चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २५ ] १६ सूत्रस्थानम् २८६
अ० २५ ] १६ सूत्रस्थानम् २८६
धर्म और काम दोनों मिलते हैं। शरीर और मन के लिये जो प्रिय या हितकर
हों, वे पथ्य हैं और जो शरीर और मन के लिये अप्रिय हों वे अपथ्य हैं, ऐसा
लक्षण नहीं समझना चाहिये । क्योंकि मात्रा (जैसे-घृत पथ्य होते हुए भी
अधिक मात्रा में अपथ्य है), काल (वसन्त में घी अपथ्य है), क्रिया (घृत
विरुद्ध द्रव्य के साथ अपथ्य है), भूमि (जल बहुत देश में अपथ्य है)। देह
(अतिस्थूल शरीर में घी अपथ्य है), दोष (कफ दोष में घी अपथ्य है) से
भेद हो जाता है। इसी प्रकार विष भी पथ्य हो जाता है (यथा—'उदरे
विषं तिलं दद्यात्।' उदर रोगों में तिलमात्र विष देना चाहिये)। इस प्रकार
पथ्य वस्तु अपथ्य हो जाती है और अपथ्य वस्तु पथ्य बन जाती है, इसलिये
जो वैद्य यश की इच्छा करते हों, उन को वस्तु के स्वभाव, प्राकृतिक गुण और
मात्रा, काल आदि का विचार करके प्रयोग करना चाहिये ॥ ४०-४५ ॥
तदात्रेयस्य भगवतो वचनमनुनिशम्य पुनरपि भगवन्तमात्रेयमग्नि-
वेश उवाच—यथोद्देशमभिनिर्दिष्टः केवलोऽयमर्थो भगवता श्रुतस्त्व-
स्माभिः । आसवद्रव्याणामिदानीं लक्षणमनतिसंक्षेपेणोपदिश्यमानं
शुश्रूषामह इति ॥ ४६ ॥
आत्रेय ऋषि के वचन को सुनकर फिर भी अग्निवेश भगवान् आत्रेय मुनि
से पूछने लगे। हे महाराज ! आपने प्रतिज्ञानुसार पथ्यापथ्य का प्रधान विषय
सम्पूर्ण रूप से प्रतिपादन कर दिया है। इस समय आसव द्रव्यों के लक्षणों को
विस्तार में आपसे सुनना चाहते हैं ॥ ४६ ॥
तमुवाच भगवानात्रेयः—धान्य-फल-मूल-सार-पुष्प-काण्ड-पत्र-त्वचो
भवन्त्यासवयोनयोऽग्निवेश ! संग्रहेणाष्टौ शर्करा नवमीकाः, तास्वेव द्रव्य-
संयोगकरणतोऽपरिसंख्येयासु यथापथ्यतमानामासवानां चतुरशीतिं
निबोध । तद्यथा—सुरा-सौवीर-तुषोदक-मैरेय-मेदक-धान्याम्लाः षड्
धान्यासवा भवन्ति, मृद्वीका-खर्जूर-काश्मर्य-धन्वन-राजादन-तृणशून्य-
परूषकाभयामलक-मृगलिण्डिका-जाम्बव- कपित्थ-कुवल - बदर-कर्कन्धु-
पीलु-प्रियाल-पनस-न्यग्रोधाश्वत्थ-प्लक्ष-कपीतनोदुम्बराजमोद-शृङ्गाटक-
शङ्खिनीभिः फलासवाः पञ्चविंशतिः। विदारिगन्धाश्वगन्धा-कृष्णगन्धा-
शतावरी - श्यामा - त्रिवृद्दन्ती - बिल्बोत्थुबुक - चित्रक - मूलैरेकादश
मूलासवाः। शालप्रियकैकवकर्ण-चन्दन-स्यन्दन-खदिर - कदर-सप्तप-
र्णार्जुनासनारिमेद-विन्दुक-किणिही-शमी-शुक्ति-शिंशपा-शिरीष-वञ्जुल -
धन्वन-मधूकैः सारासवा विंशतिः। पद्मोत्पल-नलिन-कुमुद-सौगन्धिक-
पुण्डरीक-शतपत्र-मधूक-प्रियङ्गु-धातकीपुष्पैर्दश पुष्पाप्तवा भवन्ति । इक्षु-
काण्डेक्ष्विक्षुबालिका-पुण्ड्रक-चतुर्थाः काण्डाप्तवा भवन्ति । पटोल-ता-
डपत्रासवौ द्वौ भवतः । तिल्वक-लोध्रैलबालुक-क्रमुक-चतुर्थास्त्वगासवा
भवन्ति, शर्करासब एक एवेति । एवमेषामासवानां चतुरशीतिः परस्प-
रेणासंस्पृष्टानामासवद्रव्याणामुपनिर्दिष्टा भवति । एषामासवानामासु-
तत्त्वादासकसंज्ञा । द्रव्य-संयोग-विभागस्त्वेषां बहुविकल्पः संस्कारश्च ।
यथास्वं योनिसंस्कारसंस्कृताश्चाऽऽसवाः स्वकर्म कुर्वन्ति । संयोग-
संस्कार-देश-काल-स्थापन-मात्रादयश्च भावास्तेषां तेषामासवानां ते ते
समुपदिश्यन्ते तत्तत्कार्यमभिसमीक्ष्येति ॥ ४७ ॥
अग्निवेश को भगवान् आत्रेय ने कहा—हे अग्निवेश ! संक्षेप से उन सब
के उत्पत्ति स्थान ६ ( नौ ) हैं । यथा— धान्य, फल, मूल, सार, पुष्प, काण्ड,
पत्र, त्वचा, (छाल) और शर्करा । इन्हीं में द्रव्यसंयोग (मिश्रण), करण
(संस्कार) द्वारा असंख्येय आसव बन जाते हैं । इनमें अधिक हितकारी (मुख्य)
आसव २४ ( चौबीस ) हैं । उनको कहते हैं—
सुरा, सौवीरक, तुषोदक, मैरेय और मेदक और धान्याम्ल—ये छः धान्या-
म्बुक (कांजी) आसव होते हैं १ । द्राक्षा, खजूर, गम्भारी, धान्वन, राजादन
(खिरनी), तृणशून्य (केतकी), परूषक (फालसा), अभया (हरड़),
आमलक (आंवला), मृगलिण्डिका (बहेड़ा ?), जाम्भव (जामुन), कपित्थ
(कैथ), कुवल (बड़ा बेर), बदर (छोटा बेर), कर्कन्धु (झाड़ी का बेर),
पीलु, पियालु (प्याल), पनस (कटहल), न्यग्रोध (बड़), अश्वत्थ (पीपल),
प्लक्ष (पिलखन), कपीतन, उदुम्बर (गूलर), अजमोद (अजवायन),
शृङ्गाटक (सिंघाड़ा), और शंखिनी, ये छब्बीस फलासव हैं । विदारीगन्धा
(शालपर्णी), अश्वगन्धा (असगन्ध), कृष्णागन्धा (शोभाञ्जन), शतावरी,
निशोथ, जमाल गोटा, द्रवन्ती (मुगलई ऐरण्ड), बेलगिरी, एरण्डमूल, चीतामूल,
ये ग्यारह मूलासव हैं । बड़ासाल, अश्वकर्ण (साल भाग), चन्दन, तीनस,
खैर, सफेद खैर, सलवन, अर्जुन, असन, अरिमेद (विट् खदिर), तिन्दुक,
किणिही (अपामार्ग), शमी (जंड), शुक्ति (बेर), शीशम, सिरस, अशोक,
| धान्वन और मुलेहठी ये बीस 'सारासव' है । पद्म (लाल आठ पत्तों वाला),
उत्पल (नील कमल), कुमुद, सौगन्धिक, पुण्डरीक, (श्वेत कमल), शतपत्र_
१. सौवीरं निष्तुषयवकृतम्, मैरेयं सुरासवकृता सुरा, मेदकः श्वेतसुर
जगलाख्या, धान्याम्बु (काञ्जि) ।