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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३८६

अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३८६
तुर्यमभितः परिवर्तन्ते, संश्रवणे चास्याऽऽत्मनो वैद्यगुणामुच्चैर्वदन्ति,
यश्चास्य वैद्यः प्रतिकर्म करोति तस्य च दोषान् मुहुर्मुहुरुदाहरन्ति,
आतुरमित्राणि च प्रहर्षणोपजापोपसेवादिभिरिच्छन्त्यात्मीकर्तुं, स्वल्पे-
च्छतां चाऽऽत्मनः ख्यापयन्ति, कर्म चाऽऽसाद्य मुहुर्मुहुरवलोकयन्ति
दाक्ष्यॆणाज्ञानमात्मनः प्रच्छादयितुकामाः, व्याधिं चापवर्तयितुमशक्नु-
वन्तो व्याधितमेवानुपकरणमपचारकमनात्मवन्तमुद्दिशन्ति, अन्त॑
गतं चैनमभिसमीक्ष्यान्यमाश्रयन्ति देशमपदेशमात्मनः कृत्वा, प्राकृत-
जनसन्निपाते चाऽऽत्मनः कौशलमकुशलवद्वर्णयन्ति, अधीरवच्च
धैर्यमपवदन्ति धीराणां, विद्वज्जनसन्निपातं चाभिसमीक्ष्य प्रतिभयमिव
कान्तारमध्वगाः परिहरन्ति दूरात्, यश्चैषां कश्चित्सूत्रावयवो भवत्यु-
पयुक्तस्तमप्रकृते प्रकृतान्तरे वा सततमुदाहरन्ति, न चानुयोगमिच्छ-
न्त्यनुयोक्तुं वा, मृत्योरिव चानुयोगादुद्विजन्ते, न चैषामाचार्यः शिष्यो
वा सब्रह्मचारी वैवादिको वा कश्चित्प्रज्ञायत इति ॥ ८ ॥

इनसे विपरीत गुण वाले वैद्य 'रोगाभिसर' अर्थात् रोगों को लानेवाले और
प्राणों का नाश करने वाले होते हैं। ये वैद्य वैद्य के वेष में लोक में कांटे के
समान दुःखदायी, बिगाड़ करने वाले, द्रोह करने वाले, धर्म का त्याग करके,
राजाओं के आलस्य से हो राष्ट्र में विचरते हैं। इन वैद्यों के विशेष लक्षण ये
हैं—ये वैद्य के समान वस्त्र धारण करके अपनी प्रशंसा करते हुए रोगी के घर
में गली में चिकित्सा कर्म के लोभ से जाते हैं, किसी को रोगी सुनकर उसको
चारों ओर से घेर बैठते हैं, और अपने गुणानुवादों को ऊंचे २ सुनाने लगते
हैं। जो पहले वैद्य चिकित्सा कर रहा है, उसके दोषों को बार २ कहते
हैं। रोगी के मित्रों को खुश करके, चापलूसी, चुगली से, सेवा आदि द्वारा
अपना बनाना चाहते हैं। और अपनी इच्छा को थोड़ा बतलाते हैं। चिकित्सा
कार्य मिलने पर बार २ इधर उधर देखते हैं। चालाकी से अपने अज्ञान को
छिपाने की चेष्टा करते हुए, रोग को अच्छा करने में अशक्त होने पर रोगी को
ही उलाहना देने लगते हैं, तुम्हारे पास साधन नहीं, सेवक नहीं, पथ्य नहीं
रखते। मरता हुआ देखकर बहाना करके दूसरे देश में चले जाते हैं। भोले
भाले आदमी को देखकर अपनी कुशलता को मूर्ख पुरुष की भांति विरुद्ध
वचनों द्वारा प्रकट करते हैं। धीर पुरुषों के सामने अधीर की भांति जोर २
से अपना धैर्य कहने लगते हैं। विद्वान् मनुष्यों को देखकर दुम दबाकर ऐसे
भाग जाते हैं, जिस प्रकार कि भयंकर भय की आशंका से जंगल के रास्ते को

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दूर से ही छोड़ देते हैं। इन लोगों को जो ज़रासा भी आयुर्वेद चिकित्सा का
सूत्र मिल जाता है, तो उसीको बेसमय या बिना मतलब के (प्रसंग के बिना
ही) बार २ बोलने लगते हैं। ये न तो स्वयं किसी से कुछ पूछते हैं और न
यह चाहते हैं कि कोई हमसे पूछे। वे प्रश्न के पूछने से मृत्यु से जैसे डर
कर भागते हैं। न तो कोई इनका आचार्य, न कोई शिष्य और न कोई
सहाध्यायी होता है ॥ ८ ॥
भिषक्छद्म प्रविश्यैव व्याधितांस्तर्कयन्ति ते ।
वीतंसमिव संश्रित्य वने शाकुन्तको द्विजान् ॥ ९ ॥
श्रुत-दृष्टि-क्रिया-काल-मात्रा-ज्ञान-बहिष्कृताः ।
वर्जनीया हि ते मृत्योश्चरन्त्यनुचरा भुवि ॥ १० ॥
वृत्तिहेतोर्भिषङ्मानपूर्णान् मूर्खविशारदान् ।
वर्जयेदातुरो विद्वान् सर्पांस्ते पीतमारुताः ॥ ११ ॥
ये तु शास्त्रविदो दक्षाः शुचयः कर्मकोविदाः ।
जितहस्ता जितात्मानस्तेभ्यो नित्यं कृतं नमः ॥ १२ ॥
रोगी को देखकर वैद्य का वेष पहिन कर रोगी के घर में घुस जाते हैं। ये
जंगल में पहुंचे चिड़ीमार की तरह पक्षियों को जाल में फंसाने वाले होते हैं।
इनको शास्त्रश्रवण, कर्मदर्शन, चिकित्सा और काल, मात्रा शास्त्र का ज्ञान नहीं
होता। ये मृत्यु के नौकर होकर पृथ्वी पर विचरते हैं, इसलिये इनको छोड़
देना चाहिये। जीविका प्राप्त करने के लिये वैद्य बने हुए, पूरे मूर्खों को,
बुद्धिमान् रोगी छोड़ देवे, क्योंकि वे वायु पिये हुए सांप के समान हैं। जो
वैद्य शास्त्रज्ञानी, कर्म में दक्ष, पवित्र, कर्मकुशल, जितहस्त, संयमी, ऐसे
प्राणाभिसर वैद्यों को नित्य प्रति नमस्कार है ॥ ९-१२ ॥
तत्र श्लोकाः—दश प्राणायतनिके श्लोकस्थानार्थसंग्रहः ।
द्विविधा भिषजश्चोक्ताः प्राणस्याऽऽयतनानि च ॥ १३ ॥
इस दश प्राणायतनीय अध्याय में सम्पूर्ण सूत्रस्थान की संक्षिप्त सूची, दो
प्रकार के वैद्य, शरीर के दस प्राणायतन ये विषय प्रतिपादन कर दिये हैं ॥१३॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने दशप्राणायतनीयो
नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः समाप्तः ॥ २९ ॥

अ० ३० ] सूत्रस्थानम् ३६१

त्रिंशत्तमोऽध्यायः
➔➔
अथातोऽर्थे दशमहामूलीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे 'अर्थे दशमहामूलीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे
जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
अर्थे दश महामूलाः समासक्ता महाफलाः ।
महच्चार्थश्च हृदयं पर्यायैरुच्यते बुधैः ॥ ३ ॥
हृदय जिनका मूलस्थान है ऐसी महान् कार्य करने वाली दस धमनियां
हृदय में आश्रित हैं। 'महत्' और 'अर्थ' ये हृदय के ही नामान्तर हैं ॥ ३ ॥
षडङ्गमङ्गं विज्ञानमिन्द्रियाण्यथपञ्चकम् ।
आत्मा च सगुणश्चेतश्चिन्त्यं च हृदि संश्रितम् ॥ ४ ॥
प्रतिष्ठार्थं हि भावानामेषां हृदयमिष्यते ।
गोपानसीनामागारकर्णिकेवार्थचिन्तकैः ॥ ५ ॥
तस्योपघातान्मूर्च्छायं भेदान्मरणमृच्छति ।
यद्धि तत्स्पर्शविज्ञानं धारि तत्तत्र संश्रितम् ॥ ६ ॥
तत्परस्यौजसः स्थानं तत्र चैतन्यसंग्रहः ।
हृदयं महदर्थश्चत स्मादुक्तं चिकित्सकैः ॥ ७ ॥
छः अंगोंवाला शरीर ( दो हाथ, दो पांव, शिर और ग्रीवा एवं
कटि का मध्य भाग ), विज्ञान ( निश्चयात्मक बुद्धि ), पांच ज्ञानेन्द्रियां
तथा इन इन्द्रियों के शब्द, स्पर्श आदि विषय, आत्मा, गुणयुक्त मन, चिन्त्य
( मन के विषय ) ये सब हृदय में आश्रित हैं। यहां पर यह संशय हो सकता है
कि हृदय तो दो अंगुल मात्र है, इसमें छ अंगों वाला शरीर किस प्रकार समा
सकता है। इन्द्रियां अपने आश्रितों में स्थित हैं, विषय बाह्य द्रव्यों में आश्रित
हैं। आत्मा व्यापक होने से अनाश्रित है, गुणयुक्त मन भी अनाश्रित है, ध्येय
आदि हृदय में नहीं रहते। इस सन्देह का उत्तर देते हैं कि हृदय में ये भाव
( पदार्थ ) कार्य-कारण सम्बन्ध से अविरोध रूप में रहते हैं। इनमें आधार-
आधेय-सम्बन्ध नहीं, परन्तु आश्रय-आश्रयि, अथवा अन्वय-व्यतिरेक सम्बन्ध है।
आगारकर्णिका अर्थात् घर को ढांपने के बीचमें एक बड़ी बल्ली होती है और
उसके दोनों ओर दूसरी शहतीरियां पड़ी रहती हैं, उसी प्रकार हृदय के चारों
ओर ये वस्तुयें पड़ी हैं। इस हृदय को उपघात ( चोट ) लगाने से मूर्च्छा हो

३९२ चरकसंहिता [ अ० ३०
जाती है और हृदय के विदीर्ण होने से मनुष्य मर जाता है । हृदय के नाश
होने से हृदय में आश्रित संसारी आत्मा भी नष्ट हो जाता है । स्पर्श को जो
जानता है या जिसके कारण स्पर्श ज्ञान होता है वही 'धारी' शरीर इन्द्रिय,
सत्त्व और आत्मा के संयोग ( शरीरेन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगो धारि जीवितम् ) ये
सब हृदय में आश्रित हैं। यह हृदय परम ( श्रेष्ठ ) ओज का स्थान है,
चैतन्य विषयों में फैले हुए मन का इसी हृदय में संग्रह होता है। विषयों में
गये हुए इसी मनको हृदय में रोकने से योगी बनते हैं और योग मोक्ष का
साधन (योगो मोक्षप्रवर्तकः) है। इसलिये हृदय को महत् और इन शब्दों से
चिकित्सक कहते हैं ॥ ४-७ ॥
तेन मूलेन महता महामूला मता दश ।
ओजोवहाः शरीरेऽस्मिन् विध्यम्यन्ते समन्ततः ॥ ८ ॥
येनौजसा वर्तयन्ति प्रीणिताः सर्वजन्तवः ।
यहते सर्वभूतानां जीवितं नावतिष्ठते ॥ ९ ॥
यत्सारमादौ गर्भस्य यत्तद्गर्भरसादसः ।
संवर्तमानं हृदयं समाविशति यत्पुरा ॥ १० ॥
यस्य नाशात्तु नाशोऽस्ति धारि यद्धृदयाश्रितम् ।
यः शरीररसस्नेहः प्राणा यत्र प्रतिष्ठिताः ॥ ११ ॥
तत्फला बहुधा वा ताः फलन्तीव महाफलाः ।
धमानाद्धमन्यः स्रवणात् स्रोतांसि सरणात्सिराः ॥ १२ ॥
इस हृदय से महामूल वाली ( जिनका प्रभावस्थान बड़ा है, ऐसी ) दस
ओजवाहिनी धमनियां निकल कर इस सम्पूर्ण शरीर में फैलती हैं । जिस ओज
के पुष्ट होने पर सब प्राणी जीते हैं, जिस ओज के बिना प्राणियों का जीवन
नहीं रह सकता, जो ओज शुक्र रक्त संयोग से बने गर्भ में सारभूत है, और जो
शुक्र रक्त के संयोग से बने कलल रूप में रसरूप सार है, जो ओज हृदय के
बनने पर स्पष्ट होकर हृदय में रहता है, जिस ओज के नष्ट होने पर ( धातुओं
का क्षय न होने पर भी ) मृत्यु निश्चित है, जो कि प्राणों को धारण करने में
मुख्य है, जिस ओज में प्राण आश्रित हैं उस ओज को लेजाने वाली, ओजोवहा,
महाफला दस धमनियां हृदय का आश्रय लेकर अनेक प्रकार से फलती हैं । वे
हृदय में दस होती हुई भी शरीर में प्रतान भेदों से असंख्य बनजाती हैं ।
पूरण अर्थात् बाह्य रस द्वारा भरने से ( स्पन्दन होने से ), धमनियाँ, स्रवण
अर्थात् रस, पोष्य वस्तु का स्रवण होने से स्रोतस् और दूसरे देश या स्थान में
जाने से 'सिरा' कहलाती हैं ॥ ८-१२ ॥