट्टा और पकने पर मीठा, इसी प्रकार हेमन्त में ओषधियां मीठी और वर्षा में
खट्टी ), ( ६३ ) भेद बन जाते हैं ॥१२॥ यथा—
स्वादुरम्लादिभिर्योगे शेषैरम्लादयः पृथक् ।
यान्ति पञ्चदशैतानि द्रव्याणि द्विरसानि तु ॥ १३ ॥
दो रस वाले पन्द्रह भेद हैं यथा—स्वादु ( मधुर ) और अम्ल के योग से
पांच, अम्ल और लवण के योग से चार, लवण और कटु के योग से तीन, कटु,
तिक्त और कषाय के योग से दो, तथा तिक्त और कषाय के योग से एक। जैसे—
(१) मधुराम्ल ( २ ) मधुरलवण (३) मधुरकटु (४) मधुरतिक्त (५) मधुरकषाय
( ६ ) अम्ललवण ( ७ ) अम्लकटु ( ८ ) अम्लतिक्त ( ६ ) अम्लुकषाय (१०)