चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०३
अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०३
गुर्वम्ल-हरितदानादतिशीताम्बु-सेवनात् ।
शिरोभितापाद् दुष्टामाद्रोदनाद् बाष्पनिग्रहात् ॥ १० ॥
मेघागमान्मनस्तापाद्देशकाल-विपर्ययात् ।
वातादयः प्रकुप्यन्ति शिरस्यस्रं च दुष्यति ॥ ११ ॥
ततः शिरसि जायन्ते रोगा विविधलक्षणाः ।
अग्निवेश के वचन को सुनकर गुरु महाराज बोले—हे सौम्य ! जो कुछ
तुमने पूछा है उसको ध्यान देकर सविस्तर सुनो । शिर के रोग पांच प्रकार के
हैं, और पांच ही प्रकार के हृदय रोग हैं। दोषों के वात-पित्त-कफ के परिमाण
से होने वाले रोग बासठ (६२) प्रकार के हैं । क्षय अठारह (१८) प्रकार के,
प्रमेह मधुमेह के कारण होने वाले फोड़े सात प्रकार के, और दोषों की गति
तीन प्रकार की है । इसी को अब विस्तार से सुनो । मूत्र आदि के उपस्थित
वेगों को रोकने से, दिन में सोने से, रात्रि में जागने से, नशा करने ( मदकारक
पदार्थों के सेवन ) से, ऊँचे या अधिक बोलने से, ओस से, सामने की वायु के
झोंके से, अति स्त्री-संभोग से,असात्म्य अर्थात् प्रतिकूल, गंध के सूंघने से, धूल धुवां
बर्फ या धूप के सेवन से, गरिष्ठ,खट्टे; धनिया-मरिच आदिके अधिक खाने से बहुत
ठण्डे पानी के सेवन से, शिर पर चोट लगने से, आम के दोष युक्त होने से
( अजीर्ण होने से ), रोने से, आंसुओं को रोकने से, बादलों के आने
से, मानसिक विक्षोभ से, देश-काल के बदलने से ( इन के अयोग,
अतियोग या मिथ्यायोग होने से ), ( अथवा भूकम्प, उल्कापात आदि
देश के मिथ्यायोग हैं इनसे वात, पित्त और कफ दूषित होकर शिर में रक्त को
दूषित करते हैं । रक्त के दूषित होने से आगे कहे जाने वाले नानाप्रकार के
लक्षणों वाले रोग शिर में उत्पन्न होते हैं ॥५-११॥
प्राणाः प्राणभृतां यत्र श्रिताः सर्वेन्द्रियाणि च ॥ १२ ॥
यदुत्तमाङ्गमङ्गानां शिरस्तदभिधीयते ।
प्राणधारियों के प्राण ( जीवन ) और सब इन्द्रियां ( ज्ञानेन्द्रियां ) जहां
पर स्थित हैं और जो शरीर के सब अंगों में मुख्य, श्रेष्ठ अंग है, उसको 'शिर'
कहते हैं ॥१२॥
अर्धावभेदको वा स्यात्सवं वा रुज्यते शिरः ॥ १३ ॥
प्रतिश्या-मुख-नासाक्षि-कर्ण-रोग-शिरो-भ्रमाः ।
अर्दितं शिरसः कम्पो गलमन्या-हनुग्रहः ॥ १४ ॥
विविधाश्चापरे रोगा वातादि-क्रिमि-संभवाः ।
२०४ चरकसंहिता [अ० १७
पृथग्दृष्टास्तु ये पञ्च संग्रहे परमर्षिभिः ॥ १५ ॥
शिरोगदांस्तान् शृणु मे यथास्वैर्हेतुलक्षणैः ।
शिर में उत्पन्न होने वाले रोग — आधे शिर का दुखना, सारे शिर का
दुखना, प्रतिश्याय (जुकाम, सर्दी), मुखरोग, नासिका के रोग, आंख के रोग,
शिर में चक्कर आना; चेहरे का लक़वा, शिर का हिलना, गलग्रह (गले का
बन्द होना), मन्याग्रह (गर्दन का इधर उधर न मुड़ सकना), हनुग्रह (जबड़ा
भिचना) और दूसरे वात आदि दोषों तथा कृमियों से उत्पन्न होने वाले रोग
शिर में होते हैं। वात, पित्त, कफ, सन्निपात और कृमिजन्य ये जो पांच प्रकार
के शिरोरोग (आगे जो अष्टोदरीय अध्याय १६ में) महर्षियों ने कहे हैं उनमें
से एक एक लक्षण सुनो ॥ १३-१५॥
उच्चैर्भाष्यातिभाष्याभ्यां तीक्ष्णपानात्प्रजागरात् ॥ १६ ॥
शीत-मारुत-संस्पर्शाद् व्यवायाद् वेगनिग्रहात् ।
अभिघातोपवासाच्च विरेकाद् वमनादपि ॥ १७ ॥
बाष्प-शोक-भय-त्रासाद् भार-मार्गातिकर्षणात् ।
शिरोगता वै धमनीर्वायुराविश्य कुप्यति ॥ १८ ॥
ततः शूलं महत्तस्य वातात्समुपजायते ।
निस्तुद्येते भृशं शङ्खौ घाटा संभिद्यते तथा ॥ १६ ॥
भ्रुवोर्मध्यं ललाटं च तपतीवातिवेदनम् ।
बध्येते स्वनतः श्रोत्रे निष्कृष्येते इवाक्षिणी ॥ २० ॥
घूर्णतीव शिरः सर्वं संधिभ्य इव मुच्यते ।
स्फुरत्यतिशिराजालं स्तभ्यते च शिरोधरा ॥ २१ ॥
स्निग्धोष्णमुपशेते च शिरोरोगेऽनिलात्मके ।
ऊंचे बोलने से, बहुत अधिक बोलने से, मद्य आदि तीक्ष्ण पदार्थों के पीने
से, रात्रि में जागने से, ठण्डी वायु के स्पर्श से, अतिमैथुन से, मल मूत्रादि के
उपस्थित वेगों को रोकने से, उपवास से, शिर पर चोट लगने से, अतिविरेचन से,
अतिवमन से, बाष्प (आंसू) को रोकने से, शोक से, भय से, भार के उठाने से,
अतिमार्ग के चलने से, परिश्रम से वायु कुपित होकर सिर में गया हुआ,
शिराओं में बढ़कर शिर में महान् शूल को उत्पन्न करता है। इस शूल के कारण
शंख (कनपटियों) पीड़ित होते हैं, गर्दन फटती है, भ्रुवों के बीच में माथे
पर बहुत वेदना होती है और माथा बहुत गरम होता है। कानों में गुंजार
(आवाज) सुनाई देती है, आंखें बाहर निकलती प्रतीत होती हैं, शिर घूमता