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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० १७ ] १४ सूत्रस्थानम् २०६

अ० १७ ] १४ सूत्रस्थानम् २०६
वृद्ध कफ, सम पित्त; क्षीण वात; वृद्ध कफ, सम वात, क्षीण पित्त ये छः प्रकार।
दो दोषों की वृद्धि और एक दोष का क्षय, यथा-वृद्ध पित्त कफ, क्षीण वात;
वृद्ध वात कफ, क्षीण पित्त; वृद्ध वात पित्त, क्षीण कफ, यह तीन प्रकार का।
एक दोष की वृद्धि और दो दोषों का क्षय-यथा वृद्ध कफ, क्षीण वात-पित्त,
वृद्ध पित्त क्षीण कफ-वात, वृद्ध वात क्षीण पित्त-कफ ये तीन। इस प्रकार से
ये बारह भेद उपरोक्त पचास भेद से पृथक् हैं। कुल मिलकर बासठ (६२)
भेद हो जाते हैं ॥४१-४४॥
प्रकृतिस्थं यदा पित्तं मारुतः श्लेष्मणः क्षये।
स्थानादादाय गात्रेषु यत्र यत्र विसर्पति ॥ ४५ ॥
तदा भेदश्च दाहश्च तत्र तत्रानवस्थितः ।
गात्रदेशे भवत्यस्य श्रमो दौर्बल्यमेव च ॥ ४६ ॥
साम्ये स्थितं कफं वायुः क्षीणे पित्ते यदा बली।
कर्षेत्कुर्यात्तदा शूलं सशैत्य-स्तम्भ-गौरवम् ॥ ४७ ॥
यदाऽनिलं प्रकृतिगं पित्तं कफपरिक्षये ।
संरुणद्धि तदा दाहः शूलं चास्योपजायते ॥ ४८ ॥
श्लेष्माणं हि समं पित्तं यदा वातपरिक्षये ।
निपीडयेत्तदा कुर्यात्तन्द्रागौरवं ज्वरम् ॥ ४६ ॥
• प्रवृद्धो हि यदा श्लेष्मा पित्ते क्षीणे समीरणम् ।
रुन्ध्यात्तदा प्रकुर्वीत शीतकं गौरवं रुजम् ॥ ५० ॥
समीरणे परिक्षीणे कफः पित्तं समत्वगम् ।
कुर्वीत संनिरुन्धानो मृद्वग्नित्वं शिरोग्रहम् ॥ ५१ ॥
निद्रां तन्द्रां प्रलापं च हृद्रोगं गात्रगौरवम् ।
नखादीनां च पीतत्वं ष्ठीवनं कफपित्तयोः ॥ ५२ ॥
हीनवातस्य तु कफः पित्तेन सहितश्चरन् ।
करोत्यरोचकापाकौ सदनं गौरवं तथा ॥ ५३ ॥
हृल्लासमास्यस्रवणं दूयनं पाण्डुतां मदम् ।
विरेकस्य हि वैषम्यं वैषम्यमनलस्य च ॥ ५४ ॥
क्षीणपित्तस्य तु श्लेष्मा मारुतेनोपसंहितः ।
स्तम्भं शैत्यं च तोदं च जनयत्यनवस्थितम् ॥ ५५ ॥
गौरवं मृदुतामग्नेर्भक्ताश्रद्धां प्रवेपनम् ।
नखादीनां च शुक्लत्वं गात्रपारुष्यमेव च ॥ ५६ ॥

२१० चरकसंहिता [ अ० १७
हीने कफे मारुतस्तु पित्तं तु कुपितं द्वयम् ।
करोति यानि लिङ्गानि शृणु तानि समासतः ॥ ५७ ॥
भ्रममुद्वेष्टनं तोदं दाहं स्फुटनवेपने ।
अङ्गमर्दं परीशोषं दूयनं धूपनं तथा ॥ ५८ ॥
वात-पित्त-क्षये श्लेष्मा स्रोतांस्यपि दधद्भृशम् ।
चेष्टा-प्रणाशं मूर्च्छां च वाक्सङ्गं च करोति हि ॥ ५६ ॥
श्लेष्मवातक्षये पित्तं देहौजः संस्रयेच्चरत् ।
ग्लानिमिन्द्रियदौर्बल्यं तृष्णां मूर्च्छां क्रियाक्षयम् ॥ ६० ॥
पित्त-श्लेष्म-क्षये वायुर्मर्माण्यभिनिपीडयन् ।
प्रणाशयति संज्ञां च वेपयत्यथवा नरम् ॥ ६१ ॥
जिस समय कि पित्त अपनी प्रकृति में होता है और कफ क्षीण होता है,
उस समय वायु पित्त को उसके स्थान से लेकर शरीर में इधर-उधर दौड़ता
है । जिससे कि फटने की सी दर्द, जलन, थकान और निर्बलता उत्पन्न होती
है । शरीर में कफ के प्रकृत अवस्था में होने से, पित्त के क्षीण होने पर कुपित
बलवान् वायु कफ के साथ मिलकर वेदना, जड़ता, ठण्डक और भारीपन शरीर
में उत्पन्न करती है । शरीर में कफ क्षीण हो, पित्त कुपित हो, वायु प्रकृति रूप
में हो, तो पित्त वायु की गति बन्द करके जलन और दर्द उत्पन्न करता है ।
कफ समानावस्था में हो, पित्त कुपित और वायु का क्षय हो तो, कफ को रोककर
पित्त शरीर में तन्द्रा अर्थात् आलस्य, भारीपन और ज्वर उत्पन्न कर देता है ।
कफ बढ़ा हुआ हो, पित्त क्षीण हो, और वायु समानावस्थ हो, तो कफ वायु
की गति को बन्द करके ठण्डक, भारीपन और ज्वर उत्पन्न कर देता है ।
वायु का क्षय हो, पित्त समानावस्था में हो, कफ बढ़ा हुआ हो, तो कफ पित्त
की गति को बन्द करके, मन्दाग्नि, शिर का जकड़ना, नींद का आना, आलस्य,
प्रलाप, हृदय रोग, शरीर का भारीपन, नख, ओष्ठ, आंख आदि को पीलापन
तथा थूक में कफ और पित्त आने लगता है । वायु क्षीण हो और कफ एवं
पित्त दोनों बढ़े हुए एक साथ मिलकर शरीर में अरुचि, अविपाक भोजन का
अपचन, पीड़ा, भारीपन, वमन की रुचि, मुख से लार गिरना, पीड़ा, पीलापन,
नशा सा, मल त्याग में विषमता, मल का कभी आना कभी नहीं आना, इसी
प्रकार अग्नि की विषमता कभी भूख लगना और कभी नहीं लगना ये लक्षण
उत्पन्न करते हैं । पित्त के क्षीण होने पर कफ वायु के साथ मिलकर शरीर में
जड़ता, ठण्डक, कभी यहां और कभी वहां, अनिश्चित स्थान पर वेदना,
भारीपन, अग्नि की निर्बलता, भोजन में अनिच्छा, कम्पन, नख ( मल, ओष्ठ,

आंख ) में सफेद रंग और शरीर में रूक्षता अर्थात् रूखापन आ जाता है ।
कफ के क्षीण होने पर, वायु और पित्त दोनों कुपित होकर जो लक्षण शरीर में
उत्पन्न करते हैं, उनको संक्षेप से सुनो। शिर में चक्कर आना ऐंठन की पीड़ा,
चुभने की सी दर्द, जलन, शरीर का फटना, कम्पन, अंगों का टूटना, शुष्कता,
पीड़ा और धूप में बैठने से जैसे अंग गरम हो जाते हैं ऐसी जलन होती है ।
वात और पित्त दोनों क्षीण हों, केवल कफ बढ़ा हो तो—सब स्रोतों को कफ
रोक लेता है। इससे क्रियायें नष्ट हो जाती हैं, मूर्च्छा, जीभ-वाणी का बन्द हो
जाना, होता है। कफ और वात के क्षीण होने पर पित्त गति करता हुआ
शरीर के ओज ( कान्ति ) को चलायमान कर देता है। शरीर में ग्लानि,
थकान, इन्द्रियों की दुर्बलता, प्यास, मूर्च्छा और चेष्टाओं का नाश हो जाता
है। पित्त और कफ के क्षीण होने पर वायु मर्म स्थानों को विशेष रूप में
पीड़ित करती है। इससे मनुष्य की संज्ञा ( चेतना ) नष्ट हो जाती है, अथवा
मनुष्य कांपता है ॥४५-६१॥
दोषाः प्रवृद्धाः स्वं लिङ्गं दर्शयन्ति यथाबलम् ।
क्षीणा जहति लिङ्गं स्वं, समाः स्वं कर्म कुर्वते ॥ ६२ ॥
बढ़े हुए दोष अपनी शक्ति के अनुसार अपने ( स्वाभाविक ) लक्षणों को
उन्नति की अवस्था में दिखाते हैं। यथा—पित्त का स्वाभाविक लक्षण उष्णत्व
है। बढ़ने पर तीव्र उष्णिमा उत्पन्न करेगा। दोष क्षीण होने पर अपने
स्वाभाविक लक्षणों को छोड़ देते हैं, जैसे पित्त के क्षीण होने से स्वाभाविक
उष्णिमा नहीं रहती। समानावस्था में दोष अपना अपना काम करते हैं ॥६२॥
वातादीनां रसादीनां मलानामोजसस्तथा ।
क्षयास्तत्रानिलादीनामुक्तं संक्षीणलक्षणम् ॥ ६३ ॥
घट्टते सहते शब्दं नोच्चैर्द्रवति दूयते ।
हृदयं ताम्यति स्वल्पचेष्टस्यापि रसक्षये ॥ ६४ ॥
परुषा स्फुटिता म्लाना त्वग्रूक्षा रक्तसंक्षये ।
मांसक्षये विशेषेण स्फिग्ग्रीवोदरशुष्कता ॥ ६५ ॥
सन्धीनां स्फुटनं ग्लानिरक्षणोरायास एव च ।
लक्षणं मेदसः क्षीणे तनुत्वं चोदरस्य च ॥ ६६ ॥
केश-लोम-नख-श्मश्रु-द्विज-प्रपतनं भ्रमः ।
ज्ञेयमस्थिक्षये रूपं सन्धिशैथिल्यमेव च ॥ ६७ ॥
शीर्यन्त इव चास्थीनि दुर्बलानि लघूनि च ।
प्रततं वातरोगाश्च क्षीणे मज्जनि देहिनाम् ॥ ६८ ॥

२१२ चरकसंहिता [ अ० १७
दौर्बल्यं मुखशोषश्च पाण्डुत्वं सदनं श्रमः ।
क्लैब्यं शुक्राविसर्गश्च क्षीणशुक्रस्य लक्षणम् ॥ ६९ ॥
क्षीणे शकृति चान्त्राणि पीडयन्निव मारुतः ।
रूक्षस्योन्नमयन् कुक्षिं तिर्यगूर्ध्वं च गच्छति ॥ ७० ॥
मूत्रक्षये मूत्रकृच्छ्रं मूत्रवैवर्ण्यमेव च ।
पिपासा बाधते चास्य मुखं च परिशुष्यति ॥ ७१ ॥
मलायनानि चान्यानि शून्यानि च लघूनि च ।
विशुष्काणि च लक्ष्यन्ते यथास्वं मलसंक्षये ॥ ७२ ॥
बिभेति दुर्बलोऽभीक्ष्णं ध्यायति व्यथितेन्द्रियः ।
दुश्छायो दुर्मना रूक्षः क्षामश्चैवौजसः क्षये ॥ ७३ ॥
अठारह प्रकार के क्षय- वात, पित्त, कफ ये तीन दोष; रस-रक्त आदि
धातु, मल, मूत्र, कान का मल, इत्यादि सात मल और ओज इन (अठारह)
के क्षीण होने के लक्षण कहते हैं। इनमें वात, पित्त, कफ के क्षीण अवस्था के
लक्षण कह दिये हैं। रस के क्षीण होने पर हृदय मथा-बिलोया हुआ प्रतीत होता
है, ऊँची आवाज़ को सहन नहीं कर सकता, हृदय जल्दी-जल्दी चलता है।
पीड़ा होती है, ग्लानि होती है और थोड़ी क्रिया होती है, अथवा थोड़ी चेष्टा
से भी हृदय में उद्विग्नता आ जाती है। रक्त का क्षय होने पर त्वचा कठोर
हो जाती है, फट जाती है, झुर्रियां पड़ जाती हैं और रूखी बन जाती है।
मांस के क्षय होने पर-सारा शरीर क्षीण हो जाता है, परन्तु नितम्ब, ग्रीवा और
पेट विशेष रूप से पतले हो जाते हैं। अर्थात् मेद-चर्बी के क्षीण होने पर सन्धियां
टूटने-फूटने लगती हैं, अंगों में ग्लानि, आलस्य, आंखों पर थकान और पेट
पतला हो जाता है। अस्थियों के क्षय होने पर-शिर के बाल, शरीर के रोम,
दाढ़ी-मूंछ के बाल, दांत, नख गिरने लगते हैं। शरीर थका प्रतीत होता है,
और सब सन्धियां शिथिल पड़ जाती हैं। मज्जा के क्षीण होने पर-अस्थियां
मुरझाती गिरती हुई प्रतीत होती हैं, अस्थियां निर्बल और छोटी (हल्की) हो
जाती हैं और वातरोग जोर कर जाते हैं, निरन्तर वात रोग रहने लगता है।
शुक्र के क्षीण होने पर-शरीर में निर्बलता, मुख में सूखापन, चेहरे पर पीलास,
पीड़ा, थकान, पुरुषत्व की न्यूनता, सम्भोग समय में शुक्र का अभाव रहता
है। मल के क्षीण होने पर-वायु आंतों (अन्तड़ियों) को दबाती दुःखी करती
प्रतीत होती है। शरीर अन्दर और बाहर से रूक्ष हो जाता है। वायु पेट को
ऊपर उठाती हुई तिरछी या ऊपर को जाती है (नीचे नहीं जाती)। मूत्र के