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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० १५ ] १३ सूत्रस्थानम् १६३

अ० १५ ] १३ सूत्रस्थानम् १६३

विरुद्ध भोजन अजीर्ण, असात्म्यप्रकृति के प्रतिकूल, अकाल, कुसमय, मात्रा से
कम, गुरु-भारी और विषम भोजन; उपस्थित बेगों को रोकना, अनुपस्थित
बेगो को बल पूर्वक बाहर करना, इस प्रकार के कर्मों का विचार मन से भी
न करे और सब प्रकार का उचित आहार-भोजन करे। वह रोगी इसी
प्रकार करे ॥ १७ ॥

अथैनं सायाह्ने परे वाऽह्रि सुखोदकपरिषिक्तं पुराणानां लोहितशालि-
तण्डुलानां स्ववक्लिन्नानां मण्डपूर्वां सुखोष्णां यवागूं पाययेदग्निबलम-
भिसमीक्ष्य च, एवं द्वितीये तृतीये चान्नकाले। चतुर्थे त्वन्नकाले
तथाविधानामेव शालितण्डुलानामुत्त्वन्नां विलेपीमुष्णोदकद्वितीयाम-
स्नेह-लवणामल्प-स्नेह-लवणां वा भोजयेत्, एवं पञ्चमे षष्ठे चान्नकाले,
सप्तमे त्वन्नकाले तथाविधानामेव शालीनां द्विप्रसृतं सुस्विन्नमोदनमुष्णो-
दकानुपानं तनुना तनु-स्नेह-लवणोपपन्नेन मुद्गयूषेण भोजयेत्,
एवमष्टमे नवमे चान्नकाले, दशमे त्वन्नकाले लावकपिञ्जलादीनामन्य-
तमस्य मांसरसेनौदकलावणिकेनापि सारवता भोजयेदुष्णोदकानुपानम्,
एवमेकादशे द्वादशे चान्नकाले, अत ऊर्ध्वमन्नगुणान् क्रमेणोपभुञ्जानः
सप्तरात्रेण प्रकृतिभोजनमागच्छेत् ॥ १८ ॥

इसके पीछे रोगी को सायंकाल अथवा अगले दिन कुछ गरम पानी से
सम्पूर्ण अंगों का स्नान कराये। एक साल पुराने सांठी चावलों का यवागू बना
कर जब गल जावे, तब थोड़ी गरम यवागू के ऊपर की माण्ड को पहिले
पीवे। फिर अग्नि का बल देखकर शेष गाढ़े भाग को खावे। इस प्रकार दूसर
तीसरे भोजन के समय भी अग्निबल को देखकर इसी प्रकार का यवागू खावे।
चौथे भोजन काल में इसी प्रकार पुराने सांठी के चावलों से (विलेपी रूप में
बनाई) थोड़े नमक और स्नेहरहित यवागू को गरम पानी के साथ खाये।
(प्रथम दो तीन समयों में जल, नमक और स्नेह नहीं खाना चाहिये)। इस
प्रकार पांचवें और छठे अन्न-काल में चौथे समय के अनुसार बरते। सातवें
भोजन समय में पुराने सांठी के चावलों को दो प्रसृति लेकर पकाये। इन
चावलों को गरम पानी के साथ, थोड़े से घी एवं नमक के साथ मूंग के यूष
के साथ खावे। इसी प्रकार आठवें और नवे भोजन के समय में भी करे।
दसवें अन्न-काल में बटेर, कपिञ्जल आदि किसी पशु-पक्षी के मांस रस के साथ
धनी व भाई चावलों की यवागू खाये, तथा गरम पानी ऊपर से पीये। इसी
प्रकार ग्यारहवें और बारहवें अन्न-काल में क्रम से, मृदु, मध्य, कठिन (अथवा

१६४ चरकसंहिता [ अ० १५
गुरु, कठिन मधुर ) पदार्थों को सेवन करने पर सात दिन पीछे अपने स्वाभाविक
भोजन को ग्रहण करे ॥१८॥
अथैनं पुनरेव स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्यानुपहतमनसमभिसमीक्ष्य
सुखोषितं सुप्रजीर्णभक्तं कृत-होम-बलि-मङ्गल-जप्य-प्रायश्चित्तमिष्टति-
थि-नक्षत्र-करण-मुहूर्ते ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयित्वा त्रिवृत्कल्काक्षमात्रं
यथार्हालोडनप्रतिविनीतं पाययेत् प्रसमीक्ष्य दोष-भेषज-देश-काल-बल-
शरीराहार-सात्म्य-सत्त्व-प्रकृति-वयसामवस्थान्तराणि विकारांश्च ।
सम्यग्विरिक्तं चैनं वमनानन्तरलक्षणोक्तेन धूमवर्जेन विधिनोपपादये-
दाबल-वर्ण-प्रकृति-लाभात् । बलवर्णोपपन्नं चैनमनुपहतमनसमभिस-
मीक्ष्य सुखोषितं सुप्रजीर्णभक्तं शिरःस्नातमनुलिप्तगात्रं स्रग्विणमनुप-
हत-वरू-संवीतमनुरूपालङ्कारालङ्कृतं सुहृदां दर्शयित्वा ज्ञातीनां दर्शयेत् ,
अथैनं कामेष्ववसृजेत् ॥ १९ ॥
भवन्ति चात्र--अनेन विधिना राजा राजमात्रोऽथवा पुनः ।
यस्य वा विपुलं द्रव्यं स संशोधनमहर्हति ॥ २० ॥
दरिद्रस्त्वापदं प्राप्य प्राप्तकालं विरेचनम् ।
पिबेत्काममसंभृत्य संभारानपि दुर्लभान् ॥ २१ ॥
न हि सर्वमनुष्याणां सन्ति सर्वपरिच्छदाः ।
न च रोगा न बाधन्ते दरिद्रानपि दारुणाः ॥ २२ ॥
यद्यच्छक्यं मनुष्येण कर्तुमौषधमापदि ।
तत्तत्सेव्यं यथाशक्ति वसनान्यशनानि च ॥ २३ ॥
मलापहं रोगहरं बल-वर्ण-प्रसादनम् ।
पीत्वा संशोधनं सम्यगायुषा युज्यते चिरम् ॥ २४ ॥
इसके सात दिन पीछे जब मनुष्य में बल आजाय, तब फिर स्नेहन और
स्वेदन कर्म करके, प्रसन्न मन देखकर, रात्रि में सुखपूर्वक सोने पर, पहिले
दिन का खाया भोजन भली प्रकार जीर्ण होने पर, अग्निहोत्र, बलि, मंगल, जप,
प्रायश्चित्त करके, पवित्र तिथि, नक्षत्र मुहूर्त्त का विचार करके, ब्राह्मणों से
मंगल पाठ करा कर त्रिवृत् कल्क ( विरेचन द्रव्य ) निशोथ के चूर्ण की एक
अक्ष मात्रा, योग्य द्रव्य में मिलाकर पिलावे । औषध देते समय दोष, औषध
मात्रा, देश, समय, शरीर, आहार, सात्म्य, सत्त्व, प्रकृति, आयु और रोगों
की विवेचना कर ले । सम्यक् विरेचन होने पर वमन के पीछे की सम्पूर्ण विधि
( धूम्रपान को छोड़कर ) करे । जब तक कि शरीर में बल कान्ति न आय,