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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० १४] सूत्रस्थानम् १७५

अ० १४] सूत्रस्थानम् १७५
शराब से उत्पन्न रोगवाला, परिश्रम करने से थके, मूर्च्छित, बेहोश रोगी,
स्थूल-चर्बीवाले पुरुष, पित्तजन्य प्रमेही, प्यासे पुरुष, भूखे, क्रोधी, शोक-
चिन्ता-ग्रस्त, कामला, उदर रोगी, कुष्ठ रोगी, वात रक्त रोगी, निर्बल, बहुत
रूक्ष शरीर वाले, जिनका ओज क्षीण हो गया हो उनका, तथा तिमिर रोगियों
को स्वेद नहीं देना चाहिये । (परन्तु तीव्र व्याधि में अल्पस्वेद दिया जा
सकता है ) ॥१६–१६॥
प्रतिश्याये च कासे च हिक्का-श्वासेष्वलाघवे ।
कर्णमन्या-शिरःशूले स्वरभेदे गलग्रहे ॥ २० ॥
अर्दितेकाङ्ग-सर्वाङ्ग-पक्षाघाते विनामके ।
कोष्ठानाहविवन्धेषु शुक्राघाते विजृम्भके ॥ २१ ॥
पार्श्व-पृष्ठ-कटी-कुक्षि संग्रहे गृध्रसीषु च ।
मूत्रकृच्छ्रे महत्त्वे च मुष्कयोरङ्गमर्दके ॥ २२ ॥
पादोरु-जानु-जङ्घार्ति-संग्रहे श्वयथावपि ।
खल्लीष्वामेषु शीते च वेपथौ वातकण्टके ॥ २३ ॥
संकोचायामशूलेषु स्तम्भ-गौरव-सुप्तिषु ।
सर्वाङ्गेषु विकारेषु स्वेदनं हितमुच्यते ॥ २४ ॥
स्वेद योग्य व्यक्ति—जुकाम, खांसी, हिक्का, दमा, शरीर का भारीपन, कान
की दर्द, मन्या-शूल, शिरोवेदना, स्वरभेद, गलग्रह, अर्दित (चेहरे का लकवा ),
एकांग वात, सर्वाङ्ग वात, पक्षाघात रोग, विनामक (दण्डापतानक आदि )
में, पेट का अफ़रा, मल-मूत्र के अवरोध में (कब्ज), शुक्र के अवरोध,
जम्भाई का अधिक आना, पार्श्वशूल, पृष्ठवेदना, कटिशूल, कुक्षिशूल, गृध्रसी
रोग, मूत्रकृच्छ्र रोग, अण्डवृद्धि, सारे शरीर में वेदना, पांव की वेदना या
ऐंठन, घुटना अथवा जंघा की पीड़ा अथवा ऐंठन, खल्ली अर्थात् हाथ-पांव के
ऐंठन में, आम रोग, शीतावस्था, कंपकंपी, वातकण्टक, गुल्फाश्रित वात रोग,
शरीर को संकुचित करने वाले वात रोग, आयाम अन्तरायाम वात रोग, शूल-
वेदना, स्तम्भ (शरीर की जड़ता), भारीपन, अंग का सो जाना या स्पर्श
ज्ञान का अभाव, शून्यता, ज्वरादि और वात-श्लेष्मा आदि रोगों की दशाओं
में स्वेद देना हितकारी है ॥२०-२४॥
स्वेदन द्रव्य—
तिल-माष-कुलत्थाम्ल-घृत-तैलामिशौदनैः ।
पायसैः कृशरैर्मांसैः पिण्डस्वेदं प्रयोजयेत् ॥ २५ ॥

१७६ चरकसंहिता [अ० १४

गो-खरोष्ट्रवराहाश्व-शकृद्भिः सतुषैर्यवैः ।
सिकता-पांशु-पाषाण-करीषायस-पूटकैः ॥ २६ ॥
श्लैष्मिकान् स्वेदयेत् पूर्वैर्वातिकान् ममुपाचरेत् ।
द्रव्याण्येतानि शम्यन्ते यथास्वं प्रस्तरेष्वपि ॥ २७ ॥
भूगृहेषु च जेन्ताकेपूष्णगर्भ गृहेषु च ।
विधूमाङ्गारतप्तष्वभ्यक्तः स्विद्यति ना सुखम् ॥ २८ ॥
तिल, उड़द, कुलथी, अम्ल (चांगेरी-चोपनिया), घृत, तैल, ओदन-
पके हुए चावल, खीर (मात्रा-दूध का खोया), (तिल और मांस की
खिचड़ी), माछ, इन पदार्थों को गोलकार बना कर 'पिण्ड स्वेद' का प्रयोग
करना चाहिये । रूक्ष स्वेद के द्रव्य—गाय का गोबर, गधे का मल, ऊँट का
मल, सुअर का मल और घोड़े की लाँद, छिलकों वाले जौ, रेता, पांशु (धूली-
बारीक रेत), पत्थर (ईंट का) चूरा, छाना (अरना) का चूर, आयस-
लोहे का चूरा, इनका पोटली बनाकर कफ रोगियों को स्वेद देना चाहिये और
तिल, उड़द आदि से वातरोगियों को स्वेद देना चाहिये । पिण्ड स्वेद को
'संकर स्वेद' कहते हैं । ये तिल आदि पदार्थ प्रस्तर स्वेद में भी प्रशस्त हैं ।
नाड़ी स्वेद—भूमि को खोद कर बनाया हुआ घर, जेन्ताक अर्थात् कृत्रिम विधि
से गरम किया हुआ घर, उष्ण गर्म अर्थात् हमाम-बिना खिड़की के घर,
इनमें, वातहर, या कफहर लकड़ियों को जलाकर, धुवें रहित अंगारों से इन
घरों को गरम करके, शरीर का स्नेहन करने के पीछे मनुष्य सुखपूर्वक स्वेद ले
सकता है ॥२५-२८॥
ग्राम्यानूपौदकं मांसं पयो बस्तशिरस्तथा ।
वराह-मध्य-पित्तासृक् स्नेहवत्तिल-तण्डुलाः ॥ २९ ॥
इत्येतानि समुत्क्वाथ्य नाडीस्वेदं प्रयोजयेत् ।
देश-काल-विभागज्ञा युक्त्यपेक्षा भिषक्तमः ॥ ३० ॥
वारुणामृतकेरण्ड-शिग्रु-मूलक-सर्षपैः ।
वासा-वंश-करञ्जार्क-पत्रैरश्मन्तकस्य च ॥ ३१ ॥
शोभाञ्जनक-शैरेय-मालती-सुरसार्जकैः ।
पत्रैरुत्क्वाथ्य सलिलं नाडीस्वेदं प्रयोजयेत् ॥ ३२ ॥
भूतीक-पञ्चमूलाभ्यां सुरया दधिमस्तुना ।
मूत्रैरम्लैश्च सस्नेहैर्नाडीस्वेदं प्रयोजयेत् ॥ ३३ ॥
एत एव च निर्यूहाः प्रयोज्या जलकोष्ठके ।

स्वेदनार्थं घृत-क्षीर-तैल-कोष्ठांश्च कारयेत् ॥ ३४ ॥
नाड़ीस्वेद के लिए—ग्राम्य ( पालतू ) पशु और जलीय जन्तुओं का
मांस, दूध, बकरी का शिर, सुअर का मध्यभाग, पित्त, रक्त, एरण्ड के बीज,
तिल ( तुष रहित ) इन सबकों यथायोग्य उबालकर नलिका द्वारा स्वेद देवे।
देश, काल के विभाग को समझने वाला और युक्ति-प्रयोगविधि जानने वाला
वैद्य स्वेद देवे। यह स्वेद वात रोग में हितकारी है। वरना, गिलोय, ऐरण्ड,
सहजन, मूली के बीज, बांसा, रेणु, करञ्ज, आक, पाषाणभेद और चागेरी के
पत्ते लाल सहजन, शिलाह्रा, अत्तक ( तुलसी भेद ) इनके पत्तों को और छालों
को भी क्वाथ करके देश, काल के विभाग को जानने वाला, युक्ति को समझने
वाला वैद्य नाड़ीस्वेद देवे, यह स्वेद कफ जन्य रोगों में हितकारी है। भूतीक
( बड़ी अजवायन ), पञ्चमूल (बृहत्पञ्चमूल वात कफ हर होने से), सैरेय (झिंटी),
दही का पानी ( मस्तु ), आठों प्रकार के मूत्र, अम्लवर्ग से, स्नेह, घृत, तैल
आदि के साथ क्वाथ करके वात-कफ मे नाड़ीस्वेद देना चाहिये। ये ग्राम्य
मांस आदि तीनो निर्यूह ( क्वाथ ) क्रम से, वातजन्य, कफजन्य, और वात-
कफजन्य रोगों में 'जल कोष्ठक' अर्थात् इनके क्वाथों से भरे द्रोणीपात्र में खड़ा
करके आदमी को स्वेद देवे। स्वेदन के लिये घी का कोठा ( कोष्ठ ), दूध का
कोठा, या तैल का कोठा भी बना लेना चाहिये ॥२६-३४॥
गोधूम-शकलैश्चूर्णैर्यवानाम्म्लसंयुतः ।
सस्नेह-किण्व-लवणरुपनाहः प्रशस्यते ॥ ३५ ॥
गन्धैः सुरायाः किण्वेन जीवन्त्या शतपुष्पया ।
उमया कुष्ठतैलाभ्यां युक्त्या चोपनाहयेत् ॥ ३६ ॥
चर्मभिश्च पनद्धव्यः सलोमभिरपूतिभिः ।
उष्णवीर्यैरलाभे तु कौशेयाविकशाटकैः ॥ ३७ ॥
रात्रौ बद्धं दिवा मुञ्चेन्मुञ्चेद्रात्रौ दिवाकृतम् ।
विदाह-परिहारार्थं, स्यात्प्रकर्षस्तु शीतले ॥ ३८ ॥
उपनाह विधि-गेहूं का दरकच चूर्ण, जौ का चूर्ण, कांजी, तैल, मद्यकिट्ट
के साथ मिलाकर गरम करके उपनाह ( पुलटिस ) बांधना वातजन्य रोगों में
उपकारी है। चन्दन अगरू आदि सुगन्धित पदार्थ मद्य पात्र में बैठे तलछट-
प्रक्षेप, जीवन्ती सौंफ, कफजन्य रोगों में इनकी पुलटिस लगावे। अलसी, कूठ
और तैल से पुलटिस तैयार करे, इसे वात-कफ रोगियों में प्रयोग करे दुर्गन्ध
रहित, बालोंवाली एवं उष्ण वीर्य वाली खालों से लेप को बांध देना चाहिये।
और जब ऐसे चमड़े न मिले तो रेशमी वस्त्रों से या ऊन से बने कम्बल से

१७८ चरकसंहिता [ अ० १४

बांधना चाहिये। रात्रि में प्रलेप लगाकर बांधे हुए बन्धन को दिन में खोल
देना चाहिये। दिन में बांधे बंधन को रात में खोल देना चाहिये। जिससे कि
जलन उत्पन्न न हो। शीत (हेमन्त और शिशिर) काल में बंधी रहने में कोई
डर नहीं दिन में बंधी पट्टी रात भी रह जाय, तो कोई डर नहीं ॥ ३५-३८ ॥
संकरः प्रस्तरो नाडी परिषेकोऽवगाहनम् ।
जेन्ताकोऽश्मघनः कर्षूः कुटी भूः कुम्भिकैव च ॥ ३६ ॥
कूपो होलाक इत्येते स्वेदयन्ति त्रयोदश ।
तान् यथावत्प्रवक्ष्यामि सर्वानेवानुपूर्वशः ॥ ४० ॥ इति ।
स्वेदकर्म के तेरह प्रकार हैं १. संकर, २. प्रस्तर, ३. नाड़ी, ४. परिषेक,
५. अवगाहन, ६. जेन्ताक, ७. अश्मघन, ८. कर्षू, ९. कुटी, १०. भू
११. कुम्भिक, १२. कूप, १३. होलाक, ये तेरह प्रकार के स्वेद हैं। इन तेरह
स्वेदों को क्रमशः कहते हैं ॥३६-४०॥
तत्र वस्त्रान्तरितैरवस्त्रान्तरितैर्वा पिण्डैर्यथोक्तैरुपस्वेदनं संकरस्वेद
इति विद्यात् ॥ ४१ ॥
(१) संकरस्वेद - तिल, माष आदि पदार्थों का पिण्ड बनाकर वस्त्र में
लपेट कर अथवा बिना वस्त्र में लपेटे ही गरम करके स्वेदन कार्य करने का
नाम 'संकर-स्वेद' है ॥४१॥
शूक-शमी-धान्य-पुलाकानां बेसवारपायस-कृशरोत्कारिकादीनां वा
प्रस्तरे कौशेयाविकोत्तर-प्रच्छदे पद्माङ्गुलोरुबकार्कपत्र-प्रच्छदे वा
स्वभ्यक्त-सर्व-गात्रस्य शयानस्योपरि स्वेदनं प्रस्तरस्वेद इति
विद्यात् ॥ ४२ ॥
(२) प्रस्तर स्वेद - शूक धान्य (चावल गेहूँ आदि), शमी धान्य
(मूंग, उड़द, चना आदि), पुलाक (चावल रहित धान्य, पटास), बेसवार,
पायस (मावा, खोया), कृशरा, तिल, उड़द की बनी यवागू, उत्कारिका
(उड़द की बनी पूरी या पूवा), आदि वस्तुओं को गरम करके, पत्थर
(अथवा काष्ठ आदि कड़ी वस्तु पर फैलाये हुए) रेशम, कम्बल (ऊनी वस्त्र)
को फैलाकर, अथवा ऐरण्ड, उरूबक (छोटा एरण्ड), या आक के पत्तों को
फैलाकर इन पर औषध लगा देवे। फिर सारे शरीर पर स्नेह लगा कर इन
पत्तों या वस्त्र पर लेट कर स्वेद लेने का नाम 'प्रस्तरस्वेद' है ॥४२॥
स्वेदनद्रव्याणां पुनर्मूल-फल-पत्र-शुङ्गादीनां मृग-शकुनि-पिशित-शिर-
स्पदादीनामुष्णस्वभावानां वा यथार्हमम्ल-लवण-स्नेहोपसंहितानां मूत्रक्षी-
रादीनां वा कुम्भ्यां बाष्पमनुद्गमन्त्यामुत्कथितानां नाड्या शरेषीका-वंश-