चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २० ] सूत्रस्थानम् २४५
अ० २० ] सूत्रस्थानम् २४५
चिरकारित्वानि श्लेष्मणः कर्माणि, तैरन्वितं श्लेष्मविकारमेवाध्यव-
स्येत् ॥ १८ ॥
तं कटुक-तिक्त-कषाय-तीक्ष्णोष्ण-रूक्षैरुपक्रमैरुपक्रमेत स्वेदन-वमन-
शिरोविरेचन-व्यायामादिभिः श्लेष्महरैर्मात्रां कालं च प्रमाणीकृत्य, वमनं
तु सर्वोपक्रमेभ्यः श्लेष्मणि प्रधानतमं मन्यन्ते भिषजः, तद्ध्यादित
एवाऽऽमाशयमनुप्रविश्य केवलं वैकारिकं श्लेष्ममूलमपकर्षति, तन्नाव-
जिते श्लेष्मण्यपि शरीरान्तर्गताः श्लेष्मविकाराः प्रशान्तिमापद्यन्ते,
यथा—भिन्ने केदारसेतौ शालि-यव-षष्टिकादीन्यभिष्यन्दमानान्यम्भसा
प्रशोषमापद्यन्ते तद्वदिति ॥ १६ ॥
इन सब कफ की विकारों में कहे हुए या नहीं कहे हुए रोगों को या उसके
एक भाग को कफ के अपने स्वाभाविक रूप से, कार्यों से, लक्षणों से पहिचान
कर कुशल पुरुष सन्देहरहित होकर श्लेष्मविकार ही हैं ऐसा निश्चय करते हैं।
यथा चिकास, शीतलता, सफेदी, भारीपन, मधुरता, मसृणता (पिच्छलता),
ये कफ के रूप हैं। निम्न प्रकार के कार्यों से कफ की पहिचान होती है—
शरीर के अवयवों में प्रविष्ट होकर कफ सफेदी, शीतलता, खाज, स्थिरता,
भारीपन, चिकास, जड़ता, निष्क्रियता, क्लिन्नता, चिकनापन, अवरोध, मधुरता,
देर में कार्य करना ये कफ के कार्य हैं। इनके द्वारा कफ रोग को जानना
चाहिये। इस कफ को शान्त करने के लिये कटु, तिक्त, कषाय, तीक्ष्ण, गरम
और रूक्ष उपक्रमणों से चिकित्सा करनी चाहिये। मात्रा और समय के अनुसार
स्वेद, वमन, शिरोविरेचन, व्यायाम आदि श्लेष्मनाशक कार्यों का प्रयोग करे।
कफ को शान्त करने के लिये वैद्य वमन को ही सब से उत्तम साधन मानते हैं।
वमन जल्दी से आमाशय में पहुंच कर सम्पूर्ण वैकारिक कफ को जड़ समेत
बाहर कर देता है। इस कफ के पूर्ण रूप से शान्त न होने पर भी शरीर के
अन्दर के कफरोग शान्त हो जाते हैं। जिस प्रकार कि धान्य, जौ, सांठी पानी
से भरे होने पर खेत की मेंट के टूटने पर पानी से खुश्क हो जाते हैं, (सूख
जाते हैं), इसी प्रकार कफ के निकलने से रोग भी नष्ट होजाते हैं ॥ १८-१६॥
भवन्ति चात्र—रोगमादौ परीक्षेत ततोऽनन्तरमौषधम् ।
ततः कर्म भिषक्पश्चाज्ज्ञानपूर्वं समाचरेत् ॥ २० ॥
यस्तु रोगमविज्ञाय कर्माण्यरभते भिषक् ।
अप्यौषधविधानज्ञस्तस्य सिद्धिर्यदृच्छया ॥ २१ ॥
यस्तु रोगविशेषज्ञः सर्व-भैषज्य-कोविदः ।
देश-काल-प्रमाण-ज्ञस्तस्य सिद्धिरसंशयम् ॥ २२ ॥
२४६ चरकसंहिता [ अ० २१
सब से प्रथम रोग की परीक्षा करनी चाहिये, उसके पीछे औषध की परीक्षा,
इसके अनन्तर वैद्य ज्ञानपूर्वक चिकित्सा का आरम्भ करे। जो वैद्य, रोग की
परीक्षा द्वारा निश्चय किये बिना चिकित्सा कर्म आरम्भ कर देता है, भले ही
वह वैद्य औषधि के विधान को जानता हो, तो भी उसकी सफलता निश्चित
नहीं ( कभी हो जाती है, और कभी नहीं)। जो वैद्य रोगों को भली प्रकार
जानता है, इसी प्रकार औषधियों को भी जानता है, साथ में देश, काल और
प्रमाण को भी समझता है, उसकी सफलता निश्चित, अवश्यम्भावी है ॥२०-२२॥
तत्र श्लोकाः—संग्रहः प्रकृतिर्देशो विकारमुखमीरणम् ।
असंदेहोऽनुबन्धश्च रोगाणां संप्रकाशितः ॥ २३ ॥
दोषस्थानानि रोगाणां गणा नानात्मजाश्च ये ।
रूपं पृथक्त्वादोषाणां कर्म चापरिणामि यत् ॥ २४ ॥
पृथक्त्वेन च दोषाणां निर्दिष्टाः समुपक्रमाः ।
सम्यङ् महति रोगाणामध्याये तत्त्वदर्शिना ॥ २५ ॥
रोगों की संक्षिप्त संख्या, इनके स्थान और इनके साक्षात् अथवा प्रेरक
कारण, असन्देह, और अनुबन्ध, दोषों के स्थान, नानाप्रकार के रोगों की
गणना, दोषों के पृथक् पृथक् रूप, और स्वाभाविक कर्म, दोषों के पृथक्
पृथक् शान्ति के उपाय, इस महारोग अध्याय में तत्त्वदर्शि पुनर्वसु ने कह
दिये हैं ॥२३-२४॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने रोगचतुष्के
महारोगाध्यायो नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
एकविंशोऽध्यायः ।
अथातोऽष्टौनिन्दितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे 'अष्टौनिन्दितीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा
भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
इह खलु शरीरमधिकृत्याष्टौ पुरुषा निन्दिता भवन्ति; तद्यथा—
अतिदीर्घश्चातिह्रस्वश्चाविलोमा चालोमा चातिकृष्णश्चातिगौरश्चातिस्थू-
लश्चातिकृशश्चेति ॥ ३ ॥
इस लोक में शरीर के सम्बन्ध में ( मन के सम्बन्ध में अधार्मिक आदि
इन से भिन्न हैं ) आठ पुरुष निन्दित माने जाते हैं । यथा १. अतिदीर्घ २.