चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २ ] सूत्रस्थानम २६
अ० २ ] सूत्रस्थानम २६
वैद्यापवादो यन्त्रस्थाः सर्वे च भिषजां गुणाः ।
सर्वमेतत्समाख्यातं पूर्वाध्याये महर्षिणा ॥ १४० ॥
आयुर्वेद का मर्त्यलोक में आना, हेतु-रोगों का उत्पन्न होना, भरद्वाज
मुनि द्वारा मर्त्यलोक में शास्त्रों का प्रचार, अग्निवेशादि का तन्त्र बनाना,
अग्निवेशादि द्वारा बनाये हुए तन्त्रों के लिये ऋषियों से दी हुई आज्ञा, हिताहित
आदि लक्षण रूप सामान्यादि छः कारण, कार्य्य-धातुओं को समान करना
आयुर्वेद का प्रयोजन है, संक्षेप से रोगों के कारण, काल, बुद्धि, इन्द्रियार्थ का
अतियोग, अयोग, मिथ्यायोग हो; दोष वात, पित्त, कफ, इनकी औषध; आकाश
आदि तीन, द्रव्य, जल और पृथिवी, इनके साथ, रसमधुर आदि, द्रव्यसंग्रह;
शमन आदि; एवं जंगम आदि के भेद से, मूलिनां-हस्तिदन्ती आदि सोलह;
फलिनी-शंखिनी आदि उन्नीस; स्नेह घी आदि चार, महास्नेह; लवण-सौवर्चल
आदि पांच; मूत्र आठ; क्षीर आठ, दूध वाले वृक्ष, छाल वाले स्नुही,
पूतीक आदि छः वृक्ष; इनके वमन-विरेचन आदि सब कर्म; औषध के सम्यक्
योग से जो गुण और असम्यक् योग से जो दुर्गुण हैं; मूढ़ वैद्य की निन्दा और
सब गुणों से युक्त वैद्य के लक्षण; यह सब इस प्रथम 'दीर्घञ्जीवितीय' नामक
अध्याय में महर्षि भगवान् आत्रेय ने सम्यक् प्रकार से कह दिया है ॥१३६-१४०॥
इत्याग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने सभाभाष्ये भेषज-
चतुष्के दीर्घञ्जीवितीयो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
अथ द्वितीयोऽध्यायः
अथातोऽपामार्गतण्डुलीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
वमन आदि पांच कर्म स्वस्थ एवं रोगी दोनों व्यक्तियों के लिये उपयोगी
हैं। इसलिये पूर्व अध्याय में कहे हुए वमन आदि के द्रव्यों को अन्य द्रव्यों के
साथ मिला कर इस अध्याय का अवतरण करते हैं।
अपामार्ग (चिरचिटा) के बीजों का तुष रहित करके, तण्डुल बना
कर काम में लाना चाहिए, यह बताने के लिये 'अपामार्ग-तण्डुलीय'
अध्याय है।
अपामार्गस्य बीजानि पिप्पलीर्मरिचानि च ।
विडङ्गान्यथ शिग्रूणि सर्षपांस्तुम्बुरूणि च ॥ ३ ॥
३० चरकसंहिता [ अ० २
अजाजीं चाजगन्धां च पीलून्येलां हरेणुकाम् ।
पृथ्वीकां सुरसां श्वेतां कुठेरकफणिज्जकौ ॥ ४ ॥
शिरीषबीजं लशुनं हरिद्रे लवणद्वयम् ।
ज्योतिष्मतीं नागरं च दद्याच्छीर्षविरेचने ॥ ५ ॥
गौरवे शिरसः शूले पीनसेऽर्धावभेदके ।
क्रिमिव्याधावपस्मारे घ्राणनाशे प्रमोहके ॥ ६ ॥
अपामार्ग (चिरचिटे) के तण्डुल, पिप्पली, मरिच, वायविडंग, सहंजन
के बीज, श्वेत सरसों, तेजबल के बीज, जीरा, अजमोदा (तिलवन), पीलू,
एला (छोटी इलायची), हरेणु (रेणुका, मेंहदी के बीज), पृथ्वीका
(कलौंजी), सुरसा (काली तुलसी), श्वेता (अपराजिता), कुठेरक
(मरवा), फणिज्जक (तुलसी का भेद), शिरीष बीज (सिरस के बीज),
लशुन (लहसन), दोनों हरिद्रा (हल्दी और दारु हल्दी), दोनों लवण
(सैन्धव और सौवर्चल), ज्योतिष्मती (मालकंगनी), और नागर (सोंठ) ये
शिरोविरेचन के लिये उपयोग में लानी चाहिये ।
इन उपरोक्त ओषधियों में 'श्वेता' और 'ज्योतिष्मती' ये दो द्रव्य 'मूलिनी'
ओषधियों में गिने गये हैं। इसलिये इनका मूल ग्रहण करना चाहिये, और अपा-
मार्ग (चिरचिटा) के तण्डुल उपयोग में लाने चाहिये ।
(गौरव) शिर के भारीपन में (शिरःशूल) शिर के दुखने में, (पीनस)
नाक से दुर्गन्ध युक्त स्राव, कफ आता हो, (अर्द्धावभेदक) आधा शिर
दुःखता हो, (कृमिव्याधि) कृमि जन्य शिरो रोग में, (अपस्मार) मृगी में,
(घ्राण नाश) घ्राण शक्ति के नष्ट होने पर और (प्रमोहक) मूर्छा इन रोगों में
शिरो विरेचन के रूप में प्रयोग करना चाहिये ॥ ३-६ ॥
वमनकारक द्रव्य—
मदनं मधुकं निम्बं जीमूतं कृतवेधनम् ।
पिप्पलीकुटजेक्ष्वाकूण्येला धामार्गवाणि च ॥ ७ ॥
उपस्थिते श्लेष्मपित्ते व्याधावामाशयाश्रये ।
वमनार्थं प्रयुञ्जीत भिषग् देहमदूषयन् ॥ ८ ॥
मदन (मैनफल), मधुक (मुलहेठी), नीम (नीम की छाल), जीमूत
(कडुवी तुरई), कृतबेधन (कडुवा तुम्बा), पिप्पली, कुटज (कुड़ा),
इक्ष्वाकु (कडुवी घिया या आल), एला (छोटी इलायची) धामार्गव (तुरई