चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १ ] विमानस्थानम् ४९१
अ० १ ] विमानस्थानम् ४९१
इस प्रकार से आहार विधि के विशेष आठ आयतन कह दिये हैं। ये
प्रकृति आदि आठों आयतन शुभ और अशुभ फल (स्वास्थ्य एवं अस्वास्थ्य)
को उत्पन्न करने में परस्पर एक दूसरे के सहायक होते हैं। इस लिये वैद्य
इन को भी जाने। इन में जो सम-धातुओं को प्रकृति में रक्खें और विषम
धातुओं को समान करें उन को जानकर हितकारक का सेवन करे। मोह,
अज्ञान अथवा लापरवाही से आपातप्रिय (सेवन के समय अतिप्रिय), परन्तु
उत्तरकाल में परिणाम में दुःख विकार वा रोगकारक अहित आहार पदार्थों या
अन्य इस प्रकार के विहार का सेवन नहीं करना चाहिये ॥ २९ ॥
तत्रेद्माहारविधिविधानमरोगाणामातुराणां च केषाञ्चित्काले प्रकृ-
त्यैव हिततमं भुञ्जानानां भवति । उष्णं स्निग्धं मात्रावज्जीर्णे वीर्या-
विरुद्धमिष्टे देशे इष्टसर्वोपकरणं नातिद्रुतं नातिविलम्बितमजल्पन्नह-
संस्तन्मना भुञ्जीताऽऽत्मानमभिसमीक्ष्य सम्यक् ॥ ३० ॥
यहां आगे कही जाने वाली आहार विधि स्वस्थ एवं रोगी दोनों के लिये
उचित समय में स्वभाव से हितकारक होती है।
आहार विधि-उष्ण (गरम) भोजन खावे, स्निग्ध भोजन करे, मात्रानु-
सार खाये, पूर्व भोजन के जीर्ण होने पर खाये, अविरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों को
खाये, मनोवाञ्छित स्थान पर, मन के अनुकूल उपकरणों के साथ, न बहुत
जल्दी, न बहुत धीरे, बिना बोले, बिना हँसे, पूर्ण मन देकर, आत्मा के सात्म्य
या अपनी शक्ति को देखकर भली भांति विचार कर खाये ॥ ३० ॥
तस्य साद्गुण्यमुपदेक्ष्यामः-उष्णमश्नीयात् । उष्णं हि भुज्यमानं
स्वदते, भुक्तं चाग्निमौदर्यमुदीरयति, क्षिप्रं च जरां गच्छति, वातं
चानुलोमयति, श्लेष्माणं च परिशोषयति, तस्मादुष्णमश्नीयात् ॥३१॥
इस प्रकार भोजन करने के सद्गुणों का उपदेश करते हैं-गरम, जितना-
गरम मुख में सहन हो सके, उतना गरम भोजन करे। गरम भोजन रुचि उत्पन्न
करता है, खाने में अच्छा लगता है। खाने पर जाकर अग्नि को बढ़ाता है,
शीघ्र पाचन हो जाता है। वायु का अनुलोमन करता है, कफ को सुखाता है।
इस लिये गरम भोजन खावे ॥ ३१ ॥
स्निग्धमश्नीयात् । स्निग्धं हि भुज्यमानं स्वदते, युक्तमौदर्यमग्नि-
न्ति, क्षिप्रं जरां गच्छति, वातमनुलोमयति, दृढीकरोति शरीरो-
पचाभिवृद्धिं चाभिजमयति, वर्णप्रसादमपि चाभिनिर्वर्तयति
यात् ॥ ३२ ॥
स्निग्ध भोजन करे। स्निग्ध भोजन खाने में अच्छा लगता है। खाने पर
निर्बल जाठराग्नि को बढ़ाता है। शीघ्र परिपाक होता है। वायु का अनुलोमन
करता है, शरीर को बढ़ाता है, इन्द्रियों को बलवान् बनाता है, शरीर में बलकी
वृद्धि करता है, रंग में कान्ति, चिकनाई उत्पन्न करता है, इसलिये स्निग्ध
भोजन करे ॥ ३२ ॥
मात्रावदश्नीयात् । मात्रावद्धि भुक्तं वात-पित्त-कफानप्रपीडयदायुरेव
विवर्धयति केवलं, सुखं गुदमनुपर्येति, न चोष्माणमुपहन्ति, अव्यथं
च परिपाकमेति, तस्मान्मात्रावदश्नीयात् ॥ ३३ ॥
मात्रा में खावे। मात्रा में खाया हुआ अन्न वात, पित्त और कफ को कुपित
नहीं करता, केवल आयु को ही बढ़ाता है। परिपाक होकर सुखपूर्वक गुदा
मार्ग से बाहर निकल आता है। शरीर की अन्तराग्नि को नहीं बिगाड़ता, बिना
कष्ट के परिपाक हो जाता है, इसलिये मात्रा में भोजन करे ॥ ३३ ॥
जीर्णेऽश्नीयात् । अजीर्णे हि भुञ्जानस्याभ्यवहृतमाहारजातं
पूर्वस्याऽऽहारस्य रसमपरिणतमुत्तरेणाऽऽहाररसेनोपसृजत् सर्वान्दो-
षान् प्रकोपयत्याशु, जीर्णे तु भुञ्जानस्य स्वस्थानस्थेषु दोषेष्वग्नौ चोदीर्णे,
जातायां च बुभुक्षायां, विवृतेषु च स्रोतसां मुखेषु, चोद्गारे विशुद्धे,
विशुद्धे च हृदये, वातानुलोम्ये, विसृष्टेषु च वात-मूत्र-पुरीष-वेगेष्वभ्य-
वहृतमाहारजातं सर्वशरीरधातूनप्रदूषयदायुरेवाभिवर्धयति केवलम्,
तस्माज्जीर्णेऽश्नीयात् ॥ ३४ ॥
पूर्व-भुक्त भोजन के जीर्ण होने पर खावे। अजीर्ण अवस्था में भोजन
करने से पूर्व में खाये हुए भोजन के अपरिपक्व रस से नवीन आहार का रस
मिलकर शीघ्र ही दोषों को प्रकुपित कर देता है। इसलिये पूर्व भुक्त भोजन के
जीर्ण होने पर, दोषों के अपने स्थान में स्थित होने पर, अग्नि के उदीप्त होने
पर, भूख लगने पर, अन्नवह स्रोतों के मुखों के खुल जाने पर, डकार के
विशुद्ध होने पर, हृदय ( आमाशय ) के साफ होने पर, वायु के अनुकूल होने
पर वायु, मूत्र, मल के वेगों के साफ होने पर किया हुआ भोजन शरीर के सब
धातुओं को समान अवस्था में रखता हुआ, केवल आयु को ही बढ़ाता है, इस
लिये जीर्ण अवस्था में भोजन करे ॥ ३४ ॥
वीर्याविरुद्धमश्नीयात् । अविरुद्धवीर्यमश्नन् हि न विरुद्ध-
जैर्विकारैरुपसृज्यते, तस्माद्वीर्याविरुद्धमश्नीयात् ॥ ३५ ॥
अविरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों को खावे। अविरुद्ध
वाले पदार्थ के सेवन करने से, विरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों के सेवन से उत्पन्न
होने वाले (कुष्ठ, वीसर्प आदि) रोगों से मनुष्य बचा रहता है, इसलिये
अविरुद्ध वीर्य वाले पदार्थों को खावे ॥ ३५ ॥
इष्टे देशेऽश्नीयात् । इष्टे हि देशे भुञ्जानो नानिष्टदेशजैर्मनोवि-
घातकरैर्भावैर्मनोविघातं प्राप्नोति, तथेष्टैः सर्वोपकरणैः, तस्मादिष्टे देशे
तथेष्टसर्वोपकरणं चाश्नीयात् ॥ ३६ ॥
अभिमत प्रदेश में मनोनुकूल उपकरणों के साथ भोजन करे । मनो-
वाञ्छित स्थान में भोजन करने से, अनिष्ट देश में उत्पन्न होने वाले, मन को
दुःखी करने वाले भावों से मनुष्य दुःखी नहीं होता है। यही बात मन के
अनुकूल उपकारणों के साथ भी जाने । इसलिये इष्ट स्थान में और अभिमत
उपकरणों के साथ भोजन करें ॥ ३६ ॥
नातिद्रुतमश्नीयात्, अतिद्रुतं हि भुञ्जानस्योत्स्नेहनमवसादनं, भोज-
नस्याप्रतिष्ठानं, भोज्यदोषसाद्गुण्यौपलब्धिश्च न नियता, तस्मान्नाति-
द्रुतमश्नीयात् ॥ ३७ ॥
बहुत जल्दी जल्दी भोजन नहीं करे। बहुत जल्दी भोजन खाने से भोजन
उन्मार्ग अर्थात् विरुद्ध मार्ग में जाने लगता है। जल्दी खाया हुआ भोजन
अवसन्नता पैदा करता है, तथा भोजन आमाशय में नहीं रहता, वमन हो जाता
है। जल्दी खाने से भोजन के गुण दोष की पहिचान भी नहीं होती, इसलिये
बहुत जल्दी भोजन नहीं करे ॥ ३७ ॥
नातिविलम्बितमश्नीयात् । अतिविलम्बितं हि भुञ्जानो न तृप्तिम-
धिगच्छति, बहु भुङ्क्ते, शीतीभवति चाऽऽहारजातं, विषमपाकं च
भवति, तस्मान्नातिविलम्बितमश्नीयात् ॥ ३८ ॥
बहुत धीरे रुक रुक कर भी भोजन नहीं करे। बहुत धीरे धीरे खाने से
पुरुष को कभी तृप्ति नहीं होती, इसलिये बहुत खा जाता है। भोजन भी ठण्डा
पड़ जाता है, भोजन विषम रूप में पचता है, इसलिये बहुत धीरे धीरे भोजन
नहीं करे ॥ ३८ ॥
अञ्जल्पन्नहसंस्तन्मना भुञ्जीत—जल्पतो हसतोऽन्यमनसो वा भुञ्जा-
नस्य त एव हि दोषा भवन्ति य एवातिद्रुतमश्नतः, तस्मादजल्पन्नह-
संस्तन्मना भुञ्जीत ॥ ३९ ॥
बातें न करते हुए या न हंसते हुए मनोयोग के साथ भोजन करे। बातें
हुए और हंसते हुए अथवा दूसरी तरफ अन्य कार्य में मन को लगाये
४६४ चरकसंहिता [ अ० २
हुए भोजन करने पर वे ही दोष उत्पन्न होते हैं जो जल्दी खाने में उत्पन्न होते
हैं । इसलिये बिना बोले, बिना हंसे, पूर्ण मनोयोग के साथ भोजन करे ॥ ३९ ॥
आत्मानमभिसमीक्ष्य भुञ्जीत सम्यक् । इदं ममोपशेते, इदं नोपशेते
इति, विदितं ह्यस्य आत्मन आत्मसात्म्यं भवति, तस्मादात्मानमभि-
समीक्ष्य भुञ्जीत सम्यगिति ॥ ४० ॥
अपनी रुचि वा हित-अहित को देखकर भोजन करे । मेरी आत्मा को यह
अनुकूल है, यह प्रतिकूल है, यह मेरे सात्म्य है, यह मेरे असात्म्य है,
ऐसा विचार कर खावे । इस प्रकार खाने से आत्मसात्म्य का ज्ञान रहता है ।
इसलिये अपनी शक्ति और हित-अहित का विवेचन करके खाना चाहिये ॥४०॥
भवति चात्र—रसान् द्रव्याणि दोषांश्च विकारांश्च प्रभावतः ।
वेद यो देशकालौ च शरीरं च स नो भिषक् ॥ ४१ ॥
जो पुरुष रस, द्रव्य, दोष, विकार, प्रभाव, देश, काल, शरीर ( प्रकृति,
सत्त्व और सात्म्य ) इन को भली प्रकार जानता है वही हम में से वैद्य होने
योग्य है ॥ ४१ ॥
तत्र श्लोकौ—विमानार्थो रसद्रव्यदोषरोगाः प्रभावतः ।
द्रव्याणि नातिसेव्यानि त्रिविधं सात्म्यमेव च ॥ ४२ ॥
आहारायतनान्यष्टौ भोज्यसाद्गुण्यमेव च ।
विमाने रससंख्याते सर्वमेतत्प्रकाशितम् ॥ ४३ ॥
विमानस्थान का प्रयोजन, रस, द्रव्य, दोष और रोग इन चारों का प्रभाव,
बहुत अधिक सेवन न करने योग्य द्रव्य, तीन प्रकार का सात्म्य, आठ आहार
विधि के आयतन, भोजन का साद्गुण्य, ये सब बातें इस 'रस' संज्ञक विमान
में भगवान् आत्रेय ने प्रकाशित कर दी हैं ॥ ४२-४३ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते तृतीये विमानस्थाने
रसविमानं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः ।
—०*०—
अथातस्त्रिविधकुक्षीयं विमानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब इसके आगे 'त्रिविध कुक्षीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करें
जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥