चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३०३
अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३०३
वायु और पृथिवी गुण की अधिकता से कषाय रस उत्पन्न होता है । इस प्रकार
से पञ्च महाभूतों के कम अधिक होने से छः रस उत्पन्न होते हैं । जिस प्रकार
सम्पूर्ण स्थावर और जंगम पदार्थों में महाभूतों के कम अधिक होने से नाना
प्रकार के वर्ण, रंग, आकृति, रूप आदि बन जाते हैं, उसी प्रकार छः रस भी
बन जाते हैं। इसी प्रकार महाभूतों के कम अधिक होने से ही काल, संवत्सर
छः ऋतुओं में विभक्त हो जाता है। यथा—हेमन्त काल में सोम गुण की
अधिकता होती है, शिशिर ऋतु में वायु और आकाश गुण की अधिकता होती
है । 'तावेतावर्कवायू' (च० सू० अ० ६) में स्पष्ट कर चुके हैं । बीजाङ्कुरवत्
कार्य कारण की भांति संसार के अनादि होने से, पंच महाभूत और ऋतुओं
का कार्यकारण सम्बन्ध समझना चाहिये ॥३८॥
तत्राग्निमारुतात्मका रसाः प्रायेणोर्ध्वभाजः, लाघवात्पवनत्वाच्च
वायोरूर्ध्वज्वलनत्वाच्च वह्नेः, सलिलपृथिव्यात्मकस्तु प्रायेणाधोभाजः,
पृथिव्या गुरुत्वान्निम्नगत्वाच्चोदकस्य, व्यामिश्रात्मकाः पुनरुभयतो-
भाजः ॥ ३६ ॥
इन में अग्नि और वायु गुण की अधिकता वाले रसयुक्त द्रव्य प्रायः
ऊर्ध्वगामी (वमनकारक) होते हैं। क्योंकि वायु हल्की और उड़ने वाली है।
अग्नि का स्वभाव ऊपर को जलने का है, वह ऊपर को गति करता है,
इसलिए इन गुणों वाले द्रव्य ऊर्ध्वगामी हैं। जल और पृथिवी गुण युक्त रस
वाले द्रव्य प्रायः करके अधोगामी (विरेचनकारक) होते हैं। क्योंकि पृथिवी
गुरु है और पानी का स्वभाव नीचाई की ओर बहना है। जिन पदार्थों
में चारों तत्त्व मिले रहते हैं वे ऊर्ध्वगामी और अधोगामी दोनों तरह के
होते हैं ॥ ३६ ॥
तेषां षण्णां रसानामेकैकस्य यथाद्रव्यं गुणकर्माण्यनुव्याख्यास्यामः। तत्र
मधुरो रसः शरीरसात्म्याद्रस-रुधिर-मांस-मेदोऽस्थि-मज्जौजः-शुक्राभिव-
र्धन आयुष्यः षडिन्द्रियप्रसादनो बलवर्णकरः पित्त-विष-मारुत-घ्नस्तृष्णा-
प्रशमनस्त्वच्यः कण्ठ्यः प्रीणनो जीवनस्तर्पणो बृंहणः स्थैर्यकरः
क्षीणक्षतसंधानकरो घ्राण-मुख-कण्ठौष्ठ-जिह्वा-प्रह्लादनो दाहमूर्च्छाप्रशमनः
षट्पदपिपीलिकानामभीष्टतमः स्निग्धः शीतो गुरुश्च । स एवंगुणोऽप्येक
एवात्यर्थमुपयुज्यमानः स्थौल्यं मार्दवमालस्यमतिस्वप्नं गौरवमनन्ना-
भिलाषमग्निदौर्बल्यमास्यकण्ठमांसाभिवृद्धिं श्वास-कास-प्रतिश्यायालस-
क-शीत-ज्वरानाहास्य-माधुर्य-वमथु-संज्ञास्वरप्रणाश-गलगण्डगण्डमा-
३०४ चरकसंहिता [अ० २६
ङा-श्लीपद-गलशोफ-बस्ति-धमनीगण्डोपलेपाक्ष्यामयानभिष्यन्दमित्येवं
प्रभृतीन् कफजान् विकारानुपजनयति ॥ (१)॥
इन छः रसों में से एक-एक रस के आधार द्रव्य के अनुसार गुण, कर्म
की व्याख्या करेंगे। इन में मधुर रस—जन्म से ही शरीर के अनुकूल
(सात्म्य) है। (जन्म से ही मधुर रसयुक्त दूध को पीकर बच्चा बढ़ता है)।
रस, रक्त, मांस, मेद, मज्जा, अस्थि, ओज और शुक्र को बढ़ाता है,
आयुवर्द्धक, श्रोत्र, त्वक्, नासिका, चक्षु, रसना ये पांच ज्ञानेन्द्रिय और
मन इन को प्रसन्न, निर्मल करता है। बलकारक, कान्तिकारक पित्त-
नाशक, विषनाशक, वायुनाशक, तृष्णानाशक, त्वचा, केश, और स्वर के
लिये हितकारी, आह्लादजनक, अभिघात आदि से बेहोश पुरुष को जीवन देने
वाला, तृप्ति करने वाला, वृद्धि करने वाला, स्थिरकारक, क्षीण और क्षत व्यक्ति
का पोषण करने एवं सन्धान अर्थात् टूटे का जोड़ने वाला नासिका, मुख, कण्ठ,
ओष्ठ और जीभ का आह्लाद करने वाला, जलन और मूर्च्छानाशक, भ्रमर और
चिऊंटियों का प्रिय, स्निग्ध, शीत और गुरु है। यद्यपि इस मधुर रस में इतने
गुण हैं, तो भी इस अकेले रस को ही निरन्तर अधिक मात्रा में खाने से स्थूलता
कोमलता, आलस्य, नींद की अधिकता, भारीपन, अन्न में अरुचि, अग्नि की
निर्बलता, मुख (गाल), गले में मांस की वृद्धि, श्वास, कास, प्रतिश्याय, अलसक,
शीत ज्वर, आनाह (अफारा), मुख की मधुरता, वमन, संज्ञानाश, स्वर नाश,
गलगण्ड, गण्डमाला, श्लीपद, गले की सूजन, बस्ति, धमनी गुदा (गले में) में
मांस, चर्बी या कफ कोई पदार्थ बढ़ जाता है, नेत्र रोग, अभिष्यन्द, कफ
रोग (कफस्राव) आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं॥
अम्लो रसो भक्तं रोचयति, अग्निं दीपयति, देहं बृंहयति ऊर्जयति,
वातमनुलोमयति, हृदयं तर्पयति, आस्यमास्रावयति, भुक्तमपकर्षयति,
क्लेदयति, जरयति, प्रीणयति, लघुरुष्णः स्निग्धश्च । स एवंगुणोऽप्येक
एवात्यर्थमुपयुज्यमानो दन्तान् हर्षयति, तर्षयति, संवीजयति लोमानि,
कफं विलापयति, पित्तमभिवर्धयति, रक्तं दूषयति, मांसं विदहति, कायं
शिथिलीकरोति, क्षीण-क्षत-कृश-दुर्बलानां श्वयथुमापादयति, अपिच
क्षताभिहत-दष्ट-दग्ध-भग्न-शून-प्रच्युतावमूत्रित-परिसर्पित-मर्दित-च्छिन्न-
भिन्न-विश्लिष्ट-विद्धोत्पिष्टादीन् पाचयत्याग्नेयस्वभावात् परिदह्यं
कण्ठ-मुरो हृदयं च ॥ (२)॥
अम्ल रस अन्न में रुचि पैदा करता है, अग्नि को बढ़ाता है, शरीर
बढ़ाता है, तेज देता है, मन को उत्तेजित ( जाग्रत ) करता है । इन्द्रियों को
बलवान् करता है, बल को बढ़ाता है वायु का अनुलोमन करता हैं, हृदय के
लिये हितकारी है । मुख में लार चुआता है, खाये हुए भोजन को बाहर निका-
लता है, क्लिन्न ( शरीर को गीला ) बनाता है । खाये भोजन को पचाता है,
प्रसन्नता करता है लघु, उष्ण, स्निग्ध गुण वाला है ।।
यही एक रस यदि अधिक मात्रा में सेवन किया जाय, तो दांतों को खोट
करता है, ( खट्टा करता है ), तृप्ति अर्थात् भोजन में अनिच्छा उत्पन्न करता
है, आंखों को मीचाता है, शरीर के बालों को कंपा देता है, ( रोमांचित करता
है ), कफ को पिघलाता है, पित्त को बढ़ाता है, रक्त को दूषित करता है,
मांस में जलन पैदा करता है, शरीर को ढीला ( सुस्त करता है ), क्षीण, उरः-
क्षत रोगी, निर्बल, कमजोर पुरुषों में सूजन उत्पन्न करता है और भी जख्म,
चोट, दांत लगे, जले, अस्थि आदिका टूटना, सूजन, सन्धिभ्रंश, प्राणियों के
मूत्रजन्य विष, स्पर्शजन्य विष ( मकड़ी के ), रगड़ लगे हुए, दो टुकड़े हुए,
चुभे हुए पिसे हुए आदि व्रणों को पका देता है । अग्निगुण होने से कण्ठ,
छाती और हृदय में जलन उत्पन्न करता है ॥ (२) ॥
लवणो रसः पाचनः क्लेदनो दीपनश्च्यावनश्छेदनो भेदनस्तीक्ष्णः
सरो विकाश्यधः संस्रंस्यवकाशकरो वातहरः स्तम्भ-बन्ध संघात-विधमनः
सर्वरसप्रत्यनीकभूतः, आस्यमास्त्रावयति, कफं विष्यन्दयति, मार्गान्
विशोधयति, सर्वशरीरावयवान्मृदूकरोति, रोचयत्याहारमाहारयोगी,
नात्यर्थं गुरुः स्निग्ध उष्णश्च; स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानः
पित्तं कोपयति, रक्तं वर्धयति, तर्षयांत्, मूर्च्छयति, तापयति, दारयति,
कुष्णाति मांसानि, प्रगाळयति कुष्ठानि, विषं वर्धयति, शोफान् स्फोटयति,
दन्तांश्च्यावयति, पुंस्त्वमुपहन्ति, इन्द्रियाण्युपरुणद्धि, वली-पलित-
खालित्यमापादयति, अपि च लोहित-पित्ताम्ल-पित्त-वीसर्प-वात-रक्त-
विचर्चिकेन्द्रलुप्त-प्रभृतीन्वकारानुपजनयति ॥ ( ३ )॥
लवण रस—पाचक, नरम बनाने वाला, अग्निदीपक, नीचे गिराने वाला,
छेदन भेदन करने वाला, तीक्ष्ण, सर ( मल लाने वाला ), विकाशी ( क्लेद का
छेदन करने वाला ) अधःस्रंसी, विष्यन्दशील ( रेचक ) विरलता करने वाला
वातनाशक, मल-मूत्रादि के अवरोध को नाश करने वाला और जहां पर
जरा सा अधिक हो जाता है, वहां पर और कोई दूसरा रस स्पष्ट नहीं
में थूक उत्पन्न करता है, कफ को पिघलाता है, मागों का शोधन
३०६ चरकसंहिता [ अ० २६
करता है, शरीर के सब अवयवों को कोमल करता है, आहार में रुचि उत्पन्न
करता है, आहार में सदा बरता जाता है, बहुत भारी नहीं होता, स्निग्ध और
उष्ण गुणवाला है।
यही एक रस यदि अधिक सेवन किया जाय तो पित्त को कुपित करता है,
रक्त को बढ़ाता है, प्यास उत्पन्न करता है, संज्ञा नाश करता है, शरीर को
गरम करता है, फाड़ता है, मांस को गलाता है, कुष्ठों को द्रवित करता है,
विष को बढ़ाता है, सूजन को फाड़ता है, दांतों को गिरा देता है, पुरुषत्व का
नाश करता है, इन्द्रियों को जड़ बनाता है। झुर्रियां पैदा करता, बालों को श्वेत
करता, गंज अर्थात् बालों को गिराता है। इसके अतिरिक्त रक्तपित्त, अम्लपित्त,
वीसर्प, वातरक्त, विचर्चिका, इन्द्रलुप्त आदि रोगों को उत्पन्न करता है ॥(३)॥
कटुको रसो वक्त्रं शोधयति, अग्निं दीपयति, भुक्तं शोषयति, घ्राण-
मास्रावयति, चक्षुर्विरेचयति, स्फुटीकरोतीन्द्रियाणि, अलसक-श्वयथूप-
चयोदर्दाभिष्यन्द-स्नेह-स्वेद-क्लेद-मलानुपहन्ति, रोचयत्यशनं कण्डूर्विनाश-
यति, क्रिमीन् हिनस्ति, मांसं विलिखति, शोणितसंघातं भिनत्ति, बन्धां-
श्छिनत्ति, मार्गान्विवृणोति, श्लेष्माणं शमयति, लघुरुष्णो रूक्षश्च । स
एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमानो विपाकप्रभावात् पुंस्त्वमुपहन्ति,
रसवीर्यप्रभावान्मोहयति, ग्लपयति, सादयति, कर्षयति, मूर्च्छयति,
नमयति, तमयति, भ्रमयति, कण्ठं परिदहति, शरीरतापमुपजनयति,
बलं क्षिणोति, तृष्णां चोपजनयति । अपिच वाय्वग्निबाहुल्याद् भ्रम-म-
द-द्रवथु¹ कम्प-तोद भेदंश्चरण-भुज-पार्श्वपृष्ठ-प्रभृतिषु मारुतजान्विका-
रानुपजनयति ॥ (४) ॥
कटु रस मुख का शोधन करता है, अग्नि को बढ़ाता है, खाये हुए भोजन
को सुखाता है, नाक से कफ बहाता है, आंखों में आंसू लाता है, इन्द्रियों को
उत्तेजित करता है, अलसक, सूजन, वृद्धि, उदर्द, अभिष्यन्द, स्नेह, पसीना,
क्लेद, मल का नाश करता है। कृमियों को मारता है, मांस का लेखन करता
है (स्थूलता को कम करता है)। खाये हुए भोजन का रेचन करता है, खाज
को मिटाता है, व्रणों को बैठाता है, भरता है । जमे हुए रक्त को तोड़ता है,
सन्धि-बन्धनों को छेदन करता है, मार्गों को साफ़ बनाता है, कफ को शान्त
करता है । लघु, उष्ण और रूक्ष होता है ।
यही एक रस यदि अधिक मात्रा में सेवन किया जाय तो कटु ।
१. 'भ्रममदवमथु' इति च पाठः ।