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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

सूत्र-निदान-विमानात्मक

ॐ श्रीः ॐ
महर्षि अग्निवेश प्रणीत
चरक-संहिता
चरक और दृढ़बल से प्रतिसंस्कृत
( हिन्दी अनुवाद )
सूत्र-निदान-विमानात्मक
प्रथम खण्ड
अनुवादक—
कविराज श्री अत्रिदेवजी गुप्त,
विद्यालंकार, भिषग्रत्न
( गुरुकुल विश्वविद्यालय )
प्रकाशक—
भार्गव पुस्तकालय, गायघाट, बनारस।
ब्राञ्च—कचौड़ीगली, बनारस।
[द्वितीय संस्करण] सर्वाधिकार सुरक्षित

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दो शब्द
श्रीचरकसंहिता आयुर्वेद में एक सर्वमान्य पुस्तक है। इसका
पठन पाठन आयुर्वेद के विद्यार्थि के लिये अति आवश्यक है। वास्तवमें
चरकसंहिता का तथा दूसरे ग्रन्थों का स्पष्टीकरण जितना पढ़ाने
में होता है, उतना पढ़ने के समय नहीं होता। यही कारण है कि आयु-
र्वेद सम्प्रदाय के मुख्य आचार्य श्री गंगाधर जी कविराज, श्री योगीन्द्र-
नाथ सेन जी श्रीचरकसंहिता पर जल्पकल्पतरु और चरकोपस्कार
टीकायें लिखकर आयुर्वेद के प्रेमियों का बहुत उपकार किया। इनमें
चरकोपस्कारभाष्य तो विद्यार्थियों के लिये बहुत ही उत्तम और लाभ
दायक है। पढ़ते समय विद्यार्थी की मनोवृत्ति बहुत ही विचित्र
रहती है; खास कर आजकल के आयुर्वेद कॉलेज की जीवन में;
जब कि उसको पाश्चात्य विद्या भी सत्तर प्रतिशत सीखनी होती
है। ऐसी अवस्था में तो वह उत्तीर्ण होकर उपाधि ही प्राप्त करने का
इच्छुक रहता है। इसमें कोई दो चार अपवाद भी होते हैं। यह वृत्ति
हमारे यहां ही हो-यह बात नहीं; पाश्चात्य देशों में भी इसका-मनुष्य
धर्म के स्वभाव के अनुसार परिचय मिलता है। इसके लिये संक्षिप्त
प्रकाशन, या सारांश रूप में पुस्तकें छोटी-छोटी प्रकाशित की जाती
हैं। यह पुस्तकें सस्ती, छोटी तथा आवश्यक सब विषयों से पूर्ण रहती
हैं। इनमें विद्यार्थी को जहाँ आर्थिक भार से बचत होती है वहाँ
श्रेणी में सुना सब विषय समझने में सरलता रहती है।
इसी कारण से या अन्य कारणों से बंगला में, मराठी में या तेलगु
में जो भी अनुवाद चरकसंहिता या दूसरे आयुर्वेद ग्रन्थोंके हुए हैं, वे
सस्ते, तथा मूल के साथ साथ अनुवाद रूप में ही हैं। उनको स्पष्ट
करने के लिये किसी भी अर्वाचीन रूप की सहायता नहीं ली गई और
इन ग्रन्थों के पढ़ने से सफल वैद्य बने हैं, ऐसा हमारे देखने में भी है।
मेरी अपनी मान्यता यह है कि आयुर्वेद के विचारों को आयुर्वेद
के ही दृष्टि कोण से देखा या समझा जा सकता है; और इन्हीं के
दृष्टि कोण से देखने और समझने की कोशिश करनी चाहिये। इस
अर्वाचीन चिकित्साशास्त्र से हमारे शास्त्र का समन्वय सिद्धान्तों में
हो ही नहीं सकता। दोनों पद्धतियां भिन्न हैं, और भिन्न रहेंगी यह कोई
आवश्यक नहीं कि दोनों को एक किया जाय। होम्योपैथ अपनी
पद्धति का ऐलोपैथी के साथ गोट-जोड़ा नहीं करता। 'आयुर्वेद'

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शब्द और 'एलोपैथी' ये दोनों शब्द ही भिन्न हैं, और इनके अर्थों
में तो जमीन और आसमान का अन्तर है। इतनाही नहीं अपितु छत्तीस
का सम्बन्ध है। फिर दोनों कैसे एक हो सकते हैं। इसलिये इस
प्रकार को मिलाकर पुस्तकें लिखना-प्राचीन ग्रन्थों के प्रति न्याय मैं
नहीं समझता। साथ ही आधुनिक विज्ञान प्रति दिन उन्नति पर है,
आज से पच्चीस साल के पहले के सिद्धान्त-आज बहुत कुछ बदल गये;
आज के सिद्धान्त-कल नहीं बदलेंगें यह कोई नहीं कह सकता। ऐसी
अवस्था में इन पुस्तकों में केवल अग्रेंजी पुस्तकों का उलथा देना
युक्तिसंगत मैं नहीं समझता !
इन सब बातों का विचार करके मैंने आयुर्वेद के दृष्टिकोण का
विचार करते हुए विद्यार्थियों की दृष्टि से, उनकी रुचि के अनुसार
यह अनुवाद किया है। यह अनुवाद आज से बीस साल पहले का
है, इस संस्करण में भी इसकी पुनरावृत्ति नहीं कर सकता केवल कुछ
थोड़े से स्थानों को छोड़कर। क्योंकि संस्करण बहुत दिनों से समाप्त
था विद्यार्थियों की मांग थी। इसलिये इसको प्रकाशित करना जल्दी
थी। प्रथम प्रकाशक-श्री आर्यसाहित्य मण्डल लिमिटेड अजमेर वालों
को कई बार इसके लिये कहा-परन्तु लड़ाई के कारण तथा अन्य
असुविधा के कारण वे इसका प्रकाशन नहीं कर सके। कानून
के अनुसार पब्लिशर बनने का या पब्लिश करने का सबको अधिकार
नहीं। इसके सिवाय कागज की असुविधा। इसलिये मुझे किसी ऐसे
पब्लिशर की इच्छा थी जो इस समय इन असुविधाओं में भी
इसका प्रकाशन शीघ्र कर दे। श्रीकैलाशनाथजी भार्गव अमर
मालिक भार्गव पुस्तकालय काशी वाले से पत्र व्यवहार हुआ और अब
तो उन्होंने इसको छापना भी स्वीकार किया जिसका फल यह है कि इस
समय में कागज कम्पोजिटर आदि की कठिनाई होते हुए भी यह छप
सका। इसके लिये वे धन्यवाद के पात्र हैं। अग्रिम संस्करण में
सम्भव हुआ तो इसकी पुनरावृत्ति हो सकेगी।
आशा है कि जिस प्रकार वैद्य समाज ने, विद्यार्थियों ने इसकी
पहला संस्करण अपनाया था उसी प्रकार इसका यह भी दूसरा संस्करण
अपनायेंगे। इति शम्

$\left.{l} गुरुकुल कांगड़ी
१-७-४८ \right}$ \hspace{2cm} अत्रिदेवगुप्त