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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० २६ ] सूत्रस्थानम ३१३

अ० २६ ] सूत्रस्थानम ३१३
होने से होता है । रस प्रत्यक्ष है, विपाक सदा परोक्ष और वीर्य अनुमान द्वारा
ज्ञात होता है । यथा-सैन्धव नमक शीत वीर्य और जलचर मांस उष्ण है ।
कहीं २ वीर्य का प्रत्यक्ष द्वारा भी ज्ञान हो जाता है । यथा-राई को चखकर
तीक्ष्ण वीर्य का पता लग जाता है । यह वीर्य सहज और कृत्रिम है, उड़द का
भारीपन और मूंग का हल्कापन यह स्वभाव से ही है । और लाजा का हल्का-
पन यह कृत्रिम है ॥ ६१-६३ ॥
रसवीर्यविपाकानां सामान्यं यत्र लक्ष्यते ।
विशेषः कर्मणां चैव प्रभावस्तस्य स स्मृतः ॥ ६४ ॥
कटुकः कटुकः पाके वीर्योष्णश्चित्रको मतः ।
तद्वद्दन्ती प्रभावात्तु विरेचयति मानवम् ॥ ६५ ॥
विषं विषघ्नमुक्तं यत् प्रभावस्तत्र कारणम् ।
ऊर्ध्वानुलोमिकं यच्च तत्प्रभावप्रभावितम् ॥ ६६ ॥
मणीनां धारणीयानां कर्म यद्विविधात्मकम् ।
तत्प्रभावकृतं तेषां, प्रभावोऽचिन्त्य उच्यते ॥ ६७ ॥
किंचिद्रसेन कुरुते कर्म वीर्येण चापरम् ।
द्रव्यं गुणेन पाकेन प्रभावेण च किंचन ॥ ६८ ॥
रसं विपाकस्तौ वीर्यं प्रभावस्तानपोहति ।
बलसाम्ये रसादीनामिति नैसर्गिकं बलम् ॥ ६९ ॥
सम्यग्विपाकवीर्याणि प्रभावश्चाप्युदाहृतः ।
प्रभाव—जिस स्थान पर रस, वीर्य और विपाक की समानता होने पर
भी कार्य में विशेषता उत्पन्न होती हो, उसे 'प्रभाव' कहते हैं । जिस प्रकार
चित्रक ( चीतामूल ) का रस कटु, विपाक कटु और वीर्य उष्ण है, उसी प्रकार
दन्ती ( जमालमोटा ) भी कटु रस, कटु विपाक और उष्णवीर्य है । परन्तु
जमालमोटा विरेचन करता है, चीता नहीं करता । जो विष विष को ( स्थावर
विष जंगम विष को—'तस्माद् दंष्ट्राविषं मौलम्' ) नष्ट करता है, उसका भी
कारण प्रभाव है । जो द्रव्य ऊर्ध्वगामी और अधोगामी दोनों मार्गों का संशोधन
करता है, वह भी प्रभाव है । मणियों के धारण करने से विषनाश, शूलहरण
आदि जो नाना प्रकार के कार्य होते हैं, वे सब प्रभाव के कारण ही होते हैं।
प्रभाव द्रव्य की वह अचिन्त्य शक्ति है जिसके विषय में कुछ कह नहीं सकते कि
क्यों होता है । कोई द्रव्य अपने रस से, कोई वीर्य से, कोई गुण से, कोई विपाक
से और कोई प्रभाव से कार्य करता है । किसी पदार्थ में रस आदि का बल

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समान हों, तो वहां पर रस को विपाक, रस और विपाक को वीर्य, रस, विपाक,
वीर्य को प्रभाव अपने स्वाभाविक बल से जीत लेता है। जिस प्रकार कि भैंस
की चर्बी रस और विपाक में मधुर है, परन्तु वीर्य-उष्ण है, इसलिये वह मधुर रस
के कार्य पित्त-शमन को न करके, उष्ण वीर्य के कार्य पित्तप्रकोप को करता है।
मद्य, इसका रस और विपाक अम्ल है, वीर्य उष्ण है, परन्तु यही मद्य अपने
प्रभाव से इन तीनों को रद्द करके स्त्रियों में दुग्ध उत्पन्न करता है। अब तक
विपाक, वीर्य और प्रभाव का वर्णन भली प्रकार कर दिया है ॥ ६४-६६ ॥
षण्णां रसानां विज्ञानमुपदेक्ष्याम्यतः परम् ॥ ७० ॥
स्नेहन-प्रीणनाह्लाद-मार्दवै रुपलभ्यते ।
मुखस्थो मधुरश्चाऽऽस्यं व्याप्रुवंल्लिम्पतीव च ॥ ७१ ॥
दन्तहर्षान्मुखस्रावात्स्वेदनान्मुखबोधनात् ।
विदाहाच्चाऽऽस्यकण्ठस्य प्राश्यैवाम्लं रसं वदेत् ॥ ७२ ॥
प्रलीयन्क्लेदविष्यन्दमार्दवं कुरुते मुखे ।
यः शीघ्रं लवणो ज्ञेयः स विदाहान्मुखस्य च ॥ ७३ ॥
संवेजयेद्यो रसनां निपाते तुदतीव च ।
विदहन्मुखनासाक्षि संस्रावी स कटुः स्मृतः ॥ ७४ ॥
प्रतिहन्ति निपाते यो रसनं स्वदते न च ।
स तिक्तो मुख-वैशद्य-शोष-प्रह्लाद-कारकः ॥ ७५ ॥
वैशद्य-स्तम्भ-जाड्यैर्यो रसनं योजयेद्रसः ।
बध्नातीव च यः कण्ठं कषायः स विकास्यपि ॥ ७६ ॥ इति ॥
इसके आगे छः रसों के लक्षण कहते हैं। जो रस स्निग्धता, प्रसन्नता,
आल्हाद अथवा मृदुता उत्पन्न करता है, मुख में रखने से सम्पूर्ण मुख को
चिकास से भर देता है, लिसलिसा बना देता है, वह मधुर रस है। जो रस
दांतों को खट्टा कर देता है, मुख से थूक ( लाला ) चुआता है, पसीना लाता
है, मुख में जागृति उत्पन्न कर देता है, मुख और गले में जलन करता है,
वह 'अम्ल' रस है। जो रस मुख में रखने से घुलने लगे, क्लिन्न नमीदार,
लाला बहावे, मुख में हल्कापन लाये, मुख में विदाह करता हो, उसे 'लवण'
रस कहते हैं। जो रस जीभ को छूते ही चुरचुराहट उत्पन्न करे और सुई जैसा
चुभने लगे, मुख को जलाता हुआ नाक और आँखों से पानी बहाने लगे वह
'कटु' रस है। जो रस जीभ के साथ स्पर्श होने पर जीभ को जड़ कर दे और
और कुछ अच्छा नहीं लगता और मुख को साफ करता है, सन्तोष की

आह्लादित करता है वह 'तिक्त' रस है । जिस रस के खाने से जीभ स्वच्छ,
जड़ और स्तम्भित हो जाती है और गले को रोक देता है और हृदय को
पीड़ित करता है, वह 'कषाय' रस है ॥ ७०-७६ ॥
एवंवादिनं भगवन्तमात्रेयं पुनरग्निवेश उवाच—भगवन् ! श्रुत-
मेतदवितथमर्थसंपद्युक्तं भगवतो यथावद् द्रव्यगुणकर्माधिकारे वचः,
परं त्वाहारविकाराणां वैरोधिकानां लक्षणमनतिसंक्षेपेणोपदिश्यमानं
शुश्रूषामह इति ॥ ७७ ॥
तमुवाच भगवान्नात्रेयः—देहधातुप्रत्यनीकभूतानि द्रव्याणि देह-
धातुभिर्विरोधमापद्यन्ते, परस्परगुणविरुद्धानि कानिचित् कानिचित्सं-
योगात्संस्कारादपराणि देश-काल-मात्रादिभिश्चापराणि तथा स्वभावा-
दपराणि ॥ ७८ ॥
तत्र यान्याहारमधिकृत्य भूयिष्ठमुपयुज्यन्ते तेषामेकदेशं वैरोधिक-
मधिकृत्योपदेक्ष्यामः—न मत्स्यान् पयसा सहाभ्यवहरेत्, उभयं
ह्येतन्मधुरं मधुरविपाकं महाभिष्यन्दि शीतोष्णत्वाद्विरुद्धवीर्यं विरुद्ध-
वीर्यत्वाच्छोणितप्रदूषणाय महाभिष्यन्दित्वान्मागर्गापरोधाय चेति ॥७९॥
इस प्रकार से कहते हुए महर्षि आत्रेय को अग्निवेश ने कहा कि हे
भगवन् ! आपने द्रव्यगुण कर्म के विषय में जो कुछ अर्थयुक्त वाणी कही है,
वह यथार्थ रूप में सुन ली । परन्तु विरुद्ध आहार के लक्षणों को विस्तार से
सुनने की इच्छा से, इसलिये आप उसको प्रतिपादन करें । इस पर आत्रेय ऋषि
ने कहा—शरीर के रसादि सात धातु या वातादि दोष, इनको प्रकृति के विरुद्ध
करने (दूषित करने) वाले द्रव्यों से शरीर के धातु बिगड़ जाते हैं। इन द्रव्यों में
कुछ द्रव्य परस्पर गुणों से कुछ संयोग से और कुछ संस्कार से, कुछ देश, काल,
मात्रा से और कुछ स्वभाव से ही दूषित करने वाले (विरोधी गुण के) होते हैं।
परस्पर विरुद्ध जैसे मछलियों को दूध के साथ खाना । संयोग विरुद्ध-जैसे पके हुए
बड़हल को उड़दों में मिलाकर खाना । संस्कार विरुद्ध-जैसे कबूतर को सरसों
के तेल में भून कर खाना । देश दो प्रकार का है, भूमि और शरीर । भूमि
विरुद्ध—राख और धूल में मिला भोजन या परोक्ष में बना भोजन खाना ।
शरीरविरुद्ध—उष्णावस्था में मधु खाना । समयविरुद्ध-वासी रक्खा मकोय का
; खाना । मात्रा विरुद्ध—एक वजन में मधु और घी खाना । स्वभाव विरुद्ध-
विष ओज के विरुद्ध दसगुण रखता है। इनमें से जो विरोधी द्रव्य

३१६ चरकसंहिता [ अ० २६
मछलियों को दूध के साथ नहीं खाना चाहिये। क्योंकि दोनों ही वस्तुएं मधुर
रस और मधुर विपाक वाली हैं। इसलिये दोनों को एक साथ सेवन करने से
कफ की बहुत वृद्धि होती है, दूध शीतवीर्य और मछलियां उष्णवीर्य हैं। इस-
लिये रक्त को दूषित करती हैं और महा अभिष्यन्दि होने से स्रोतों को रोक देंगी ॥
तदनन्तरमात्रेयवचनमनुनिशम्य भद्रकाप्योऽग्निवेशमुवाच—
सर्वानेव मत्स्यान् पयसा सहाभ्यवहरेदन्यत्रैकस्माच्चिलिचिमात्, स पुनः
शकली सर्वतो लोहितराजी रोहितप्रकारः प्रायो भूमौ चरति, तं चेत्प-
यसा सहाभ्यवहरेन्निःसंशयं शोणितजानां विबन्धजानां च व्याधीनाम-
न्यतममथवा मरणं प्राप्नुयादिति ॥ ८० ॥
आत्रेय महर्षि के वचन को श्रवण कर भद्रकाप्य मुनि अग्निवेश को बोले
कि एक चिलचिम मछली को छोड़कर और सब मछलियों को दूध के साथ खा
सकते हैं। इस चिलचिम मछली पर चारों ओर लाल लाल रेखायें, धारियां होती
हैं, इसका रंग लाल होता हे और प्रायः भूमि (रेगिस्तान, जैसलमेर में जिसे
रेगमाही मच्छी कहते हैं) में फिरती हैं। इस मछली को दूध के साथ खाने से
निश्चय रूप में रक्तजन्य या अवरोध (मलमूत्र) जन्य रोगों या मृत्यु को भी
प्राप्त हो सकता है ॥ ८० ॥
नेति भगवानात्रेयः । सर्वानेव मत्स्यान्न पयसाऽभ्यवहरेद्विशेषतस्तु
चिलिचिमं, स हि महाभिष्यन्दित्वात्स्थूललक्षणतरानेतान् व्याधीनुपज-
नयत्यामविषमुदीरयति च ॥ ८१ ॥
ग्राम्यानूपौदकपिशितानि च मधु-तिल-गुड-पयो-माष-मूलक-बिसै-
र्विरूढधान्यैश्च नैकघाऽद्यात्, तन्मूलं च बाधिर्य्यान्ध्य-वेपथु-जाड्य-विक-
ळ-मूकतामैन्मिण्यमथवा मरणमाप्नोति न पौष्करं, रोहिणीकं शाकं,
कपोतान् वा सार्षप-तैल-मृष्टान्मधुपयोभ्यां सहाभ्यवहरेत्, तन्मूलं हि
शोणिताभिष्यन्द-धमनी-प्रविचयापस्मार-शङ्खक-गलगण्ड-रोहिणीकाना-
मन्यतमं प्राप्नोत्यथवा मरणमिति । न मूलक-लशुन कृष्णगन्धार्जक-
सुमुख-सुरसादीनि भक्षयित्वा पयः सेव्यं, कुष्ठाबाधभयात् । न जातुक-
शाकं न लिकुचं पक्वं मधुपयोभ्यां सहोपयोज्यं, एतद्धि मरणायाथवा
बल-वर्ण-तेजो-वीर्योपरोधायालगुण्याधये षाण्ढ्याय चेति । तदेव लिकुचं
पक्वं न माष-सूप-गुड-सर्पिर्भिः सहोपयोज्यं वैरोधिकत्वात् । तथाऽम्लाम्र-
तक-मातुलुङ्ग-लिकुच-करमर्द-मोच-दन्त-शठ-बदर-कोशाम्र-भव्य-जम्बु-
कपित्थ-तिन्तिडीक-पारावताक्षोट-पनस-नालिकेर-दाडिमामलक- की