सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० १८ ] सूत्रस्थानम् २२६

अ० १८ ] सूत्रस्थानम् २२६
स्थानान्तरगतश्चैव जनयत्यामयान् बहून् ॥ ४७ ॥
तस्माद्विकारप्रकृतीरधिष्ठानान्तराणि च ।
समुत्थानविशेषांश्च बुद्ध्वा कर्म समाचरेत् ॥ ४८ ॥
यो ह्येतत्त्रिविधं ज्ञात्वा कर्माण्यारभते भिषक् ।
ज्ञानपूर्वं यथान्यायं स कर्मसु न मुह्यति ॥ ४९ ॥
ये रोग रुजा ( पीड़ा ), वर्ण, समुत्थान अर्थात् कारण ( जैसे रूक्ष भोजन
या रात्रि जागरण आदि के कारण से वायु कुपित होकर भिन्न चिकित्सा से
शान्त होता है ), स्थान ( आमाशय, रसादि ), संस्थान ( आकृति गुल्म,
अर्बुद आदि ), नामभेद इन भेदों के कारण भेद होने से असंख्य बन जाते हैं ।
चिकित्सा कार्य में व्यवहार करने के लिये स्थूल संग्रह ( अष्टोदरीय संग्रह )
किया है। इसलिये चिकित्सा कार्य में प्रकृति की समानता से यह रोग वातजन्य,
यह पित्तजन्य, यह कफजन्य इत्यादि रोगों की व्यवस्था बांधनी चाहिये । रोगों
को नाम से न जानने वाला वैद्य कभी भी चिकित्सा कार्य में लज्जा न उठावे ।
सब रोगों की नाम द्वारा स्थिति नहीं, (सब रोगों के नाम नहीं) हैं। कोई एक
दोष कारण विशेष से कुपित होकर अन्य स्थान पर पहुंचकर नाना प्रकार के
रोगों को उत्पन्न कर देता है। इसलिये रोग के स्वभाव को, उस के अधिष्ठान
को, उस के भेदों को और रोग के विशेष कारणों को जानकर चिकित्सा कार्य
करना चाहिये । जो वैद्य इन तीन बातों को जानकर चिकित्सा का कार्य
ज्ञानपूर्वक उचित रूप से करता है, वह चिकित्सा कार्य में मोहित नहीं होता,
वह भूल नहीं करता ॥४४-४६॥
नित्याः प्राणभृतां देहे वात-पित्त-कफास्त्रयः ।
विकृताः प्रकृतिस्था वा तान् बुभुत्सेत पण्डितः ॥ ५० ॥
उत्साहोच्छ्वास-निःश्वास-चेष्टा धातुगतिः समा ।
समो मोक्षो गतिमतां वायोः कर्माविकारजम् ॥ ५१ ॥
दर्शनं पक्तिरूष्मा च क्षुत्तृष्णा देहमार्दवम् ।
प्रभा प्रसादो मेधा च पित्तकर्माविकारजम् ॥ ५२ ॥
स्नेहो बन्धः स्थिरत्वं च गौरवं वृषता बलम् ।
क्षमा धृतिरलोभश्च कफकर्माविकारजम् ॥ ५३ ॥
वाते पित्ते कफे चैव क्षीणे लक्षणमुच्यते ।
कर्मणः प्राकृताद्धानिर्वृद्धिर्वाऽपि विरोधिनाम् ॥ ५४ ॥

२३० चरकसंहिता [ अ० १८
दोष-प्रकृति-वैशेष्यं नियतं वृद्धिलक्षणम् ।
दोषाणां प्रकृतिर्हानिर्वृद्धिश्चैवं परीक्ष्यते ॥ ५५ ॥ इति ॥
शरीरधारियों के शरीर में वात, पित्त और कफ ये तीनों नित्य सदा रहते
हैं । वे या तो विकृत अवस्था में रहते हैं, या प्रकृत अर्थात् स्वाभाविक रूप में
रहते हैं । विद्वान् को चाहिये कि वह इन को पहिचाने, जाने कि विकृतावस्था
में हैं, या प्रकृतावस्था में । काम करने में उत्साह, सांस का अन्दर और बाहर
आना, चेष्टा, रस, रक्त आदि धातुओं की गति को समान रखना, पुरीष,
मल-मूत्र आदि गमन शील वस्तुओं को ठीक प्रकार से बाहर करना, ये अविकृत
वायु के कर्म हैं । देखना, अन्न का पचन, देहकी, उष्णिमा, भूख प्यास का
लगना, शरीर की कोमलता, कान्ति, मन की प्रसन्नता, और बुद्धि का होना ये
अविकृत पित्त के कार्य हैं । चिकनाई, सन्धियों का बन्धन, स्थिरता, भारीपन,
पुरुषत्व, बल, सहन शक्ति, मन की स्थिरता, धैर्य, लोभ का न होना ये अविकृत
कफ के कार्य हैं । वात, पित्त, कफ इन के क्षीण होने पर लक्षण कहते हैं—
स्वाभाविक कर्मों में न्यूनता आती है अथवा स्वाभाविक कर्मों के विरोधी
कार्यों की वृद्धि होती है ( यथा वायु के क्षीण होने पर उत्साह के विपरीत
विषाद बढ़ता है, पित्त के क्षीण होने पर नहीं दीखता, कफ के क्षीण होने पर
रूक्षता बढ़ती है ) । वृद्धि का लक्षण कहते हैं—दोष की प्रकृति ( स्वभाव )
का वैषम्य ( बढ़ना ) वृद्धि का लक्षण होता है । यथा—कफ की स्निग्धता,
मधुरता और शीतलता यह प्रकृति है, इसका अति स्निग्ध, अति शीत होना
वृद्धि है । इस प्रकार दोषों की प्रकृति, हानि और वृद्धि की परीक्षा करनी
चाहिये ॥ ५०-५५ ॥
तत्र श्लोकाः ।
संख्यां निमित्तं रूपाणि शोथानां साध्यतां न च ।
तेषां तेषां विकाराणां शोफांस्तांस्तांश्च पूर्वजान् ॥ ५६ ॥
विधिभेदं विकाराणां त्रिविधं बोध्यसंग्रहम् ।
प्राकृतं कर्म दोषाणां लक्षणं हानिवृद्धिषु ॥ ५७ ॥
वीत-राग-रजो-दोष-लोभ-मान-मद-स्पृहः ।
व्याख्यातवांस्त्रिशोफीये रोगाध्याये पुनर्वसुः ॥ ५८ ॥
शोथों की संख्या, कारण, लक्षण, साध्यासाध्य इनसे उत्पन्न रोगों को और
जिन रोगों में शोथ प्रथम होता है उनको, रोगों के विधि, भेद से तीन प्रकार की
प्रकृति का ज्ञान, दोषों के स्वाभाविक कर्म, वृद्धि और हानि के लक्षण, यह सब